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नवकार उपाधि अलंकरण 2017 की तैयारियां शुरू, 7 सत्रों में दिसंबर से शुरू होगा आयोजन

कोलकाता : जैन समाज का सबसे बड़ा अवार्ड नवकार उपाधि अलंकरण 2017 के आयोजन की तैयारियां शुरू हो गयी है आयोजन सत्रों की घोषणा करते हुए आयोजक विनायक अशोक लुनिया ने बताया की उक्त आयोजन 15 दिसंबर 2017 से प्रारम्भ होकर 30 दिसम्बर 2017 को उज्जैन में देश भर के समाज सेवियों को अलंकरण प्रदान किया जायेगा. आयोजक श्री लुनिया ने बताया की उक्त उपाधि अलंकरण का आयोजन पिता जी स्व. श्री अशोक जी लुनिया के स्मृति में आयोजित किया जा रहा है, श्री लुनिया ने कहा पिता श्री के पुण्याई का ही फल है की आज हमें गुरुभगवन्तों के श्री चरणों में "नवकार गुरु महारत्न" उपाधि अर्पण करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है. साथ ही देश भर के समाज की उन हस्तियों को नवकार उपाधि से अलंकृत करने का सौभाग्य मिल रहा है जिन्होंने समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है. 

श्री लुनिया ने आगे बताया की इस बार समिति की तरफ से "नवकार महारत्न उपाधि" से देश दुनिया में जैन धर्म की डंका बजने वाले 3 मुख्यमंत्रियों को अलंकृत किया जायेगा.

श्री शिवराज सिंह जी चौहान साहब (मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश शासन)

श्री देवेंद्र भाई फडणवीस जी (मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र शासन)

श्री विजय भाई रुपानी जी (मुख्यमंत्री, गुजरात शासन)

आयोजक लुनिया ने बताया है की समिति द्वारा नवकार महारत्न उपाधि से मान्यवरों को गुजरात / हिमाचल चुनाव आचारसंहिता समापन के पश्चात् मान्यवरों की अनुकूलतानुसार अलंकृत किया जायेगा. 

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देवउठनी एकादशी 2017 पूजा विधि: जानिए किस विधि से माता तुलसी का विवाह करना आपके लिए हो सकता है शुभ

देव उठनी एकादशी को प्रबोधनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी के दिन व्रत करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। वैसे तो सभी एकादशी का व्रत करने से भी पापों से मुक्ति मिलती है, लेकिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के एकादशी के व्रत का पुण्य राजसूय यज्ञ के पुण्य प्राप्ति से अधिक माना जाता है। इसलिए इस एकादशी का महत्व अधिक होता है। इस दिन के लिए वैसे तो अनेक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन एक मान्यता अनुसार माना जाता है कि आषाढ़ की एकादशी के दिन भगवान विष्णु सहित सभी देवता क्षीरसागर में जाकर सो जाते हैं। इसके साथ जुड़ी मान्यता है कि इन दिनों पूजा-पाठ और दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं। किसी तरह का शुभ कार्य जैसे शादी, मुंडन, नामकरण संस्कार आदि नहीं किए जाते हैं।

देवउठनी एकादशी पूजा विधि-
रोजाना तुलसी के पौधे को जल चढ़ाएं और उसके आगे दीया-बाती अवश्य करें। एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त देखकर तुलसी के विवाह के लिए मंडप सजाएं। गन्नों को मंडप के चारों तरफ खड़ा करें और नया पीले रंग का कपड़ा लेकर मंडप बनाए। इसके बीच हवन कुंड रखें। मंडप के चारों तरफ तोरण सजाएं। इसके बाद तुलसी के साथ आंवले का गमला लगाएं। तुलसी का पंचामृत से पूजा करें। इसके बाद तुलसी की दशाक्षरी मंत्र से पूजा करें।

दशाक्षरी मंत्र– श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा।
ऊं श्री तुलस्यै विद्महे।
विष्णु प्रियायै धीमहि।
तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।।
इसके बाद घी के दीपक से पूजा करें और सिंदूर, रोली, चंदन चढ़ाएं। पश्चात तुलसी को वस्त्र चढ़ाएं और तुलसी के चारों ओर दीपदान करें। मान्यता है कि इस दिन तुलसी माता का पूजन करने से घर से नकारात्मक शक्तियां चली जाती हैं और साथ ही इसके सुख-समृद्धि का प्रवास हमेशा रहता है।

देवउठनी एकादशी पूजा सामाग्री-
– गंगा जल,
– शुद्ध मिट्टी,
– हल्दी,
– कुमकुम,
– अक्षत,
– लाल वस्त्र,
– कपूर, पान,
– घी,
– सुपारी,
– रौली,
– दूध,
– दही,
– शहद,
– फल,
– चीनी,
– फूल,
– गन्ना,
– हवन सामाग्री,
– तुलसी पौधा,
– विष्णु प्रतिमा।

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बॉडीबिल्डर Monk? थाईलैंड का ये बौद्ध भिक्षु अपने डोलों-शोलों के चलते हो रहा है वायरल

किसी भी बौद्ध भिक्षु के बारे में सोचते ही आपके मन में पहला ख़्याल क्या आता है? एक शांत, पतला सा युवक जिसके चेहरे पर शांति और सकारात्मकता झलक रही है. कई लोग इस बात से इत्तेफ़ाक रख सकते हैं. हालांकि, एक बुद्धिस्ट मॉन्क आपके नज़रिए को एकदम बदल कर रख देगा. थाईलैंड के इस मॉन्क की तस्वीरों को खूब शेयर किया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस शख़्स ने अपनी तस्वीरें खुद ही शेयर की हैं ताकि वो लोगों का ध्यान बौद्ध भिक्षुओं के स्वास्थ्य की तरफ़ आकर्षित कर सके.


 


इस बौद्ध अनुयायी के बारे में अभी तक कोई खास जानकारी हासिल नहीं हो पाई है, लेकिन थाईलैंड में इन तस्वीरों का क्रेज़ लगातार बढ़ रहा है और इस बॉडी बिल्डर बौद्ध भिक्षु की तस्वीरों को लोग धड़ाधड़ शेयर कर रहे हैं. माना जा रहा है कि अच्छी सेहत के लिए इस शख़्स ने मीठे और तरल पदार्थों का कम से कम सेवन करना शुरू किया था. इस शख़्स का मानना है कि बुद्धिस्ट मॉन्क को अपनी सेहत पर खास ध्यान देना चाहिए.

कुछ लोगों ने कयास लगाए कि हो सकता है कि मॉन्क बनने से पहले ये शख़्स बॉडी बिल्डिंग में दिलचस्पी रखता हो, लेकिन कुछ लोग इस शख़्स का विरोध भी कर रहे हैं. ये पोस्ट सोशल मीडिया पर देखते ही देखते वायरल हो गई. कई लोगों ने मॉन्क के लिए रोज़-रोज़ जिम जाना व्यर्थ बताया, तो कुछ लोग इस शख़्स की तारीफ़ भी कर रहे हैं. लेकिन इस पोस्ट पर आई हजारों प्रतिक्रियाओं ने इसे थाईलैंड में वायरल कर दिया.



