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आखिर इस रामायण में क्यों लिखा है ‘बिस्मिल्लाह’ ?

भारत विविधताओं से भरा देश है और यहाँ कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिन्हें देखकर पता चल जाता है कि क्यों ये देश कई धर्म-जातियों कई भाषाओं के होते हुए भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ है. ऐसा ही एक उदाहरण इस रामयण से भी मिलता है जो सन् 1715 में लिखी गई थी.

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1715 में सुमेर चंद ने संस्कृत में लिखी गई रामायण का फ़ारसी में अनुवाद किया था और कौमी एकता के लिए उन्होंने इसकी शुरुआत ‘बिस्मिल्लाह’ शब्द लिखकर की थी. जिस प्रकार राम केवल हिन्दुओं के देवता नहीं है बल्कि प्राचीन संस्कृति के एक प्रतीक चिन्ह हैं वैसे ही ये रामायण भी गंगा-जामुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण है. उन्होंने इसकी प्रस्तावना तीन पन्नों में लिखी और ये प्रस्तावना सोने के पानी से लिखी गई.

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अब फारसी में लिखी गई इस रामयण का अनुवाद हिंदी में करके रामपुर रजा लाइब्रेरी ने प्रकाशित किया है. टाउनहॉल में लगे देश के पहले राष्ट्रीय संस्कृत पुस्तक मेले में पहली बार फ़ारसी भाषा से हिंदी में अनुदित इस ग्रंथ की प्रतियां पाठकों के लिए उपलब्ध हैं.

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ये दुनिया की एक अनूठी रामायण इसलिए भी क्योंकि इसमें चित्रों को भी बड़े ही अच्छे तरीके से शामिल किया गया है. तीन खंडों में प्रकाशित हुई इस रामायण में 258 चित्र शामिल किये गए हैं.

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Krishna Janmashtami 2017: कन्हैया के जन्मोत्सव पूजा के बाद आधी रात में ऐसे खोलें उपवास

Krishna Janmashtami 2017 Fast: भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने और उन्हें भोग चढ़ाने के बाद ही जन्माष्टमी का व्रत खोला जाता है।

हिंदू धर्म में जन्माष्टमी एक मुख्य त्योहार है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। पुराणों के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण ने अपने अत्याचारी मामा कंस का विनाश करने के लिए मुथरा में अवतार लिया था। इस दिन व्रत भी रखा जाता है। बताया जाता है कि इस दिन हर एक व्यक्ति को व्रत रखना होता है। हालांकि, बुजुर्ग, रोगी और बच्चों को इस मामले में छूट है।

जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने के लिए कोई खास नियम नहीं हैं। इस दिन कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं तो वहीं कुछ लोग फलाहार के साथ ही उपवास रखते हैं। निर्जल व्रत में लोग पूरे दिन कुछ भी खाते और पीते नहीं है। यहां तक की पानी का सेवन भी नहीं किया जाता। लोगों को मानना है कि इस दिन पानी और खाना त्याग देने से भगवान श्री कृष्ण खुश होंगे। मानना है कि इस दिन व्रत करने से मुन की मुरादें पूरी होती हैं। इस दिन उपवास आधी रात में खोला जाता है। व्रत खत्म करने से पहले भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और उन्हें पकवानों का भोग लगाया जाता है।

जो श्रद्धालू निर्जल व्रत नहीं रख पाते, वो फलाहार के साथ उपवास रखते हैं। यह उपवास निर्जल व्रत जितना कठिन नहीं है। इसमें श्रद्धालू दूध और फलों का सेवन कर सकते हैं। हालांकि, जन्माष्टमी के दिन अनाज और नमक का सेवन नहीं करना होता है। निर्जल या फलाहार व्रत रखने वाले श्रद्धालू इस दिन भजन गाकर श्री कृष्ण की भक्ति करते हैं। इसके साथ ही इस दिन ‘ओम नमो भगवते वासुदेवा’ मंत्र का जाप करते हैं। वहीं कुछ लोग इस दिन श्रीमद भागवत पुराण भी व्रत के दौरान पढ़ते हैं।

जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालू भगवान श्री कृष्ण को विशेष मिठाई पेड़े और कलाकंद चढ़ाते हैं। इसके अलावा श्रीखंड और तिल की खीर का भोग भी लगाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण को दूध से बनी चीजें बहुत पसंद थीं। ऐसे में इस मौके पर भगवान श्री कृष्ण को दूध से बनी मिठाईयां चढ़ाई जाती हैं। श्रद्धालू भगवान को प्रसाद चढ़ाने के बाद भी खुद सेवन करते हैं।

 

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संत का इषारा समझा और बदल लिया जीवन

Ajeybharat/पूना /कहते हैं कि व्यक्ति में अगर जीवन-परिर्वतन की गुंजाइष हो तो उसे वक्त नहीं लगता। मात्र स्थान व समय निष्चित होता है कि अब वह बदलने वाला है पर बदलाव लाने में कोई ना कोई सहयोगी अवष्य बनता है। जी हाँ! पूना शहर के कात्रज स्थित ‘आनंद दरबार’ में श्रमण संघीय सलाहकार दिनेष मुनि, डाॅ. द्वीपेन्द्रमुनि और श्रमण डाॅ. पुष्पेन्द्र की दैनिक चातुर्मासिक प्रवचन-शृंखला गतिमान है।
23 जुलाई 2017 रविवार को सलाहकारप्रवर के सान्निध्य में ‘आचार्य आनंद कार्यक्षम पत्रकार पुरस्कार’ समारोह आयोजित था। समारोह में पत्रकार श्री बजरंग निंबालकर भी सम्मानित हुए। 
जब वे मुनिश्री के पास आषीर्वाद लेने आए, तब श्री दिनेष मुनि ने इषारे में उनको पूछा कि क्या आप मांसाहार करते हैं? 
पत्रकार बंधु ने तत्काल जवाब दिया – ‘‘हाँ गुरुदेव!’’ 
मुनिश्री ने मात्र इषारे में ही कहा कि छोड़ दीजिये। 
बजरंगजी ने मुनिश्री के संकेत को सकारात्मक लिया और तुरन्त बोले – ‘‘गुरुदेव! आज से त्याग करता हूँ।’’ 

गुरुदेवश्री ने उनको नवकार मंत्र सुनाते हुए इष्टदेव की साक्षी से आजीवन मांसाहार-त्याग की प्रतिज्ञा करवाई। बजरंगजी को तो एक नहीं, दो-दो पुरस्कार मिल गये। उनके हृदय-परिवर्तन की साक्षी धर्मसभा में उपस्थित नर-नारी ‘हर्ष-हर्ष, जय-जय’ बोल उठे। सभा में उनकी पत्नी व पुत्र भी थे, वे भी हर्ष से पुलकित हो उठे। 
बीस वर्षों तक सेना में रहकर देषसेवा करने वाले बजरंगजी पिछले सात वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मन की सच्चाई और सत्संकल्प का यह प्रेरक प्रसंग उनकी पत्रकारिता को नई दीप्ति प्रदान करता रहेगा। इससे पूर्व मनपा पूना नगरसेवक युवराज बेलदरे जब अपने जन्मदिवस पर आर्षीवाद प्राप्त करने आए तो सलाहकार दिनेष मुनि के कहने पर उन्होंने भी एक वर्ष तक मांसाहार त्यागने का निष्चय किया। संघपति बालासाहेब धोका ने इस अवसर पर श्री बजरंग जी का स्वागत अभिनंदन किया।

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हिन्दू धर्म के अनसुलझे रहस्य, जिनकी सत्यता आज तक साबित नहीं हुई

आज हम आपको कुछ ऐसे अनसुलझे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जो हिन्दू धर्म से जुड़े हुए हैं, जिनका आज तक खुलासा नहीं हो पाया है। आइये बात करते है इनके बारे में-

  1. तिब्बत का यमद्वार 

     

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सबसे पहले हम बात करेंगे तिब्बत में स्थित एक ऐसे स्थान की जिसे प्राचीनकाल में दुनिया का यमद्वार कहते थे । तिब्बत अखंड भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। तिब्बत को चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है। तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। यम का द्वार पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। इसकी परिक्रमा करने के बाद ही कैलाश यात्रा शुरू होती है। हिन्दू मान्यता के अनुसार इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है।

यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वॉइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं जिसका मतलब होता है- दो पैर वाले स्तूप। ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिरनुमा द्वार किसने और कब बनाया? इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।कहते हैं कि द्वार के इस ओर संसार है, तो उस पार मोक्षधाम।

2. स्वर्ण बनाने की विधि का सच ?

Jeevan Mantra

कहते हैं कि प्राचीन भारत के लोग स्वर्ण बनाने की विधि जानते थे। वे पारद आदि को किसी विशेष मिश्रण में मिलाकर स्वर्ण बना लेते थे, लेकिन क्या यह सच है? यह आज भी एक रहस्य है। कहा तो यह भी जाता है कि हिमालय में पारस नाम का एक सफेद पत्थर पाया जाता है जिसे यदि लोहे से छुआ दो तो वह लोहा स्वर्ण में बदल जाता था। पारे, जड़ी- वनस्पतियों और रसायनों से सोने का निर्माण करने की विधि के बारे में कई ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।

ऐसा तो नहीं कि इसी कारण बगैर किसी ‘खनन’ के बावजूद भारत के पास अपार मात्रा में सोना था। आखिर यह सोना आया कहां से था? मंदिरों में टनों सोना रखा रहता था। सोने के रथ बनाए जाते थे और प्राचीन राजा-महाराजा स्वर्ण आभूषणों से लदे रहते थे। कहते हैं कि बिहार की सोनगिर गुफा में लाखों टन सोना आज भी रखा हुआ है।

3. गरुड़

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प्राचीन मंदिरों के द्वार पर एक ओर गरूड़, तो दूसरी ओर हनुमानजी की मूर्ति आवेष्‍ठित की जाती रही है। घर में रखे मंदिर में गरूड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरूड़ ध्वज होता है। गरूड़ नाम से एक व्रत भी है। गरूड़ नाम से एक पुराण भी है। भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है। गरूड़ का हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। वे पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के वाहन हैं।

भगवान गरूड़ को कश्यप ऋषि और विनीता का पुत्र कहा गया है। विनीता दक्ष कन्या थीं। गरूड़ के बड़े भाई का नाम अरुण है, जो भगवान सूर्य के रथ का सारथी है। पक्षीराज गरूड़ को जीव विज्ञान में लेपटोटाइल्स जावानिकस कहते हैं। यह इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट यानी विलुप्तप्राय पक्षी की श्रेणी में है। पंचतंत्र में गरूड़ की कई कहानियां हैं।

क्या कभी पक्षी मानव हुआ करते थे? पुराणों में भगवान गरूड़ के पराक्रम के बारे में कई कथाओं का वर्णन मिलता है। उन्होंने देवताओं से युद्ध करके उनसे अमृत कलश छीन लिया था। उन्होंने भगवान राम को नागपाश से मुक्त कराया था। उन्हें उनकी शक्ति पर बड़ा घमंड हो चला था लेकिन हनुमानजी ने उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था।

गरुड़ की मान्यता

गरूड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण पक्षी माना गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गरूड़ को सुपर्ण (अच्छे पंख वाला) कहा गया है। जातक कथाओं में भी गरूड़ के बारे में कई कहानियां हैं। गुप्त काल के शासकों का प्रतीक चिह्न भी गरूड़ ही था। कर्नाटक के होयसल शासकों का भी प्रतीक गरूड़ था। अमेरिका और इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक गरूड़ है।

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भगवान विश्वकर्मा ने बनायी थीं नायाब चीज़ें, इनमें से कुछ तो आज भी मौजूद हैं

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा निर्माण और सृजन के देवता हैं. इन्हें सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का ईष्टदेव कहा जाता है. कुछ लोग मानते हैं कि भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मा जी के पुत्र हैं और उन्होंने ही ब्रह्माण्ड की रचना की थी.

