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OMG बुंदेलखंड में एक महिला मिट्टी खा कर है ज़िंदा !

मां जब भी पूजा करती थी, उसके बाद दोहे गुनगुनाती थी. उनमें से ही एक था, 'माट्टी कहे कुम्हार से, तू क्या गोंधे मोहे, इक दिन ऐसा आयेगा मैं गोंधूगी तोहे'. उस वक़्त पल्ले नहीं पड़ता था ये दोहा, लेकिन आज एक लेख पढ़ने के बाद पड़ने लगा है.
बात बुंदेलखंड की हो रही है. एक ऑनलाइन वेबसाइट के स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने रिपोर्ट लिखी, उन्होंने अपनी इस रिपोर्ट में एक ऐसी महिला का ज़िक्र किया जो लगभग 12 सालों से मिट्टी फांक कर ज़िंदा है.

कहां से शुरू होता है किस्सा?

आये दिन समाचार पत्रों में, वेब पोर्टलस में ये बात सामने आती रहती है कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का हाल बहुत बुरा है. यहां सूखे ने लोगों के जीवन पर अपना गहरा असर छोड़ा है. पानी को लेकर जीवन लगातार लड़ रहा है. इसी संघर्ष के दौरान बहुत सी कहानियां-किस्से सामने आते हैं. कुछ कहानियां पानी की तलाश में दम तोड़ देती हैं, तो कुछ का संघर्ष ताउम्र चलता रहता है.
एक ऐसी ही दास्तां है बुंदेलखंड के जिले ललितपुर के पास बसे राजवारा गांव की. यहां एक आदिवासी महिला शकुन बीते कई सालों से मिट्टी खाकर ख़ुद को ज़िंदा रखे हुए. हालांकि बुंदेलखंड सूखे की मार झेल रहा है लेकिन सूखे के साथ-साथ भूख ने भी अपनी बाहों में कई ज़िंदगानियों को जकड़ रखा है.

Source: Indianexpress

लोग कर रहे हैं पलायन

आज ही नहीं बल्कि सदियों से पलायन एक बड़ा मुद्दा रहा है. लोग अपनी ज़मीन में संघर्ष करने की बजाय दूसरी ज़मीन में पसीना बहाना बेहतर समझते हैं. ऐसा फिलहाल हर जगह हो रहा है फिर यह स्थान भला कैसे अछूता रह सकता है? हालांकि यहां तो प्रकृति भी अपना कोप बरसा रही है. अब तक सहरिया आदिवासियों की लगभग 60 प्रतिशत आबादी इलाके से पलायन कर चुकी है. गर जनसंख्या के आधार पर देखें तो राजवारा गांव काफ़ी बड़ा है, लेकिन शकुन रायकवार की दास्तां मिट्टी से निकली है और मिट्टी में ही रह जाती है. इलाके के लोगों में इतना दम तक नहीं है कि इस महिला की मदद करने को आगे आ सकें. एक वक़्त की रोटी-पानी देकर लोग अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं और मन ही मन इंसानियत का चोला ओढ़ लेते हैं.

Source: governancenow

एक विधवा का संघर्ष...

शकुन रायकवार के दो बच्चे हैं, इनके पति का पांच बरस पहले इंतकाल हो चुका है. इनका पेट मिट्टी की गठरी बन चुका है. एक स्थानीय निवासी बताते हैं कि, “ ये बारह सालों से मिट्टी खा रही हैं. हालांकि कभी हमारे यहां तो कभी कहीं और से इन्हें दाना-पानी मिल जाता है, लेकिन जब कुछ नहीं मिलता तो मिट्टी फांक लेती हैं.” इनके दोनों बच्चों का कुछ अता-पता नहीं है. वो भी दूसरे गांवों से मांग-मांग कर अपना पेट पाल रहे हैं. शकुन के पास सरकारी मदद आज तक नहीं पहुंची है. सहरिया समुदाय इनकी हालत से वाकिफ़ होने के बाद भी इनकी मदद करने में असक्षम है.

Source: Catchnews
शकुन कहती हैं कि, “अब हमसे ना पानी भरा जाता है. पेट में भी बहुत दर्द होता है. बार-बार हमें शौच के लिए जाना पड़ता है, रोटी भी अब हज़म नहीं होती.” स्थानीय लोगों बताते हैं कि शकुन के पति का इंतकाल हो जाने के बाद उसमें खेती करने की ताकत नहीं रही, बच्चों को मांग कर खाने की आदत पड़ गई. पेट में भूख की ज्वाला उठने पर वो मिट्टी खाकर भी उसे शांत कर लेती हैं.
सूखे के कारण इलाके के खेतों की सांसें उफनती जा रही हैं. पानी के अभाव के कारण लोगों की शारीरिक और मानसिक स्थिती दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ा है.
फिलहाल मैं दफ़तर में बैठा वही दोहा सुन रहा हूं.
"माट्टी कहे कुम्हार से, तू क्या गोंधे मोहे, एक दिन ऐसा आयेगा मैं गोंधूंगी तोहे.”
शायद मिट्टी गूंध रही है शकुन को. यह लोकतंत्र की मौत नहीं तो और भला क्या है. शायद लोकतंत्र मात्र बातों का मसला रह गया है. जहां एक तरफ़ खाने को इतना है कि फेंका जाता है वहीं दूसरी तरफ़ खाने को इतना भी उपलब्ध नहीं है कि एक वक़्त पेट भरा जा सके. यह खाई कब भरेगी? इस बात को कोई नहीं जानता लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि अब तक कई शकुन इस खाई में दफ़न हो चुकी हैं. ऑफ़िस में मेरा सामने बैठा शख़्स ये कहा रहा है कि खाना स्वाद नहीं है, उसने खाना डस्टबीन में फेंक दिया.
इस मसले पर अपनी राय ज़रूर दें. क्योंकि भूख सवाल उठाना सिखा देती है, लेकिन सवाल के जवाब तलाशना नहीं सिखाती.

This Story First Published By: Hindicatchnews

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