यदि वह पुलिसकर्मी होता तब भी क्या उसे यात्रियों को मारने का अधिकार मिल जाता है…

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करन निम्बार्क:मुंबई

मुंबई, 29 सितम्बर 2017,मुंबई की जीवन रेखा है लोकल ट्रेन सेवा। मुंबई का अस्तित्व इसके बिना अधुरा है। प्रतिदिन लाखों यात्री घर से कार्यालय और कार्यालय से घर लौटते हैं। इस सेवा को सुचारू रूप से चलाने का दायित्व है कई कन्धों पर और इसकी रक्षा का दायित्व है रेल्वे पुलिस बल पर। हालाँकि रेल यात्रियों का भी कुछ दायित्व है सार्वजनिक संपत्ति के प्रति और अन्य यात्रियों के प्रति। शुक्रवार की सुबह एलफिस्टन रोड पर घटित हुई घटना दुखद भी है और निंदनीय भी। इसमें कहीं ना कहीं बिना सोचे विचारे भगदड़ मचाने वाले यात्रियों की भी भूल है।

प्रतिदिन यात्रा के समय कुछ ना कुछ विवाद घटित होते रहता है। प्रतिदिन एक ही ट्रेन के एक ही डिब्बे में वर्षों से यात्रा करनेवाले सहयात्री एक परिवार की तरह हो जाते हैं। यात्रा के दौरान लगभग सभी यात्री एकदूजे का सहयोग करते हैं। एक ऐसी घटना जो शायद लोगों तक ना पहुँच सकी इसका उल्लेख हम करना चाहते हैं। शुक्रवार की सुबह जब विरार से चर्चगेट के लिए ८:४० की लोकल ट्रेन चलने लगी तभी एक सावला रंग, सशक्त शरीर लंबा कद, साधारण कपड़ों में एक युवक चढ़ा और अचानक गेट (द्वार) पर पहले से खड़े यात्रियों से अशिष्ट होकर गेट पर खड़े रहने के लिए कहने लगा। जब उन्होंने समझाया कि यहाँ पर्याप्त जगह नहीं है तब भी वह धक्का देकर आगे बढ़ा और जब एक यात्री ने उसे रोका तो उसे माँ-बहन की गाली देते हुए उस पर हाथ उठा दिया। जैसा हमने पहले उल्लेख किया कि प्रतिदिन एकसाथ यात्रा करने वाले एक परिवार की तरह होते हैं इसलिए सहयात्रियों ने उसका विरोध किया और उन्हें छुडाने लगें।

जब इस युवक पर ये लोग भारी पड़ने लगें तब वह चिल्लाया कि मैं रेल्वे पुलिस से हूँ और जब यात्रियों ने उसका पहचान पात्र माँगा तब उसने केवल एक पल के लिए कोई पहचान पत्र निकाला जिसपर उल्लेखित था कि वह अभी प्रशिक्षण ले रहा थायदि वह पुलिसकर्मी भी होता तब भी क्या उसे यात्रियों से अशिष्ट व्यवहार करने, उन्हें मारने का अधिकार मिल जाता है? शायद उसने सोचा होगा कि पुलिस में हूँ तो कोई विरोध नहीं होगा लेकिन जागरूक यात्रियों ने न केवल अपने सहयात्री का जीवन बचाया अपितु उसका विरोध भी किया। जैसा कि स्पष्ट है कोई भी कामकाजी व्यक्ति पुलिस के पचेडों में पड़ना पसंद नहीं करता लेकिन क्या यह रेलमंत्री और रेल्वे पुलिस दल के लिए एक बड़ा सवाल नहीं है कि पुलिस आम आदमी की रक्षक है या भक्षक?

जो व्यक्ति दिन दहाड़े ऐसा कृत्य कर सकता है क्या वह रात के सन्नाटे में पुलिस बनने के बाद कोई घिनौना अपराध नहीं कर सकता? जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, न्याय करनेवाले ही अन्याय करने लगें तो आम आदमी कहाँ और किसके पास जाए? कल तो ये लोग आम आदमी को भी किसी झूठे मामले में फँसा सकते हैं। उम्मीद है कि सरकार और रेल्वे पुलिस अपने कर्मचारियों को जनता के प्रति उनके दायित्व और कर्तव्य से अवगत करायेगी और उन्हें सिखाएगी कि जनता तभी उन्हें सम्मान देगी तभी उनका सहयोग करेगी जब वे जनता का, आम आदमी का सम्मान करेंगे, उनकी रक्षा करेंगे।

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