Source: happywishes2016

क्या आपने कभी ये सोचा कि भगवान विश्वकर्मा को निर्माण का देवता क्यों कहा जाता है? या देवताओं के इस सबसे कुशल शिल्पी या आज की भाषा में इंजीनियर ने क्या-क्या बनाया था?

 

आज हम आपको बता रहे हैं ऐसी चीज़ें जिनका निर्माण पुराणों और लोक कथाओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने किया.

1. सोने की लंका

Source: blogspot

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, सोने की लंका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था. ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के बाद, सोने की लंका का निर्माण, विश्वकर्मा जी से करवाया था. शिव जी ने महापंडित रावण को गृह पूजन के लिए बुलाया, तो रावण ने दक्षिणा में उनसे ये सोने का महल ही मांग लिया. 

2. द्वारिका नगरी

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श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में भगवान विश्वकर्मा से द्वारिका नगरी का निर्माण करवाया था. द्वारिका नगरी की लम्बाई-चौड़ाई 48 कोस थी. उसमें वास्तु शास्त्र के अनुसार चौड़ी सड़कों, चौराहों और गलियों का निर्माण किया गया था.

3. शिव जी का रथ

Source: babamahakaal

महाभारत के अनुसार तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली के वध के लिए भगवान शिव जिस रथ से गए थे, वो विश्वकर्मा ने ही बनाया था. सोने के उस रथ के दाएं चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विराजमान थे.

4. गोपी तालाब

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भगवान कृष्ण के प्रेम में पागल गोपियां, एक बार एक तालाब के किनारे उनका इंतज़ार कर रही थीं. कुछ दिन बाद जब कृष्ण वहां आये तो उन्होंने गोपियों का समर्पण देखकर उस तालाब का नाम गोपी तालाब रखने का प्रस्ताव दिया. लेकिन गोपियों ने उनसे इस पुराने तालाब की जगह नया तालाब बनवाने को कहा. तब कृष्ण के आदेश पर विश्वकर्मा जी ने एक ख़ूबसूरत तालाब का निर्माण किया, जिसे वर्तमान में 'गोपी तालाब' के नाम से जाना जाता है.

5. राजीव लोचन मंदिर

Source: apnachhatisgarh

एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने एक बार विश्वकर्मा जी से धरती पर उनका ऐसी जगह मंदिर बनाने को कहा, जहां पांच कोस तक कोई शव न जलाया गया हो. भगवान विश्वकर्मा धरती पर आए तो उन्हें ऐसा कोई स्थान नहीं मिला. ये परेशानी बताने पर भगवान विष्णु ने अपना कमल का फूल धरती पर गिराया और विश्वकर्मा से कहा कि जहां ये फूल गिरे, वहीं मंदिर बना दो. वो फूल छत्तीसगढ़ के राजिम में गिरा जहां आज भगवान विष्णु का राजीव लोचन मंदिर है. ये मंदिर कमल के पराग पर बनाया गया है.

6. पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर

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बिहार के औरंगाबाद के 'देव' में त्रेतायुग में बना पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था. मंदिर में काले और भूरे रंग के पत्थरों की नायाब शिल्पकारी है. मंदिर पर लगे शिलालेख में ब्राह्मी लिपि में लिखित श्लोक की तिथि के अनुसार फ़िलहाल ये मंदिर 1 लाख 50 हज़ार 17 साल पुराना हो गया.

7. हस्तिनापुर

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माना जाता है कि प्राचीन काल की जितनी भी राजधानियां हैं, सब भगवान विश्कर्मा ने ही बनाई और बसाई थीं. कलियुग का हस्तिनापुर नगर भी भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाया था.

8. भगवान विश्वकर्मा के पुत्र ने बनाया था रामसेतु

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वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम के आदेश पर वानरों ने समुद्र पर पत्थर के पुल का निर्माण किया था. इन वानरों के मुखिया का नाम नल था, जो भगवान विश्वकर्मा के पुत्र थे. उन्होंने सभी शिल्प कलाएं अपने पिता से सीखी थीं.

इसके अलावा पुराने साहित्यों और पुराणों में जगह-जगह बहुत सी वस्तुओं और भवनों का वर्णन है, जिन्हें भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया माना जाता है. इनमें सबसे प्रमुख इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमंडलपुरी, शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, पुष्पक विमान, कर्ण का कुंडल, इंद्र का वज्र और धनुष, यमराज का कालदंड आदि हैं.

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ऐसा क्या हुआ, जो मनी प्लांट को पैसे देने वाला पौधा मानने लगे लोग?

हम में से कुछ के घरों में एक पौधा छोटी बोतल या गमले में रहता है, जिसे लोग अक्सर दूसरों के घरों से चुराकर अपने यहां लगाते हैं. ये पौधा सूरज की रौशनी से दूर रहकर भी लम्बे समय तक ग्रीन और फ्रेश लगता है. सही पकड़े हैं! हम मनी प्लांट की ही बात कर रहे हैं.

मनी प्लांट एक ऐसा पौधा है, जो ज़्यादातर घरों में इस विश्वास के साथ लगाया जाता है, कि ये घर में रुपये-पैसे की कमी नहीं होने देगा और इसको लगाने से घर में सुख, समृद्धि और शांति आएगी. मगर क्या आपको पता है कि मनी प्लांट को समृद्धि से जोड़ने के पीछे की कहानी क्या है? आइए हम बताते हैं.

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मनी प्लांट से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा है. ताइवान में एक ग़रीब किसान था. मेहनत के बावजूद उसकी तरक्की नहीं हो रही थी. इसलिए वो उदास रहने लगा. एक दिन उसे खेत में एक पौधा मिला, जो दिखने में थोड़ा अलग था. किसान उस पौधे को उठाकर घर ले गया और घर के बाहर मिट्टी में रोप दिया. उसने देखा कि पौधा बहुत लचीला है और बिना ज़्यादा देखभाल के भी अपने आप बढ़ता जा रहा है.

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पौधा, जिस तरह से बिना किसी सहायता के अपने आप ही बढ़ रहा था, किसान को इससे प्रेरणा मिली. पौधे के इस विकास ने उसके दिमाग़ में एक सकारात्मक ऊर्जा भर दी. किसान ने निर्णय लिया कि वो पौधे जैसा ही अपने व्यक्तित्व में लचीलापन लाएगा और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहेगा. वो बिना किसी की परवाह किए आगे बढ़ता रहेगा. जल्द ही उस पेड़ में फूल आ गए, तब तक किसान भी अपनी मेहनत से एक सफ़ल व्यवसायी बन चुका था.

लोगों ने किसान की सफ़लता का राज़ उसके घर के बाहर लगे हरे-भरे पौधे को मान लिया और इस तरह धीरे-धीरे लोगों ने उसे समृद्धि से जोड़कर, उसका नाम मनी प्लांट रख दिया.

 

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इस कहानी के अलावा भी कई मान्यताएं हैं, जिनके अलग-अलग आधार हैं. फेंगशुई के अनुसार, ये पौधा आसपास की हवा को शुद्ध बनाता है. ये रेडिएशन का प्रभाव कम करता है और ऑक्सीज़न छोड़ता है.

कहानी तो जान गए आप, अब एक बात और समझ लीजिए. किसी चीज़ में आस्था हमें हमेशा बल देती है. मगर ज़िन्दगी में कुछ भी पाने के लिए मेहनत बहुत ज़रूरी है. हो सकता है मनी प्लांट आपकी समृद्धि को लम्बे समय तक क़ायम रखे, मगर समृद्धि बढ़ाने के लिए मेहनत आपको ही करनी पड़ेगी.

लखनऊ के शायर मलिकज़ादा जावेद का एक शेर है:

'जिन्हें भरोसा नहीं होता अपनी मेहनत पर, मनी प्लांट घरों में वही लगाते हैं.'

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सबसे श्रेष्ठ व्रत है निर्जला एकादशी, पढ़ें व्रत कथा, विधि एवं आरती…

Nirjala Ekadashi | हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष में चौबीस एकादशियां होती हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। इस व्रत में भोजन करना और पानी पीना वर्जित है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस एकादशी पर व्रत करने से वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य मिलता है।

निर्जला एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले शेषशायी भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा करें। इसके बाद मन को शांत रखते हुए ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। शाम को पुन: भगवान विष्णु की पूजा करें व रात में भजन कीर्तन करते हुए धरती पर विश्राम करें। दूसरे दिन (6 जून, मंगलवार) किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित कर उसे भोजन कराएं तथा जल से भरे कलश के ऊपर सफेद वस्त्र ढक कर और उस पर शर्करा (शक्कर) तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

इसके अलावा यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इसके बाद स्वयं भोजन करें। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है-
एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥

इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

एक बार जब महर्षि वेदव्यास पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प करा रहे थे। तब महाबली भीम ने उनसे कहा- पितामह। आपने प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या, एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में वृक नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्य व्रत से वंचित रह जाऊंगा?

तब महर्षि वेदव्यास ने भीम से कहा- कुंतीनंदन भीम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। नि:संदेह तुम इस लोक में सुख, यश और मोक्ष प्राप्त करोगे। यह सुनकर भीमसेन भी निर्जला एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए और समय आने पर यह व्रत पूर्ण भी किया। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

जानिए निर्जला एकादशी का महत्व

1. निर्जला एकादशी के व्रत से साल की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।
2. एकादशी व्रत से मिलने वाला पुण्य सभी तीर्थों और दानों से ज्यादा है। मात्र एक दिन बिना पानी के रहने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश हो जाता है।
3. व्रती (व्रत करने वाला) मृत्यु के बाद यमलोक न जाकर भगवान के पुष्पक विमान से स्वर्ग को जाता है।
4. व्रती को स्वर्ण दान का फल मिलता है। हवन, यज्ञ करने पर अनगिनत फल पाता है। व्रती विष्णुधाम यानी वैकुण्ठ पाता है।
5. व्रती चारों पुरुषार्थ यानी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त करता है।
6. व्रत भंग दोष- शास्त्रों के मुताबिक अगर निर्जला एकादशी करने वाला व्रती, व्रत रखने पर भी भोजन में अन्न खाए, तो उसे चांडाल दोष लगता है और वह मृत्यु के बाद नरक में जाता है।

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कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं, महाभारत युद्ध के दौरान कृष्ण की गीता ने नहीं, लीला ने साबित की है ये बात

इन्सान अपने भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित रहता है. उसकी इसी प्रकृति की वजह से आज टीवी चैनलों और अख़बारों में भविष्य और समस्याओं का समाधान बताने वाले बाबाओं का बिज़नेस चल रहा है. बहुत से लोग रोज़ाना सुबह उठकर सबसे पहले टीवी या अख़बार में अपना राशिफल देखते हैं और उसमें बताई गई बातों के अनुसार अपना दिन भर का काम करते हैं. लेकिन एक सामान्य सा प्रश्न है-

अगर इन्सान को सचमुच उसका भविष्य पता चल जाए, तो क्या वो सबकुछ ठीक कर लेगा? क्या तब उसकी ज़िन्दगी अभी के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी होगी?

