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रा० प्रा० वि० फाजिलपुर झाड़सा के अध्यापक भारत मुटरेजा को इंटीग्रल ह्युमेनिजम सम्मान से नवाजा गया

गुरुग्राम : शहीदी दिवस के अवसर पर  कर्ण नगरी करनाल में एक राष्ट्रीय स्तरीय आयोजित सम्मान समारोह जो शहीद भगत सिंह और प0 दीनदयाल उपाध्याय जी को समर्पित रहा का सफल आयोजन हुआ ।

समारोह में शहीद -ए – आजम भगत सिंह के भतीजे अभय सिंह संधू व् प0 दीनदयाल उपाध्याय  के भतीजे श्री विनोद शुक्ला जी ने मुख्यातिथि के रूप में शिरकत की जबकि पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री आई डी स्वामी ने बतौर विशिष्ट अतिथि शिरकत की।इस अवसर पर देश के विख्यात गायक चन्नी मस्ताना और टिक्कू हंस ने देशभक्ति गीतों की प्रस्तुतियां दी।

इस अवसर पर  देश भर की उन हस्तियो को सम्मानित किया गया जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों , अशिक्षा, ड्राप आउट्स का पाठशाला में दाखिला, पाठशाला में डिजिटल कार्य, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , नशा बंदी व पर्यावरण संरक्षण सहित समाज के वंचित वर्ग को सामाजिक धारा में जोड़ने का काम किया है। 
इस अवसर पर  गुरुग्राम जिला के रा० प्रा० विद्यालय फाजिलपुर झाड़सा में कार्यरत अध्यापक  भारत मुटरेजा को भी इंटीग्रल ह्युमेनिजम अवार्ड सम्मान से नवाजा गया 

शिक्षण कार्यों के साथ-साथ उनके द्वारा समय समय पर किये सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए यह सम्मान दिया गया है। इस अवसर पर भारत मुटरेजा ने कहा की "मेरा यह सम्मान उन छात्रों को समर्पित है जिनकी बदौलत मैं इस मुकाम पर पहुँचा हूँ" ।

देश भर से 100 लोगो को इस सम्मान के लिए चुना गया था,स्कूल के समस्त स्टाफ और प्रधानाध्यापक की तरफ से भारत मुटरेजा के उज्जवल भविष्य की कामना की गयी

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Cars पर कुछ ऐसे Quotes लिखे दिख जायें, तो स्वागत है! आप हरियाणा में हैं

हरियाणा को ले कर एक कहावत मशहूर है कि 'देशों में देश हरियाणा, जहां मिले दूध-दही का खाना.' इस दूध-दही के खाने का ही असर है कि यहां के लोगों की बोली बेशक थोड़ा अक्खड़ लगती हो, पर दिल बिलकुल किसी साफ़ पानी से भी ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है. इस अक्खड़ बोली का असर हरियाणा में चलने वाली गाड़ियों पर भी साफ़ देखा जा सकता है, जिनके बैक पर लिखे मज़ेदार कोट्स आपका फुल इंटरटेनमेंट करते हैं. आज हम आपके लिए हरियाणा वालों की गाड़ियों पर लिखे ऐसे One-Liners लेकर आये हैं, जिन्हें देख कर आप भी कहेंगे यहां लोग ही नहीं, बल्कि कारें भी बड़ी मज़ेदार होती है.







 





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एक ऐसा राजा जिससे कोई मिलने जाता तो पहले अपने कपड़े उतारता और फिर…

बचपन से हम लोग किताबों में राजा-रानी की कहानी सुनते आए हैं, और हमेशा से ही हमे उनके बारे में अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा होती है. कुछ महराजा अपनी सियासत के बारे में जाने जाते हैं तो कुछ अपनी रंगरलियों के लिए. ऐसे ही एक महाराजा थे भूपिंदर सिंह जिनके बारे में आप जितना जानेंगे उतना ज्यादा जानने की और इच्छा होगी. 12 अक्टूबर 1891 को पटियाला के मोती बाग में जन्मे भुपिंदर सिंह, महराजा राजेन्द्र सिंह के पुत्र थे. वर्ष 1900 में पिता की मौत के बाद भुपिंदर सिंह को राज्य का दायित्व मिला, जिसे वर्ष 1909 में औपचा​रिक तौर पर भुपिंदर सिंह ने संभाला था. राजा भुपिंदर सिंह छोटी उम्र से ही काफी रंगीन शौक रखते थे.

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दरअसल पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह अपनी रंगीनमिजाजी के लिए मशहूर रहे. जिसके किस्से आप जानेंगे तो चौंक जायेंगे और आपको भी इस राजा से नफरत हो जाएगी. महाराजा भूपिंदर सिंह की सभी गतिविधियों का पूरा जिक्र भूपिंदर सिंह के दीवान जरमनी दास की अपनी किताब ‘महाराजा’ में किया गया है. इस किताब में लिखा हुआ है कि महाराजा लगभग 150—400 पुरुष और महिलाओं के साथ अय्याशी करता था जिसमें नग्न औरतों के सीने पर मदिरा उडेल कर मदिरा सेवन और उसके बाद सामूहिक सेक्स होता था.

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महल का एक स्पेशल कमरा हमेशा सिर्फ महाराजा के लिए रिजर्व रहता था. कमरे की दीवारों पर चारों तरफ बने चित्रों में सैकड़ों तरह के आसनों मे प्रेम क्लाप में डूबे औरत-मर्दों को दिखाया गया. कमरे को हिन्दुस्तानी ढंग से सजाया गया है. फर्श पर कीमती जवाहरात से जड़े मोटे-मोटे क़ालीन बिछे हैं.

 

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कहा जाता है कि महाराजा भूपिंदर सिंह देश के पहले ऐसे शख्स थे, जिन्होंने सबसे पहले एरोप्लेन खरीदा था और अपने राज्य में रनवे बनवाया था. महाराजा को गाड़ियों का भी खूब शौक था, जिसके चलते उनके पास उस ज़माने में 44 रॉल्स रॉयस कारें थीं उनमें से 20 कारों का इस्तेमाल तो रोज राज्यीय दौरे के लिए किया जाता था. आपको बता दें कि साल महाराजा भूपिंदर सिंह साल 1935 में बर्लिन गए थे जहाँ वे जर्मनी के शासक हिटलर से मिले थे. हिटलर महाराजा भूपिंदर सिंह से काफी प्रभावित था जिसकी वजह से उसनें महाराजा को अपनी मायबैक कार गिफ्ट कर दी थी.

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सीजेएम ने किया नशामुक्ति केन्द्र का निरीक्षण

जीन्द 16 सितम्बर जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरण के सचिव एवं मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी डा० अशोक कुमार ने शनिवार को स्थानीय सफीदों रोड़ स्थित नई सोच नशा मुक्ति केन्द्र का औचक निरीक्षण किया । इस केन्द्र में विभिन्न नशों के आदि 16 मरीज नशा छोडऩे की जदोजहद कर रहे है। केन्द्र में उन्हे नशा छोडऩे के लिए दवाईयों के साथ- साथ मनोवैज्ञानिक डोज भी दी जाती है। 

निरीक्षण उपरान्त मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी ने बताया कि इसमें अफीम, सुल्फा, भूकी, समैक आदि प्रकार के नशा करने वाले लोगों को नशा छुड़ाने के लिए मानसिक रूप से भी तैयार किया जाता है। सीजेएम ने केन्द्र संचालक द्वारा मरीजों के लिए जुटाई जा रही सुविधाओं का मुआयना किया। गौरतलब है कि हर माह सीजेएम इस सैंटर का निरीक्षण करते है। इस निरीक्षण के दौरान सीजेएम ने सीसीटीवी की फुटेज भी देखी। उन्होंने कहा कि मरीजों के ईलाज में किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। मरीजों को मानसिक रूप से तैयार करना चाहिए कि वे भविष्य में किसी प्रकार का नशा नहीं करेंगे। सीजेएम ने एक- एक नशेड़ी से अलग- अलग बात की और उन्हे समाज की मूलधारा में शामिल होने के लिए नशों से दूर रहने की प्ररेणा दी। उन्होंने समझाया कि नशा किसी भी अच्छे भले इंसान को खत्म कर देता है। 

