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बच्चों को धन का सदुपयोग करना सिखाएं : विज्ञानानन्द

बच्चों को धन का सदुपयोग करना सिखाएं : विज्ञानानन्द

महेन्द्रगढ़ (विनीत पंसारी) लक्ष्मी का सदुपयोग तभी कहलाता है जब देश और समाज के दीन-दु:खी, अभावग्रस्त, संतप्त प्राणियों के हित में वह व्यय की जाए । तभी इसकी सार्थकता है । यदि लक्ष्मी संचयखोरों, जमाखोरों और अभक्तों के पास हो जो देश व समाज का भला नहीं चाहते तो विश्व का महान अहित होता है ।

महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती ने उक्त विचार स्थानीय बाबा जयरामदास धर्मशाला में श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानोत्सव के अन्तर्गत चल रही श्रीमद्भागवत कथा में रुकमणी-श्रीकृष्ण विवाह के प्रसंग के दौरान श्रद्धालुओं के समक्ष व्यक्त किए ।

महामंडलेश्वर ने कहा कि लक्ष्मी के तीन प्रकार बताए गए हैं । लक्ष्मी, महालक्ष्मी और अलक्ष्मी । नीति और अनीति दोनों तरह से प्राप्त धन साधारण लक्ष्मी है । नीति, धर्म और सदाचार से प्राप्त धन महालक्ष्मी है । पापाचरण और अनीति से प्राप्त धन अलक्ष्मी है । लक्ष्मी वह शक्ति है जिससे समाज में संचालन होता है ।स्वामी जी ने जोर देते हुए कहा कि धन, संपदा, वैभव तो आते जाते रहते हैं चरित्र की हानि नहीं होनी चाहिए । चरित्र में बड़ी शक्ति होती है । इसलिए चरित्रवान बनो-एक बनो तथा देश व समाज की उन्नति करो ।

अभिभावकों से भी उन्होंने कहा कि वे अपने बच्चों को धन का सदुपयोग करना सिखाएं । स्वामी जी ने बताया कि रुकमणी-श्रीकृष्ण का विवाह जीव व ईश्वर का मिलन है । रुकमणी भगवान की आद्याशक्ति हैं । इस अवसर पर श्रीकिशन मस्ताना, अरविन्द खेतान, मुकेश मैहता, सेवानिवृत प्राचार्य नितेशकुमार शर्मा, ओमप्रकाश गुर्जर, रामू, दीपक मैहता, मूलचन्द शर्मा, राजेन्द्र धींगड़ा, मोहन जोशी, डा. राजेन्द्र गौड़, श्रीकिशन सर्राफ, कन्हैयालाल, हरिबाबा, आचार्य रमाकांत, विनोद शास्त्री, आचार्य राहुल, जगदीश, हरिराम, पुरुषोत्तम, श्री गीता विज्ञान प्रचार समिति के सदस्यगणों सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित थे।

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