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ऑटोवालों की इन बेसिर-पैर की बातों को सुन कर आपने भी कहा होगा, ‘अता माझी सटकली’!

 'ऑटो' कहते ही सड़क पर सरपट दौड़ रहे इस हरे-नीले CNG वाहन से एक दुबला-सा आदमी बाहर निकलता है.
'मालवीय नगर चलोगे?'
कुछ देर सोचता है…
'मैडम, बड़ा ट्रैफिक लगता है वहां. वैसे 100 बनते हैं, आप 120 दे देना'
'ये क्या बात हुई? मैं कोई दूसरा ऑटो देख लूंगी'
'अच्छा ठीक है, बैठो'
कहानी की शुरुआत होती है यहां से. 2008 में जब मैं पहली बार दिल्ली आई तो, ऑटो लेना बेहतर समझा. उस दिन से आज तक ऐसा बहुत कम हुआ है कि मैं बिना कहा-सुनी किये ऑटो में बैठी हूं. कई बार इस बहस में कुछ ज़्यादा ही भावुक हो जाती हूं और पैदल चलने लगती हूं. 'बस ले लिया करो', कहने वाले बहुत लोग हैं. लेकिन बस के इंतज़ार में अब न तो प्यार की उम्र रही है, न ही Patience.
अगर मेट्रो और बस दिल्ली की Lifelines हैं, तो ऑटो वो धागा है, जो कभी भी टूट जाता है. दिल्ली के मौसम में बदलाव का सबसे बड़ा असर पड़ता है ऑटो वालों पर. 
गर्मी में 'बहुत गरम है', बरसात में 'बहुत बारिश है' और सर्दियों में 'बहुत कोहरा है'.
अगर आप भी दिल्ली के ऑटो में 'Suffer' करने वालों में से एक हैं, तो ये कुछ Illogical और बेसिर-पैर की बातें आपको सुनने को ज़रूर मिली होंगी:

पहला बहाना


मेरे कानों के लिए ये शब्द सुबह की आरती बन चुके हैं. ऑटो वाले अपने हिसाब से जगह Decide करते हैं और जब आप उन्हें कहो कि फलां जगह जाना है, तो कहेंगे, 'यहां नहीं, वहां जाएंगे'.

Favouriteबहाना


मतलब क्योंकि आप जिस रोड से जा रहे हैं, वहां पर लगने वाले ट्रैफिक की ज़िम्मेदारी आपकी है, इसलिए आपको Extra भाड़ा देना होगा. भले ही ट्रैफिक की वजह से देर आपको हो रही हो, लेकिन पैसे इनको चाहिए.

Reason No. 1


अगर ख़ुदा न करे, आपका ऑफिस ऐसी जगह है, जहां से सवारी नहीं मिलती. तो इसका ठीकरा भी आपके सिर फोड़ा जाएगा. ये आपकी गलती है, ये आपकी वजह से हुआ है.

येबहाना हर मौसम में चलता है!


कुछ ऑटो वालों का मीटर घर के उस शो पीस की तरह होता है, जिसका कोई इस्तेमाल नहीं है. अगर गलती से आप पूछ लें कि ठीक क्यों नहीं कराते, तो सामने से कोई जवाब नहीं आएगा.

कुछ नहीं तो ये सही


ऐसा कई बार हुआ है कि पैसों के लिए बहस के वक़्त ऑटो वाले भैय्या कह देते हैं, 'मैडम, एक दिन दस-एक रुपया ज़्यादा दे देंगी, तो कुछ नहीं होगा'.

Budget की Planning


जाने वाली जगह की पूरी डिटेल लेने के बाद ऑटो वाले भाई साहब एक लम्बी सी खामोशी का गैप रखते हैं, फिर कहते हैं, 'नहीं, उधर नहीं जाएंगे'.

Sorry मैडम जी


वैसे देर रात कोई भी ऑटो वाला किसी लड़की को कहीं ले जाने से मना नहीं कर सकता. लेकिन मजाल कोई इसे माने. जैसे ही कोई लड़की ये बात कहती है, भैय्या जी ऐसे मुंह फेर लेते हैं जैसे हमारा पड़ोसी देश अपनी करतूत के बाद.

एक औरबहाना


मीटर पर आपके 86 रुपये बने हों और कोई ऑटो वाला आपको 4 रुपये खुल्ले दे दे, तो आपका जीवन सफ़ल. आपको भले ही पूरे पैसे देने पड़ें, लेकिन इनके पास खुल्ले पैसे मिलना राखी सावंत के पास दिमाग मिलने जैसा है. और यहां तो, चेंज के लिए टॉफी भी नहीं मिलती, जो मन संतुष्ट हो जाये.
ये सब पढ़ने के बाद ऑटो वालों के लिए एक तरह की सोच या Perception बनना स्वाभाविक है. जैसे बुरे लोगों की दुनिया में कुछ अच्छे लोग भी मिल जाते हैं, ठीक वैसे ही कुछ ऑटो वाले हैं जो हमेशा कायदे से चलते हैं. जो कहीं भी जाने के लिए सीधे मीटर ऑन कर देते हैं. देर रात महिलाओं को Safely घर छोड़ के आते हैं. कई मुसाफ़िरों की मदद करते हैं. South दिल्ली के Andrews Ganj इलाके में कुछ ऑटो वालों की एक यूनियन है, जिसके सदस्य हॉस्पिटल जाने वालों से एक पैसा भी नहीं लेते और लोगों की मदद करते हैं.

इस लेख को लिखने का मकसद ये बताना भी था कि दिल्ली में ऑटो मिलना एक समस्या है और लगभग हर आदमी इससे जूझ रहा है. अगर नियम से चला जाये, तो न ऑटो चलाने वाले को दिक्कत होगी, न ही सवारी को. साथ ही अपना काम ढंग से कर रहे उन ऑटोचालकों को भी नहीं भूलना चाहिए, जो समय-समय पर लोगों की मदद करते रहते हैं.

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