महाभारत की इस कहानी से शायद आपको इस प्रश्न का जवाब मिल जाए

Source: jagran

कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का युद्ध हो रहा था. सभी लोग पक्ष- विपक्ष में बंट गए. तब उडुपी के राजा ने निष्पक्ष रहने का फ़ैसला किया. उन्होंने न कौरवों को चुना न पांडवों को, बल्कि कृष्ण से उन्होंने एक अलग ही ज़िम्मेदारी मांग ली. उन्होंने कहा कि वो दोनों पक्षों के योद्धाओं के लिए भोजन की व्यवस्था करेंगे. युद्ध कब तक चलेगा यह निश्चित नहीं था. लाखों लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी ही थी, तो कृष्ण ने यह ज़िम्मेदारी उडुपी के राजा को दे दी.

युद्ध में रोज़ाना हज़ारों लोग मरते थे. ऐसे में भोजन कितने लोगों का बने, ताकि व्यर्थ न हो, इसकी गणित लगाना मुश्किल था. मगर फिर भी उडुपी के राजा की चतुराई से पूरे युद्ध के दौरान न कभी खाना कम पड़ा और न व्यर्थ हुआ. एक दिन राजा से किसी ने पूछा कि ऐसी व्यवस्थित गणना आप कैसे कर पाते हैं कि लोगों के मरने की संख्या जाने बिना भी भोजन न ज़्यादा होता है न कम. तब राजा ने जवाब दिया, ' कृष्ण हर रात को उबली मूंगफलियां खाना पसंद करते हैं. मैं उन्हें छीलकर एक बर्तन में रख देता हूं. वो रात में जितनी मूंगफलियां खाते हैं अगले दिन लगभग उतने हज़ार सैनिक मर जाते हैं. कृष्ण से मरने वालों की संख्या इस तरह पता चल जाती है. उसी के अनुसार खाना बनता है, तो व्यर्थ होने का सवाल ही नहीं.

परिणाम जानते थे कृष्ण फिर भी करते रहे लीला 

Source: pranamnews

यहां समझने की बात ये है कि कृष्ण वो थे जिन्हें सब कुछ पता था, फिर भी वो अपनी लीला खेल रहे थे. वो लगातार अपनी ज़िम्मेदारी के अनुसार युद्ध में भागीदार बन रहे थे. मगर क्या सामान्य मनुष्य के साथ यह संभव है?

सामान्य मनुष्य को अगर यह पता चल जाए कि कल क्या होने वाला है, तो वह कर्म करना छोड़ देगा. अगर उसे पता चल जाए कि एक सप्ताह बाद उसकी मृत्यु निश्चित है तो वो इसी समय से क्षण-क्षण मरने सा महसूस करने लगेगा. ये मनुष्य की सीमित बुद्धि का फेर है कि वो समझता है भविष्य जानने से वो उसे संवार लेगा. वास्तव में जीवन एक रोमांच का नाम है. एक ऐसी यात्रा जहां अगले क्षण का पता नहीं. जिन्हें हम खुशियां कहते हैं वो सामान्य घटनाएं ही होती हैं, मगर उनकी अनिश्चितता ही उन्हें हमारे सामने ख़ुशी के रूप में प्रस्तुत करती है.

इसीलिए कृष्ण ने गीता में कहा था-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्तव्य करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं. 

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रोज शाम को जलाते हैं घर में अगरबत्ती, तो जान लीजिए इसके नुकसान


अगर आप भी अपने पूजा घर में अक्सर अगरबत्ती का इस्तेमाल करते हैं तो ये खबर आपके लिए है। जी हां शायद ही आपको पता होगा कि भगवान को खुश करने के लिए जलाई जाने वाली ये अगरबत्ती हमारी सेहत के लिए बेहद हानिकारक होती है।

 

आइए जानते हैं अगरबत्ती से होने वाले कुछ ऐसे नुकसान ।  

अगरबत्ती से सांस का संक्रमण होता है
हाल में हुए एक शोध में कहा गया है कि घरों में जलाई जाने वाली अगरबत्ती स्वास्थ्य के लिहाज से आपके लिए बेहद खतरनाक होती है। अगरबत्ती जलाने से हवा में कार्बन मोनोऑक्साइड फैलती है। जिसकी वजह से फेफड़ों में सूजन और सांस सबंधी कई दिक्कतें हो सकती हैं। ये धुआं धूम्रपान के समय फेफड़ों में जाने वाले धुएं की तरह ही होता है।

त्वचा की एलर्जी 
लंबे समय तक अगरबत्तियों का उपयोग करने से आंखों और त्वचा की एलर्जी हो जाती है। इसको जलाने से इसमें से निकलने वाला धुआं आंखों में जलन पैदा करता है। इसके अलावा संवेदनशील त्वचा वाले लोग जब इस धुएं के संपर्क में आते हैं तो उन्हें खुजली महसूस होने लगती है।

मस्तिष्क के रोग
नियमित तौर पर अगरबत्ती का उपयोग करने से सिरदर्द, ध्यान केंद्रित करने में समस्या होना और विस्मृति आदि कई समस्याएं होती है।

गले का  कैंसर ​
अगरबत्ती का उपयोग करने से गले का  कैंसर भी हो सकता है। अगरबत्ती के धुएं से ऊपरी श्वास नलिका का कैंसर होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

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तीर्थ यात्रा और यज्ञ-अनुष्ठान से लाभ नहीं मिल रहा, जानें कारण

Ajeybharat31 May, 2017

किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए भारी-भरकम दान देने और महंगी पूजा करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ मन को उस देवता की तरह सरल बनाने की आवश्यकता है। हम किसी मातृशक्ति की पूजा कर उसे प्रसन्न करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपनी जन्म देने वाली मां को प्रसन्न करना चाहिए। वैसे भी मां का दर्जा बहुत ऊंचा है।


धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जन्मभूमि और जन्म देने वाली मां स्वर्ग से भी ज्यादा श्रेष्ठ है। तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग का सुख और एक पलड़े पर मां को बैठाया जाए तो मां का पलड़ा भारी रहेगा। यदि कोई मां को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित कर देवीधाम का चक्कर लगाए तो यह किसी भी दृष्टि से नैतिक नहीं है। प्राय: अपने संगे-संबंधियों का हक छीनकर, नाजायज तरीके से दूसरे का हिस्सा लेकर यदि कोई यज्ञ-हवन करेगा तो उसका लाभ निश्चित रूप से उसे ही मिलेगा, जिसका हिस्सा लिया गया है। प्राय: लोगों से सुनने में आता है कि बहुत तीर्थयात्राएं कीं, यज्ञ-अनुष्ठान किए, किंतु कोई लाभ नहीं मिला। लाभ तो मिला क्योंकि किसी भी निवेश का रिटर्न तो मिलता ही है। हां, लाभ उसको मिला जिसके हिस्से के धन से पूजन कार्य किया गया। भगवान को रिझाना है तो सिर्फ उत्तम आचरण से, न कि प्रलोभन से। भगवान शंकर को तो एक लोटा जल से प्रसन्न किया जा सकता है। कोई कुटिलता का परिचय दे और लोगों से चाहे कि लोग उसके प्रति सहृदयी रहें तो यह संभव नहीं।


यज्ञ-अनुष्ठान और दान के बदले यदि प्रेम, सहयोग, सद्भाव, करुणा रूपी दान परिवार, समाज में किया जाए तो यह ज्यादा प्रभावशाली होगा। पूजा-पाठ तो अच्छे संस्कारों के प्रति लगाव के लिए किया जाना चाहिए, न कि नौकरी, जमीन-जायदाद, मुकद्दमे आदि में जीत के लिए। राह चलते कोई व्यक्ति घायल दिख जाए और हम उसे अनदेखा कर मंदिर जाएं तो कोई लाभ नहीं। हो सकता है कि भगवान परीक्षा ले रहा हो कि हम सहृदयी हैं या हृदयहीन। इसलिए अपने कार्यों, विचारों, चाल-चलन से भगवान की कृपा जल्दी हासिल की जा सकती है, न कि ढकोसले करने से। विद्वानों की नजर में ढकोसला, दिखावा और आडंबर आदि नकारात्मक मार्ग हैं।

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सिखों-हिन्दुओं ने मुस्लिम भाइयों के लिए मस्जिद बनवाकर पेश की सौहार्द की अद्भुत मिसाल

जहां एक तरफ़ धार्मिक स्थलों को लेकर अतिसंवेदनशील लोग अपने क्षेत्र को रणभूमि बनाने से गुरेज़ नहीं करते, वहीं पंजाब के एक गांव में हिंदू और सिख परिवारों ने सांप्रदायिक सौहार्द की शानदार मिसाल पेश की है.

लुधियाना के गालिब राण सिंह वाल गांव में सिख और हिंदू परिवारों ने मिलकर एक मस्जिद का निर्माण किया है. गांव वालों ने इस मस्जिद का उद्घाटन 25 मई को किया था. गौरतलब है कि गांव के मुस्लिम लोगों को नमाज़ पढ़ने के लिए दूसरे गांवों में जाना पड़ता था.


रमज़ान के महीने की शुरुआत हो चुकी है. अगले एक महीने तक मुस्लिम समुदाय के लोग रोज़े रखेंगे. इस दौरान पांचों वक्त की नमाज़ के लिए भी लोग मस्जिद में जाते हैं. इस गांव में रहने वाले मुसलमानों का मानना है कि मस्जिद के बन जाने की वजह से यहां रहने वाले मुस्लिमों को काफ़ी आसानी होगी और उन्होंने इसे ईद का तोहफ़ा बताया.

मस्जिद का नाम हजरत अबू-बकर मस्जिद रखा गया है. वहीं खबर के मुताबिक, इस मस्जिद को बनाने का फैसला 1998 में लिया गया था. इसके बाद मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन एलॉट की गई थी लेकिन मस्जिद बनाने का काम बीते 2 मई से ही शुरू हो पाया था. इस गांव की आबादी बेहद कम है. यहां लगभग 1300 लोग रहते हैं. इनमें से 700 सिख, 200 हिंदू और 150 मुसलमान रहते हैं.

गांव वालों ने बाकायदा मुस्लिम परिवारों के साथ मिलकर इस मस्जिद का निर्माण कराया है. एक सादे समारोह के दौरान सरपंच और गांववालों ने शाही इमाम से मस्जिद का उद्घाटन कराया. मौके पर नायाब शाही इमाम मौलाना उस्मान रहमानी ने कहा कि गांववालों की इस पहल से कौमी एकता की नींव मज़बूत होगी.