गौरतलब है कि एक लोकप्रिय फ़ेसबुक पेज पर इस तस्वीर को 14000 से ज़्यादा बार शेयर किया जा चुका है. इस शख़्स के बारे में ये भी कहा जा रहा है कि इसने महज कुछ ही बार इस लबादे को पहन कर मॉन्क लाइफ़स्टायल अपनाने की कोशिश की थी और इसके बाद वो अब रेस्टोरेंट के बिज़नेस में शामिल हो चुका है. 

 

Source: Coconuts.co

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15 दिनों तक टॉपलेस होकर पंडित संग रहती हैं लड़कियां. देवी पूजन की ये कैसी प्रथा?

देशभर में आश्विन के महीने में देवी की पूजा की जाती है. देश के अलग-अलग क्षेत्रों में देवी के पूजा के विधि-विधान भी अलग होते हैं.

कहीं पर पूरे निरामिष (शाकाहारी) तरीके से पूजी जाती हैं आदिशक्ति, तो कहीं पर आमिष (मांसाहारी) तरीके से. श्रद्धा के तौर-तरीके अलग-अलग. कोई नौ दिनों तक कठिन व्रत करता है, तो कोई नृत्य करके देवी को प्रसन्न करता है.

पर इन्हीं रीति-रिवाज़ों में से कुछ ऐसी भी रीतियां हैं, जो सभ्य समाज के अनुकूल नहीं है. तमिलनाडु के मदुरई में एक मंदिर में देवी की पूजा की रीति, सभ्यता की हद से परे मालूम होती है. Times Now के अनुसार, इस मंदिर में 7 ऐसी लड़कियों को 15 दिनों तक मंदिर में ही रखा जाता है, जिनका मासिक शुरू ना हुआ हो. 

Source: Asianage

इस दौरान इन लड़कियों को देवी की तरह ही सजाया जाता है, लेकिन इनके शरीर के ऊपरी भाग पर कोई वस्त्र नहीं होता, सिर्फ़ ज़ेवर होते हैं. इस दौरान इन कन्याओं के साथ एक पुरुष पंडित रहता है.

जब इस अजीब के रिवाज़ की ख़बरें बाहर आने लगीं, तो स्थानीय अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और लड़कियों को ऊपरी हिस्सा ढकने का आदेश दिया.

मदुरई के कलेक्टर ने इस बात का आश्वासन दिया कि लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, पर देवी पूजन के इस अजीब से रिवाज़ को बंद करने के कोई संकेत नहीं दिए. कलेक्टर साहब का कहना है कि वर्षों पुरानी इस प्रथा पर रोक लगाना अनुचित होगा. पूजा के इस प्रथा में लगभग 60 गांवों के लोग सम्मिलित होते हैं.

Source: Janta Ka Reporter

वहीं Daily Mail की रिपोर्ट्स में इस घटना का एक अलग ही पहलू सामने आया. इस रिपोर्ट के मुताबिक, National Human Rights Commission ने सोमवार को इस घटना से जुड़ी रिपोर्ट जमा की. उस रिपोर्ट की मानें, तो इस प्रथा में लड़कियों को नववधू की तरह सजाया जाता है और बाद में उनके कपड़े उतार दिये जाते हैं. इसके बाद उन्हें जबरन सेक्स वर्क में धकेल दिया जाता है. ये एक तरह की देवदासी प्रथा है, जिसे 1988 में बैन कर दिया गया था.

कमिशन की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इन कन्याओं को अपने परिवारों से अलग कर दिया जाता है. वहां के लोग इन्हें मथाम्मा कहते हैं. इन्हें किसी तरह की शिक्षा-दीक्षा भी नहीं दी जाती.

मदुरई ज़िले ने इस रिपोर्ट में छपी सभी बातों को सिरे से नकार दिया है.

Source: HT

बाल अधिकारों के कैंपनेर्स ने इस पूरी प्रथा के कई दिल दहला देने वाले पहलुओं को सामने रखा. उनके अनुसार, इन लड़कियों को किसी-किसी क्षेत्र में शराब के घड़े सिर पर उठाने पड़ते हैं. रीति के नाम पर लड़कियों का शोषण किया जाता है.

अगर देवी पूजन के नाम पर देवदासी बनाने की प्रथा चल रही है, तो सरकार को इसकी उच्चस्तरीय जांच करवानी चाहिए. National Human Rights Commission ने तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सरकारों से 4 हफ़्तों में इस मामले की जांच कर रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दिए हैं.

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आखिर इस रामायण में क्यों लिखा है ‘बिस्मिल्लाह’ ?

भारत विविधताओं से भरा देश है और यहाँ कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिन्हें देखकर पता चल जाता है कि क्यों ये देश कई धर्म-जातियों कई भाषाओं के होते हुए भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ है. ऐसा ही एक उदाहरण इस रामयण से भी मिलता है जो सन् 1715 में लिखी गई थी.

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1715 में सुमेर चंद ने संस्कृत में लिखी गई रामायण का फ़ारसी में अनुवाद किया था और कौमी एकता के लिए उन्होंने इसकी शुरुआत ‘बिस्मिल्लाह’ शब्द लिखकर की थी. जिस प्रकार राम केवल हिन्दुओं के देवता नहीं है बल्कि प्राचीन संस्कृति के एक प्रतीक चिन्ह हैं वैसे ही ये रामायण भी गंगा-जामुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण है. उन्होंने इसकी प्रस्तावना तीन पन्नों में लिखी और ये प्रस्तावना सोने के पानी से लिखी गई.

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अब फारसी में लिखी गई इस रामयण का अनुवाद हिंदी में करके रामपुर रजा लाइब्रेरी ने प्रकाशित किया है. टाउनहॉल में लगे देश के पहले राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले में पहली बार फ़ारसी भाषा से हिंदी में अनुदित इस ग्रंथ की प्रतियां पाठकों के लिए उपलब्ध हैं.

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ये दुनिया की एक अनूठी रामायण इसलिए भी क्योंकि इसमें चित्रों को भी बड़े ही अच्छे तरीके से शामिल किया गया है. तीन खंडों में प्रकाशित हुई इस रामायण में 258 चित्र शामिल किये गए हैं.

