जानियें गोवर्धन पर्वत का इतिहास और परिक्रमा का महत्व

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Report by Rekha Vaishnav

इस आर्टिकल के द्वारा हम मथुरा के गोवर्धन पर्वत के बारें में बताने जा रहें हैं। गोवर्धन पर्वत की कहानी बेहद रोचक है।  यह गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत आता है। गोवर्धन और उसके आसपास के भूमि को ब्रज भूमि के नाम से भी जाना जाता हैं। क्योंकि यह भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। द्वापर युग में मथुरा, गोकुल, वृंदावन आदि के लोगों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी अंगुली पर उठाया था। फिर नगरवासी इस पर्वत के नीचे इकठ्ठा हो गए जिससे उनकी जान बच गई। इस पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व हैं और परिक्रमा करने के लिए लोग दूर-दूर से मथुरा आतें हैं।

Govardhan Mountain की कहानी

वैसे तो गोवर्धन पर्वत की कई कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन उसमें से एक कहानी ये भी हैं। इस कहानी के अनुसार,ऐसा कहा जाता हैं कि, भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में धरती पर जन्म लिया। ताकि श्री कृष्ण कंस के अत्याचारों का अंत कर सकें। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तभी गोवर्धन पर्वत भी श्रीकृष्ण के धाम गोलोक से आकर धरती पर स्थापित हो गया था। वेद पुराणों के अनुसार गोवर्धन पर्वत द्रोणाचल पर्वत के पुत्र थे।

ऐसा कहा जाता हैं कि काशी के ऋषि पूतसल्य गोवर्धन पर्वत की सुंदरता से बहुत अधिक प्रभावित हुए और पर्वत को काशी ले जाने की ठान ली। ऋषि ने द्रोणाचल से कहा मैं तुम्हारें पुत्र गोवर्धन को अपने साथ ले जाना चाहता हूं। द्रोणाचल ने उन्हें इसकी इजाजत दे दी। लेकिन गोवर्धन ने ऋषि के समाने एक शर्त रखी की अगर वो थककर उन्हें रास्ते में कहीं भी रख देते हैं तो वो वहीँ स्थापित हो जाएंगे और आगे नहीं जायेंगे। ऋषि ने बिना सोचे समझे गोवर्धन पर्वत की बात मान ली।

गोवर्धन पर्वत हैं श्रापित

गोवर्धन पर्वत को श्रापित माना जाता हैं। जब ऋषि गोवर्धन को काशी ले जाते समय ब्रज मंडल से गुजर रहें थे तब गोवर्धन ने अपना वजन अचानक से बढ़ा लिया। ऋषि, गोवर्धन का वजन सहन नहीं कर सकें और उन्हें ब्रज मंडल की भूमि पर ही रख दिया। तभी से यह पर्वत वहीं स्थापित हो गया हैं। लेकिन जाते-जाते ऋषि ने गोवर्धन पर्वत को श्राप दे दिया की एक दिन वो पृथ्वी से गायब हो जायेंगा। शायद यहीं वजह है कि, गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) दिनों दिन घटता जा रहा है। करीब 5 हजार साल पहले यह पर्वत 30 हजार मीटर ऊँचा था, लेकिन अब यह पर्वत 30 मीटर ही रह गया हैं।

जानियें गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) का इतिहास और परिक्रमा का महत्वजानियें क्यों बढ़ाया गोवर्धन ने अपना वजन

गोवर्धन पर्वत जब ब्रज मंडल में पहुंचे तो उन्हें धरती पर अपने आने का सही मकसद का एहसास हुआ। क्योंकि वे श्री कृष्ण के सानिध्य में आने के लिए ही धरती पर आये थे। इसलिए गोवर्धन ने ब्रज की भूमि पर पहुंचते ही अपना वजन बढ़ा लिया। गोवर्धन पर्वत को श्री गिरिराज के नाम से भी जाना जाता हैं। गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) की सम्पूर्ण परिक्रमा पूरे 21 कि.मी की है। माना जाता हैं कि,यह पर्वत लगभग पांच हजार साल पुराना हैं।

गोवर्धन पर्वत की एक और प्रचलित कथा

गोवर्धन पर्वत की एक ओर कथा हैं। इस कथा के अनुसार त्रेता युग में जब श्री राम जी, सीता जी को लाने के लिए लंका गए, तब राम जी रामसेतु का निर्माण करते हैं। जब रामसेतु को बनाने के लिए पत्थर कम पड़ जाते हैं तो श्रीराम हनुमान जी से कहते हैं तुम कहीं से पत्थरों का इंतेजाम करो। तब हनुमान जी को गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain)दिखाई देता हैं। हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को पूरी गाथा सुनातें हैं। गोवर्धन पर्वत हनुमान जी की मदद करने के लिए तैयार हो जातें हैं और वे एक शर्त रखतें हैं कि, वे आजीवन प्रभु श्री राम के काम में आएंगे। हनुमान ने उनकी शर्त मान ली।