 

Source: Times Now

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श्री गणेश चतुर्थी व्रत: घर को मंगलयुक्त करने के लिए इस दिशा में करें पूजन

Ajeybharat:29 May, 2017, 

 

29 मई, सोमवार को सिद्धि विनायक श्री गणेश चतुर्थी व्रत है। विघ्नों का नाश करने के लिए गणपति उपासना सर्वोत्तम है। विद्वानों का कहना है, मनोकामना पूर्ति के लिए इस दिन से आरंभ किए गए उपाय शुभ एवं श्रेष्ठ फल देते हैं। सर्वप्रथम इस विधि से करें पूजन-


पूजन विधि
गणेश जी का पूजन सर्वदा पूर्वमुखी या उत्तरमुखी होकर करें। सफेद आक, लाल चंदन, चांदी या मूंगे की स्वयं के अंगूठे के आकार जितनी निर्मित प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति शुभ होती है। साधारण पूजा के लिए पूजन सामग्री में गंध, कुंकुम, जल, दीपक, पुष्प, माला, दूर्वा, अक्षत, सिंदूर, मोदक, पान लें। ब्रह्यवैवर्तपुराण के अनुसार गणेशजी को तुलसी पत्र निषिद्व है। सिंदूर का चोला चढ़ा कर चांदी का वर्क लगाएं और गणेश जी का आह्वान करें।
 
गजाननं भूतगणांदिसेवितं 
कपित्थजम्बूफल चारुभक्षणम्।
उमासूतं शोकविनाशकारकं 
नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम्।

गणेश संकट स्तोत्र का पाठ कर मोदक का भोग लगाएं एवं आरती करें। घर के बाहरी द्वार के ऊर्ध्वभाग में स्थित गणेश प्रतिमा की पूजा करने पर घर मंगलयुक्त हो जाता हैं।
खास काम पर जाने से पहले गणेश मंत्र का जाप कर 108 बार दूब चढ़ाएं।


शक्ति विनायक मंत्र
मंत्र महोदधि अनुसार मंत्र इस प्रकार है :
ऊँ ह्मीं ग्रीं ह्मीं

उपयुक्त मंत्र का पुरश्चरण चार लाख जप है। चतुर्थी से आरम्भ कर इसका दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन पश्चात् घी सहित अन्न की आहुति से हवन करने पर रोजगार प्राप्ति, गन्ने के हवन से लक्ष्मी प्राप्ति, केला और नारियल के हवन से घर में सुख शांति प्राप्त होती है।


किसी कार्य की सफलता में संदेह हो तो घर से निकलते वक्त गणेश जी के चरणों में रखा फूल अपने साथ लेकर जाएं।

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जब कोई व्यक्ति पराजित होने लगता है, उसमें दिखने लगता है ये लक्षण

बहुत समय पहले की बात है आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थी-मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाकी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिए बाहर जाना पड़ गया लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनों मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपकी हार और जीत का फैसला करेंगी।


यह कह कर देवी भारती वहां से चली गईं। शास्त्रार्थ की प्रक्रिया आगे चलती रही। कुछ देर पश्चात देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आईं। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी-बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किए गए और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी। सभी दर्शक हैरान हो गए कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। 


एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की-हे!, ‘‘देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीं फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया?’’ 


देवी भारती ने मुस्कराकर जवाब दिया,  ‘जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ में पराजित होने लगता है और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रोधित हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध के ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैं। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।’ 


विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गए, सबने उनकी काफी प्रशंसा की। दोस्तो, क्रोध हमारी वो मनोदशा है जो हमारे विवेक को नष्ट कर देती है और जीत के नजदीक पहुंचकर भी जीत के सारे दरवाजे बंद कर देती है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का भी प्रमुख कारण बन जाता है। लाख अच्छाइयां होने के बावजूद भी क्रोधित व्यक्ति के सारे फूल रूपी गुण उसके क्रोध की गर्मी से मुरझा जाते हैं। क्रोध पर विजय पाना आसान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन उसे कम आसानी से किया जा सकता है इसलिए अपने क्रोध के मूल कारण को समझें और उसे सुधारने का प्रयत्न करें, आप पाएंगे कि स्वत: आपका क्रोध कम होता चला जाएगा।

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अपरा (अचला) एकादशी व्रत कथा ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी

एकादशी व्रत का संबंध केवल पाप मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति से नहीं है। एकादशी व्रत भौतिक सुख और धन देने वाली भी मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी ऐसी ही एकादशी है जिस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने से अपार धन प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

अपरा एकादशी का एक अन्य अर्थ यह कि ऐसी ऐसी एकादशी है जिसका पुण्य अपार है। इस एकादशी का व्रत करने से, ऐसे पापों से भी मुक्ति मिल जाती है जिससे व्यक्ति को प्रेत योनी में जाना पड़ सकता है। पद्मपुराण में बताया गया है कि इस एकादशी के व्रत से व्यक्ति को वर्तमान जीवन में चली आ रही आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है। अगले जन्म में व्यक्ति धनवान कुल में जन्म लेता है और अपार धन का उपभोग करता है। 

शास्त्रों में बताया गया है कि परनिंदा, झूठ, ठगी, छल ऐसे पाप हैं जिनके कारण व्यक्ति को नर्क में जाना पड़ता है। इस एकादशी के व्रत से इन पापों के प्रभाव में कमी आती है और व्यक्ति नर्क की यातना भोगने से बच जाता है। 

व्रत की विधिः 
पुराणों में एकादशी के व्रत के विषय में कहा गया है कि व्यक्ति को दशमी के दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए और रात्रि में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह उठकर मन से सभी विकारों को निकाल दें और स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा में तुलसी पत्ता, श्रीखंड चंदन, गंगाजल एवं मौसमी फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। व्रत रखने वाले को पूरे दिन परनिंदा, झूठ, छल-कपट से बचना चाहिए। 

जो लोग किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं उन्हें एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए। इन्हें भी झूठ और परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। 

व्रत कथाः 
महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।

ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

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जानिए क्यों 60 लाख से भी ज़्यादा कोरियाई लोग, भगवान राम की नगरी अयोध्या को मानते हैं अपना ननिहाल

भगवान की राम की नगरी 'अयोध्या' का नाम अकसर राजनीतिक कारणों से चर्चा में रहता है. एक बार फिर प्रभु राम की जन्मनगरी अयोध्या लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार कारण राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि कोरिया है.

ये जानने के बाद आप भी सोच रहे होंगे, भला अयोध्या का कनेक्शन कोरिया से कैसे हो सकता है? आज से लगभग दो हज़ार साल पहले हुई एक शादी ने अयोध्या का रिश्ता हज़ारों मील दूर स्थित कोरिया से जोड़ दिया था.


क्या है मामला?

भगवान राम को जब वनवास हुआ था, तो 14 साल बाद उनकी घर वापसी हो गई थी, लेकिन अयोध्या की ऐसी राजकुमारी है, जो अयोध्या से कोरिया तो पहुंच गई लेकिन वहां से वापिस लौट कर कभी नहीं आ पाई. धर्म नगरी अयोध्या हर साल सैकड़ों कोरियाई लोगों की मेज़बानी करता है. ये लोग भारत में लीजेंडरी क्वीन Heo Hwang-ok को श्रद्धांजलि देने आते हैं.

ऐसा माना जाता है, राजकुमारी अयोध्या से कोरिया की यात्रा पर गईं थी. समुद्र यात्रा पर जाते वक़्त राजकुमारी अपने साथ नाव का बैलेंस बनाने के लिए एक पत्थर लेकर भी गई थी. किमहये शहर में राजकुमारी Heo की प्रतिमा भी है. महापुरुषों के मुताबिक, वो इस पत्थर के सहारे सुरक्षित कोरिया पहुंच गई थी. इतना ही नहीं, कोरिया पहुंचने के बाद वो Geumgwan के King Suro की पहली रानी भी बन गई थी, जब राजा Suro की शादी हुई, उस वक़्त वो महज़ 16 साल के थे. यही कारण है कि कोरिया के 70 लाख से भी ज़्यादा लोग अयोध्या को अपनी मातृभूमि मानते हैं.


कोरिया के ज़्यादातर लोगों के मुताबिक, रानी Heo ने ही 7वीं शताब्दी में कोरिया के विभिन्न राजघरानों की स्थापना की थी. इनके वंशजों को कारक वंश का नाम दिया गया है, जो कि कोरिया समेत विश्व के अलग-अलग देशों में उच्च पदों पर आसीन हैं.


इस मामले के बारे में Hanyang University के प्रोफ़ेसर Byung Mo Kim का कहना है, 'हमारी रानी अयोध्या की बेटी थी, इसलिए अयोध्या हमारी मां हुई. कोरिया के दो-तिहाई से अधिक लोग इनके वंशज हैं.


कोरिया और अयोध्या के कनेक्शन के प्रमाण के बारे में बताते हुए प्रोफ़ेसर ने कहा, 'इसका जीता-जागता सबूत है, जुड़वा मछली का पत्थर, जिसे राजकुमारी का कहा जाता है. वो अयोध्या का प्रतीक चिन्ह है.'


आगे प्रोफ़ेसर कहते हैं, 'मैं अपने जीन को अयोध्या के शाही परिवार से साझा करता हूं. दोनों देशों के बीच कारोबार ही नहीं, बल्कि जीन का भी संबंध है. अयोध्या की राजकुमारी की शादी कोरिया के राजा से हुई.' कथा के अनुसार, रानी की मृत्यु 157 वर्ष की आयु में हुई थी.

 

Source : speakingtree

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आदियोगी का 112 फीट लंबी अर्धप्रतिमा का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज, ऐसी ही तीन और प्रतिमाएं बनाने की है योजना

ईशा योग फ़ाउन्डेशन द्वारा स्थापित भगवान शिव के अदियोगी रूप की 112 फ़ीट लंबी अर्धप्रतिमा को गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिल गयी है.

द गिनीज़ ने इसकी घोषणा अपनी अधिकारिक वेबसाइट पर की है. इस अर्धप्रतिमा को तमिलनाडु के कोयम्मबटुर शहर के बाहरी हिस्से में बनाया गया है. इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल फरवरी महीने में किया था.


ईशा फ़ाउन्डेशन के संचालक आध्यातमिक गुरू जग्गी वासुदेव ने प्रेस रिलीज़ में ये बताया कि हर दिन हज़ारों श्रद्धालू इसे देखने आते हैं. ये भी कहा गया है कि अर्धप्रतिमा आदियोगी के 112 योगा के तरीकों को इंगित करती है.


ईशा फ़ाउन्डेशन की योजना है कि वो 3 और ऐसी ही अर्धप्रतिमाओं को स्थापित करेगी. ये दूसरी बार है, जब ईशा फ़ाउन्डेशन का नाम गिनीज़ बुक में दर्ज हुआ है, इससे पहले इस फ़ाउन्डेशन का नाम 8.52 लाख पौधे लगाने के लिए गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था.

Feature Image: newindianexpress

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फिर से ‘रामायण’ देखने को तैयार हो जाइए, 500 करोड़ रुपये में बन रही नई ‘रामायण’

'Old Is Gold'. ये अंग्रेज़ी कहावत तब कही जाती है, जब पुराने दिनों की याद आती है. ऐसी सुनहरी यादों में से एक टेलिविज़न पर आने वाली रामायण भी है. 90's के दौर का वो सीरियल, जिसे देखने के लिए पूरा परिवार अपने सारे काम छोड़कर एकजुट हो जाया करता था. उस दौर में कुछ ही घरों में टीवी हुआ करता था, धार्मिक भावनाएं जुड़ी होने के कारण मोहल्ले के लोग भी इसे देखने के एक साथ इकठ्ठा हो जाते थे.

रविवार को आधे घंटे तक आने वाले इस सीरियल के वक़्त गली-मोहल्लों में ज़रा सी भी आवाज़ नहीं आती थी. सभी की नज़रें बस टीवी पर टिकी रहती थीं. उस दिन रामायण देखने के सिवा किसी के लिए कुछ और ज़रूरी काम हो ही नहीं सकता था.