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Krishna Janmashtami 2017: कन्हैया के जन्मोत्सव पूजा के बाद आधी रात में ऐसे खोलें उपवास

Krishna Janmashtami 2017 Fast: भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने और उन्हें भोग चढ़ाने के बाद ही जन्माष्टमी का व्रत खोला जाता है।

हिंदू धर्म में जन्माष्टमी एक मुख्य त्योहार है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। पुराणों के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण ने अपने अत्याचारी मामा कंस का विनाश करने के लिए मुथरा में अवतार लिया था। इस दिन व्रत भी रखा जाता है। बताया जाता है कि इस दिन हर एक व्यक्ति को व्रत रखना होता है। हालांकि, बुजुर्ग, रोगी और बच्चों को इस मामले में छूट है।

जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने के लिए कोई खास नियम नहीं हैं। इस दिन कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं तो वहीं कुछ लोग फलाहार के साथ ही उपवास रखते हैं। निर्जल व्रत में लोग पूरे दिन कुछ भी खाते और पीते नहीं है। यहां तक की पानी का सेवन भी नहीं किया जाता। लोगों को मानना है कि इस दिन पानी और खाना त्याग देने से भगवान श्री कृष्ण खुश होंगे। मानना है कि इस दिन व्रत करने से मुन की मुरादें पूरी होती हैं। इस दिन उपवास आधी रात में खोला जाता है। व्रत खत्म करने से पहले भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और उन्हें पकवानों का भोग लगाया जाता है।

जो श्रद्धालू निर्जल व्रत नहीं रख पाते, वो फलाहार के साथ उपवास रखते हैं। यह उपवास निर्जल व्रत जितना कठिन नहीं है। इसमें श्रद्धालू दूध और फलों का सेवन कर सकते हैं। हालांकि, जन्माष्टमी के दिन अनाज और नमक का सेवन नहीं करना होता है। निर्जल या फलाहार व्रत रखने वाले श्रद्धालू इस दिन भजन गाकर श्री कृष्ण की भक्ति करते हैं। इसके साथ ही इस दिन ‘ओम नमो भगवते वासुदेवा’ मंत्र का जाप करते हैं। वहीं कुछ लोग इस दिन श्रीमद भागवत पुराण भी व्रत के दौरान पढ़ते हैं।

जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालू भगवान श्री कृष्ण को विशेष मिठाई पेड़े और कलाकंद चढ़ाते हैं। इसके अलावा श्रीखंड और तिल की खीर का भोग भी लगाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण को दूध से बनी चीजें बहुत पसंद थीं। ऐसे में इस मौके पर भगवान श्री कृष्ण को दूध से बनी मिठाईयां चढ़ाई जाती हैं। श्रद्धालू भगवान को प्रसाद चढ़ाने के बाद भी खुद सेवन करते हैं।

 

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संत का इषारा समझा और बदल लिया जीवन

Ajeybharat/पूना /कहते हैं कि व्यक्ति में अगर जीवन-परिर्वतन की गुंजाइष हो तो उसे वक्त नहीं लगता। मात्र स्थान व समय निष्चित होता है कि अब वह बदलने वाला है पर बदलाव लाने में कोई ना कोई सहयोगी अवष्य बनता है। जी हाँ! पूना शहर के कात्रज स्थित ‘आनंद दरबार’ में श्रमण संघीय सलाहकार दिनेष मुनि, डाॅ. द्वीपेन्द्रमुनि और श्रमण डाॅ. पुष्पेन्द्र की दैनिक चातुर्मासिक प्रवचन-शृंखला गतिमान है।
23 जुलाई 2017 रविवार को सलाहकारप्रवर के सान्निध्य में ‘आचार्य आनंद कार्यक्षम पत्रकार पुरस्कार’ समारोह आयोजित था। समारोह में पत्रकार श्री बजरंग निंबालकर भी सम्मानित हुए। 
जब वे मुनिश्री के पास आषीर्वाद लेने आए, तब श्री दिनेष मुनि ने इषारे में उनको पूछा कि क्या आप मांसाहार करते हैं? 
पत्रकार बंधु ने तत्काल जवाब दिया – ‘‘हाँ गुरुदेव!’’ 
मुनिश्री ने मात्र इषारे में ही कहा कि छोड़ दीजिये। 
बजरंगजी ने मुनिश्री के संकेत को सकारात्मक लिया और तुरन्त बोले – ‘‘गुरुदेव! आज से त्याग करता हूँ।’’ 

गुरुदेवश्री ने उनको नवकार मंत्र सुनाते हुए इष्टदेव की साक्षी से आजीवन मांसाहार-त्याग की प्रतिज्ञा करवाई। बजरंगजी को तो एक नहीं, दो-दो पुरस्कार मिल गये। उनके हृदय-परिवर्तन की साक्षी धर्मसभा में उपस्थित नर-नारी ‘हर्ष-हर्ष, जय-जय’ बोल उठे। सभा में उनकी पत्नी व पुत्र भी थे, वे भी हर्ष से पुलकित हो उठे। 
बीस वर्षों तक सेना में रहकर देषसेवा करने वाले बजरंगजी पिछले सात वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मन की सच्चाई और सत्संकल्प का यह प्रेरक प्रसंग उनकी पत्रकारिता को नई दीप्ति प्रदान करता रहेगा। इससे पूर्व मनपा पूना नगरसेवक युवराज बेलदरे जब अपने जन्मदिवस पर आर्षीवाद प्राप्त करने आए तो सलाहकार दिनेष मुनि के कहने पर उन्होंने भी एक वर्ष तक मांसाहार त्यागने का निष्चय किया। संघपति बालासाहेब धोका ने इस अवसर पर श्री बजरंग जी का स्वागत अभिनंदन किया।

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हिन्दू धर्म के अनसुलझे रहस्य, जिनकी सत्यता आज तक साबित नहीं हुई

आज हम आपको कुछ ऐसे अनसुलझे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जो हिन्दू धर्म से जुड़े हुए हैं, जिनका आज तक खुलासा नहीं हो पाया है। आइये बात करते है इनके बारे में-

  1. तिब्बत का यमद्वार 

     

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सबसे पहले हम बात करेंगे तिब्बत में स्थित एक ऐसे स्थान की जिसे प्राचीनकाल में दुनिया का यमद्वार कहते थे । तिब्बत अखंड भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। तिब्बत को चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है। तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। यम का द्वार पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। इसकी परिक्रमा करने के बाद ही कैलाश यात्रा शुरू होती है। हिन्दू मान्यता के अनुसार इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है।

यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वॉइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं जिसका मतलब होता है- दो पैर वाले स्तूप। ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिरनुमा द्वार किसने और कब बनाया? इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।कहते हैं कि द्वार के इस ओर संसार है, तो उस पार मोक्षधाम।

2. स्वर्ण बनाने की विधि का सच ?

