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बाल दिवस पर Ajeybharat के लिए नेहा वालिया की विशेष रिपोर्ट

प्रशासनिक व लचर सरकारी नीतियों से बाल दिवस के महत्व से अनजान है बचपन
कहीं ढ़ाबो पर तो कहीं चाय की दुकानों पर काम व मजदूरी करते दिखाई देते है बच्चे
नेहा वालिया, लोहारू
Ajeybharat जिस उम्र में बच्चे के हाथों में कलम, किताब और मन में कुछ कर दिखाने का जज्बा होना चाहिए, उम्र की उस दहलीज की शुरुआत यदि कूड़े-करकट में हो तो ऐसे में उनके भविष्य एवं सक्षम राष्ट्र के कर्णधार बनने की क्या उम्मीदें हो सकती हैं। सर्व शिक्षा अभियान का स्लोगन आओ बच्चों स्कूल चलें हम, सब पढ़ें सब बढ़ें उस समय धूल में मिल जाता है जब बचपन कूड़े के ढेर में बिखरने लगता है। इसके बावजूद बच्चों को मुफ्त अनिवार्य शिक्षा देने के दावे कर शिक्षा विभाग अपनी पीठ थपथपाने में पीछे नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू का सपना था कि बच्चे हर संभव खुश हों और उनको दो जून की रोटी मिल सके। लेकिन नेहरू के प्यारे बच्चों की कितनी बुरी दुर्दशा होगी, इसका अंदाजा खुद नेहरू जी को भी नहीं रहा होगा। 

भले ही प्रशासन बाल मजदूरी और भिखारी बच्चों को बेहतर भविष्य देने के कितने ही दावे क्यों न करे, लेकिन बाल दिवस के महत्व से अनजान लोहारू कस्बे व आसपास के क्षेत्र में जगह-जगह मौजूद भीख मांगते बच्चे और दुकानों आदि पर मजदूरी कर अपने बचपन को खो रहे बच्चे बाल दिवस पर सरकार व प्रशासन की असलियत बयान करते है। चाय की दुकान हो या सडक़ किनारे लगी रेहड़ी या फिर ढाबे, ज्यादातर जगह खिलौनों से खेलने की उम्र वाले बच्चे जूठे बर्तन साफ करते नजर आ जाते हैं। यह हाल तब है, जब सरकार की ओर से आपरेशन मुस्कान व एनजीओ के श्रम विद्यालय बाल मजदूरी को रोकने के उदेश्य से संचालित किए जा रहे है। 
नगर व कस्बों में चाय की दुकान हो या फिर रेहड़ी पर बिकने वाले खाद्य पदार्थ, ज्यादातर जगह बच्चे काम करते नजर आते हैं। कमोबेश यहीं हाल ज्यादातर ढाबों का है, जहां बच्चे काम कर रहे हैं। छोटू एक ऐसा शब्द बन गया है, जो अब लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। कस्बे व आसपास के क्षेत्र में बने अलग-अलग चाय के खोखों, ढाबों और रेहडिय़ों व दुकानों पर काम कर रहे बहुत से बच्चे अपना असली नाम सुनने को भी तरस जाते हैं। उनका नाम क्या है, इससे भी किसी को मतलब नहीं है। गंभीर बात यह है कि ये सारे छोटू प्रशासनिक अधिकारियों को भी नजर आते हैं, लेकिन उनके बेहतर भविष्य के लिए कोई कुछ नहीं करता। 
प्रशासन भले ही यह कहे कि कस्बे में भिखारी बच्चे या बाल मजदूरी न के बराबर है, लेकिन कस्बे के रेलवे स्टेशन चौक पर बनी दुकानों, देवीलाल चौक, ऑटो मार्केट व मुख्य बाजारों में विभिन्न दुकानों पर मजदूर के रूप में कार्य करते बच्चे, बस स्टैंड व रेलवे स्टेशन पर छोटे बच्चों का पेट भरने के लिए लोगों के आगे हाथ फैलाना प्रशासन के दावों की पोल खोल रहे है। ऐसा नहीं है कि यह कभी-कभी होता है, प्रतिदिन की यहीं कहानी है। वहीं शनिवार व रविवार के दिन अचानक चौराहों, रेलवे स्टेशन और बस अड्डा पर भिखारी बच्चों की फौज बढ़ जाती है। हाथ में छोटा सा बर्तन, उसमें शनिदेव की प्रतिमा और थोड़ा सा तेल लेकर लोगों के आगे हाथ फैलाते इनको आसानी से देखा जा सकता है। आस्था के चलते लोग भी इस दिन खुलकर दान करते हैं। इसके चलते शनिवार का दिन ऐसे बच्चों को खूब फायदेमंद साबित हो रहा है।
बाल मजदूरों के विकास के लिए वर्ष 1988 में नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट की स्थापना की गई थी। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत पकड़े गए बाल मजदूरों को एनसीएलपी के बनाए स्कूलों में पढ़ाया जाता है और उन्हें सारी सुविधाएं दी जाती हैं। इस प्रोजेक्ट के लिए हर साल सरकार की तरफ से बजट भी दिया जाता है। सरकार ने इन स्कूलों को संभालने के लिए एनजीओ को सौंप दिया गया है, जो समय-समय पर इनकी सहायता करती हैं। लेकिन इसके बावजूद बाल मजदूरी रूकने का नाम भी नही ले रही है। बाल दिवस पर बाल सरंक्षण व बच्चों के भविष्य को संवारने के बडे-बडे दावे तो किए जाते है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हो पाता। 
बाल दिवस पर आज प्रशासन व विभिन्न स्कूल बाल दिवस पर कार्यक्रम आयोजित कर प. जवाहरलाल नेहरू के सपने को साकार करने का प्रण तो लेते है वहीं दूसरी ओर सडकों पर भीख मांगते बच्चे, दुकानों पर मजदूरी करते लाचार बच्चे शायद बाल दिवस से अनजान अपने व अपने परिवार के पेट के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड करते दिखाई देते है। वे नही जानते कि बाल दिवस क्या है तथा बाल दिवस के उनके लिए क्या मायने है। सरकार का आपरेशन मुस्कान भी बच्चों को उनके अधिकार दिलवाने में अभी तक तो नाकाम ही साबित हुए है।
स्लम बस्तियों में जागरूकता जरूरी:-
क्षेत्र की स्लम बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों का भविष्य निरक्षरता के अंधेरे में गुम होता जा रहा है। इन बच्चों के माता-पिता भी कमजोर आर्थिक हालात के चलते चाहकर भी अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने में असमर्थ हैं। अकेले लोहारू कस्बे में लगभग पांच दर्जन परिवार ऐसे है जो अपने बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय उन्हें अपने गुजारे के लिए मेहनत-मजदूरी के कार्य में उन्हें लगा लेते हैं। ऐसे में शिक्षा विभाग को चाहिए कि इनके अभिभावकों को सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र में लागू कल्याणकारी योजनाओं से अवगत कराएं।

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