निरीक्षण के दौरान जुलाना कस्बे से एक वृद्ध नशा मुक्ति केन्द्र में आकर अपने पोते से मिलता है। 19 वर्षीय पोता शुल्फा की लत में पड़कर अपने स्वास्थ्य के साथ- साथ सामाजिक प्रवेश को भी भुल चुका है। दादा ने इस नशेड़ी पोते की इस लत को छोडऩे के काम में डाक्टरों की भूमिका की सराहना की। सीजेएम ने कहा कि इस युवा को मनावैज्ञानिक रूप से सहायता दिये जाने की आवश्यकता है। इस मौके पर मनोवैज्ञानिक नरेश जागलान, एडवोकेट विजय शर्मा, पीएलवी वेदप्रकाश आर्य भी उपस्थित रहे। 

इसके बाद मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी ने महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा जिला के निर्जन गांव में संचालित बाल प्रयास कुंज का भी औचक निरीक्षण किया उन्होंने यहां सफाई व्यवस्था की बात को लेकर संचालक को कड़े निर्देश दिये कि वे यहां परिसर में पूरी साफ- सफाई रखे। बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति भी पूरी तरह से गम्भीर रहे। भविष्य में किसी प्रकार की कोताही किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं होगी। गौरतलब है कि यहंा बाल प्रयास कुंज में 8 बच्चे रखे गये है। इस मौके पर बाल कल्याण विभाग के प्रोबैसन ऑफिसर अमित कुमार, मनोवैज्ञानिक नरेश जागलान, वकील विजय शर्मा, पीएलवी वेद प्रकाश आर्य भी मौजूद रहे। 
 

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ये IAS ऐसा कुछ करता था कि लोग परेशान हो गये थे, जिसके बाद गये कोर्ट

पूरे देश के सभी गाँवों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए सरकार ने कई नई नीतियाँ बनाई हैं. केन्द्र सरकार देश के सभी गाँवों को निर्मल बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन के तहत कई ग्रामीण योजनाओं का संचालन कर रही है. इस योजना के तहत ऐसे परिवार हैं जिनके घरों में शौचालय नहीं है जिसकी वजह से उन्हें खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है. लेकिन उनके पास पैसे नहीं है कि वे लोग अपने घर में शौचालय बनवा सकें तो इसलिए सरकार ऐसे लोगों को आर्थिक रूप से मदद देकर शौचालय निर्माण के साथ ही नियमित उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रही हैं. ऐसे में ही हरियाणा से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसनें वहां के जिला डिप्टी कमिश्नर मणिराम शर्मा की नौकरी को खतरे में डाल दिया है.

जी हाँ असल में डिप्टी कमिश्नर मणिराम शर्मा ने कुछ लोगों की फोटो फेसबुक पर डाली थी और उसके साथ एक आपत्तिजनक कमेंट भी लिखा था. ये फोटो कोई आम फोटो नहीं थी बल्कि ये फोटो खुले में शौच कर रहे लोगों का फोटो था. जिसके लिए इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उनसे उनके ऐसा करने का जवाब माँगा है.

आपको बता दें कि कोर्ट ने डिप्टी कमिश्नर मणिराम शर्मा को साफ़-साफ़ लताड़ा है कि क्या उनके पास कोई और अन्य रेवेन्यू और प्रशासनिक काम नहीं बचा था जिसकी वजह से वो यह काम कर रहे थे? इतना ही नहीं कोर्ट ने तो सरकार को आदेश दिए हैं कि सरकार कोर्ट को मणिराम शर्मा द्वारा उनके कार्यकाल में किये गए कार्यों का लेखा-जोखा भी दें कि वो अब तक क्या करते आये हैं. इस मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होनी है.

@क्या था पूरा मामला@ 

जून के महीने में ओडीएफ अभियान के समय डिप्टी कमिश्नर मणिराम शर्मा सालरडेही और सलम्बा गांव के दौरे के लिए इन गावों में गए थे. यहीं इस दौरे के दौरान गाँव के कुछ लोग खुले में शौच कर रहे थे. इतने में ही मणिराम शर्मा वहां पहुँच गए और उन्होंने उन सभी लोगों की पहले तो फोटो खिची और फिर सभी का 1100-1100 रुपए का चालान भी काटा. इतना सब कुछ करने के बावजूद उनहोंने उन सभी गाँव वालों की फोटो फेसबुक पर शेयर करते हुए भद्दा कमेंट भी लिखा था.

जिन लोगों की तस्वीर डिप्टी कमिश्नर मणिराम शर्मा ने शेयर की थी उनमें से कुछ लोगों ने मणिराम शर्मा के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी और अब इनके पिटिशनर के वकील डॉ. मज्लिश खान का आरोप है कि मणिराम शर्मा ने तो पहले खुले में शौच करने वालों को गिरफ्तार करवाया और फिर उन्हें अपराधी की तरह बैठाकर उनका फोटो लिया और फिर फेसबुक पर पोस्ट किया था जिसकी वजह से गाँव वालों की काफी बदनामी भी हुई. हम अपनी इस पोस्ट के ज़रिये किसी को भी खुले में शौच करने के लिए प्रेरित नहीं कर रहे हैं लेकिन जिन लोगों को मजबूरी के चलते खुले में शौच करना पड़ा और उनके साथ जो गलत हुआ हम उसके साथ हैं.

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क्या चौथी शताब्दी में ही शून्य की खोज हो चुकी थी !

हमेशा से ही माना जाता रहा है कि दुनिया के लिए शून्य भारत की देन रहा है। ये बात पहले ही तय है लेकिन हाल में हुई खोजों में कुछ ऐसे सबूत सामने आए हैं जिसमें शून्य की उम्र 3-4 सदी और ज्यादा बढ़ाने की बात छेड़ दी है। जिससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या शुन्य और ज्यादा पुराना हो गया है? इन सामने आए नए सबूतों ने शुन्य को और ज्यादा पुराना कर दिया है।

दरअसल ये बहस 1881 की भोजपत्र पांडुलिपि ने छेड़ दी है। नई कार्बन डेटिंग तकनीकी से यह बात सामने आई है कि 4 से 6 शताब्दी के बीच ही शून्य की खोज हो चुकी थी। ये पांडुलिपि बख्शाली में है, 1881 में पेशावर के करीब मिली जो 1902 से ऑक्सफोर्ड में ऐसे ही सुरक्षित रही।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर मारकुस डू सॉटॉय का कहना है कि ये गणित से भरा पड़ा है, लेकिन सबसे रोमांचक बात ये है कि हमने शून्य को पहचान लिया, इसलिए मैं ग्वालियर के उस छोटे से मंदिर गया जहां दीवार पर शून्य अंकित है वो नौवीं सदी के मध्य का माना जाता है, उम्मीद थी कि ये पांडुलिपि वहां मिलेगी। लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं मिला, कार्बन डेटिंग के मुताबिक ये पांडुलिपि दूसरी से चौथी शताब्दी के बीच की है, जो सबको हैरान करता है कि इसमें लिखा शून्य कितना पुराना है।

ये किसी ऐसी संस्कृति से आता है जिसने शून्य से लेकर अनंत तक के विचार दुनिया के सामने रखे है और कुछ नहीं या शून्य के लिए संकेत का इस्तेमाल किया। ये उनके दर्शन और संस्कृति का हिस्सा है, ये जानना बेहद रोमांचाकारी है कि कैसे किसी संस्कृति से गणित के अनसुलझे रहस्य उजागर होते हैं। अभी तक ये माना जाता रहा कि शून्य के इस संकेत का इस्तेमाल छठी सदी में ब्रह्मगुप्त ने किया। लेकिन अब इस दस्तावेज से शून्य का इतिहास और भी पीछे चला गया है।

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राष्ट्रपति की कार में नंबर प्लेट की जगह होता है ये ख़ास चिन्ह, जानिए उनकी कार की खासियत !

भारत के 14वें राष्ट्रपति बने रामनाथ कोविंद के बारे में आप सभी जानते ही होंगे लेकिन क्या आप यह बात जानते हैं कि उन्हें कौन सी कार मिली हुई है ? आपको बता दें प्रोटोकॉल के तहत रामनाथ कोविंद की कार भी उनके साथ यूपि आएगी. हम आपको रामनाथ जी कि कार के फीचर बताने वाले हैं.