Jeevan Mantra

कहते हैं कि प्राचीन भारत के लोग स्वर्ण बनाने की विधि जानते थे। वे पारद आदि को किसी विशेष मिश्रण में मिलाकर स्वर्ण बना लेते थे, लेकिन क्या यह सच है? यह आज भी एक रहस्य है। कहा तो यह भी जाता है कि हिमालय में पारस नाम का एक सफेद पत्थर पाया जाता है जिसे यदि लोहे से छुआ दो तो वह लोहा स्वर्ण में बदल जाता था। पारे, जड़ी- वनस्पतियों और रसायनों से सोने का निर्माण करने की विधि के बारे में कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।

ऐसा तो नहीं कि इसी कारण बगैर किसी ‘खनन’ के बावजूद भारत के पास अपार मात्रा में सोना था। आखिर यह सोना आया कहां से था? मंदिरों में टनों सोना रखा रहता था। सोने के रथ बनाए जाते थे और प्राचीन राजा-महाराजा स्वर्ण आभूषणों से लदे रहते थे। कहते हैं कि बिहार की सोनगिर गुफा में लाखों टन सोना आज भी रखा हुआ है।

3. गरुड़

religious blog – Jagran Junction

प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। गरूड़ नाम से एक व्रत भी है। गरूड़ नाम से एक पुराण भी है। भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है। गरूड़ का हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं।

भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई कहानियां हैं।

क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। उन्होंने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से मुक्त कराया था। उन्हें उनकी शक्ति पर बड़ा घमंड हो चला था लेकिन हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।

गरुड़ की मान्यता

गरूड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण पक्षी माना गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गरूड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख वाला) कहा गया है। जातक कथाओं में भी गरूड़ के बारे में कई कहानियां हैं। गुप्त काल के शासकों का प्रतीक चिह्न भी गरूड़ ही था। कर्नाटक के होयसल शासकों का भी प्रतीक गरूड़ था। अमेरिका और इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक गरूड़ है।

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भगवान विश्वकर्मा ने बनायी थीं नायाब चीज़ें, इनमें से कुछ तो आज भी मौजूद हैं

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा निर्माण और सृजन के देवता हैं. इन्हें सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का ईष्टदेव कहा जाता है. कुछ लोग मानते हैं कि भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मा जी के पुत्र हैं और उन्होंने ही ब्रह्माण्ड की रचना की थी.

Source: happywishes2016

क्या आपने कभी ये सोचा कि भगवान विश्वकर्मा को निर्माण का देवता क्यों कहा जाता है? या देवताओं के इस सबसे कुशल शिल्पी या आज की भाषा में इंजीनियर ने क्या-क्या बनाया था?

 

आज हम आपको बता रहे हैं ऐसी चीज़ें जिनका निर्माण पुराणों और लोक कथाओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने किया.

1. सोने की लंका

Source: blogspot

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, सोने की लंका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था. ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के बाद, सोने की लंका का निर्माण, विश्वकर्मा जी से करवाया था. शिव जी ने महापंडित रावण को गृह पूजन के लिए बुलाया, तो रावण ने दक्षिणा में उनसे ये सोने का महल ही मांग लिया. 

2. द्वारिका नगरी

Source: flickr

श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में भगवान विश्वकर्मा से द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया था. द्वारिका नगरी की लम्बाई-चौड़ाई 48 कोस थी. उसमें वास्तु शास्त्र के अनुसार चौड़ी सड़कों, चौराहों और गलियों का निर्माण किया गया था.

3. शिव जी का रथ

Source: babamahakaal

महाभारत के अनुसार तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली के वध के लिए भगवान शिव जिस रथ से गए थे, वो विश्वकर्मा ने ही बनाया था. सोने के उस रथ के दाएं चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विराजमान थे.

4. गोपी तालाब

Source: blogspot

भगवान कृष्ण के प्रेम में पागल गोपियां, एक बार एक तालाब के किनारे उनका इंतज़ार कर रही थीं. कुछ दिन बाद जब कृष्ण वहां आये तो उन्होंने गोपियों का समर्पण देखकर उस तालाब का नाम गोपी तालाब रखने का प्रस्ताव दिया. लेकिन गोपियों ने उनसे इस पुराने तालाब की जगह नया तालाब बनवाने को कहा. तब कृष्ण के आदेश पर विश्वकर्मा जी ने एक ख़ूबसूरत तालाब का निर्माण किया, जिसे वर्तमान में 'गोपी तालाब' के नाम से जाना जाता है.

5. राजीव लोचन मंदिर

Source: apnachhatisgarh

एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने एक बार विश्वकर्मा जी से धरती पर उनका ऐसी जगह मंदिर बनाने को कहा, जहां पांच कोस तक कोई शव न जलाया गया हो. भगवान विश्वकर्मा धरती पर आए तो उन्हें ऐसा कोई स्थान नहीं मिला. ये परेशानी बताने पर भगवान विष्णु ने अपना कमल का फूल धरती पर गिराया और विश्वकर्मा से कहा कि जहां ये फूल गिरे, वहीं मंदिर बना दो. वो फूल छत्तीसगढ़ के राजिम में गिरा जहां आज भगवान विष्णु का राजीव लोचन मंदिर है. ये मंदिर कमल के पराग पर बनाया गया है.

6. पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर

Source: patrika

बिहार के औरंगाबाद के 'देव' में त्रेतायुग में बना पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था. मंदिर में काले और भूरे रंग के पत्थरों की नायाब शिल्पकारी है. मंदिर पर लगे शिलालेख में ब्राह्मी लिपि में लिखित श्लोक की तिथि के अनुसार फ़िलहाल ये मंदिर 1 लाख 50 हज़ार 17 साल पुराना हो गया.

7. हस्तिनापुर

Source: youtube

माना जाता है कि प्राचीन काल की जितनी भी राजधानियां हैं, सब भगवान विश्कर्मा ने ही बनाई और बसाई थीं. कलियुग का हस्तिनापुर नगर भी भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाया था.

8. भगवान विश्वकर्मा के पुत्र ने बनाया था रामसेतु

Source: agrwaltv

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम के आदेश पर वानरों ने समुद्र पर पत्थर के पुल का निर्माण किया था. इन वानरों के मुखिया का नाम नल था, जो भगवान विश्वकर्मा के पुत्र थे. उन्होंने सभी शिल्प कलाएं अपने पिता से सीखी थीं.

इसके अलावा पुराने साहित्यों और पुराणों में जगह-जगह बहुत सी वस्तुओं और भवनों का वर्णन है, जिन्हें भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया माना जाता है. इनमें सबसे प्रमुख इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमंडलपुरी, शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, पुष्पक विमान, कर्ण का कुंडल, इंद्र का वज्र और धनुष, यमराज का कालदंड आदि हैं.

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ऐसा क्या हुआ, जो मनी प्लांट को पैसे देने वाला पौधा मानने लगे लोग?

हम में से कुछ के घरों में एक पौधा छोटी बोतल या गमले में रहता है, जिसे लोग अक्सर दूसरों के घरों से चुराकर अपने यहां लगाते हैं. ये पौधा सूरज की रौशनी से दूर रहकर भी लम्बे समय तक ग्रीन और फ्रेश लगता है. सही पकड़े हैं! हम मनी प्लांट की ही बात कर रहे हैं.

