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“बाजार” बच्चों के लिए नहीं है और “बधाई हो” बच्चों की समझ से परे है:करन निम्बार्क

मुंबई/ करन निम्बार्क:

पिछले सप्ताह दो चलचित्र प्रदर्शित हुए, “बाजार” और “बधाई हो” । दोनों चलचित्रों में यदि कोई एक चुनना हो तो मैं कहूँगा “बधाई हो” । जहाँ “बाजार” व्यापार जगत, शेयर मार्केट, राजनीति, महत्त्वकांक्षा की एक अच्छी कहानी है, वहीं “बधाई हो” कहानी है रिश्तों और आपसी प्रेम की, पारिवारिक ताने-बाने की । हालाँकि बाजार में संवाद और सैफ अली खान का अभिनय सच में प्रशंसा योग्य है । तब भी पटकथा में कहीं-कहीं थोड़ी सी कमी लगी । जब कि “बधाई हो” की कहानी अंत तक आपको बांधे रखती है । वैसे यह भी निर्भर करता है आप की जडें और सोच पर । “बाजार” बच्चों के लिए नहीं है और “बधाई हो” बच्चों की समझ से परे है ।

आजकल चलचित्रों में शराब और सेक्स का खुलकर सहारा लिया जाता है । क्या सच में इससे आपकी कहानी पर कोई विशेष प्रभाव पड़ता है ? बस यह सवाल था मेरे मन में कि हम कब तक पश्चिम का अनुसरण करते रहेंगे ? हम कितना भी उनके जैसा बनने का प्रयास कर ले अपनी जड़ों से तो नहीं कट सकते । मैं शराब और सेक्स दोनों के ही विरोध में नहीं हूँ । 

परंतु हम मीडिया के माध्यम से कहीं ना कहीं इसे ऐसा जता रहे हैं कि कोई सफलता हो, कोई तनाव हो, आधुनिक कहलाना हो तो उसके लिए शराब और सेक्स दोनों आवश्यक है । यह तो एक व्यक्तिगत चुनाव होना चाहिए । तो बात करें दोनों चलचित्रों की, पटकथा, निर्देशन, अभिनय इत्यादि को ध्यान में रहते हुए अजेयभारत समाचार की ओर से मुंबई विभाग प्रमुख करन निम्बार्क, “बाजार” (** 1/2 ) को पाँच में से ढाई तारे देते हैं और “बधाई हो” (***) को तीन तारे ।      
           

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