….जेल ने बदल दिए जिंदगी के मायने

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अजेय भारत : राधा मोहन वैष्णव : नई दिल्ली :’गैंग्स आफ वासेपुर’ का जिक्र होते ही जेहन में उभरती है एक कुख्यात शख्स की तस्वीर। फिल्म के पहले ही दृश्य में ‘सुलतान कुरैशी’ नाम का ये बंदा जब दिल दहलाने वाली आवाज में कहता है कि ‘जितने भी छेद हैं, सबको गोलियों से भर दो’ तो थिएटर में बैठे सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस किरदार को अपनी सशक्त अदाकारी से यादगार बनाने वाले अभिनेता हैं पंकज त्रिपाठी। पंकज ने खास मुलाकात के दौरान अपनी रियल व रील लाइफ से जुड़े विभिन्न पहलुओं को बेबाकी से बयां किया।

बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसन गांव के रहने वाले पंकज ने कहा- मैं किसान परिवार में जन्मा हूं। दसवीं तक गांव के स्कूल में पढ़ाई की। फिर दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर आरएसएस की गतिविधियों से जुड़ गया। मधुबनी कांड में मुझे फुलवारी कैम्प जेल जाना पड़ा। यही मेरी जिंदगी का पहला टर्निंग प्वाइंट था। जेल में मेरा साहित्य से जुड़ाव हुआ। मैंने मुक्तिबोध की कविताएं पढ़ीं। जेल में बिताए सात-आठ दिनों ने मेरी जिंदगी के मायने ही बदल दिए। जेल से रिहा होने पर साहित्य की वजह से नाटकों के प्रति रुझान पैदा हुआ। सालभर कई नाटक देखे। फिर नाटकों में अभिनय करने लगा। इसके बाद तीन साल दिल्ली में नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में प्रशिक्षण हासिल लिया। फिर पटना आकर थिएटर करने लगा। कुछ वक्त बाद अहसास हुआ कि थिएटर करके परिवार चलाना संभव नहीं है इसलिए मुंबई चला गया।

मुंबई में शुरुआत के तीन साल काफी संघर्ष किया। निर्माता-निर्देशकों के आफिस का पता करने में ही एक से डेढ़ साल निकल गए। कई बार मनोबल टूटा भी, लेकिन फिर से हिम्मत जुटाकर संघर्ष जारी रखा। 2004 में बोनी कपूर की फिल्म ‘रन’ से पहला ब्रेक मिला। मुझे आज भी याद है कि पहला चेक 8000 रुपये का था, जिसमें बोनी कपूर की अभिनेत्री पत्नी श्रीदेवी के हस्ताक्षर थे। जिनका मैं कभी सपना देखा करता था।

रन के बाद अपहरण, आक्रोश, अग्निपथ, दबंग-2 और फुकरे जैसी फिल्मों में अभिनय का जौहर दिखा चुके पंकज ने कहा-आज मैं जहां तक भी पहुंच पाया हूं, अपने बलबूते पहुंचा हूं। गॉडफादर होने से चीजें भले आसान हो जाती हैं लेकिन आदमी उसका ऋणी हो जाता है। मेरा कोई गाडफादर नहीं है इसलिए मैं स्वतंत्र और निडर हूं।

पंकज उस दिन को याद करके आज भी भावुक हो उठते हैं जब उन्होंने अपनी पत्नी को जुहू में अपनी तस्वीर वाली होर्डिंग्स दिखायी थी। उन्होंने कहा-उस दिन मुझे अहसास हुआ कि मुंबई को मायानगरी क्यों कहा जाता है। जिस शहर की सड़कों पर मैंने इतने धक्के खाये उसी शहर में आज मेरा बड़ा सा होर्डिंग्स लगा था।’

पंकज भोजपुरी फिल्मों के गिरते स्तर को लेकर काफी विचलित दिखे। उन्होंने कहा-भोजपुरी फिल्मों से जुड़े लोगों को इससे कोई प्यार नहीं है। उनका मकसद सिर्फ रुपये कमाना है। वे भोजपुरी समाज की सभ्यता-संस्कृति व समस्याओं को दिखाना ही नहीं चाहते। यहां सिर्फ अश्लीलता परोसी जा रही है। यही कारण है कि भोजपुरी समुदाय के जो लोग जरा भी पढ़े-लिखे हैं, वे ऐसी फिल्में देखने नहीं जाते। चयन की बात होने पर मेरी प्राथमिकता भोजपुरी ही होगी। भोजपुरी मेरी मातृभाषा है। मुझे लगता है कि भोजपुरी फिल्मों में मैं अपनी आत्मा के साथ पूरी सच्चाई से काम कर सकता हूं। मेरी खुद भी एक भोजपुरी फिल्म बनाने की तमन्ना है। एक अच्छी भोजपुरी फिल्म बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी। पंकज ‘प्यार मिले चैन वहां’ नामक भोजपुरी फिल्म में काम कर चुके हैं।

उनकी आने वाली हिन्दी फिल्मों में अर्जुन कपूर, रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा जैसे सितारों से सजी ‘गुंडे’ प्रमुख है। इसके साथ ही वे जैकी श्राफ व श्रेया सरन अभिनीत एक फिल्म में भी दिखेंगे, जिसका नाम अभी निर्धारित नहीं हुआ है। दर्शक उनसे एक बार फिर नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ बुद्धदेव दासगुप्ता की फिल्म में भी रु-ब-रु होंगे। नवाजुद्दीन के साथ उनकी माउंटेन मैन भी आने वाली है।

ड्रीम किरदार के बारे में पूछने पर पंकज ने कहा-मैं ऐसे किरदार निभाना चाहता हूं जिसमें मानवीय संवेदना झलकती हो। वह किरदार जो ठीक तरह से निकलकर सबके सामने आए। एक अभिनेता की कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां भी होती हैं, जिन्हें वह अपने किरदार में निहित करके निभा सकता है।

विज्ञापन की दुनिया में भी जलवा बिखेर चुके पंकज इसे अधिक कठिन काम मानते हैं। उन्होंने कहा-विज्ञापन फिल्मों में काम करना अधिक चुनौतीपूर्ण एवं रचनात्मक होता है क्योंकि 30 सेकेंड में मनोरंजन और प्रोडक्ट के बारे में बताना, दोनों करना पड़ता है।

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