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भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मर्सडीज S क्लास (S600) पुलमैन गार्ड कार यूज करते हैं. आपको बता दें इस कार की कीमत 10 से 12 करोड़ तक है. आपको बता दें उनकी गाड़ी का असल नंबर और रजिस्ट्रेशन नंबर सिक्यूरिटी के चलते लीक  नहीं किया जाता है. आपको बता दें उनकी कार पर नंबर की जगह अशोक स्तंभ   लगा होता है.

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जर्मन में बनी हुई यह कार किसी लम्बोज़ीन से कम नहीं है और यह दो कंपनी ने मिलकर बनाया है. ज्ञात हो पूर्व राष्ट्रपति भी उसी कार से चलते थे. यह कार 0.44 कैलिबर, मिलिट्री राइफल शॉट्स, बॉम्ब और मिसाइल से हुए अटैक के दौरान सेफ्टी देता है. इस कार  के अंदर फ्रेश ऑक्सीजन का भी बंदोबस है ताकि गैस अटैक के दौरान   बचा जा सके. कार पीन्चेर होने के बाद भी  कई 100 किलोमीटर  तक चल सकती है और यह कार सैटेलाइट सुविधा और जैमर आदि से लेस है.

 

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पीएम मोदी ने जापानी पीएम को कहा “शुक्रिया” तो जवाब में शिंजो आबे ने कहा….

देश में बुलेट ट्रेन की नींव रखी जा चुकी है. 13 सितम्बर को जापानी पीएम शिंजो आबे अपनी पत्नी के साथ आये ही भारत को तोहफ़ा देने थे. पीएम मोदी के साथ मिलकर शिंजो आबे ने आखिरकार देश को वो तोहफ़ा दे भी दिया जिसका हर भारतवासी टकटकी लगाये इंतज़ार कर रहा था. मिली ख़बरों के अनुसार 14 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे ने अहमदाबाद में देश के पहली बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का शिलान्यास कर दिया है.

बताया जा रहा है कि यह प्रोजेक्ट करीब 1 लाख करोड़ रुपए का है. जानकारी के लिए बता दें कि बुलेट ट्रेन का यह प्रोजेक्ट अहमदाबाद से मुंबई तक का है. सरकार की ओर से आत्मविश्वास के साथ कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट को निर्धारित समय से एक साल पहले यानी 2023 के बजाय 2022 में ही पूरा करे जाने की बात की जा रही है. ऐसे में बुलेट ट्रेन के शिलान्यास के मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि, “आजादी के 70 साल बाद इस प्रोजेक्ट का भूमि पूजन हुआ है, जब 2022 में आजादी के 75 साल पूरे होंगे तब मैं और शिंजो आबे बुलेट ट्रेन में एक साथ बैठेंगे.”

 

जिसके जवाब में शिंजो आबे ने कहा कि…

बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना ये भाषण गुजराती भाषा में शुरू किया. पीएम मोदी ने कहा कि मेरे करीबी मित्र शिंजो आबे का बहुत-बहुत धन्यवाद. पीएम मोदी ने कहा कि सपनों का विस्तार ही किसी भी देश को आगे बढ़ाता है, ये न्यू इंडिया है. जिसके जवाब में शिंजो आबे ने कहा कि, “भारत और जापान की दोस्ती सिर्फ द्विपक्षीय नहीं है, यह विश्व व्यवस्था की है. जापान पूरी तरह से मेक इन इंडिया का समर्थन करता है.” आगे बोलते हुए शिंजो आबे ने कहा कि, “मैं और पीएम मोदी जय इंडिया, जय जापान का सपना साकार करेंगे. साथ ही मुझे पूरी उम्मीद है अगली बार जब भारत आऊंगा तो बुलेट ट्रेन में बैठूंगा.” शिंजो आबे ने आगे कहा कि, “पीएम मोदी एक दूरदर्शी नेता हैं, मैंने खुद इस प्रोजेक्ट में रुचि ली है. जापान से 100 से अधिक इंजीनियर भारत में आए हुए हैं, मोदी की नीतियों का पूरा समर्थन करता हूं.” यही नहीं शिंजो आबे ने ये तक कहा कि जापान में बुलेट ट्रेन से कोई हादसा नहीं होता है ऐसे ही पीएम मोदी के प्रयास से एक दिन पूरे भारत में बुलेट ट्रेन दौड़ेगी.

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प्रद्युम्न्न का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने किया ऐसा खुलासा…

गुडगाँव में रेयान इंटरनेशनल स्कूल में मासूम प्रद्युम्न की हत्या को काफी दिन बीत चुके हैं लेकिन पुलिस के हाथ अभी तक ऐसा कोई सुराग नहीं आया है जिससे केस को कोई ठोस दिशा मिल सके. केस सामने आने के बाद से ही एक ही थ्योरी है जिस पर लगातार ही स्कूल दबाव बने पर तुला हुआ है तो वहीँ दूसरी ओर प्रद्युम्न के घर वाले इस बात को मानने से सिरे से इनकार कर रहे हैं कि प्रद्युम्न की हत्या कंडक्टर ने की है.

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पहली थ्योरी के मुताबिक प्रद्युम्न की हत्या कंडक्टर ने की थी वो भी महज़ इस वजह से कि वो प्रद्युम्न के साथ यौन शोषण करने की कोशिश में नाकाम रहा था. हालाँकि परिवार ने हमेशा इस थ्योरी पर सवाल उठाये थे. ऐसे में परिवार की इस विश्वास को मनाओ उस वक़्त और ही मजबूती मिल गयी जब प्रद्युम्न की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई. जानकारी के लिए बता दें कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ये बात साफ़ हो गयी है कि प्रद्युम्न की हत्या से पहले उसका यौन उत्पीड़न नहीं हुआ था. प्रद्युम्न की पोस्मॉर्टम करने वाले डॉक्टरों में से एक दीपक माथुर ने कहा कि उसके साथ यौन उत्पीड़न नहीं किया गया था.

पोस्टमार्टम में हुए इस खुलासे के बाद स्कूल प्रशासन पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं. सवाल ये कि अगर प्रद्युम्न के साथ यौन शोषण की कोशिश हुई ही नहीं तो कंडक्टर ने उसे मारा क्यूँ? आखिर पहले ही दिन से ये थ्योरी क्यों चलायी जा रही है कि प्रद्युम्न के यौन शोषण की कोशिश की गयी थी और नाकाम होने पर उसे मौत के घाट उतार दिया गया? अब जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ये बात साफ़ हो गयी है कि प्रद्युम्न के साथ कोई गलत काम की कोशिश नहीं की गयी थी तो आखिर क्या इअसी वजह रही होगी जिसके चलते मासूम प्रद्युम्न को इतनी बेरहमी से मार दिया गया?

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स्काउट व गाइड एवं स्काउटर व गाइडर के द्वितीय तृतीय सोपान एवं टोली नायक प्रशिक्षण शिविर सम्पन

Ajay Kumar Vidhyarthi/डीग 10 सितम्बर स्थानीय संघ डीग द्वारा स्काउट व गाइड एवं स्काउटर व गाइडर के द्वितीय तृतीय सोपान एवं टोली नायक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन डीग के किशन लाल जोशी  राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में किया गया।  संघ के सचिव बच्चू सिंह के अनुसार प्रशिक्षण शिविर   में स्काउट व गाइड प्रतिज्ञा, नियम, खोज के चिन्ह, सीटी के  संकेत, हाथ के इशारे, दिशा ज्ञान, अनुमान लगाना, भोजन बनाना, कम्पास का ज्ञान, प्राथमिक उपचार, हाइक, बैजों की जानकारी, इतिहास व संगठन की जानकारी व समाज सेवा की जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण के दौरान डीग एस.डीएम दुली चंद मीणा कहा कहा कि स्काउट गाइड का यह प्रशिक्षण छात्र छात्राओं को सामान्य छात्रों से अलग पहचान दिलाता है। उन्होने स्काउट गाइड से राष्ट्रीय एकता,स्वच्छता व समाज  सेवा कार्य करने के लिए प्रेरित किया। प्रशिक्षण के अंतिम दिवस स्काउट गाइड ने डीग जल महलों की प्रवेश द्वार एवं उद्यानों की साफ-सफाई की ।शिविर में भगवान सिंह सिनसिनवार, बलराज सिंह, जहान सिंह प्रधानाचार्य, घनश्याम शर्मा शा. शिक्षक, मानसिंह यादव, सरस्वती गोपालिया, वीणा मुद्गल, प्रीति शर्मा, उमेश यादव, मंजू पवन, विनोद कुमार शर्मा, नरेंद्र शर्मा, मान सिंह बघेल आदि ने भाग लिया

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Meet Jagdeep Singh, the judge who sentenced Dera chief Ram Rahim to 20 years in prison

Jagdeep Singh joined the Haryana judicial services in 2012 and was posted at Sonepat. The CBI court posting, which is generally given after a lot of checks by the high court administration, is his second posting.