रामायण 90's का सबसे पॉपुलर शो था. इसने टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. ये पॉपुलर शो एक बार फ़िर वापसी कर रहा है. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि, इस बार इस धार्मिक शो की वापसी छोटे पर्दे पर नहीं बल्कि बड़े पर्दे पर होगी.

'बाहुबली: द बिगिनिंग' और फिर 'बाहुबली: द कन्क्लूज़न' की रिकॉर्ड तोड़ सफ़लता के बाद, 500 करोड़ की फ़ीचर फ़िल्म के लिए तीन फ़िल्म निमार्ताओं ने हाथ मिलाया है. प्रोड्यूसर्स अल्ला अरविंद, नमित मल्होत्रा ​​और मधु मंताना, इस महाकाव्य को बड़े पर्दे पर उतारने में जुट गए हैं.

ये फ़िल्म हिंदी, तेलुगु और तमिल भाषाओं में होगी, जो कि भारत की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में अनुमानित 500 करोड़ रुपये के बजट के साथ पेश होगी. 'Lord of the Rings' की तरह ही इसे तीन सीरीज़ में दिखाया जाएगा.


PTI से बात करते हुए मंताना ने कहा, 'हां मैं इस पर काम कर रह हूंं.'

वहीं अरविंद का कहना है कि 'ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, लेकिन रामायण को बड़े पर्दे पर भव्यता के साथ कहनी होगा. हम एक बेहतरीन रचना प्रस्तुत करने के लिए कमिटेड हैं.'

सूत्रों के मुताबिक, तीनों एक वर्ष से अधिक समय से फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं.

नमित ने कहा कि 'वो बिल्कुल अलग तरीके की कहानी बताएंगे. उन्होंने कहा मेरे परिवार की तीन पीढ़ियां फ़िल्मों में हैं और ऐसी कहानियों को हम प्रभावी तरीके से सामने लाने में सक्षम हैं. इस महान भारतीय गाथा को दुनिया के सामने पेश करने के लिए बेहतर समय और अवसर दूसरा नहीं है, वो भी उस तरीके से, जिस तरीके से इसका दृष्टिकोण तथा सम्मान बरकरार रहे.'


1987-88 में दूरदर्शन पर प्रसारित रामानंद सागर की ‘रामायण’ में अरुण गोविल और दीपिका चिखल्या ने राम और सीता का रोल निभाया था. वहीं 2008 में सागर आर्ट्स द्वारा निर्मित रामायण में ये किरदार गुरमीत चौधरी और देबिना ने निभाया था. 

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जहां 10 लाख मुसलमान सैनिकों से लड़कर जीते थे मात्र 40 सिक्ख-चमकौर का युद्ध

दुनिया के इतिहास में ऐसा युद्ध न कभी किसी ने पढ़ा होगा न ही कभी किसी ने सोचा होगा, जिसमे 10 लाख की फ़ौज का सामना महज 40 लोगों के साथ हुआ था और 10 लाख की फ़ौज के सामने जीत होती है उन 40 सूरमो की।

22 दिसंबर सन्‌ 1704 को सिरसा नदी के किनारे चमकौर नामक जगह पर सिक्खों और मुग़लों के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया जो इतिहास में "चमकौर का युद्ध" नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के नेतृत्व में 40 सिक्खों का सामना वजीर खान के नेतृत्व वाले 10 लाख मुग़ल सैनिकों से हुआ था। वजीर खान किसी भी सूरत में गुरु गोविंद सिंह जी को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ना चाहता था क्योंकि औरंगजेब की लाख कोशिशों के बावजूद गुरु गोविंद सिंह मुग़लों की अधीनता स्वीकार नहीं कर रहे थे। लेकिन गुरु गोविंद सिंह के दो बेटों सहित 40 सिक्खों ने गुरूजी के आशीर्वाद और अपनी वीरता से वजीर खान को अपने मंसूबो में कामयाब नहीं होने दिया और 10 लाख मुग़ल सैनिक भी गुरु गोविंद सिंह जी को नहीं पकड़ पाए। यह युद्ध इतिहास में सिक्खों की वीरता और उनकी अपने धर्म के प्रति आस्था के लिए जाना जाता है । गुरु गोविंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन "जफरनामा" में करते हुए लिखा है- 

 

" चिड़ियों से मै बाज लडाऊ गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ.

सवा लाख से एक लडाऊ तभी गोबिंद सिंह नाम कहउँ,"

 


आइए याद करते अपने भारत के गौरवशाली इतिहास को और जानते है "चमकौर युद्ध" के पुरे घटनाक्रम को।

मई सन्‌ 1704 की आनंदपुर की आखिरी लड़ाई में कई मुग़ल शासकों की सयुक्त फौज ने आनंदपुर साहिब को 6 महीने तक घेरे रखा। उनका सोचना था की जब आनंदपुर साहिब में राशन-पानी खत्म हो जाएगा तब गुरु जी स्वयं मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लेंगे। पर ये मुग़लों की नासमझी थी, जब आनंदपुर साहिब में राशन-पानी खत्म हुआ तो एक रात गुरु गोविंद सिंह जी आनंदपुर साहिब में उपस्थित अपने सभी साथियों को लेकर वहां से रवाना हो गए। पर कुछ ही देर बाद मुगलों को पता चल गया की गुरु जी यहां से प्रस्थान कर गए है तो वो उनका पीछा करने लगे। उधर गुरु गोविंद सिंह जी अपने सभी साथियों के साथ सिरसा नदी की और बढे जा रहे थे।

जिस समय सिक्खों का काफिला इस बरसाती नदी के किनारे पहुँचा तो इसमें भयँकर बाढ़ आई हुई थी और पानी जोरों पर था। इस समय सिक्ख भारी कठिनाई में घिर गए। उनके पिछली तरफ शत्रु दल मारो-मार करता आ रहा था और सामने सिरसा नदी फुँकारा मार रही थी, निर्णय तुरन्त लेना था। अतः श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी ने कहा कि कुछ सैनिक यहीं शत्रु को युद्ध में उलझा कर रखो और जो सिरसा पार करने की क्षमता रखते हैं वे अपने घोड़े बहाव के साथ नदी पार करने का प्रयत्न करें।

ऐसा ही किया गया। भाई उदय सिंह तथा जीवन सिंह अपने अपने जत्थे लेकर शत्रु के साथ भिड़ गये। इतने में गुरूदेव जी सिरसा नदी पार करने में सफल हो गए। किन्तु सैकड़ों सिक्ख नदी पार करते हुए मौत का शिकार हो गए क्योंकि पानी का वेग बहुत तीखा था। कई तो पानी के बहाव में बहते हुए कई कोस दूर बह गए। जाड़े ऋतु की वर्षा, नदी का बर्फीला ठँडा पानी, इन बातों ने गुरूदेव जी के सैनिकों के शरीरों को सुन्न कर दिया। इसी कारण शत्रु सेना ने नदी पार करने का साहस नहीं किया।

नदी पार करने के पश्चात 40 सिक्ख दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह तथा जुझार सिंह के अतिरिक्त गुरूदेव जी स्वयँ कुल मिलाकर 43 व्यक्तियों की गिनती हुईं। नदी के इस पार भाई उदय सिंह मुगलों के अनेकों हमलों को पछाड़ते रहे ओर वे तब तक वीरता से लड़ते रहे जब तक उनके पास एक भी जीवित सैनिक था और अन्ततः वे युद्ध भूमि में गुरू आज्ञा निभाते और कर्त्तव्य पालन करते हुए वीरगति पा गये।

इस भयँकर उथल-पुथल में गुरूदेव जी का परिवार उनसे बिछुड़ गया। भाई मनी सिंह जी के जत्थे में माता साहिब कौर जी व माता सुन्दरी कौर जी और दो टहल सेवा करने वाली दासियाँ थी। दो सिक्ख भाई जवाहर सिंह तथा धन्ना सिंह जो दिल्ली के निवासी थे, यह लोग सरसा नदी पार कर पाए, यह सब हरिद्वार से होकर दिल्ली पहुँचे। जहाँ भाई जवाहर सिंह इनको अपने घर ले गया। दूसरे जत्थे में माता गुजरी जी छोटे साहबज़ादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह तथा गँगा राम ब्राह्मण ही थे, जो गुरू घर का रसोईया था। इसका गाँव खेहेड़ी यहाँ से लगभग 15 कोस की दूरी पर मौरिंडा कस्बे के निकट था। गँगा राम माता गुजरी जी व साहिबज़ादों को अपने गाँव ले गया।

गुरूदेव जी अपने चालीस सिक्खों के साथ आगे बढ़ते हुए दोपहर तक चमकौर नामक क्षेत्र के बाहर एक बगीचे में पहुँचे। यहाँ के स्थानीय लोगों ने गुरूदेव जी का हार्दिक स्वागत किया और प्रत्येक प्रकार की सहायता की। यहीं एक किलानुमा कच्ची हवेली थी जो सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि इसको एक ऊँचे टीले पर बनाया गया था। जिसके चारों ओर खुला समतल मैदान था। हवेली के स्वामी बुधीचन्द ने गुरूदेव जी से आग्रह किया कि आप इस हवेली में विश्राम करें।

गुरूदेव जी ने आगे जाना उचित नहीं समझा। अतः चालीस सिक्खों को छोटी छोटी टुकड़ियों में बाँट कर उनमें बचा खुचा असला बाँट दिया और सभी सिक्खों को मुकाबले के लिए मोर्चो पर तैनात कर दिया। अब सभी को मालूम था कि मृत्यु निश्चित है परन्तु खालसा सैन्य का सिद्धान्त था कि शत्रु के समक्ष हथियार नहीं डालने केवल वीरगति प्राप्त करनी है।

अतः अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सभी सिक्ख तत्पर हो गये। गरूदेव अपने चालीस शिष्यों की ताकत से असँख्य मुगल सेना से लड़ने की योजना बनाने लगे। गुरूदेव जी ने स्वयँ कच्ची गढ़ी (हवेली) के ऊपर अट्टालिका में मोर्चा सम्भाला। अन्य सिक्खों ने भी अपने अपने मोर्चे बनाए और मुगल सेना की राह देखने लगे।

उधर जैसे ही बरसाती नदी सिरसा के पानी का बहाव कम हुआ। मुग़ल सेना टिड्डी दल की तरह उसे पार करके गुरूदेव जी का पीछा करती हुई चमकौर के मैदान में पहुँची। देखते ही देखते उसने गुरूदेव जी की कच्ची गढ़ी को घेर लिया। मुग़ल सेनापतियों को गाँव वालों से पता चल गया था कि गुरूदेव जी के पास केवल चालीस ही सैनिक हैं। अतः वे यहाँ गुरूदेव जी को बन्दी बनाने के स्वप्न देखने लगे। सरहिन्द के नवाब वजीर ख़ान ने भोर होते ही मुनादी करवा दी कि यदि गुरूदेव जी अपने आपको साथियों सहित मुग़ल प्रशासन के हवाले करें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है। इस मुनादी के उत्तर में गुरूदेव जी ने मुग़ल सेनाओं पर तीरों की बौछार कर दी।
इस समय मुकाबला चालीस सिक्खों का हज़ारों असँख्य (लगभग 10 लाख) की गिनती में मुग़ल सैन्यबल के साथ था। इस पर गुरूदेव जी ने भी तो एक-एक सिक्ख को सवा-सवा लाख के साथ लड़ाने की सौगन्ध खाई हुई थी। अब इस सौगन्ध को भी विश्व के समक्ष क्रियान्वित करके प्रदर्शन करने का शुभ अवसर आ गया था।