मनी प्लांट एक ऐसा पौधा है, जो ज़्यादातर घरों में इस विश्वास के साथ लगाया जाता है, कि ये घर में रुपये-पैसे की कमी नहीं होने देगा और इसको लगाने से घर में सुख, समृद्धि और शांति आएगी. मगर क्या आपको पता है कि मनी प्लांट को समृद्धि से जोड़ने के पीछे की कहानी क्या है? आइए हम बताते हैं.

Source: pinterest

मनी प्लांट से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा है. ताइवान में एक ग़रीब किसान था. मेहनत के बावजूद उसकी तरक्की नहीं हो रही थी. इसलिए वो उदास रहने लगा. एक दिन उसे खेत में एक पौधा मिला, जो दिखने में थोड़ा अलग था. किसान उस पौधे को उठाकर घर ले गया और घर के बाहर मिट्टी में रोप दिया. उसने देखा कि पौधा बहुत लचीला है और बिना ज़्यादा देखभाल के भी अपने आप बढ़ता जा रहा है.

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पौधा, जिस तरह से बिना किसी सहायता के अपने आप ही बढ़ रहा था, किसान को इससे प्रेरणा मिली. पौधे के इस विकास ने उसके दिमाग़ में एक सकारात्मक ऊर्जा भर दी. किसान ने निर्णय लिया कि वो पौधे जैसा ही अपने व्यक्तित्व में लचीलापन लाएगा और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहेगा. वो बिना किसी की परवाह किए आगे बढ़ता रहेगा. जल्द ही उस पेड़ में फूल आ गए, तब तक किसान भी अपनी मेहनत से एक सफ़ल व्यवसायी बन चुका था.

लोगों ने किसान की सफ़लता का राज़ उसके घर के बाहर लगे हरे-भरे पौधे को मान लिया और इस तरह धीरे-धीरे लोगों ने उसे समृद्धि से जोड़कर, उसका नाम मनी प्लांट रख दिया.

 

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इस कहानी के अलावा भी कई मान्यताएं हैं, जिनके अलग-अलग आधार हैं. फेंगशुई के अनुसार, ये पौधा आसपास की हवा को शुद्ध बनाता है. ये रेडिएशन का प्रभाव कम करता है और ऑक्सीज़न छोड़ता है.

कहानी तो जान गए आप, अब एक बात और समझ लीजिए. किसी चीज़ में आस्था हमें हमेशा बल देती है. मगर ज़िन्दगी में कुछ भी पाने के लिए मेहनत बहुत ज़रूरी है. हो सकता है मनी प्लांट आपकी समृद्धि को लम्बे समय तक क़ायम रखे, मगर समृद्धि बढ़ाने के लिए मेहनत आपको ही करनी पड़ेगी.

लखनऊ के शायर मलिकज़ादा जावेद का एक शेर है:

'जिन्हें भरोसा नहीं होता अपनी मेहनत पर, मनी प्लांट घरों में वही लगाते हैं.'

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सबसे श्रेष्ठ व्रत है निर्जला एकादशी, पढ़ें व्रत कथा, विधि एवं आरती…

Nirjala Ekadashi | हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष में चौबीस एकादशियां होती हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस व्रत में भोजन करना और पानी पीना वर्जित है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस एकादशी पर व्रत करने से वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य मिलता है।

निर्जला एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले शेषशायी भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा करें। इसके बाद मन को शांत रखते हुए ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। शाम को पुन: भगवान विष्णु की पूजा करें व रात में भजन कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें। दूसरे दिन (6 जून, मंगलवार) किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर उसे भोजन कराएं तथा जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढक कर और उस पर शर्करा (शक्कर) तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

इसके अलावा यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन करें। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है-
एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥

इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

एक बार जब महर्षि वेदव्यास पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे। तब महाबली भीम ने उनसे कहा- पितामह। आपने प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में वृक नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्य व्रत से वंचित रह जाऊंगा?

तब महर्षि वेदव्यास ने भीम से कहा- कुंतीनंदन भीम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। नि:संदेह तुम इस लोक में सुख, यश और मोक्ष प्राप्त करोगे। यह सुनकर भीमसेन भी निर्जला एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए और समय आने पर यह व्रत पूर्ण भी किया। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

जानिए निर्जला एकादशी का महत्व

1. निर्जला एकादशी के व्रत से साल की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।
2. एकादशी व्रत से मिलने वाला पुण्य सभी तीर्थों और दानों से ज्यादा है। मात्र एक दिन बिना पानी के रहने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है।
3. व्रती (व्रत करने वाला) मृत्यु के बाद यमलोक न जाकर भगवान के पुष्पक विमान से स्वर्ग को जाता है।
4. व्रती को स्वर्ण दान का फल मिलता है। हवन, यज्ञ करने पर अनगिनत फल पाता है। व्रती विष्णुधाम यानी वैकुण्ठ पाता है।
5. व्रती चारों पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करता है।
6. व्रत भंग दोष- शास्त्रों के मुताबिक अगर निर्जला एकादशी करने वाला व्रती, व्रत रखने पर भी भोजन में अन्न खाए, तो उसे चांडाल दोष लगता है और वह मृत्यु के बाद नरक में जाता है।

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कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं, महाभारत युद्ध के दौरान कृष्ण की गीता ने नहीं, लीला ने साबित की है ये बात

इन्सान अपने भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है. उसकी इसी प्रकृति की वजह से आज टीवी चैनलों और अख़बारों में भविष्य और समस्याओं का समाधान बताने वाले बाबाओं का बिज़नेस चल रहा है. बहुत से लोग रोज़ाना सुबह उठकर सबसे पहले टीवी या अख़बार में अपना राशिफल देखते हैं और उसमें बताई गई बातों के अनुसार अपना दिन भर का काम करते हैं. लेकिन एक सामान्य सा प्रश्न है-

अगर इन्सान को सचमुच उसका भविष्य पता चल जाए, तो क्या वो सबकुछ ठीक कर लेगा? क्या तब उसकी ज़िन्दगी अभी के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी होगी?

महाभारत की इस कहानी से शायद आपको इस प्रश्न का जवाब मिल जाए

Source: jagran

कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का युद्ध हो रहा था. सभी लोग पक्ष- विपक्ष में बंट गए. तब उडुपी के राजा ने निष्पक्ष रहने का फ़ैसला किया. उन्होंने न कौरवों को चुना न पांडवों को, बल्कि कृष्ण से उन्होंने एक अलग ही ज़िम्मेदारी मांग ली. उन्होंने कहा कि वो दोनों पक्षों के योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था करेंगे. युद्ध कब तक चलेगा यह निश्चित नहीं था. लाखों लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी ही थी, तो कृष्ण ने यह ज़िम्मेदारी उडुपी के राजा को दे दी.