He is the man of the moment. Special CBI judge Jagdeep Singh was flown into Rohtak jail on Monday morning in a helicopter to pronounce the sentence on self-styled godman Ram Rahim Singh.

The judge sentenced he ‘godman’ to two 10-year prison terms that will run consecutively.

Singh, who pronounced Singh guilty of raping two women in a heavily guarded courtroom on Friday, is known for his competence and toughness. Eyewitnesses recall how he didn’t let the tense atmosphere in Haryana’s Panchkula — more than 200,000 dera followers had camped in the city — to unfaze him as he walked into the court on Friday.

Soon after, Singh convicted Sirsa-based Dera Sacha Sauda chief Gurmeet Ram Rahim in a 15-year-old rape case, filed by two of his women followers.

A very competent, tough and upright judge with a no-nonsense attitude. That is how Singh is described by his colleagues in the legal fraternity.

An additional district and sessions judge rank official, Singh was designated as the CBI special judge last year. This is his second posting as a judicial officer.

Singh joined the Haryana judicial services in 2012 and was posted at Sonepat. The CBI court posting, which is generally given after a lot of checks by the high court administration, is his second posting.

Prior to joining the judicial service, he was a Punjab and Haryana high court lawyer. “Singh likes keeping a low profile and is a man of few words. But all those who know him vouch for his competence and integrity,” said a lawyer who has practiced with him. Singh, who hails from Haryana, took up both civil and criminal cases between 2000 and 2012.

Singh completed his law degree from Panjab University (PU) around 2000. “He was a bright student,” recalled a Haryana judicial officer, who has known him since his Panjab University days. “He is considered a very hardworking and upright officer,” he added.

Jagdeep hit the headlines in September 2016, when on his way from Hisar to Panchkula, he played a Good Samaritan and rushed four people, who were seriously injured in a road accident, to a hospital in Jind district. As per reports, he first called up emergency to rush an ambulance, but when the operator told him, “Will the ambulance come flying?”, he stopped a private vehicle and himself took the injured to the hospital.

 

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हेलीकॉप्टर में अपनी बेटी के साथ कुछ ऐसा करते नज़र आये बाबा रहीम.

25 अगस्त को देश ने वो नज़ारा देखा जो आजतक हम सिर्फ फिल्मों में देखा या कहानियों में सुना करते थे. मौका था हाईकोर्ट की तरफ से आने वाले उस एक फैसले का. फैसले एक “इंसानी-बाबा” पर लगे यौन शोषण का. अपने कारनामों का फैसला सुनने के लिए बाबा राम रहीम सुबह 9 बजकर 5 मिनट पर करीब 800 गाड़ियों के साथ सिरसा से पंचकुला के लिए निकले थे.

 

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मीडिया रिपोर्ट्स की ख़बरों की मानें तो बताया जा रहा है कि बाबा के इस पांच घंटे के सफर में साए की तरह उनकी  बेटी हरमनप्रीत उनके साथ ही मौजूद थी. बता दें कि हरमनप्रीत, रहीम की गोद ली बेटी हैं. मिली जानकारी के मुताबिक बाबा जब कोर्ट में पहुंचे थे उनके साथ में हरमनप्रीत भी साथ में थी.

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बताया जा रहा है कि फैसले के बाद जब आर्मी के हेलीकॉप्टर से राम रहीम को पुलिस प्रशिक्षण केंद्र (पीटीसी) रोहतक के अंदर अस्थायी जेल में पांच बजकर एक मिनट पर हेलीपेड पर उतारा गया, तो भी सबको चौंकते हुए हरमनप्रीत भी उनके साथ ही उतरी.

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..लेकिन बेटी का साथ होना से भी ज्यादा हैरान करने वाली बात ये रही कि जिस वक़्त बाबा को फैसला सुनाते हुए दोषी करार दिया गया, जिसको सुनकर ही उनके समर्थक दंगा-फ़साद करने लगे वहीँ दूसरी तरफ बाबा इन सब के बावजूद मज़े में हेलीकॉप्टर में बैठे चॉकलेट खाते नज़र आये.

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जी हाँ, डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां साध्वियों से दुष्कर्म का दोषी जरूर ठहराया गया है लेकिन इससे उनके रुतबे में शायद ही कोई आंच आई हो. 5 साल पुराने इस केस में सीबीआई कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए दोषी बेशक सुनाये गए हों लेकिन उनको देखकर आप बिलकुल नहीं कह सकते कि ये बलात्कार के दोषी ठहराए गए हैं.

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फैसले के बाद ही जहाँ डेरे के गुंडों ने उपद्रव मचाना शुरू कर दिया, मीडिया पर ताबड़तोड़ हमला किया वहीँ राम रहीम मज़े में दिखे. एक तरफ जहां लाशों गिर रही थीं, वहीं राम रहीम हेलिकॉप्टर से रोहतक जाते समय टेंशन मिटाने के लिए चॉकलेट खाता रहा.

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जानिए कोर्टरूम में क्या हुआ था?

बता दें कि राम रहीम के कोर्ट में पहुंचते ही सीबीआई जज जगदीप सिंह ने उसके केस की फाइल देखी, फिर अपने नायब कोर्ट को कहा कि आरोपी राम रहीम को हिरासत में ले लो. जज का फैसला आया और जैसे ही बाबा को हिरासत में लिया गया, सबको समझ में आ गया कि बाबा को सजा होनी तय है, समर्थक तो वहीँ गले फाड़ कर रोने लगे.

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मरने के बाद फिर से जिन्दा हुआ ये शख्स, बताया मरने के बाद क्या हुआ उसके साथ !

दुनिया में बहुत से लोगो के मन में ये जानने की इच्छा होती है, कि आखिर मरने के बाद क्या होता. आखिर मरने के बाद इंसान की आत्मा कहा जाती है और उसकी आत्मा के साथ क्या होता है. मगर आज तक इस सवाल का सही जवाब नहीं मिल पाया है. बरहलाल आज हम आपको कुछ ऐसा बताएंगे जिसे जानने के बाद शायद आपको आपके सभी सवालों का जवाब मिल जाएँ.

जी हां आज हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताना चाहते है, जो मरने के बाद जिन्दा हो गया और यकीन मानिए ये कोई फ़िल्मी कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है. वास्तव में वो इंसान मरने के बाद जिन्दा हो गया. हालांकि ये जान कर आपको हैरानी जरूर हुई होगी पर यही सच है. गौरतलब है, कि इस शख्स का नाम विलियम्स है और इनकी उम्र 57 वर्ष है. दरअसल विलियम्स को 2011 में किसी बीमारी के चलते हॉस्पिटल में एडमिट किया गया था.

 

मगर जब इन्हे ऑपरेशन थिएटर में लाया गया, तभी इन्हे हार्ट अटैक आ गया. इसके इलावा ऑक्सीजन की कमी के कारण इनके दिमाग ने भी काम करना बंद कर दिया. ऐसे में डॉक्टर्स ने भी इन्हे मरा हुआ घोषित कर दिया. मगर आपको जान कर हैरानी होगी कि कुछ ही देर बाद उन्होंने आँखे खोल ली और उसके बाद उन्होंने जो बताया वो बेहद चौंकाने वाला था. गौरतलब है, कि उन्होंने उन सब बातो और चीजों का जिक्र किया जो उन्हें मरते समय दिखे थे.