22 दिसम्बर सन 1704 को सँसार का अनोखा युद्ध प्रारम्भ हो गया। आकाश में घनघोर बादल थे और धीमी धीमी बूँदाबाँदी हो रही थी। वर्ष का सबसे छोटा दिन होने के कारण सूर्य भी बहुत देर से उदय हुआ था, कड़ाके की शीत लहर चल रही थी किन्तु गर्मजोशी थी तो कच्ची हवेली में आश्रय लिए बैठे गुरूदेव जी के योद्धाओं के हृदय में।

कच्ची गढ़ी पर आक्रमण हुआ। भीतर से तीरों और गोलियों की बौछार हुई। अनेक मुग़ल सैनिक हताहत हुए। दोबारा सशक्त धावे का भी यही हाल हुआ। मुग़ल सेनापतियों को अविश्वास होने लगा था कि कोई चालीस सैनिकों की सहायता से इतना सबल भी बन सकता है। सिक्ख सैनिक लाखों की सेना में घिरे निर्भय भाव से लड़ने-मरने का खेल, खेल रहे थे। उनके पास जब गोला बारूद और बाण समाप्त हो गए किन्तु मुग़ल सैनिकों की गढ़ी के समीप भी जाने की हिम्मत नहीं हुई तो उन्होंने तलवार और भाले का युद्ध लड़ने के लिए मैदान में निकलना आवश्यक समझा।

सर्वप्रथम भाई हिम्मत सिंह जी को गुरूदेव जी ने आदेश दिया कि वह अपने साथियों सहित पाँच का जत्था लेकर रणक्षेत्र में जाकर शत्रु से जूझे। तभी मुग़ल जरनैल नाहर ख़ान ने सीढ़ी लगाकर गढ़ी पर चढ़ने का प्रयास किया किन्तु गुरूदेव जी ने उसको वहीं बाण से भेद कर चित्त कर दिया। एक और जरनैल ख्वाजा महमूद अली ने जब साथियों को मरते हुए देखा तो वह दीवार की ओट में भाग गया। गुरूदेव जी ने उसकी इस बुजदिली के कारण उसे अपनी रचना में मरदूद करके लिखा है।

सरहिन्द के नवाब ने सेनाओं को एक बार इक्ट्ठे होकर कच्ची गढ़ी पर पूर्ण वेग से आक्रमण करने का आदेश दिया। किन्तु गुरूदेव जी ऊँचे टीले की हवेली में होने के कारण सामरिक दृष्टि से अच्छी स्थिति में थे। अतः उन्होंने यह आक्रमण भी विफल कर दिया और सिँघों के बाणों की वर्षा से सैकड़ों मुग़ल सिपाहियों को सदा की नींद सुला दिया।

सिक्खों के जत्थे ने गढ़ी से बाहर आकर बढ़ रही मुग़ल सेना को करारे हाथ दिखलाये। गढ़ी की ऊपर की अट्टालिका (अटारी) से गुरूदेव जी स्वयँ अपने योद्धाओं की सहायता शत्रुओं पर बाण चलाकर कर रहे थे। घड़ी भर खूब लोहे पर लोहा बजा। सैकड़ों सैनिक मैदान में ढेर हो गए। अन्ततः पाँचों सिक्ख भी शहीद हो गये।

फिर गुरूदेव जी ने पाँच सिक्खों का दूसरा जत्था गढ़ी से बाहर रणक्षेत्र में भेजा। इस जत्थे ने भी आगे बढ़ते हुए शत्रुओं के छक्के छुड़ाए और उनको पीछे धकेल दिया और शत्रुओं का भारी जानी नुक्सान करते हुए स्वयँ भी शहीद हो गए। इस प्रकार गुरूदेव जी ने रणनीति बनाई और पाँच पाँच के जत्थे बारी बारी रणक्षेत्र में भेजने लगे। जब पाँचवा जत्था शहीद हो गया तो दोपहर का समय हो गया था।

सरहिन्द के नवाब वज़ीर ख़ान की हिदायतों का पालन करते हुए जरनैल हदायत ख़ान, इसमाईल खान, फुलाद खान, सुलतान खान, असमाल खान, जहान खान, खलील ख़ान और भूरे ख़ान एक बारगी सेनाओं को लेकर गढ़ी की ओर बढ़े। सब को पता था कि इतना बड़ा हमला रोक पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए अन्दर बाकी बचे सिक्खों ने गुरूदेव जी के सम्मुख प्रार्थना की कि वह साहिबजादों सहित युद्ध क्षेत्र से कहीं ओर निकल जाएँ।

यह सुनकर गुरूदेव जी ने सिक्खों से कहा: ‘तुम कौन से साहिबजादों (बेटों) की बात करते हो, तुम सभी मेरे ही साहबजादे हो’ गुरूदेव जी का यह उत्तर सुनकर सभी सिक्ख आश्चर्य में पड़ गये। गुरूदेव जी के बड़े सुपुत्र अजीत सिंह पिता जी के पास जाकर अपनी युद्धकला के प्रदर्शन की अनुमति माँगने लगे। गुरूदेव जी ने सहर्ष उन्हें आशीष दी और अपना कर्त्तव्य पूर्ण करने को प्रेरित किया।

साहिबजादा अजीत सिंह के मन में कुछ कर गुजरने के वलवले थे, युद्धकला में निपुणता थी। बस फिर क्या था वह अपने चार अन्य सिक्खों को लेकर गढ़ी से बाहर आए और मुगलों की सेना पर ऐसे टूट पड़े जैसे शार्दूल मृग-शावकों पर टूटता है। अजीत सिंघ जिधर बढ़ जाते, उधर सामने पड़ने वाले सैनिक गिरते, कटते या भाग जाते थे। पाँच सिंहों के जत्थे ने सैंकड़ों मुगलों को काल का ग्रास बना दिया।

अजीत सिंह ने अविस्मरणीय वीरता का प्रदर्शन किया, किन्तु एक एक ने यदि हजार हजार भी मारे हों तो सैनिकों के सागर में से चिड़िया की चोंच भर नीर ले जाने से क्या कमी आ सकती थी। साहिबजादा अजीत सिंह को, छोटे भाई साहिबज़ादा जुझार सिंह ने जब शहीद होते देखा तो उसने भी गुरूदेव जी से रणक्षेत्र में जाने की आज्ञा माँगी। गुरूदेव जी ने उसकी पीठ थपथपाई और अपने किशोर पुत्र को रणक्षेत्र में चार अन्य सेवकों के साथ भेजा।

गुरूदेव जी जुझार सिंघ को रणक्षेत्र में जूझते हुए, को देखकर प्रसन्न होने लगे और उसके युद्ध के कौशल देखकर जयकार के ऊँचे स्वर में नारे बुलन्द करने लगे– "जो बोले, सो निहाल, सत् श्री अकाल"। जुझार सिंह शत्रु सेना के बीच घिर गये किन्तु उन्होंने वीरता के जौहर दिखलाते हुए वीरगति पाई। इन दोनों योद्धाओं की आयु क्रमश 18 वर्ष तथा 14 वर्ष की थी। वर्षा अथवा बादलों के कारण साँझ हो गई, वर्ष का सबसे छोटा दिन था, कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी, अन्धेरा होते ही युद्ध रूक गया।

गुरू साहिब ने दोनों साहिबजादों को शहीद होते देखकर अकालपुरूख (ईश्वर) के समक्ष धन्यवाद, शुकराने की प्रार्थना की और कहा:

‘तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागे मेरा’।

शत्रु अपने घायल अथवा मृत सैनिकों के शवों को उठाने के चक्रव्यूह में फँस गया, चारों ओर अन्धेरा छा गया। इस समय गुरूदेव जी के पास सात सिक्ख सैनिक बच रहे थे और वह स्वयँ कुल मिलाकर आठ की गिनती पूरी होती थी। मुग़ल सेनाएँ पीछे हटकर आराम करने लगी। उन्हें अभी सन्देह बना हुआ था कि गढ़ी के भीतर पर्याप्त सँख्या में सैनिक मौजूद हैं।

रहिरास के पाठ का समय हो गया था अतः सभी सिक्खों ने गुरूदेव जी के साथ मिलकर पाठ किया तत्पश्चात् गुरूदेव जी ने सिक्खों को चढ़दीकला में रहकर जूझते हुए शहीद होने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी ने शीश झुकाकर आदेश का पालन करते हुए प्राणों की आहुति देने की शपथ ली किन्तु उन्होंने गुरूदेव जी के चरणों में प्रार्थना की कि यदि आप समय की नज़ाकत को मद्देनज़र रखते हुए यह कच्ची गढ़ीनुमा हवेली त्यागकर आप कहीं और चले जाएँ तो हम बाजी जीत सकते हैं क्योंकि हम मर गए तो कुछ नहीं बिगड़ेगा परन्तु आपकी शहीदी के बाद पँथ का क्या होगा ?

इस प्रकार तो श्री गुरू नानक देव जी का लक्ष्य सम्पूर्ण नहीं हो पायेगा। यदि आप जीवित रहे तो हमारे जैसे हज़ारों लाखों की गिनती में सिक्ख आपकी शरण में एकत्र होकर फिर से आपके नेतृत्त्व में सँघर्ष प्रारम्भ कर देंगे।

गुरूदेव जी तो दूसरों को उपदेश देते थे: जब आव की आउध निदान बनै, अति ही रण में तब जूझ मरौ। फिर भला युद्ध से वह स्वयँ कैसे मुँह मोड़ सकते थे ? गुरूदेव जी ने सिंघों को उत्तर दिया– मेरा जीवन मेरे प्यारे सिक्खों के जीवन से मूल्यवान नहीं, यह कैसे सम्भव हो सकता है कि मैं तुम्हें रणभूमि में छोड़कर अकेला निकल जाऊँ। मैं रणक्षेत्र को पीठ नहीं दिखा सकता, अब तो वह स्वयँ दिन चढ़ते ही सबसे पहले अपना जत्था लेकर युद्धभूमि में उतरेंगे। गुरूदेव जी के इस निर्णय से सिक्ख बहुत चिन्तित हुए। वे चाहते थे कि गुरूदेव जी किसी भी विधि से यहाँ से बचकर निकल जाएँ ताकि लोगों को भारी सँख्या में सिंघ सजाकर पुनः सँगठित होकर, मुगलों के साथ दो दो हाथ करें।

सिक्ख भी यह मन बनाए बैठे थे कि सतगुरू जी को किसी भी दशा में शहीद नहीं होने देना। वे जानते थे कि गुरूदेव जी द्वारा दी गई शहादत इस समय पँथ के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगी। अतः भाई दया सिंह जी ने एक युक्ति सोची और अपना अन्तिम हथियार आजमाया। उन्होंने इस युक्ति के अन्तर्गत सभी सिंहों को विश्वास में लिया और उनको साथ लेकर पुनः गुरूदेव जी के पास आये।

और कहने लगे: गुरू जी, अब गुरू खालसा, पाँच प्यारे, परमेश्वर रूप होकर, आपको आदेश देते हैं कि यह कच्ची गढ़ी आप तुरन्त त्याग दें और कहीं सुरक्षित स्थान पर चले जाएं क्योंकि इसी नीति में पँथ खालसे का भला है।

