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जानिए ज्योतिष और खांसी रोग का सम्बंध(कारण) और निवारण :ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री


प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर का संचालन होता है। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि कुंडली न केवल व्यक्ति का आइना है बल्कि यह इस बात को दर्शाता है कि कौन सा ग्रह किस समय आपको शारीरिक कष्ट, लंबी और भयंकर बीमारी देकर जाएगा।



कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार मानव के शरीर का वर्गीकरण कुंडली के द्वादश भाव और नवग्रह के आधार पर किया गया है। सर्दी आते ही अमूमन लोग सर्दी, खांसी और जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं।

ग्रह शरीर को बीमारियों का घर भी बना सकते हैं और आजीवन चुस्त-दुरुस्त भी रखते हैं।

आयुर्वेद में खांसी को कास रोग भी कहा जाता है। खांसी होने ये पहले रोगी को गले में खरखरापन, खराश, खुजली आदि होती है और गले में कुछ भरा हुआ-सा महसूस होता है। कभी-कभी मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है।



कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो एलर्जी के कारण अथवा अपनी दैनिक जीवन-शैली और आस-पास के रहन-सहन से प्रभावित होकर दमे से पीड़ित हो जाते हैं। सर्दी, खांसी और दमे का सीधा संबंध कुंडली के चौथे भाव से होता है। ये भाव छाती को संबोधित करता है। शास्त्रों ने चन्द्रमा को चौथे भाव का कारक माना है क्योंकि चौथा भाव उस माता को संबोधित करता है जो अपने शिशु को स्तनपान करवाती है। कुंडली में दूषित चन्द्रमा अथवा चन्द्रमा का पाप करती (कैंची) योग के बीच छुपना छाती संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं को न्यौता देता है।

नजला-खांसी, जुकाम और दमा चन्द्रमा एवं बुध के द्वंद योग के कारण भी उन्नत होता है। ज्योतिष की चिकित्सा प्रणाली के अनुसार चन्द्रमा को चौथे भाव को पुन: स्थापित करके छाती संबंधित समस्याओं से राहत पाई जा सकती है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार हर बीमारी का संबंध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दूसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। इसी प्रकार काल पुरुष की कुंडली में मनुष्य शरीर के सभी अंगों को 12 भावों में बांटा गया है। इन 12 भावों में कालपुरुष की 12 राशियां आती हैं जिनके स्वामी 7 ग्रह हैं तथा छाया ग्रहों राहु-केतु के प्रभाव भी अति महत्वपूर्ण हैं। साथ ही 27 नक्षत्रों का प्रभाव भी मनुष्य शरीर के सभी अंगों पर बराबर बना रहता है। इनके स्वामी ग्रह भी ये ही 7 ग्रह हैं अर्थात् सारांश रूप से यह कह सकते हैं कि शरीर के सभी अंगों को 12 भाव/राशियां, 9 ग्रह व 27 नक्षत्र संचालित करते हैं।

यदि चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इसमें भी शरीर के सारे अंग आ जाते हैं जिनका चिकित्सा की दृष्टि से दवाई द्वारा उपचार करना है जबकि कुंडली में अंगों का उपचार औषधि की बजाय ज्योतिष से होता है। इन दोनों में सामंजस्य बैठाना ही काल पुरूष की कुंडली का चिकित्सा विज्ञान में प्रयोग करना कहते हैं।

खांसी की बीमारी में ज्योतिष के इन उपाय से मिलेगी राहत--

खाकी धागे में चांदी का चौकोर सिक्का पिरोकर धारण करें।

सफेद रंग के अंत वस्त्र न पहनें।

सफेदे के पेड़ की पत्तियों को जलाकर घर में धूप करें।

सफेद गाय के शुद्ध घी में लौंग मिलाकर छाती पर लगाएं।

घरेलू इलाज
1. सूखी खांसी में दो कप पानी में आधा चम्मच मुलहठी चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर ठंडा करके छान लें। इसे सोते समय पीने से 4-5 दिन में अंदर जमा हुआ कफ ढीला होकर निकल जाता है और खांसी में आराम हो जाता है।