इसके इलावा जो बातें उन्होंने आंखे खोलने के बाद बताई वो सब सच थी. हालांकि जब ये सब बातें हुई तब उनकी सांसे जा चुकी थी. पर फिर भी उन्हें सब कुछ मालूम था. ऐसा लग रहा था जैसे वो कभी मरे ही नहीं थे. वैसे आपने अक्सर कई लोगो से ये सुना होगा कि मरने के बाद सबसे पहले काफी तेज रौशनी दिखाई देती है और साथ ही एक साया भी आता है, जो आत्मा को लेकर चला जाता है. मगर विलियम्स ने जो बातें बताई वो इन सबसे मेल नहीं खाती थी.

जी हां विलियम्स के मुताबिक वो मौत के तीन मिनट तक वही थे और अपने आस पास हो रही सभी हरकते और बातें महसूस कर रहे थे. यहाँ तक कि हॉस्पिटल स्टाफ ने भी खुद ये कहा कि विलयम्स ने जो भी बातें बताई वो सब सच थी. हालांकि डॉक्टर ने उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया था, पर फिर भी उन्हें मरने के बाद की सभी घटनाएं याद थी. इस दौरान विलियम्स ने बताया कि मेडिकल स्टाफ उन्हें झटके दे रहा था और उन्हें दो लोगो की आवाज भी सुनाई दे रही थी.

इनमे से एक आवाज उस मेडिकल स्टाफ की थी जो उन्हें बार बार झटके दे रहे थे और दूसरी आवाज उस महिला की थी, जो उनका हाथ पकड़ कर उन्हें छत के रास्ते बाहर ले जाना चाहती थी. ऐसे में उन्होंने उस महिला की बात सुनी और छत के रास्ते बाहर निकल आये. इसके इलावा मौत के दौरान उन्हें ऐसा लग रहा था, कि जो महिला उन्हें लेकर जा रही है, वो उनकी जान पहचान की है. इसके साथ ही उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वो महिला किसी कारण से वहां आयी है, मगर वो कारण क्या था, ये उन्हें नहीं पता था. बस इसके बाद उन्हें जोर का झटका लगा और उन्हें अपनी आँखों के सामने सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा.

इसका मतलब ये हुआ कि झटका लगने के बाद वो फिर से जिन्दा हो गए थे. वैसे इन सब बातों को जानने के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि मौत कब किस करवट बदल जाए ये कोई नहीं कह सकता.

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ये 7 पैरामिलिटरी फोर्सेज़ करती हैं अतुल्य भारत की सुरक्षा

26/11 का वो मनहूस दिन आपको याद होगा ही, जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया था. करीब 4 दिन तक चली इस मुठभेड़ में आखिरकार एनएसजी कमांडोज़ को आ कर स्थिति को संभालना पड़ा. ये एनएसजी कमांडोज़ का दस्ता भारत की पैरामिलिटरी फ़ोर्स का अंग है. जितनी सुरक्षा हमें अपने देश की सीमा पार के दुश्मनों से करनी पड़ती है, उतनी ही देश के अंदर रह रहे असामाजिक तत्वों से भी करनी पड़ती है. इसके लिए भारत में 7 पैरामिलिटरी फोर्सेज़ हैं, जो सशक्त, सचेत और समर्पित हैं देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए. इन सारी फोर्सेज़ का अधिकार क्षेत्र अलग-अलग है, लेकिन ये गृह मंत्रालय के अंतर्गत ही आती हैं. असम राइफ़ल्स के अलावा, इन सभी बलों का नेतृत्व एक आईपीएस अफ़सर करता है. जानते हैं इन पैरामिलिटरी फोर्सेज़ के बारे में.

1. असम राइफ़ल्स

भारत का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल, असम राइफ़ल्स, उत्तर-पूर्व से घुसपैठ रोकने में एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण रोल अदा करता है. सिर्फ़ यही नहीं, असम राइफ़ल्स भारत-म्यांमार बॉर्डर को भी सुरक्षित रखते हैं.

Source: BetterIndia

2. सीमा सुरक्षा बल (बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स)

बीएसएफ का गठन 1965 में हुआ था और ये आर्मी के साथ कुछ चुनिंदा जगहों की निगरानी करते हैं. जम्मू-कश्मीर में भी बीएसएफ की टुकड़ी बॉर्डर की सुरक्षा करती है.

 

Source: TheHindu

3. केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ)

पैरामिलिटरी फ़ोर्स के इस दस्ते का गठन 1969 में हुआ था और इनका मूल कार्यक्षेत्र था सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या सरकारी कंपनियों की सुरक्षा करना. एयरपोर्ट पर भी आपको सीआईएसएफ के जवान देखने को मिल जायेंगे.

Source: DeccanChronicle

4. केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ)

1939 में देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ का गठन हुआ था. इसीलिए आप इनकी मौजूदगी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में देख सकते हैं. इसके अलावा सीआरपीएफ के जवान दंगा रोकने में भी अहम भूमिका निभाते हैं.

Source: YouTube

5. भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल (आईटीबीपी)

1962 में गठित, आईटीबीपी का मुख्य उद्देश्य भारत और तिब्बत के बॉर्डर को सुरक्षित रखना था. इसके साथ ही वो भारत-चीन बॉर्डर की भी देखरेख करते हैं.

6. राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी)

Source: IndiaStrategic

1984 में एनएसजी का गठन हुआ था आतंकवाद से सामना करने के लिए. इन्हें चुनिंदा मिशंस के लिए चुना जाता है, जिसके लिए इन्हें स्पेशल ट्रेनिंग भी दी जाती है. 26/11 के मुंबई हमलों में एनएसजी कमांडोज़ की भूमिका बहुत ही अहम थी.

Source: TheHindu

7. सहस्त्र सीमा बल (एसएसबी)

1963 में गठित, सहस्त्र सीमा बल भारत-नेपाल और भारत-भूटान बॉर्डर पर तैनात रहते हैं. इसके साथ ही वो चुनावों के समय मतदान केंद्रों की भी सुरक्षा करते हैं.

 

Source: TheHindu

आज, 23 मार्च, शहीद दिवस पर हम उन सभी सैनिकों और जांबाज़ों का अभिनन्दन करते हैं, जो सदैव देश की सुरक्षा के लिए मुस्तैद रहते हैं. इन पैरामिलिटरी फोर्सेज़ की वजह से ही हम चैन की नींद सो पाते हैं. ग़ज़बपोस्ट की तरफ़ से आप सभी को शहीद दिवस पर वंदे मातरम और जय हिंद.

 

Feature Image Source: FT

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… तो हमें 1915 में ही आज़ादी मिल जाती, और देश के राष्ट्रपिता यही होते

मुश्किल हालात थे, टूटे हुए जज़्बात थे. अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था. हर हिन्दुस्तानी अंग्रेजों की बर्बरता, जुल्म और अन्याय से आजादी चाहता था. हिन्दुस्तान की अवाम किसी भी कीमत पर अब आजादी चाहती थी. मन में रोष था, अंग्रेजों के ख़िलाफ नफ़रत थी. ऐसे में कई सपूत देश की आजादी के लिए एक दीप की तरह आए, जो समंदर की तेज लहरों से टकराने का माद्दा रखते थे. उनकी हिम्मत देख अंग्रेज भी उनके क़ायल हो जाते थे. तमाम मुश्किलातों के बाद आख़िरकार हमें आजादी मिली. आज हम चैन की सांस ले रहे हैं. बेरोक-टोक कहीं जा रहे हैं. पूरा हिन्दुस्तान उन स्वतंत्रता सेनानियों का शुक्रगुजार है और हमेशा रहेगा. लेकिन सबसे दुखद बात ये है कि स्वतंत्रता की लड़ाई का इतिहास लिखते समय कई क्रान्तिकारियों को नाइंसाफी का शिकार होना पड़ा. 'यतीन्द्रनाथ मुखर्जी' उनमें से ही एक क्रांतिकारी थे. इनके बारे में आपको बता दूं कि ' वे उस दौर के हीरो थे.'