गुरूदेव जी ने पाँच प्यारों का आदेश सुनते ही शीश झुका दिया और कहा: मैं अब कोई प्रतिरोध नहीं कर सकता क्योंकि मुझे अपने गुरू की आज्ञा का पालन करना ही है।

गुरूदेव जी ने कच्ची गढ़ी त्यागने की योजना बनाई। दो जवानों को साथ चलने को कहा। शेष पाँचों को अलग अलग मोर्चो पर नियुक्त कर दिया। भाई जीवन सिंघ, जिसका डील-डौल, कद-बुत तथा रूपरेखा गुरूदेव जी के साथ मिलती थी, उसे अपना मुकुट, ताज पहनाकर अपने स्थान अट्टालिका पर बैठा दिया कि शत्रु भ्रम में पड़ा रहे कि गुरू गोबिन्द सिंघ स्वयँ हवेली में हैं, किन्तु उन्होंने निर्णय लिया कि यहाँ से प्रस्थान करते समय हम शत्रुओं को ललकारेगें क्योंकि चुपचाप, शान्त निकल जाना कायरता और कमजोरी का चिन्ह माना जाएगा और उन्होंने ऐसा ही किया।
देर रात गुरूदेव जी अपने दोनों साथियों दया सिंह तथा मानसिंह सहित गढ़ी से बाहर निकले, निकलने से पहले उनको समझा दिया कि हमे मालवा क्षेत्र की ओर जाना है और कुछ विशेष तारों की सीध में चलना है। जिससे बिछुड़ने पर फिर से मिल सकें। इस समय बूँदाबाँदी थम चुकी थी और आकाश में कहीं कहीं बादल छाये थे किन्तु बिजली बार बार चमक रही थी। कुछ दूरी पर अभी पहुँचे ही थे कि बिजली बहुत तेजी से चमकी।

दया सिंघ की दृष्टि रास्ते में बिखरे शवों पर पड़ी तो साहिबज़ादा अजीत सिंह का शव दिखाई दिया, उसने गुरूदेव जी से अनुरोध किया कि यदि आप आज्ञा दें तो मैं अजीत सिंह के पार्थिव शरीर पर अपनी चादर डाल दूँ। उस समय गुरूदेव जी ने दया सिंह से प्रश्न किया आप ऐसा क्यों करना चाहते हैं। दयासिंघ ने उत्तर दिया कि गुरूदेव, पिता जी आप के लाड़ले बेटे अजीत सिंह का यह शव है।

गुरूदेव जी ने फिर पूछा क्या वे मेरे पुत्र नहीं जिन्होंने मेरे एक सँकेत पर अपने प्राणों की आहुति दी है ? दया सिंह को इसका उत्तर हाँ में देना पड़ा। इस पर गुरूदेव जी ने कहा यदि तुम सभी सिंहों के शवों पर एक एक चादर डाल सकते हो, तो ठीक है, इसके शव पर भी डाल दो। भाई दया सिंह जी गुरूदेव जी के त्याग और बलिदान को समझ गये और तुरन्त आगे बढ़ गये।

योजना अनुसार गुरूदेव जी और सिक्ख अलग-अलग दिशा में कुछ दूरी पर चले गये और वहाँ से ऊँचे स्वर में आवाजें लगाई गई, पीर–ऐ–हिन्द जा रहा है किसी की हिम्मत है तो पकड़ ले और साथ ही मशालचियों को तीर मारे जिससे उनकी मशालें नीचे कीचड़ में गिर कर बुझ गई और अंधेरा घना हो गया। पुरस्कार के लालच में शत्रु सेना आवाज की सीध में भागी और आपस में भिड़ गई। समय का लाभ उठाकर गुरूदेव जी और दोनों सिंह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगे और यह नीति पूर्णतः सफल रही। इस प्रकार शत्रु सेना आपस में टकरा-टकराकर कट मरी।

अगली सुबह प्रकाश होने पर शत्रु सेना को भारी निराशा हुई क्योंकि हजारों असँख्य शवों में केवल पैंतीस शव सिक्खों के थे। उसमें भी उनको गुरू गोबिन्द सिंह कहीं दिखाई नहीं दिये। क्रोधातुर होकर शत्रु सेना ने गढ़ी पर पुनः आक्रमण कर दिया। असँख्य शत्रु सैनिकों के साथ जूझते हुए अन्दर के पाँचों सिक्ख वीरगति पा गए।

भाई जीवन सिंह जी भी शहीद हो गये जिन्होंने शत्रु को झाँसा देने के लिए गुरूदेव जी की वेशभूषा धारण की हुई थी। शव को देखकर मुग़ल सेनापति बहुत प्रसन्न हुए कि अन्त में गुरू मार ही लिया गया। परन्तु जल्दी ही उनको मालूम हो गया कि यह शव किसी अन्य व्यक्ति का है और गुरू तो सुरक्षित निकल गए हैं।

मुग़ल सत्ताधरियों को यह एक करारी चपत थी कि कश्मीर, लाहौर, दिल्ली और सरहिन्द की समस्त मुग़ल शक्ति सात महीने आनन्दपुर का घेरा डालने के बावजूद भी न तो गुरू गोबिन्द सिंह जी को पकड़ सकी और न ही सिक्खों से अपनी अधीनता स्वीकार करवा सकी। सरकारी खजाने के लाखों रूपये व्यय हो गये। हज़ारों की सँख्या में फौजी मारे गए पर मुग़ल अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त न कर सके।

 

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अगर इनमें से कोई चिह्न आपके हाथों में है, तो आपका आने वाला कल बेहद अच्छा होगा

इंसान की तकदीर कल उसे कहां ले जाएगी, ये कोई नहीं जानता लेकिन सदियों पुराने हस्त रेखा शास्त्र में पारंगत होने पर व्यक्ति किसी के भविष्य को लेकर संकेत ज़रूर दे सकता है. बेहद प्राचीन और गूढ़ इस शास्त्र को समझना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन जिन लोगों ने इसे पढ़ा और समझा है, उनके लिए ये बताना आसान है कि किसी व्यक्ति के जीवन में क्या हो सकता है. 

आज हम आपको ऐसे कुछ चिह्नों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके हाथों पर होकर आपका भविष्य निर्धारित करते हैं.

1. मंदिर


ये चिह्न दिखाता है कि व्यक्ति जीवन में दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल करेगा और सर्वोच्च पद पर आसीन होगा. ऐसे लोग किसी देश के राष्ट्रपति भी बन सकते हैं.

2. छत्र


छत्र, मंडप या छाता बहुत ही दुर्लभ साइन है और इसे ज़्यादातर मामलों में आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है. इसके साथ ही ये राजसी योग देता है. ये राजाओं और योगियों में पाया जा सकता है.

3. ध्वज


ये चिह्न जिनके हाथ में होता है, विजयश्री उनके कदम चूमती है. ऐसे लोगों के लिए कोई भी काम कठिन नहीं होता.

4 . तलवार


ये निशान जिनके हाथ में होता है, उनके लिए दुर्भाग्य का सूचक होता है. वे लोग जीवन में चुनौतियों और संघर्ष से गुज़रते हैं.

5. वृक्ष


ये निशान हाथ की जिस भी रेखा पर बना हो, उसकी विशेषता को और बढ़ा देता है. ये भाग्य रेखा, जीवन रेखा या ह्रदय रेखा पर पाए जाने पर बहुत अच्छे परिणाम देता है. कुल मिलाकर ये बहुत ही पॉज़िटिव साइन है.

6. त्रिकोण


-यदि ह्रदय रेखा पर त्रिकोण पाया जाता है, तो व्यक्ति अपनी मेहनत के दम पर सफल होगा.

-जब ये मस्तिष्क रेखा पर हो तो ये दिखाता है कि व्यक्ति राजसी योग पाएगा और ये पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहेगा.

-अगर ये निशान बृहस्पति के उच्च स्थान पर बना हो तो ऐसा व्यक्ति डिप्लोमैट हो सकता है, जो सिर्फ़ अपने बयानों से दो देशों के बीच शांति स्थापित कर सकेगा.

-अगर ये शनि के शिखर पर बन रहा हो तो व्यक्ति अदृश्य या गुप्त विज्ञान में पारंगत होता है और इसके भीतर गुप्त शक्तियां भी होती हैं.

-अगर ये निशान सूर्य पर्वत पर हो तो ऐसा व्यक्ति किसी कला में बेहद निपुण होता है, जैसे कि संगीत, नृत्य, पेंटिंग आदि.

-अगर ये बुध पर्वत पर हो तो व्यक्ति के पास ज़बरदस्त बिज़नेस सेन्स होता है और वो बहुत बुद्धिमान होता है. ऐसे लोग डिप्लोमैट के पद पर भी पहुंच सकते हैं.

-अगर त्रिकोण का ये निशान हाथ में मंगल पर हो तो शख़्स मार्शल आर्ट्स, ताइक्वांडो, कुंगफ़ू में पारंगत होता है और कई शस्त्र चलाना जानता है.

-अगर ये त्रिकोण शुक्र पर्वत पर पाया जाता है तो व्यक्ति अपने साथी को बेहद प्रेम करने वाला होगा.

 

7. त्रिशूल


ये बेहद सौभाग्यकारक निशान है. जो सूर्य या बृहस्पति पर्वत पर पाया जा सकता है. ये आपको जीवन में प्रसिद्धि देता है और सेलेब्रिटी जैसा दर्ज़ा भी.

8. अंडाकार या जौ के आकार का निशान


-इसे लेकर लोगों में कई मत हैं. जब ये अंगूठे के निचले पोर में पाया जाता है तो ये धन और मिला-जुलाकर सफलता का सूचक होता है.

-जब ये अंगूठे के बेस में पाया जाता है, तो इसे बेटे की निशानी मानते हैं.

-जब ये भाग्य रेखा की शुरुआत में हो, तो माता-पिता की अल्पायु में मृत्यु का संकेत देता है.

9. मत्स्य या मछली


ये निशान मणिबंध रेखा के ऊपर पाया जाता है. ये मार्क अगर बड़ा, बिना कहीं से कटा हुआ और साफ हो तो ये ज़िन्दगी में चमत्कार करने वाला है.

10. कछुआ


ये निशान व्यक्ति को बहुत ही भाग्यवान बनाता है.

11. कमल का निशान


ये बहुत ही दुर्लभ निशान है, जो शासकों के हाथों में देखने को मिलता है, या फिर उनके, जो जीवन को एन्जॉय करते हैं. ये व्यक्ति के चरित्र की पवित्रता और जीवन में बसी आध्यात्मिकता को भी दर्शाता है.

12. रथ का चिह्न


ये चिह्न अकसर राजाओं के हाथ में पाया जाता है, जो जीवन के सारे सुख प्राप्त करते हैं.

13. स्वास्तिक


ये बेहद शुभ निशान है, जो व्यक्ति को धर्म और सन्मार्ग पर ले जाता है. ऐसे लोग उच्चतम पदों पर पहुंचते हैं. यहां तक कि लोग इनकी पूजा करने लगते हैं.

14. सिंह का चिह्न


ये निशान जातक को हद से ज़्यादा बहादुर और हिम्मती बनाता है. ऐसे लोग ऊर्जा से हमेशा भरे रहते हैं.

15. धनुष


ऐसे लोग बहुत नेक होते हैं और उनका पूरा जीवन दूसरों की भलाई में गुज़रता है. उन्हें एक बेहतरीन लाइफ़ पार्टनर मिलता है और शादीशुदा जीवन शांतिपूर्ण गुज़रता है. ऐसे लोगों का भाग्य विवाह के बाद चमक उठता है.

