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हिटलर से भी 15 गुना आगे निकलकर संजय गाँधी ने करा डाली जबरन नसबंदी और जिसका नतीजा…

हिटलर से भी 15 गुना आगे निकलकर संजय गाँधी ने करा डाली जबरन नसबंदी और जिसका नतीजा…

“सबको सूचित कर दीजिए कि अगर महीने के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो न सिर्फ वेतन रुक जाएगा बल्कि निलंबन और कड़ा जुर्माना भी होगा. सारी प्रशासनिक मशीनरी को इस काम में लगा दें और प्रगति की रिपोर्ट रोज वायरलैस से मुझे और मुख्यमंत्री के सचिव को भेजें.”

एक बार को ऊपर लिखी इन लाइनों को पढ़ कर आपको शायद कुछ समझ ना आया हो ऐसे में आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें कि ये एक टेलीग्राफ का अंश है. जी हाँ ये उस टेलीग्राफ का अंश बताया जाता है जिसे आपातकाल के समय उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने अपने लोगों को भेजा था.

इस टेलीग्राफ का लक्ष्य सुनेंगें तो शायद आपकी रूह काँप जाये. इस टेलीग्राफ का मकसद बताया जाता है नसबंदी. जी हाँ वो ही नसबंदी जिसे आपातकाल के समय लोगों में जबरन करायी गयी थी. आप इन बातों से खुद ही अंदाज़ा लगा लीजिये कि नौकरशाही में इस फैसले को लेकर लोगों में आखिर किस कदर खौफ रहा होगा.

 

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इस फैसले और इसके पीछे की वजह जानने से पहले हम नसबंदी के फैसले से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बात आपको बता दें. दरअसल “चोर की दाढ़ी में तिनका”. ये कहावत आपने यूँ तो कई बार सुनी होगी लेकिन अगर असल मायने में ये किसी शख्स या कहिये किसी परिवार पर उपयुक्त बैठती है तो वो है गाँधी परिवार. देश की शायद ये एक अनोखी ऐसी पार्टी रही होगी जिसने काम से ज्यादा काण्ड का डंका बजाया है, और काण्ड भी ऐसे जिनके बारे में जानकर किसी के भी कान खड़े हो जायें.

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गाँधी परिवार के काण्ड इतने निराले रह चुके हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री ने भी इनपर मूवीज बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा. फिल्म “किस्सा कुर्सी का” से लेकर नसबंदी जैसे फैसलों पर देश में फिल्म बन चुकी है.  आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1978 में जबरन नसबंदी के फैसले पर एक फिल्म बनायीं जाती है. ये फिल्म एक स्पूफ़ फिल्म होती है जिसे बनाया होता है आईएस जौहर ने.

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इस फिल्म में उस समय के बड़े और नामचीन कलाकार के डुप्लीकेट ने काम किया था. फिल्म में ये दिखाने की कोशिश होती है कि कैसे संजय गाँधी के एक फैसले के चलते जबरन लोगों को पकड़ा जाता है और उनकी नसबंदी करा दी जाती है.

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लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नसबंदी जैसा फैसला आखिर लिया ही क्यों गया? आखिर ऐसी क्या वजह थी जिसके चलते देश में इतने बड़े पैमाने पर लोगों को जबरन पकड़ कर उनकी नसबंदी करा दी गयी? तो चलिए हम आपको बताते हैं संजय गांधी के इस फैसले के पीछे की बड़ी वजह.

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इस फैसले के चलते ना जाने कितनों की जाने भी गयीं

बताया जाता है कि आपातकाल के समय जब ये फैसला लिया गया कि लोगों की नसबंदी की जाएगी तब इस पर इतना ज्यादा ज़ोर दिया गया  था कि कई जगहों से इस तरह की भी खबरे आयीं कि पुलिस वालों ने जबरन गांवों को घेरा और फिर किसी भी या यूँ कहिये हर धर्म के, फिर वो चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, सिख हों या इसाई,  सभी पुरुषों को जबरन खींचकर उनकी नसबंदी करा डाली. मिली जानकारी के मुताबिक संजय गांधी के इस अभियान में करीब 62 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी हुई थी. यहाँ ये भी बताया जाता है कि इस दौरान गलत ऑपरेशनों से करीब दो हजार लोगों की मौत भी हो गयी थी.

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हिटलर ने भी उठाया था ऐसा कदम 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1933 में जर्मनी में भी ऐसा ही एक अभियान चलाया गया था. इसके लिए एक कानून बनाया गया जिसके मुताबिक अगर किसी भी व्यक्ति को कोई आनुवंशिक बीमारी हो जाती है तो उसकी नसबंदी का प्रावधान था. उस वक़्त तक जर्मनी नाजी पार्टी के अंतर्गत आ चुका था. बताया जाता है कि इस कानून के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि अगर आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा जो बीमारियों से मुक्त रहेगा.  आंकड़ो के मुताबिक हिटलर के इस फैसले के चलते लगभग चार लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी.