2. गीली खांसी के रोगी गिलोय, पीपल व कण्टकारी, तीनों को मोटा-मोटा कूटकर शीशी में भर लें। एक गिलास पानी में तीन चम्मच यह चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाए तब उतारकर बिलकुल ठंडा कर लें और 1-2 चम्मच शहद या मिश्री पीसकर डाल दें। इसे दिन में दो बार सुबह-शाम आराम होने तक पीना चाहिए।

आयुर्वेदिक चिकित्सा 
श्रंगराभ्र रस, लक्ष्मी विलास रस अभ्रकयुक्त और चन्द्रामृत रस, तीनों 10-10 ग्राम तथा सितोपलादि चूर्ण 50 ग्राम। सबको पीसकर एक जान कर लें और इसकी 30 पुड़िया बना लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया, एक चम्मच वासावलेह में मिलाकर चाट लें। दिन में तीन बार, सुबह, दोपहर व शाम को, 'हर्बल वसाका कफ सीरप' या 'वासा कफ सायरप' आधा कप कुनकुने गर्म पानी में डालकर पिएँ। साथ में खदिरादिवटी 2-2 गोली चूस लिया करें। छोटे बच्चों को सभी दवाएँ आधी मात्रा में दें। प्रतिदिन दिन में कम से कम 4 बार, एक गिलास कुनकुने गर्म पानी में एक चम्मच नमक डालकर आवाज करते हुए गरारे करें।

जानिए क्या रखें सावधानी :---

1 खांसी के रोगी को कुनकुना गर्म पानी पीना चाहिए और स्नान भी कुनकुने गर्म पानी से करना चाहिए। कफ ज्यादा से ज्यादा निकल जाए इसके लिए जब-जब गले में कफ आए तब-तब थूकते रहना चाहिए।

2 मीठा, क्षारीय, कड़वा और गर्म पदार्थों का सामान्य सेवन करना चाहिए। मीठे में मिश्री, पुराना गुड़, मुलहठी और शहद, क्षारीय चीजों में यवक्षार, नवसादर और सुहागा, द्रव्यों में सोंठ, पीपल और काली मिर्च तथा गर्म पदार्थों में गर्म पानी, लहसुन, अदरक आदि-आदि पदार्थों का सेवन करना लाभकारी होता है।

3 खांसी होने पर खटाई, चिकनाई, अधि‍क मिठाई, तेल के तले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा ठंड, ठंडी हवा और ठंडी प्रकृति के पदार्थों का सेवन करने से परहेज करना चाहिए।

जानिए खांसी के  प्रकार --

1. वातज खांसी : वात के कारण होने वाली खांसी में कफ सूख जाता है, इसलिए इसमें कफ बहुत कम निकलता है या निकलता ही नहीं है। कफ न निकल पाने के कारण, खांसी लगातार और तेजी से आती है, ताकि कफ निकल जाए। इस तरह की खांसी में पेट, पसली, आंतों, छाती, कनपटी, गले और सिर में दर्द भी होने लगता है।

2. पित्तज खांसी : पित्त के कारण होने वाली खांसी में कफ निकलता है, जो कि पीले रंग का कड़वा होता है। वमन द्वारा पीला व कड़वा पित्त निकलना, मुंह से गर्म बफारे निकलना, गले, छाती व पेट में जलन होना, मुंह सूखना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना, प्यास लगती रहना, शरीर में गर्माहट या जलने का अनुभव होना और खांसी चलना, पित्तज खांसी के प्रमुख लक्षण हैं।


3. कफज खांसी : कफ के कारण होने वाली खांसी में कफ बहुत निकलता है। इसमें जरा-सा खांसते ही कफ आसानी से निकल आता है। कफज खांसी के लक्षणों में गले व मुंह का कफ से बार-बार भर जाना, सिर में भारीपन व दर्द होना, शरीर में भारीपन व आलस्य, मुंह का स्वाद खराब होना, भोजन में अरुचि और भूख में कमी के साथ ही गले में खराश व खुजली और खांसने पर बार-बार गाढ़ा व चीठा कफ निकलना शामिल है।