युद्ध में रोज़ाना हज़ारों लोग मरते थे. ऐसे में भोजन कितने लोगों का बने, ताकि व्यर्थ न हो, इसकी गणित लगाना मुश्किल था. मगर फिर भी उडुपी के राजा की चतुराई से पूरे युद्ध के दौरान न कभी खाना कम पड़ा और न व्यर्थ हुआ. एक दिन राजा से किसी ने पूछा कि ऐसी व्यवस्थित गणना आप कैसे कर पाते हैं कि लोगों के मरने की संख्या जाने बिना भी भोजन न ज़्यादा होता है न कम. तब राजा ने जवाब दिया, ' कृष्ण हर रात को उबली मूंगफलियां खाना पसंद करते हैं. मैं उन्हें छीलकर एक बर्तन में रख देता हूं. वो रात में जितनी मूंगफलियां खाते हैं अगले दिन लगभग उतने हज़ार सैनिक मर जाते हैं. कृष्ण से मरने वालों की संख्या इस तरह पता चल जाती है. उसी के अनुसार खाना बनता है, तो व्यर्थ होने का सवाल ही नहीं.

परिणाम जानते थे कृष्ण फिर भी करते रहे लीला 

Source: pranamnews

यहां समझने की बात ये है कि कृष्ण वो थे जिन्हें सब कुछ पता था, फिर भी वो अपनी लीला खेल रहे थे. वो लगातार अपनी ज़िम्मेदारी के अनुसार युद्ध में भागीदार बन रहे थे. मगर क्या सामान्य मनुष्य के साथ यह संभव है?

सामान्य मनुष्य को अगर यह पता चल जाए कि कल क्या होने वाला है, तो वह कर्म करना छोड़ देगा. अगर उसे पता चल जाए कि एक सप्ताह बाद उसकी मृत्यु निश्चित है तो वो इसी समय से क्षण-क्षण मरने सा महसूस करने लगेगा. ये मनुष्य की सीमित बुद्धि का फेर है कि वो समझता है भविष्य जानने से वो उसे संवार लेगा. वास्तव में जीवन एक रोमांच का नाम है. एक ऐसी यात्रा जहां अगले क्षण का पता नहीं. जिन्हें हम खुशियां कहते हैं वो सामान्य घटनाएं ही होती हैं, मगर उनकी अनिश्चितता ही उन्हें हमारे सामने ख़ुशी के रूप में प्रस्तुत करती है.

इसीलिए कृष्ण ने गीता में कहा था-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्तव्य करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं. 

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रोज शाम को जलाते हैं घर में अगरबत्ती, तो जान लीजिए इसके नुकसान


अगर आप भी अपने पूजा घर में अक्सर अगरबत्ती का इस्तेमाल करते हैं तो ये खबर आपके लिए है। जी हां शायद ही आपको पता होगा कि भगवान को खुश करने के लिए जलाई जाने वाली ये अगरबत्ती हमारी सेहत के लिए बेहद हानिकारक होती है।

 

आइए जानते हैं अगरबत्ती से होने वाले कुछ ऐसे नुकसान ।  

अगरबत्ती से सांस का संक्रमण होता है
हाल में हुए एक शोध में कहा गया है कि घरों में जलाई जाने वाली अगरबत्ती स्वास्थ्य के लिहाज से आपके लिए बेहद खतरनाक होती है। अगरबत्ती जलाने से हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड फैलती है। जिसकी वजह से फेफड़ों में सूजन और सांस सबंधी कई दिक्कतें हो सकती हैं। ये धुआं धूम्रपान के समय फेफड़ों में जाने वाले धुएं की तरह ही होता है।

त्वचा की एलर्जी 
लंबे समय तक अगरबत्तियों का उपयोग करने से आंखों और त्वचा की एलर्जी हो जाती है। इसको जलाने से इसमें से निकलने वाला धुआं आंखों में जलन पैदा करता है। इसके अलावा संवेदनशील त्वचा वाले लोग जब इस धुएं के संपर्क में आते हैं तो उन्हें खुजली महसूस होने लगती है।

मस्तिष्क के रोग
नियमित तौर पर अगरबत्ती का उपयोग करने से सिरदर्द, ध्यान केंद्रित करने में समस्या होना और विस्मृति आदि कई समस्याएं होती है।

गले का  कैंसर ​
अगरबत्ती का उपयोग करने से गले का  कैंसर भी हो सकता है। अगरबत्ती के धुएं से ऊपरी श्वास नलिका का कैंसर होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

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तीर्थ यात्रा और यज्ञ-अनुष्ठान से लाभ नहीं मिल रहा, जानें कारण

Ajeybharat31 May, 2017

किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए भारी-भरकम दान देने और महंगी पूजा करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ मन को उस देवता की तरह सरल बनाने की आवश्यकता है। हम किसी मातृशक्ति की पूजा कर उसे प्रसन्न करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपनी जन्म देने वाली मां को प्रसन्न करना चाहिए। वैसे भी मां का दर्जा बहुत ऊंचा है।


धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जन्मभूमि और जन्म देने वाली मां स्वर्ग से भी ज्यादा श्रेष्ठ है। तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग का सुख और एक पलड़े पर मां को बैठाया जाए तो मां का पलड़ा भारी रहेगा। यदि कोई मां को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित कर देवीधाम का चक्कर लगाए तो यह किसी भी दृष्टि से नैतिक नहीं है। प्राय: अपने संगे-संबंधियों का हक छीनकर, नाजायज तरीके से दूसरे का हिस्सा लेकर यदि कोई यज्ञ-हवन करेगा तो उसका लाभ निश्चित रूप से उसे ही मिलेगा, जिसका हिस्सा लिया गया है। प्राय: लोगों से सुनने में आता है कि बहुत तीर्थयात्राएं कीं, यज्ञ-अनुष्ठान किए, किंतु कोई लाभ नहीं मिला। लाभ तो मिला क्योंकि किसी भी निवेश का रिटर्न तो मिलता ही है। हां, लाभ उसको मिला जिसके हिस्से के धन से पूजन कार्य किया गया। भगवान को रिझाना है तो सिर्फ उत्तम आचरण से, न कि प्रलोभन से। भगवान शंकर को तो एक लोटा जल से प्रसन्न किया जा सकता है। कोई कुटिलता का परिचय दे और लोगों से चाहे कि लोग उसके प्रति सहृदयी रहें तो यह संभव नहीं।


यज्ञ-अनुष्ठान और दान के बदले यदि प्रेम, सहयोग, सद्भाव, करुणा रूपी दान परिवार, समाज में किया जाए तो यह ज्यादा प्रभावशाली होगा। पूजा-पाठ तो अच्छे संस्कारों के प्रति लगाव के लिए किया जाना चाहिए, न कि नौकरी, जमीन-जायदाद, मुकद्दमे आदि में जीत के लिए। राह चलते कोई व्यक्ति घायल दिख जाए और हम उसे अनदेखा कर मंदिर जाएं तो कोई लाभ नहीं। हो सकता है कि भगवान परीक्षा ले रहा हो कि हम सहृदयी हैं या हृदयहीन। इसलिए अपने कार्यों, विचारों, चाल-चलन से भगवान की कृपा जल्दी हासिल की जा सकती है, न कि ढकोसले करने से। विद्वानों की नजर में ढकोसला, दिखावा और आडंबर आदि नकारात्मक मार्ग हैं।

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सिखों-हिन्दुओं ने मुस्लिम भाइयों के लिए मस्जिद बनवाकर पेश की सौहार्द की अद्भुत मिसाल

जहां एक तरफ़ धार्मिक स्थलों को लेकर अतिसंवेदनशील लोग अपने क्षेत्र को रणभूमि बनाने से गुरेज़ नहीं करते, वहीं पंजाब के एक गांव में हिंदू और सिख परिवारों ने सांप्रदायिक सौहार्द की शानदार मिसाल पेश की है.

