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अपने ही अंत की ओर बढ़ रहे हैं हम,कुदरत को ललकारते हुए-कवि अरमान राज़

अपने ही अंत की ओर बढ़ रहे हैं हम,कुदरत को ललकारते हुए-कवि अरमान राज़

जन्म के बाद ली प्रथम सांस के साथ,
भोग और विलासता के दास बन,
हर इच्छा पूर्ती की चेष्टा लिए,
अपने ही अंत की ओर बढ़ रहे हैं हम।।

कुदरत को ललकारते हुए,
अपने वज़ूद से लड़ रहे हैं हम।।
हर क्षेत्र में किस्मत को आज़माते हुए,
अंधकारमय भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं हम।।

गलतियों पर गलतियाँ करते हुए,
अपने ही मुज़रिम खुद बन रहे हैं हम।।
अपनी मर्ज़ी को बस तवज़्ज़ो देते हुए,
मौत के फंदे की ओर खुद बढ़ रहे हैं हम।।।

खुद मुट्ठी भर मिट्टी से बन कर,
स्वप्निल इमारतों को साकार कर रहे हैं हम।।
विकास पथ पर चलने की कोशिश में,
मुट्ठी भर मिट्टी मे ही मिलने चले हैं हम।।।

हर पल एक नयी और स्फूर्ति भरी,
हर शुरुआत में विनाश रच रहे हैं हम।।
स्वर्णिम भविष्य लिखने की चेष्टा लिए,
अपना ही अंत खुद लिख रहे हैं हम।।।

अपना ही अंत खुद लिख रहे हैं हम।।।
अपना ही अंत खुद लिख रहे हैं हम।।।
युवा कवि अरमान राज़

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