जब हनुमान जी गोवर्धन पर्वत के साथ मथुरा पंहुचें तो उन्हें संदेश मिला की रामसेतु बन चूका हैं अब पत्थर की जरूरत नहीं हैं तब हनुमान जी ने पर्वत को वहीं छोड़ दिया, इससे गोवर्धन पर्वत बहुत अधिक नाराज हुए। हनुमान जी ने श्रीराम को गोवर्धन पर्वत की नाराजगी का कारण बताया, तो श्रीराम जी ने हनुमान जी से कहा तुम गोवर्धन से कहो मैं द्वापर युग में कृष्ण के रूप में उन्हें अपनी ऊँगली पर धारण करूँगा। तभी से गोवर्धन पर्वत मथुरा में ही हैं।

जानियें गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) का इतिहास और परिक्रमा का महत्व

गोवर्धन पर्वत पर हैं कई कुंड और सरोवर

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते समय मध्य में गोवर्धन गाँव पड़ता है। उत्तर दिशा की ओऱ राधाकुण्ड गाँव और दक्षिण दिशा में पुछारी गाँव वसा है। गोवर्धन पर्वत में कई सारें मंदिर, दुकान, होटल आदि हैं। इन सब के अलावा यहां के प्रमुख स्थल हैं श्रीराधा-गोविंद मंदिर, रुद्र कुंड, श्या‍म कुंड, उद्धव कुंड, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, आन्यौर, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लोटा, दानघाटी, हनुमान का पंचमुखी रूप, केदारनाथ धाम, माता वैष्णो देवी मंदिर इत्यादि सुंदर स्थल हैं। गोवर्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी और एक शिला पर भगवान कृष्ण के चरण चिह्न भी हैं।

सड़क के दोनों और गोवर्धन पर्वत और कई भव्य मंदिर हैं। परिक्रमा करते वक्त लगता ही नहीं हैं कि, हम किसी पर्वत पर विचरण कर रहें हैं। क्योंकि पर्वत के दोनों ओर बहुत सारें घर, मकान, कुंड, होटल, रेस्टोरेंट हैं। यहाँ परिक्रमा लगातें समय ऐसा लगता हैं, मानों हम किसी नगर में विचरण कर रहें हैं।

Govardhan Mountain की परिक्रमा का महत्व

गोवर्धन परिक्रमा का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक लाखों भक्त यहां की सप्तकोसी (21 कि. मी.) परिक्रमा करते हैं। इन दिनों परिक्रमा करने वालों की प्रशासन विशेष व्यवस्था करते है। उनके खाने पिने और बीमार होने पर ईलाज की भी व्यवस्था सरकार करती है। वहां रह रहें कई लोग भंडारा भी करवातें है और परिक्रमा कर रहें लोगों को बड़े सम्मान के साथ खाना खिलातें है। सभी लोग अपनी छमता के अनुसार परिक्रमा लगातें है। कोई चलकर परिक्रमा लगातें है तो कोई लेट-लेट कर या दण्डवत करते हुए अपनी परिक्रमा पूरी करते है। दण्डवत परिक्रमा करने में एक हफ्ता का समय लग जाता है। गोवर्धन पर्वत लोगों की आस्था से जुड़ा हैं, लोग श्री कृष्ण की भक्ति में मग्न होकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करतें है। कहा जाता हैं कि, गिरिराज महाराज सभी की मनोकामना पूरी करते हैं।

जानियें गोवर्धन पर्वत (Govardhan Mountain) का इतिहास और परिक्रमा का महत्व

मथुरा से गोवर्धन कैसे पहुंचे

गोवर्धन मथुरा शहर से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर हैं। यहाँ जीप, बस, ऑटो आदि द्वारा पहुँच सकते हैं। मथुरा के लिए देश के सभी भागों से रेल यातायात भी जुड़ा हुआ हैं। मथुरा से गोवर्धन पर्वत तक आसानी से आ सकतें हैं। गोवर्धन पर्वत पर ठहरने के लिए होटल और धर्मशाला आदि की व्यवस्था भी हैं। (Govardhan Mountain) गोवर्धन पर्वत समस्त गौड़ीय सम्प्रदाय, अष्टछाप कवि एवं अनेक वैष्णव रसिक संतों की साधाना स्थली भी रही है।

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