16. चक्र


ऐसे लोग बेहद धनवान, सुख-सम्पदा से पूर्ण और अच्छे होते हैं. ये जातक भगवान विष्णु के भक्त होते हैं. वे किसी राजा से कम नहीं होते.

17. अंकुरित बीज


ये आलीशान और आरामपरस्त ज़िन्दगी की निशानी है.

18. कलश


जिसके हाथ में ये निशान हो, उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं.

19. जलाशय


ये निशान जातक को अत्यंत समृद्ध बनाता है, लेकिन उसे पेट, आंतों और गैस आदि की तकलीफ बनी रहती है.

20. गज चिह्न


हाथ में मौजूद ये निशान जातक को राजा बना देता है और सिंहासन पर बैठा देता है.

तो आपकी हथेली पर इनमें से कौन सा निशान है?

 

Designed by: Puneet Gaur Barnala, Information source: Nikhilworld

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दुनिया के अलग-अलग धर्मों की ऐतिहासिक तस्वीरों के पीछे है जीवन, मनुष्यता और धर्म का सच

दुनिया के दिलचस्प और रहस्यमयी विचारों में धर्म को भी शुमार किया जा सकता है. धर्म के प्रमुख तौर पर दो आयाम हैं. एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहरी दुनिया से है. दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध अंदरुनी और आंतरिक विचारों  से है. एक अलग परिपेक्ष्य में अगर देखा जाए तो उसी धर्म को विचारणीय समझा जाता है जो God Centric हो. कुछ विशेष विचारों के ज़रिए करोड़ों लोगों को अपना मुरीद बना लेने में धर्म सफ़ल रहा है. धर्म है तो प्रतीक भी होंगे ही. ज़्यादातर धर्म प्रतीकवाद से जुड़े हुए होते हैं. इनमें सबसे प्रमुख होती हैं तस्वीरें. किसी भी साधारण घर में आपको देवी-देवताओं की मूर्तियां मिल जाएंगी. मानने वालों का कहना है कि इन तस्वीरों से आत्मबल मिलता हैं.

घर में रखी ईश्वर की ये तस्वीरें भले ही आपकी अंदरूनी शांति के लिए ज़रूरी हों, लेकिन क्या आपने सोचा है कि दुनिया भर के प्रमुख धर्मों की महागाथाओं की खास तस्वीरों का महत्व क्या है? दुनिया में बेहतर होती तकनीक के ज़रिए धर्म का ग्लैमराइज़ेशन भी हुआ है और इसके चलते हम कई Iconic तस्वीरों के साक्षी बने हैं. लेकिन इन तस्वीरों का महत्व और प्रासंगिकता आखिर क्या है?

रथ पर भगवान कृष्ण के साथ सवार अर्जुन, महाभारत

Source: vignette4

महाभारत की ऐतिहासिक गाथा में छिपे संदेश को दरकिनार नहीं किया जा सकता. हिंदू धर्म के महाकाव्य का ये संदेश दरअसल हमारी कमियों और खासियतों के बीच होने वाला संघर्ष है. इस संघर्ष में भगवान कृष्ण, आत्मा या कहें ‘Higher intellect’ का नेतृत्व करते हैं और वे हमेशा से ही धर्म यानि मानवता के रास्ते की पैरवी करते आए हैं. ये संघर्ष हमेशा से जारी रहा है और आज भी जारी है.

ये तस्वीर हमारे मस्तिष्क और इंद्रियों को प्रशिक्षित करने का ज़रिया हो सकती है. इस तस्वीर में रथ शरीर है. इस तस्वीर में यात्रा करने वाला अर्जुन एक जीव है. सारथी कृष्ण, आत्मा है. ये सारथी, कौरवों (बुराइयां) और पांडवों (अच्छाइयां) के बीच चलने वाले युद्ध में इंसान का मार्गदर्शक होता है. तस्वीर में मौजूद घोड़ा इंद्रियां हैं, यानि शरीर के वे अंग (आंख, कान, नाक, जीभ) जिनसे आप चीज़ें महसूस करते हैं. घोड़े की लगाम मस्तिष्क है. मस्तिष्क को इंंद्रियों के रूप में मौजूद घोड़े पर लगाम कसनी होती है. इस मार्ग पर मनुष्य का ध्यान भटकाने के लिए  ढेरों लोभ-लुभावनी वस्तुओं की मौजूदगी होती है.

अगर आप अपने लिए भगवान का साथ चाहते हैं और उन्हें अपना मार्गदर्शक बनाना चाहते हैं, तो आपको ये सुनिश्चित करना होगा कि आप दिव्य पथ का रास्ता चुनें. आपको धर्म का मार्ग अपनाना होगा, क्योंकि जहां धर्म है, वहीं भगवान है. इस रथ को आपको दिव्य पथ यानि धर्म के रास्ते पर ले जाना होगा. इसे आदर्श और आत्मज्ञान की दिशा में ले जाना होगा. अगर ये घोड़े थके हुए हों, रास्ते को ठीक से न देख पा रहे हों और अगर उनकी मंज़िल दूसरी हो तो आपके मार्ग में कई रुकावटें आ सकती हैं.

भगवत गीता को मोक्ष तक पहुंचने का ज़रिया माना गया है. ज़िंदगी में शांति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए इसका इस्तेमाल होता है. हालांकि इस दुनिया में हम अकेले हैं और हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है, लेकिन हमारी आत्मा के सारथी कृष्णा अपने अंदर की कमियों के साथ संघर्ष में साथ देते हैं.

बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान मुद्रा में बैठे महात्मा बुद्ध, बौद्ध धर्म

Source: appliedbuddhism

महात्मा बुद्ध का जन्म के समय नाम था ‘सिद्धार्थ’. वे एक हार्ड कोर अस्तित्ववादी और शून्यवादी थे. उनके पैदा होने से पहले भविष्यवाणी भी हुई थी कि वे या तो एक विख्यात राजा होंगे या मोह-माया की दुनिया से दूर लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाएंगे. एक राजा के घर में पैदा हुए सिद्धार्थ चाहते तो पूरी उम्र ऐशो-आराम और शानो-शौकत में गुज़ार सकते थे, लेकिन ज़िंदगी के प्रति उत्सुकता ने उन्हें एक संत बना दिया. ज़िंदगी के असल मतलब की खोज को लेकर सालों-साल संघर्ष के बाद ही वे इस बोधि वृक्ष के नीचे आकर बैठ गए थे.

उन्होंने प्रण कर लिया था कि वे इस जगह को तब तक नहीं छोड़ेंगे, जब तक उन्हें ज़िंदगी का असली मार्ग नहीं मिल जाता. बोधि वृक्ष के नीचे वे ध्यान की मुद्रा में 49 दिनों तक बैठे रहे. वे तकलीफ़ों, परेशानियों से मुक्ति के उपाय को लेकर प्रतिबद्ध थे. महात्मा बुद्ध का ध्यान भटकाने के लिए ‘मारा’ नाम के शैतान ने उन्हें कई प्रलोभन देने चाहे, ‘मारा’ चाहता था कि सिद्धार्थ अपने बारे में सोचने लगें और उनका ध्यान भंग हो जाए, लेकिन बुद्ध की अच्छाइयों ने उनके दिमाग को भटकने नहीं दिया.

ईशु मसीह को सूली पर लटका देने वाली मार्मिक तस्वीर, ईसाई धर्म

Source: wikimedia

जीसस को सूली पर चढ़ा देने के इस मार्मिक चित्र से सभी वाकिफ़ हैं. हालांकि कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस की मृत्यु सूली पर चढ़ने से नहीं हुई. रोमनों द्वारा सूली पर चढ़ाए जाने के बावजूद वे बच गए थे और उनका बाकी जीवन भारत में बीता. हालांकि ईसाई धर्मगुरु इस बात से इंकार करते हैं कि ईशु मसीह कभी भारत आए थे.

एक पारंपरिक तरीके की जगह अगर जीसस की इस तस्वीर को अलग नज़रिए से देखा जाए, तो इसका राजनीतिक पहलू जान पड़ता है. जीसस को अथॉरिटी यानि प्रशासन ने अपने रास्ते से हटवाया. इसका एक कारण हो सकता है यीशु मसीह यानि जीसस का भगवान में अद्भुत विश्वास होना. इस कारण से वे उस समाज के ‘Radical Critic’ कहे जा सकते थे. जीसस को दरअसल इस सिस्टम ने मार डाला. जीसस की मौत दरअसल एक बड़ा उदाहरण है कि फ़ासीवाद स्तर का Domination system अक्सर अपने खिलाफ़ बोलने वालों को खत्म कर देता है.

इस क्रॉस का एक निजी और व्यक्तिगत पहलू भी है. यह तस्वीर आपकी ज़िंदगी में होने वाले सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक भी है. ये तस्वीर दरअसल आपके आध्यात्मिक, साइकोलॉजिकल परिवर्तन का प्रतीक है. एक ऐसा बदलाव जहां आप एक नई परिभाषा और एक उच्च चेतना यानि ‘Higher consciousness’ में मौजूद होंगे.

ध्यान मुद्रा में बैठे महावीर, जैन धर्म

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ये तस्वीर महावीर की है. जैन धर्म और बौद्ध धर्म में काफ़ी समानताएं हैं. जहां बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध की ज़िंदगी से प्रेरित है, वहीं जैन धर्म का केंद्र महावीर का जीवन और उनके विचारों से प्रेरित है. बौद्ध धर्म का मकसद जहां ज्ञान की प्राप्ति और मोक्ष है, वहीं जैन धर्म के कई विचार अहिंसा और आत्मा की शुद्धि से जुड़े हैं.

इस्लाम धर्म

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इस्लाम का केंद्र एकेश्वरवाद यानी एक अल्लाह का सिद्धांत रहा है. इस धर्म में अल्लाह के चित्रों और मूर्तियों का कोई स्थान नहीं है. हालांकि इस्लामी धार्मिक ग्रंथ कुरान में तस्वीर या मूर्ति बनाने पर प्रतिबंध का ज़िक्र ही नहीं है. अगर प्रतिबंध है तो किसी चित्र या मूर्ति की पूजा करने पर. इस्लाम के जानकारों के मुताबिक, जो बहुआयामी हो, जिसका कोई आदि और अंत न हो और जिसके जैसा कोई न हो, ऐसे सर्वशक्तिमान को चित्र या मूर्ति के सीमित दायरे से देखा-समझा नहीं जा सकता.

हिंदुओं का महाकाव्य, रामायण

यह तस्वीर भगवान श्रीराम के आदर्शों को हमारे सामने पेश करती है. श्रीराम ने अयोध्या छोड़ी, एक शानो-शौकत भरी ज़िंदगी की जगह 14 साल का वनवास चुना, लेकिन धर्म और आदर्श का साथ नहीं छोड़ा. यह दरअसल अच्छाई, बुराई और धर्म और अधर्म के निरंतर टकराव की गाथा है. ये टकराहट मनुष्य के सामने आज भी है, केवल उसका रूप बदल गया है.

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को उनके गुरु, उनके पिता, यहां तक कि उनकी माता ने भी धर्म मर्यादा भंग करने का अनुरोध किया, परंतु श्रीराम ने मर्यादा कभी भंग नहीं की. वह हमेशा ही धर्म की रक्षा करते रहे.

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