लुधियाना के गालिब राण सिंह वाल गांव में सिख और हिंदू परिवारों ने मिलकर एक मस्जिद का निर्माण किया है. गांव वालों ने इस मस्जिद का उद्घाटन 25 मई को किया था. गौरतलब है कि गांव के मुस्लिम लोगों को नमाज़ पढ़ने के लिए दूसरे गांवों में जाना पड़ता था.


रमज़ान के महीने की शुरुआत हो चुकी है. अगले एक महीने तक मुस्लिम समुदाय के लोग रोज़े रखेंगे. इस दौरान पांचों वक्त की नमाज़ के लिए भी लोग मस्जिद में जाते हैं. इस गांव में रहने वाले मुसलमानों का मानना है कि मस्जिद के बन जाने की वजह से यहां रहने वाले मुस्लिमों को काफ़ी आसानी होगी और उन्होंने इसे ईद का तोहफ़ा बताया.

मस्जिद का नाम हजरत अबू-बकर मस्जिद रखा गया है. वहीं खबर के मुताबिक, इस मस्जिद को बनाने का फैसला 1998 में लिया गया था. इसके बाद मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन एलॉट की गई थी लेकिन मस्जिद बनाने का काम बीते 2 मई से ही शुरू हो पाया था. इस गांव की आबादी बेहद कम है. यहां लगभग 1300 लोग रहते हैं. इनमें से 700 सिख, 200 हिंदू और 150 मुसलमान रहते हैं.

गांव वालों ने बाकायदा मुस्लिम परिवारों के साथ मिलकर इस मस्जिद का निर्माण कराया है. एक सादे समारोह के दौरान सरपंच और गांववालों ने शाही इमाम से मस्जिद का उद्घाटन कराया. मौके पर नायाब शाही इमाम मौलाना उस्मान रहमानी ने कहा कि गांववालों की इस पहल से कौमी एकता की नींव मज़बूत होगी.

 

Source: Times Now

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श्री गणेश चतुर्थी व्रत: घर को मंगलयुक्त करने के लिए इस दिशा में करें पूजन

Ajeybharat:29 May, 2017, 

 

29 मई, सोमवार को सिद्धि विनायक श्री गणेश चतुर्थी व्रत है। विघ्नों का नाश करने के लिए गणपति उपासना सर्वोत्तम है। विद्वानों का कहना है, मनोकामना पूर्ति के लिए इस दिन से आरंभ किए गए उपाय शुभ एवं श्रेष्ठ फल देते हैं। सर्वप्रथम इस विधि से करें पूजन-


पूजन विधि
गणेश जी का पूजन सर्वदा पूर्वमुखी या उत्तरमुखी होकर करें। सफेद आक, लाल चंदन, चांदी या मूंगे की स्वयं के अंगूठे के आकार जितनी निर्मित प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति शुभ होती है। साधारण पूजा के लिए पूजन सामग्री में गंध, कुंकुम, जल, दीपक, पुष्प, माला, दूर्वा, अक्षत, सिंदूर, मोदक, पान लें। ब्रह्यवैवर्तपुराण के अनुसार गणेशजी को तुलसी पत्र निषिद्व है। सिंदूर का चोला चढ़ा कर चांदी का वर्क लगाएं और गणेश जी का आह्वान करें।
 
गजाननं भूतगणांदिसेवितं 
कपित्थजम्बूफल चारुभक्षणम्।
उमासूतं शोकविनाशकारकं 
नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्।

गणेश संकट स्तोत्र का पाठ कर मोदक का भोग लगाएं एवं आरती करें। घर के बाहरी द्वार के ऊर्ध्वभाग में स्थित गणेश प्रतिमा की पूजा करने पर घर मंगलयुक्त हो जाता हैं।
खास काम पर जाने से पहले गणेश मंत्र का जाप कर 108 बार दूब चढ़ाएं।


शक्ति विनायक मंत्र
मंत्र महोदधि अनुसार मंत्र इस प्रकार है :
ऊँ ह्मीं ग्रीं ह्मीं

उपयुक्त मंत्र का पुरश्चरण चार लाख जप है। चतुर्थी से आरम्भ कर इसका दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन पश्चात् घी सहित अन्न की आहुति से हवन करने पर रोजगार प्राप्ति, गन्ने के हवन से लक्ष्मी प्राप्ति, केला और नारियल के हवन से घर में सुख शांति प्राप्त होती है।


किसी कार्य की सफलता में संदेह हो तो घर से निकलते वक्त गणेश जी के चरणों में रखा फूल अपने साथ लेकर जाएं।

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जब कोई व्यक्ति पराजित होने लगता है, उसमें दिखने लगता है ये लक्षण

बहुत समय पहले की बात है आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थी-मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाकी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिए बाहर जाना पड़ गया लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपकी हार और जीत का फैसला करेंगी।


यह कह कर देवी भारती वहां से चली गईं। शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आईं। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किए गए और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी। सभी दर्शक हैरान हो गए कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। 


एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की-हे!, ‘‘देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीं फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया?’’ 