बंगाल का बालक, मजबूत कद-काठी, बाज़ जैसी नज़रें, चीते की चाल, सीने में देशप्रेम की आग और जुबां पर हिन्दुस्तान की आजादी का जूनून, कुछ इस तरह की यतीन्द्रनाथ मुखर्जी की पहचान है. इनका जन्म बंगाल के नादिया में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है.कम उम्र में पिता की मौत के बाद इनका लालन-पालन नानी घर में हुआ. बचपन से ही इनकी रुचि भाग-दौड़ वाले खेलों में रही. इस वजह से उनका शरीर काफ़ी बलिष्ठ हो गया.

Source: bharatniti 

आर्टिकल पढ़ने से पहले पढ़ें ये महत्वपूर्ण तथ्य

 

  • इतिहासकारों के अनुसार, अगर साथी इनसे गद्दारी नहीं करते और इनका प्लान कामयाब हो जाता, तो हमें 1915 में ही आज़ादी मिल जाती. इसके लिए देश को न गांधी की ज़रूरत पड़ती और न बोस की.
  • बचपन से ही ये बलशाली थे.11 साल की उम्र में ही उन्होंने शहर के बिगड़ैल घोड़ों को काबू करना शुरु कर दिया था.
  • अंग्रेजों और अंग्रेजी हुकूमत से इन्हें इतनी नफ़रत थी कि वो अंग्रेजों को जहां अकेला देखते थे, उन्हें पीट देते थे. एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्र नाथ ने अकेले ही आठ-आठ अंग्रेजों को पीट दिया था. अंग्रेज इनसे ख़ौफ खाते थे.
  • चेक गणराज्य के इतिहासकार कहते हैं कि ‘इस प्लान में अगर इमेनुअल विक्टर वोस्का (चेक एजेंट) न घुसता, तो किसी ने भारत में गांधी का नाम तक न सुना होता और 'राष्ट्रपिता' बाघा जतिन को कहा जाता.'
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  • उनकी मौत के बाद चले ट्रायल के दौरान ब्रिटिश प्रोसीक्यूशन ऑफिसर ने कहा, “Were this man living, he might lead the world.”. इस वाक्य से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितना खौफ होगा बाघा जतिन का उस वक़्त.
  • बंगाल के पुलिस कमिश्नर रहे चार्ल्स टेगार्ट से कहा था कि 'अगर बाघा जतिन अंग्रेज होते, तो अंग्रेज लोग उनका स्टेच्यू लंदन में ट्रेफलगर स्क्वायर पर नेलसन के बगल में लगवाते’.
  • जतिन के शब्द लोग आज भी याद करते हैं, वो कहा करते थे, ‘अमरा मोरबो, जगत जागबे’ यानी ‘हमारे मरने से देश जागेगा’.
  • विवेकानंद से काफ़ी प्रभावित थे

    यतीन्द्रनाथ मुखर्जी स्वामी विवेकानंद से इतने प्रभावित हुए कि वे रोज उनके पास जाने लगे. उनका गठीला बदन देख कर विवेकानंद ने उन्हें अम्बू गुहा के देसी जिम में भेजा, ताकि वो कुश्ती के दांव-पेंच सीख सकें.

    Source: India Today

    "भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए”

    पढ़ाई पूरी करते ही वे 1899 में मुज़फ्फरपुर में बैरिस्टर पिंगले के सेक्रेटरी बनकर पहुंचे, जो बैरिस्टर होने के साथ-साथ एक इतिहासकार भी था. उसके साथ रहकर जतिन ने महसूस किया कि भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए. शायद यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने का पहला विचार था. जो बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आई.

    Source: Theweek

    'यतीन्द्रनाथ मुखर्जी' से 'बाघा जतिन' तक का सफ़र

    घरवालों के दबाव में आकर उन्हें मजबूरन शादी करनी पड़ी. लेकिन बड़े बेटे की अचानक मौत से वे काफी विचलित हुए. आंतरिक शांति के लिए हरिद्वार की यात्रा की. वापस लौटने पर जानकारी मिली कि उनके गांव में एक तेंदुए का आतंक है. बिना समय व्यर्थ किए वो उसे जंगल में ढूंढने निकल पड़े. रास्ते में चलते हुए अचानक उनका सामना रॉयल बंगाल टाइगर से हो गया, लेकिन जतिन ने बिना समय गंवाए उसको अपनी खुखरी से मार डाला. उनके साहस और हिम्मत को देख कर बंगाल सरकार ने उन्हें सम्मानित किया.अंग्रेजी अखबारों में जमकर उनकी तारीफ़ हुई. उस दिन से लोग उन्हें 'बाघा जतिन' के नाम से पुकारने लगे.

    Source: Baghajatin

    महान क्रांतिकारी थे 'बाघा जतिन'

    सुभाष चंद्र बोस से पहले रास बिहारी ने जतिन में ही असली नेता पाया था. रास बिहारी कहते थे कि 'जतिन का ओहदा अंतर्राष्ट्रीय है. उसमें विश्व नेता बनने की क्षमता है.'

    Source: Wikimedia

    एक और 1857 होने को था

    फरवरी 1915 में इतिहास को दोहराया जा रहा था. फ़िर से एक कोशिश की जा रही थी. विद्रोह की अलग-अलग तारीखें तय कर दी गई थीं. लेकिन एक गद्दारी के चलते सारी मेहनत मिट्टी में मिल गई.

    Source: Uttarpradesh

    और हम आज़ाद न हो सकें

    उन दिनों जर्मनी के राजा भारत भ्रमण पर आए हुए थे. लोगों से छुप कर बाघा जतिन ने जर्मनी के राजा से मुलाकात की. उन्होंने हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए हथियार देने की बात कही, जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया. सब कुछ भारत के पक्ष में था, तभी इस बात की भनक चेक जासूस इमेनुअल विक्टर वोस्का को लग गई. उसने ये ख़बर अमेरिका को दे दी, बाद में अमेरिका ने अंग्रेजी हुकूमत को बताया. इंग्लैण्ड से खबर भारतीय अधिकारियों के पास आई और उड़ीसा का पूरा समुद्र तट सील कर दिया गया.

    Source: Bhaga

    और शहीद हो गए 'राष्ट्रनेता बाघा जतिन'

    9 सितंबर 1915 को राजमहंती नामक अधिकारी ने गांव वालों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशिश की, तो उन्होंने उसे मार दिया. तभी ख़बर पाकर अन्य अंग्रेजी अफ़सर भी आ गए. दोनों तरफ से गोलियां चलीं और इसी बीच उनके परम साथी चित्तप्रिय शहीद हो गए. वे खुद अन्य क्रांतिकारियों के साथ काफी देर तक गोलीबारी का सामना करते रहे. लेकिन अंत में गोलियों से छलनी हो चुका उनका शरीर जमीन पर गिर पड़ा.

    Source: Wikimapia

    जब अंग्रेज़ अधिकारी उनके पास पहुंचा तो उन्होने कहा कि ‘गोली मैं और मेरा शहीद हो चुका साथी चित्तप्रिय ही चला रहे थे, बाकी तीन साथी निर्दोष हैं.‘ और…10 सितंबर 1915 को जीवन और मौत के बीच जूझते हुए बाघा जतिन ज़िंदगी की जंग हार गए.

    कहने को तो इस देश में कई क्रांतिकारी पैदा हुए, लेकिन जतिन जैसा कोई न हो सका. हां… इस बात की कसक ज़रूर रहेगी कि हमने इस महान क्रांतिकारी को भुला दिया. कुछ क्रांतिकारियों को सत्ता ने खुद से चिपका लिया. राजनीति की वजह से ऐसे क्रांतिकारियों की इतिहास में मौत हुई. मुझे नहीं लगता है कि पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश बांग्लादेश के अलावा कोई और इस महान क्रांतिकारी के बारे में जानता भी होगा. एक सुखद बात ये है कि कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में इनकी एक मूर्ति ज़रूर रखी गई है. मेरी आप लोगों से बस एक ही गुजारिश है कि इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद एक बार शेयर ज़रूर करें, जिससे ज्यादा लोगों को धरती के इस शेर के बारे में पता चल सके. शायद हम इसी बहाने इन्हें एक सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें.