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संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए

25 जून 1975 को आपातकाल लगने के बाद ही राजनीति में अपना कदम रखने वाले संजय गांधी के बारे में यह बात तो साफ हो गयी थी कि आगे गांधी-नेहरू परिवार की विरासत अब संजय गाँधी ही संभालने वाले थे. ऐसे में संजय गाँधी भी अब एक ऐसे मुद्दे की तलाश में जुट गए थे जो उन्हें कम से कम समय में एक सक्षम और प्रभावशाली नेता के तौर पर देश और देश की जनता के दिल-ओ-दिमाग में स्थापित कर सके.

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बता दें देश में उस समय वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन और शिक्षा जैसे मुद्दों पर खासा जोर दिया जाता था, लेकिन संजय गाँधी को कहीं ना कहीं लगने लगा था कि उन्हें किसी त्वरित करिश्मे की बुनियाद नहीं बनाया जा सकता था.

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अब इसे संयोग ही कहेंगें कि देश में भी उस वक़्त वही दौर चल रहा था जब दुनिया में भारत की आबादी का जिक्र उसके अभिशाप की तरह सामने आने लगी थी. अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश अब ऐसे मानने लगे थे कि हरित क्रांति से अनाज का उत्पादन कितना भी क्यों ना बढ़ा दिया जाए, लेकिन अजगर के मुंह की तरह फैलाती आबादी के लिए वह कभी भी पर्याप्त नहीं होगा. उनका मानना था कि भारत को अनाज के रूप में मदद भेजना समंदर में रेत फेंकने जैसा है जिसका कोई फायदा नहीं. बता दें वो ऐसा सिर्फ अनाज के सन्दर्भ में ही नहीं, बाकी संसाधनों के बारे में भी ऐसा ही सोचते थे.

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तो इस वजह से संजय गाँधी ने उठाया था जबरन नसबंदी का फैसला?

अपनी किताब द संजय स्टोरी में पत्रकार विनोद मेहता लिखते हैं कि, “ऐसे में अगर संजय गाँधी आबादी की इस रफ्तार पर जरा भी लगाम लगाने में सफल हो जाते तो यह उनकी एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती. सिर्फ राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा होती.” शायद यही वजह है कि आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से लागू करवाना संजय गांधी का अहम लक्ष्य बन गया जिसके लिए उन्होंने नसबंदी, या यूँ कहिये जबरन नसबंदी की राह चुन ली थी.

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यूँ तो 25 जून 1975 से पहले भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इस बात का दबाव बढ़ने लगा था कि भारत में नसबंदी जैसे परिवार नियोजन के कार्यक्रमों को लेकर तेजी दिखाई जाये. भारत इस मोर्चे पर 1947 से काफी कीमती समय बर्बाद कर चुका था और इसलिए उसे बढ़ती आबादी पर जल्द-से-जल्द रोक लगाने के लिए यह कार्यक्रम अब युद्धस्तर पर शुरू करने की नौबत आन पड़ी थी.

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जानकर बताते है कि आपातकाल शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों का गुट और भी जोरशोर से नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की वकालत करने लगा, ऐसे में अब इंदिरा गांधी ने भी उनकी यह बात मान ली. देखा जाये तो यह उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि वो यूँ तो खुद ही काफी समय से कुछ ऐसा करना चाह रही थीं जिससे लोगों का ध्यान उस अदालती मामले से भटकाया जा सके जो उनकी किरकिरी और नतीजतन आपातकाल की वजह बन चुका था.

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और शायद इसलिए ही उन्होंने संजय गांधी को नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी. ये संजय गाँधी के लिए किसी लौटरी से कम नहीं था जो मानो इसी बात के इंतजार में कितने समय से बैठे थे. यही वजह है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान मिली इस निरंकुश ताकत का गलत इस्तेमाल करते हुए यह अभियान तुरंत ही शुरू कर दिया. संजय गाँधी ने अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी.

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नसबंदी जैसे बड़े अभियान को छेड़े जाने से पहले की ये प्रक्रिया थी कि पहले चरण में लोगों में इसको लेकर जागरूकता फैलाई जाती. जानकार मानते हैं कि इसे युद्धस्तर की बजाय धीरे-धीरे और जागरूकता के साथ आगे बढ़ाया जाता तो देश के लिए इसके परिणाम क्रांतिकारी हो सकते थे.

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हालाँकि संजय गाँधी को अब जल्द से जल्द नतीजे चाहिए थे जिसके चलते उन्होंने ये फैसला जनता पर थोपना शुरू कर दिया था. नतीजा ये हुआ कि यह अभियान ऐसे चला कि देश भर में लोग कांग्रेस से और भी ज्यादा नाराज हो गए. माना जाता है कि संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम से उपजी नाराजगी की 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करने में सबसे अहम भूमिका रही.

 

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