देवी भारती ने मुस्कराकर जवाब दिया,  ‘जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ में पराजित होने लगता है और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रोधित हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध के ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैं। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।’ 


विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गए, सबने उनकी काफी प्रशंसा की। दोस्तो, क्रोध हमारी वो मनोदशा है जो हमारे विवेक को नष्ट कर देती है और जीत के नजदीक पहुंचकर भी जीत के सारे दरवाजे बंद कर देती है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का भी प्रमुख कारण बन जाता है। लाख अच्छाइयां होने के बावजूद भी क्रोधित व्यक्ति के सारे फूल रूपी गुण उसके क्रोध की गर्मी से मुरझा जाते हैं। क्रोध पर विजय पाना आसान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन उसे कम आसानी से किया जा सकता है इसलिए अपने क्रोध के मूल कारण को समझें और उसे सुधारने का प्रयत्न करें, आप पाएंगे कि स्वत: आपका क्रोध कम होता चला जाएगा।

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अपरा (अचला) एकादशी व्रत कथा ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी

एकादशी व्रत का संबंध केवल पाप मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति से नहीं है। एकादशी व्रत भौतिक सुख और धन देने वाली भी मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी ऐसी ही एकादशी है जिस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से अपार धन प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

अपरा एकादशी का एक अन्य अर्थ यह कि ऐसी ऐसी एकादशी है जिसका पुण्य अपार है। इस एकादशी का व्रत करने से, ऐसे पापों से भी मुक्ति मिल जाती है जिससे व्यक्ति को प्रेत योनी में जाना पड़ सकता है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी के व्रत से व्यक्ति को वर्तमान जीवन में चली आ रही आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है। अगले जन्म में व्यक्ति धनवान कुल में जन्म लेता है और अपार धन का उपभोग करता है। 

शास्त्रों में बताया गया है कि परनिंदा, झूठ, ठगी, छल ऐसे पाप हैं जिनके कारण व्यक्ति को नर्क में जाना पड़ता है। इस एकादशी के व्रत से इन पापों के प्रभाव में कमी आती है और व्यक्ति नर्क की यातना भोगने से बच जाता है। 

व्रत की विधिः 
पुराणों में एकादशी के व्रत के विषय में कहा गया है कि व्यक्ति को दशमी के दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह उठकर मन से सभी विकारों को निकाल दें और स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा में तुलसी पत्ता, श्रीखंड चंदन, गंगाजल एवं मौसमी फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। व्रत रखने वाले को पूरे दिन परनिंदा, झूठ, छल-कपट से बचना चाहिए। 

जो लोग किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं उन्हें एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। इन्हें भी झूठ और परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। 

व्रत कथाः 
महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।

ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

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जानिए क्यों 60 लाख से भी ज़्यादा कोरियाई लोग, भगवान राम की नगरी अयोध्या को मानते हैं अपना ननिहाल

भगवान की राम की नगरी 'अयोध्या' का नाम अकसर राजनीतिक कारणों से चर्चा में रहता है. एक बार फिर प्रभु राम की जन्मनगरी अयोध्या लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार कारण राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि कोरिया है.

ये जानने के बाद आप भी सोच रहे होंगे, भला अयोध्या का कनेक्शन कोरिया से कैसे हो सकता है? आज से लगभग दो हज़ार साल पहले हुई एक शादी ने अयोध्या का रिश्ता हज़ारों मील दूर स्थित कोरिया से जोड़ दिया था.


क्या है मामला?

भगवान राम को जब वनवास हुआ था, तो 14 साल बाद उनकी घर वापसी हो गई थी, लेकिन अयोध्या की ऐसी राजकुमारी है, जो अयोध्या से कोरिया तो पहुंच गई लेकिन वहां से वापिस लौट कर कभी नहीं आ पाई. धर्म नगरी अयोध्या हर साल सैकड़ों कोरियाई लोगों की मेज़बानी करता है. ये लोग भारत में लीजेंडरी क्वीन Heo Hwang-ok को श्रद्धांजलि देने आते हैं.

ऐसा माना जाता है, राजकुमारी अयोध्या से कोरिया की यात्रा पर गईं थी. समुद्र यात्रा पर जाते वक़्त राजकुमारी अपने साथ नाव का बैलेंस बनाने के लिए एक पत्थर लेकर भी गई थी. किमहये शहर में राजकुमारी Heo की प्रतिमा भी है. महापुरुषों के मुताबिक, वो इस पत्थर के सहारे सुरक्षित कोरिया पहुंच गई थी. इतना ही नहीं, कोरिया पहुंचने के बाद वो Geumgwan के King Suro की पहली रानी भी बन गई थी, जब राजा Suro की शादी हुई, उस वक़्त वो महज़ 16 साल के थे. यही कारण है कि कोरिया के 70 लाख से भी ज़्यादा लोग अयोध्या को अपनी मातृभूमि मानते हैं.


कोरिया के ज़्यादातर लोगों के मुताबिक, रानी Heo ने ही 7वीं शताब्दी में कोरिया के विभिन्न राजघरानों की स्थापना की थी. इनके वंशजों को कारक वंश का नाम दिया गया है, जो कि कोरिया समेत विश्व के अलग-अलग देशों में उच्च पदों पर आसीन हैं.


इस मामले के बारे में Hanyang University के प्रोफ़ेसर Byung Mo Kim का कहना है, 'हमारी रानी अयोध्या की बेटी थी, इसलिए अयोध्या हमारी मां हुई. कोरिया के दो-तिहाई से अधिक लोग इनके वंशज हैं.


कोरिया और अयोध्या के कनेक्शन के प्रमाण के बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर ने कहा, 'इसका जीता-जागता सबूत है, जुड़वा मछली का पत्थर, जिसे राजकुमारी का कहा जाता है. वो अयोध्या का प्रतीक चिन्ह है.'


आगे प्रोफ़ेसर कहते हैं, 'मैं अपने जीन को अयोध्या के शाही परिवार से साझा करता हूं. दोनों देशों के बीच कारोबार ही नहीं, बल्कि जीन का भी संबंध है. अयोध्या की राजकुमारी की शादी कोरिया के राजा से हुई.' कथा के अनुसार, रानी की मृत्यु 157 वर्ष की आयु में हुई थी.

 

Source : speakingtree

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आदियोगी का 112 फीट लंबी अर्धप्रतिमा का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज, ऐसी ही तीन और प्रतिमाएं बनाने की है योजना

ईशा योग फ़ाउन्डेशन द्वारा स्थापित भगवान शिव के अदियोगी रूप की 112 फ़ीट लंबी अर्धप्रतिमा को गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिल गयी है.

द गिनीज़ ने इसकी घोषणा अपनी अधिकारिक वेबसाइट पर की है. इस अर्धप्रतिमा को तमिलनाडु के कोयम्मबटुर शहर के बाहरी हिस्से में बनाया गया है. इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल फरवरी महीने में किया था.


ईशा फ़ाउन्डेशन के संचालक आध्यातमिक गुरू जग्गी वासुदेव ने प्रेस रिलीज़ में ये बताया कि हर दिन हज़ारों श्रद्धालू इसे देखने आते हैं. ये भी कहा गया है कि अर्धप्रतिमा आदियोगी के 112 योगा के तरीकों को इंगित करती है.


ईशा फ़ाउन्डेशन की योजना है कि वो 3 और ऐसी ही अर्धप्रतिमाओं को स्थापित करेगी. ये दूसरी बार है, जब ईशा फ़ाउन्डेशन का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज हुआ है, इससे पहले इस फ़ाउन्डेशन का नाम 8.52 लाख पौधे लगाने के लिए गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था.

Feature Image: newindianexpress

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