    Story Inputs- Story Platter, Dainik Jagaran & Panchjanya

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डीग में राज्य स्तरीय खो खो क्रीडा प्रतियोगिता का उदघाटन सोमवार को बीसूका केबिनेट मंत्री डा दिगम्बर सिह सिंह करेगें

प्रतियोगिता में भाग लेने वाली 74 टीमों में से अधिकांश जिलों की टीमें आयोजन स्थल पर डीग में पहुची

 

Rajiv Vidyarthi/डीग /भरतपुर/ राज्य स्तरीय खोखो क्रीडा प्रतियोगिता का उदघाटन बी सूका केबिनेट मंत्री डा दिगम्बर सिह द्वारा सोमवार को प्रातः दस बजे किया जाएगा ।डीग के किशनलाल जोशी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में आयोजित 62वीं राज्य स्तरीय क्रीडा प्रतियोगिता खो खो की तैयारी पूरी कर ली गई हैं। प्रतियोगिता के संयोजक और प्रधानाचार्य तारासिहं सिनसिनवार के अनुसार प्रतियोगिता में भाग लेने वाली 74 टीमों में से अधिकांश जिलों की टीमें आयोजन स्थल पर डीग में पहुच चुकी है।

.प्रभारी डिप्टी फिजीकल माध्य. शिक्षा खेलकूद भरतपुर डा. रमेश इंदोलिया के अनुसार आने वाली सभी टीमों के खिलाडियों का मेडीकल परीक्षण करा लिया गया हैं।

इंदोलिया के अनुसार प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिये निर्देशालय बीकानेर एवम जिला शिक्षा अधिकारी भरतपुर द्वारा प्रतिनियुक्त निर्णायक मण्डल को खेल की तकनीकी जानकारी प्रदान करने के लिये खो खो खेल क्लीनिक का आयोजन किया गया। शाम को शाम को प्रतियोगिता के संयोजक तारा सिंह सिनसिनवार ने टीम प्रभारियों पीटीआई आवास व्यवस्था के प्रभारियों से प्रभारियों की बैठक में प्रतियोगिता से संबंधित विभिन्न तैयारियों की विस्तार से चर्चा की और किसी भी परेशानी होने पर संबंधित प्रभारियों को अवगत कराने के कहा इस दौरान डीग एसडीएम दुली चंद मीणा ने प्रतियोगिता में हर प्रकार का सहयोग सहयोग उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया प्रतियोगिता के संयोजक दारा सिंह सिनसिनवार ने डीग SDM को प्रतियोगिता के संबध में विस्तार से जानकारी जानकारी प्रदान की इस अवसर पर सह संयोजक पुष्पा उपाध्याय दलबीर सिंह रमेशचंद इंदोलिया हरवीर सिंह चाहर निशा शर्मा अशोक कुमार जैन , अनोज भारद्वाज सहित विभिन्न जिलों की टीम प्रभारी ,विभिन्न आवास स्थलों के प्रभारी व विभिन्न व्यवस्थाओं में लगे प्रभारी उपस्थित थे

 कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डा. शैलेष सिंह होगें I जबकि विशिष्ट अतिथि उप निर्देशक प्रा. शिक्षा इन्द्रा सिंह , जिला शिक्षा अधिकारी माध्य. प्रथम भरतपुर कैलाश चन्द यादव ,वीरेन्द्र यादव महेश चंद रजवानी निरंजन टकसालिया होगें I

 

 

 

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क्या आप इंडियन आर्मी, नेवी और वायू सेना की सलामी में अंतर जानते हैं ?

आपने कभी ना कभी रिपब्लिक डे या इंडिपेंडेंस डे की परेड को देखा होगा, लाइव ना सही टीवी पर तो देखा ही होगा ,परेड में आपने ये भी नोटिस करा होगा की हर तरह की परेड को एक चीज़ जोड़ती है वो है सलामी,  सलामी सम्मान का सबसे बड़ा प्रदर्शन है जो शश्स्त्र बल देता है, इंडिया गेट पर स्तिथ अमर जवान ज्योति को तीनो बालों के प्रमुख सलामी देते हैं, उनके साथ पूरी सेना सलामी देती है जो किसी भी भारतीय के लिए एक बड़े गर्व का पल होता है l लेकिन क्या आप जानते हैं भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना की सलामी के तरीके में अंतर है ?

 

देखिए क्या अंतर है तीनों सेनाओं की सलामी में 

आर्मी की सलामी 

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आर्मी  की सलामी खुली हथेली से की जाती है, और हाथ को उस व्यक्ति को तरफ रखा जाता है जिसको सलामी दी जाती है l इससे आर्मी ये दिखाती है उनके पास कोई इस समय हथियार नहीं है और हर कोई उनपर विश्वास कर सकता है l

 

नेवी की सलामी 

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पुराने दिनों में, नाविक सारा दिन अपने जहाजों पर काम करते थे, उनके हाथ चिकने और गंदे हो जाते थे। इसलिए नेवी की सलामी हाथ को नीचे करके दी जाती है ताकि उनके सीनियर्स को अपमान महेसूस ना हो l

वायू सेना की सलामी 

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वायू सेना अपनी सलामी 45 डिग्री के एंगल पर देती है जिससे वो असामन की तरफ अपने बड़ते कदम दर्शाती है l इससे पहले वायू सेना आसमान की तरफ हथेली करके सलामी देती थी l

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…दुनिया में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहाँ पर भारत का है अधिकार

 

अपने आपको सुरक्षित करने के लिए और दुश्मनों से निपटने के लिए हर देश कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे पूरे क्षेत्र में उसकी पकड़ बनी रहे. अमेरिका, चीन, रूस, चीन से लेकर ब्रिटेन तक हर देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए कुछ ना कुछ ऐसा करते रहते हैं जो उनकी तरफ कोई ऊँगली न उठा सके. भारत भी अब अपनी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह से तैयार है.

 

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अटल जी ने भारत को सशक्त करने के लिए लिया था ये फैसला

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जानते थे कि अगर अपना प्रभुत्व बढ़ाना है तो कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिससे दुनिया उनकी तरफ आँख न उठा सके. वो भारत की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे और इस चिंता को मिटाने के लिए उन्होंने एक योजना बनाई थी. उनका प्लान था कि भारत दुनिया में अपने आधिकारिक मिलिट्री बेस बनाए और उनका ये प्लान हक़ीकत में भी तब्दील हुआ जब भारत ने तजाकिस्तान के फारखोर में अपना पहला वायुसेना बेस स्थापित किया. ये भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी.

भारत को ताकतवर बनाने के लिए कांग्रेस ने नहीं दिखाई कोई दिलचस्पी 

अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत को सशक्त करने के लिए कई योजनाएं बनाई थीं लेकिन उन योजनाओं को वो पूरा नहीं कर पाए क्योंकि अगला चुनाव वो हार गए. इसके बाद कांग्रेस भारत की सत्ता में आई और कांग्रेस ने भारत की शक्ति को बढ़ाने के लिए किये गए अटल जी के कार्यों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसके बाद दस साल बाद जब नरेंद्र मोदी की सरकार भारत में आई तो उन्होंने अटल जी के अधूरे सपने को पूरा करने के लिए कदम बढ़ाने शुरू कर दिये.

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पीएम मोदी ने सत्ता में आते ही अटल जी के सपने को पूरा करने की तैयारी शुरू कर दी 

पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल के शुरुआत में ही विदेशी दौरे शुरू कर दिये थे. इन विदेशी दौरों में सबसे अहम था उनका पांच दिनों का वो दौरा जिसमें पीएम मोदी मॉरीशस और सेशल्स गए. इस दौरे में पीएम मोदी ने दोनों देशों से राजनीतिक रिश्तों को सुधारने की बात की लेकिन कुछ ऐसा भी था जिसने इस दौरे को बहुत ख़ास बना दिया था.

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पीएम मोदी ने लीज़ पर ले लिए दो द्वीप  

दरअसल इस दौरे में पीएम मोदी ने दोनों देशों से उस समझौते पर हस्ताक्षर करवाए जिसके अंतर्गत दोनों देश अपना एक-एक द्वीप भारत को लीज़ पर देंगे. जिसका मतलब ये है कि एक निश्चित समय के लिए ये द्वीप भारत के होंगे. भारत ने सेशल्स से अज़म्पशन और मॉरीशस से अगलेगा आइसलैंड लीज़ यानी पट्टे पर ख़रीदा. भारत ने दोनों देशों से इन द्वीपों पर आधारिक संरचना के सारे अधिकार भी लिए हैं. इन द्वीपों पर भारत की उपस्थिति भारत के लिए बहुत बड़ी रणनीतिक जीत है.

