“कर हर मैदान फ़तेह” से एक उभरता हुआ सितारा पर अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ :संगीतकार विक्रम मंतरोसे

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तारे धरती पर देखे हैं आपने ? मैंने देखा है एक सितारा उभरता हुआ पर अपनी मिट्टी से जुड़ा हुआ । आज हम बात कर रहे हैं विक्रम मंतरोसे की; युवा, मेहनती और प्रतिभाशाली संगीत निर्देशक । हाल ही में प्रदर्शित हुई फिल्म “संजु” के गीत “कर हर मैदान फ़तेह” जिसे लिखा है शेखर अस्तित्व जी ने, अपने सूरों से सजाया है सुखविंदर जी ने और इन मोतियों को एक माला में पिरोया है संगीत निर्देशक विक्रम जी ने । आज हर ओर यह गीत लोगों का ना केवल मन मोह रहा है बल्कि उन्हें उल्लास से भी भर दे रहा है । यह गीत प्रोत्साहन गान बन चुका है ।

इस गीत के अलावा भी विक्रम ने एक और गीत को संगीतबद्ध किया है जो इसी फिल्म के अंत में है “बाबा बोलता है बस हो गया” । इलाहाबाद में जन्में, पलें-बढें विक्रम को कुछ पंद्रह-सोलह वर्ष की आयु में ही सुरों से लगाव हो गया था और उनकी लगन इतनी पक्की थी कि अल्पायु में उन्होंने मुंबई आने का निर्णय ले लिया । विक्रम, जिन्हें तब ना कोई मुंबई में जानता था, जो शायद स्वयं भी नहीं जानते होंगे कि  प्रारम्भ कहाँ से करें ! लेकिन उन्होंने जब ठान ही लिया था कि संगीत को ही जीवन की पहचान बनाना है तब दिल्ली कहाँ दूर थी ! वैसे शुरुआत में मुंबई आकर विक्रम ने कुछ कम्पनियों में नौकरियाँ कीं और उसी समय उन्होंने स्वयं ही संगीत निर्माण करना सीखा ।

विक्रम की माता जी स्वयं बहुत अच्छी गायिका हैं और लोक गीतों जैसे भारतीय संगीत में महारत प्राप्त है । बातों में बातों ही पता चला कि विक्रम बचपन से ही संगीत के प्रति बहुत जुनूनी रहे हैं । विक्रम ने किसी विशेष अकादमी से संगीत की शिक्षा ना ली हो परंतु नीलकंठ की भाँति वे संगीत को स्वयं में समाहित कर गए हैं । वर्ष २००५ से २०१८ की यात्रा लंबी अवश्य रही परंतु उन्हें वह पहला पड़ाव मिल ही गया जिसके लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की । पहली ही फिल्म से लोगों के दिलों में अपने लिए जगह बनाने वाले विक्रम वास्तविक जीवन में बहुत ही विनम्र और सरल स्वभाव के हैं । वैसे आज २२ अगस्त को उनका जन्मदिन भी है ।

“एक अच्छा  गीत बनाने के लिए आवश्यक है कि कहानी को समझना और स्वयं ही अपने कार्य की सबसे पहले समीक्षा करना । जब तक मुझे गीत के अच्छे होने का आभास ना हो, जब तक वह गीत मुझे और मेरे लोगों को ना छूए तब तक मैं उस गीत पर काम करता रहता हूँ “ – विक्रम । वे आगे बताते हैं कि जब शेखर ने यह गीत लिखा तो हिरानी जी को पहली ही बार में यह गीत पसंद आ गया था और उसके बाद विक्रम और उनके दल ने दिन-रात एक कर लोगों को यह उपहार दिया ।     

अपने मूल्यवान समय से कुछ पल हमें देकर विक्रम जी ने हमें संगीत के बारे में, अपने बारे में बहुत कुछ बताया ।  क्योंकि किसी कलाकार को चंद पन्नों में, शब्दों में समेटना आसान नहीं है इसलिए हम अपने लेख को यही विराम देते हैं । अजेयभारत और मुंबई विभाग प्रमुख – करन निम्बार्क, विक्रम मंतरोसे जी को उनके आगामी भविष्य की ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं और हमें प्रतीक्षा रहेगी उनकी नई रचना की ।                                       

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