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अब समुद्र में भारत की स्थिति और पकड़

भारत में कच्चा तेल सबसे ज्यादा यूएई, सऊदी अरब, कुवैत और ईरान से आता है अमेरिका और चाइना भी इन देशों से तेल लेते हैं. ये सारा तेल पानी के जहाज़ों से लाया जाता है. नीचे दिख रही फोटो में काले रंग की रेखाएं भारत के ट्रांसपोर्ट रूट को दर्शा रही हैं, वहीँ लाल रेखाएं चाइना और नीली रेखाएं अमेरिका के रूट को दर्शा रही हैं. हल्के काले रंग के शेड में जो जगह आपको दिख रही है वो सोमालिया के समुद्री लुटेरों का इलाका है. ऐसे हालात में बहुत जरुरी हो जाता है तेलों से भरे समुद्री जहाज़ों को इन लुटेरों से बचाना. जो जगहें आपको हल्के सफ़ेद रंग के शेड में दिख रही हैं ये वो जगहें हैं जहाँ भारत की मिलिट्री का प्रभाव है या जहाँ भारत की पकड़ है. जो इलाका हल्के हरे रंग में दिख रहा है ये वो जगहें हैं जहाँ भारत की मिलिट्री का कंट्रोल है. जो जगहें हल्के नीले रंग में दिख रही हैं वो अमेरिका और इंग्लैंड के प्रभुत्व वाला क्षेत्र हैं. जो जगहें आपको हल्के लाल रंग में दिख रही हैं वहां चीन ने अपनी पकड़ बनाई हुई है या यूँ कहें अपनी मिलट्री तैनात की हुई है. जिससे साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि चाइना इंडिया को घेरना चाहता है.

चीन के इस प्लान को जिसे वो स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स कहता है और जिसके अंतर्गत वो अपने समुद्री जहाजों की सुरक्षा भी करता है और भारत को घेरने की कोशिश भी करता है को करारा जवाब देने के लिए भारत ने पीएम मोदी के नेतृत्व में स्ट्रिंग ऑफ़ फ्लावर्स योजना बनाई और इसी के अंतर्गत भारत ने सेशल्स से अज़म्पशन और मॉरीशस से अगलेगा आइसलैंड लीज़ पर लिए. भारत के लिए ये दोनों द्वीप रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं. सूत्रों की मानें तो अज़म्पशन द्वीप पर भारत एक ट्राईकमांड बेस बनाने की तैयारी में है. इस द्वीप पर भारतीयों के अलावा किसी को आने की इजाज़त नहीं है.

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अखिल कुमार ने दो राउंड में ही कंगारू मुक्‍केबाज को चित कर दिया:PRO BOXING

पेशेवर मुक्केबाज़ी के पहले मैच में भारतीय मुक्केबाज़ अखिल कुमार ने ऑस्ट्रेलियन मुक्केबाज़ टाइ गिलक्रिस्ट को करारी शिकस्त दी है. अखिल कुमार ने दो राउंड में ही कंगारू मुक्‍केबाज को चित कर दिया.

अखिल कुमार चार राउंड के जूनियर वेल्‍टरवेट(63 किलो) में उतरे थे. ऑस्‍ट्रेलिया के गिलक्रिस्‍ट को 13 मुकाबलों का अनुभव था लेकिन अखिल के मुक्‍कों का उनके पास कोई जवाब नहीं था. हालांकि पहले दौर में अखिल को चोट आई लेकिन दूसरे राउंड में वे भरपूर ऊर्जा के साथ आए और विपक्षी को ढेर कर दिया.

मैच के दौरान गिलक्रिस्ट को पेट के पास चोट भी आयी, जिसके बाद रेफरी ने खेल समाप्त कर अखिल कुमार को विजयी घोषित किया. उनके साथी जितेंद्र कुमार ने भी जीत के साथ प्रो बॉक्सिंग में आगाज किया है.

इससे पहले अखिल कुमार ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक लाकर दिए हैं. अखिल कुमार ने पहली बार पेशेवर मुक्केबाजी में भाग लिया है. जिसमें उनका मुकाबला ऑस्ट्रेलियाई टाइ गिलक्रिस्ट से हुआ.

अखिल अनुभवी मुक्केबाज़ हैं और अपने एमेच्योर करियर में उन्होंने लगभग 250 मुकाबलों में देश का प्रतिनिधित्व किया. यह 36 वर्षीय मुक्केबाज चार दौर के मुकाबले में जूनियर वेल्टरवेट (63 किग्रा) में गिलक्रिस्ट का सामना किया.

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भारत को धमकी देने वाली चीन की आर्मी की हालत देखकर आप भी कहेंगे कि ये लड़ेंगे भारत से

इन दिनों रूस में इंटरनेशनल आर्मी गेम्स जैसी प्रतियोगिता चल रही है, इस प्रतियोगिता में कई बड़े देशों की सेना के टैंकों के बीच एक जबरदस्त मुकाबला हो रहा है. आपको बता दें कि जो चीन आये दिन भारत को धमकियाँ देता रहता है और अपनी औकात से ज्यादा बोलता दिखाई देता है आज उसी चीन ने इस प्रतियोगिता के दौरान भारत के टैंकों के सामने अपने घुटने टेक दिए.

 

 

दरअसल इस गेम के दौरान जब चीन का नंबर आया तो उसका टैंक लड़खड़ा गया जिसके बाद टैंक के कई अलग-अलग हिस्से भी हो गए और इतना ही नहीं बल्कि इस रेस के दौरान तो चीन के टैंक का पहिया ही अलग हो गया था.

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चीन द्वारा इतनी शर्मिंदगी देखने के बाद अब चीन का भारत में जमकर मज़ाक उड़ाया जा रहा है कि चीन इसलिए हारा है क्योंकि उनका टैंक भी तो चीन का माल है इसलिए उसपर भी यकीन नहीं किया जा सकता है कि कितना चलेगा…

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फिलहाल तो इस प्रतियोगिता में पहले स्थान पर रूस की सेना ने बाजी मारी है और भारत चौथे नंबर के पायदान पर मौजूद रहा. जिसके चलते भारतीय सेना अब इस प्रतियोगिता के दूसरे राउंड में चली गई है.

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इंटरनेशनल आर्मी गेम्स का अगला राउंड अब अगले तीन दिन तक चलेगा, जिसमें भारतीय सेना का मुकाबला 10 अगस्त को होने वाला है जिसमें भारतीय सेना अपना शौर्य दिखाएगी. साथ ही आपको बता दें की इस बार केवल टैंकों की रेस ही नहीं बल्कि हथियार चलाने के भी गेम होंगे.

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सूत्रों की मानें तो इस बार दूसरे राउंड में 48 किलोमीटर की रिले रेस भी होगी और जिसमें केवल एक ही टैंक होगा उसी के द्वारा सभी देशों को अपना करतब दिखाना होगा. इस राउंड में जो भी देश टॉप 4 पर होंगे वो ही देश अगली रेस के लिए भेजे जायेंगे जो की 12 अगस्त को होने वाली है और यह ही रेस आखिरी रेस कहलाएगी. इसी दिन दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा की किस्में कितना है दम.

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इस इंटरनेशनल आर्मी गेम्स प्रतियोगिता में कुल 19 देशों ने हिस्सा लिया था, जिसमें भारत, चीन, कजाकिस्तान, रूस, जैसे देश शामिल हैं. आपको बता दें कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सैन्य खेलों में लगभग 28 कार्यक्रम होते हैं और जिनका आयोजन रूस, कजाखिस्तान, चीन और बेलारूस में होता है.

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भारतीय सेना की टीम पिछले तीन वर्षों से इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही है. साथ ही सेना ने बताया है कि  ‘‘इस साल पहली बार भारतीय टीम अपने टी 90 टैंकों के साथ हिस्सा लेगी जिन्हें जहाज द्वारा रूस भेजा गया है.’’

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