4. क्षतज खांसी : यह खांसी वात, पित्त, कफ, तीनों कारणों से होती है और तीनों से अधिक गंभीर भी। अधि‍क भोग-विलास (मैथुन) करने, भारी-भरकम बोझा उठाने, बहुत ज्यादा चलने, लड़ाई-झगड़ा करते रहने और बलपूर्वक किसी वस्तु की गति को रोकने आदि से रूक्ष शरीर वाले व्यक्ति के गले में घाव हो जाते हैं और खांसी हो जाती है।इस तरह की खांसी में पहले सूखी खांसी होती है, फिर रक्त के साथ कफ निकलता है।

5. क्षयज खांसी : यह खांसी क्षतज खांसी से भी अधिक गंभीर, तकलीफदेह और हानिकारक होती है। गलत खानपान, बहुत अधि‍क भोग-विलास, घृणा और शोक के के कारण शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है और इनके कारण कफ के साथ खांसी हो जाती है। इस तरह की खांसी में शरीर में दर्द, बुखार, गर्माहट होती है और कभी-कभी कमजोरी भी हो जाती है। ऐसे में सूखी खांसी चलती है, खांसी के साथ पस और खून के साथ बलगम निकलता है। क्षयज खांसी विशेष तौर से टीबी यानि (तपेदिक) रोग की प्रारंभिक अवस्था हो सकती है, इसलिए इसे अनदेखा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।

चन्द्रमा के कारण होती है--सर्दी - खांसी, फेफड़ों में परेशानी, नजला, जुकाम, क्षय रोग, श्वास सम्बन्धी रोग एवं मानसिक रोगों के लिए चन्द्र उत्तरदायी होता है | |चंद्रमा को शांति का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक दिमाग और खून से जुड़ी बीमारियों का संबंध चंद्रमा की दशा से है। चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है।

उपचार स्थिती--

प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन होता है जबकि चन्द्रमा बलवान हो और 1, 5, 7 एवं 8 भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार से रोग का ईलाज संभव हो पाता है.पत्रिका में तृतीय, षष्टम, नवम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार के उपरान्त रोग से मुक्ति मिलती है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों और सप्तमांश बलवान हों तो रोग का निदान संभव होता है.चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह की स्थिति से ज्ञात होता है कि रोगी को दवाईयों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा. इसके आलावा अलग अलग ग्रहों के उपचार के साथ साथ रोगो से बचने के लिये महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

-ऊँ नम: शिवाय मंत्र का सतत जाप करें। -ऊँ हूँ जूँ स: इन बीज मंत्रो का चौबीसो घंटे जाप करे।

-शिव का अभिषेक करें।

जन्मजात रोग-प्रतिरोधात्मक क्षमता----

सूर्य चन्द्रमा और लग्न-- जन्मपत्रिका में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए इन तीनों का बली होना अत्यंत आवश्यक है। यदि ये तीनों बली हो तो व्यक्ति आदिव्याधि से बचा रहता है। अष्टम भाव आयु का भाव है, इसलिए अष्टम भाव और अष्टमेश का भी बली होना आवश्यक है। जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता निम्न स्थितियों में अच्छी रहती है :---

1. बली लग्र एवं लग्नेश

2. लग्न एवं लग्नेश का शुभ कतृरि में होना

3. 3,6,11 में अशुभ ग्रह एवं गुलिक

4. केन्द्र-त्रिकोण में शुभ ग्रह होना

5. अष्टम भाव में शनि होना।

6. बली अष्टमेश

7. बली आत्मकारक

8. लग्न व अष्टम भाव में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु होना

जन्म पत्रिका में लग्र, सूर्य, चंद्र के चक्र बिंदुओ से शरीर के बाहरी, भीतरी रोग को आसानी से समझा जा सकता है। लग्र बाहर के रोगो का, तथा सूर्य भीतर के रोग, तेज, प्रकृति का तथा चंद्रमा मन उदर का प्रतिनिधी होता है। इन तीनों ग्रहों का अन्य ग्रहों से पारस्परिक संबध या शत्रुता ही शरीर के विभिन्न रोगो को जन्म देती है।

रक्तचाप के लिए चन्द्र, मंगल और शनि ग्रह को अधिक उत्तरदायी माना गया है। शनि ग्रह और साढ़े साती से व्याप्त भय तथा विनाश की चर्चा अक्सर की जाती है, हजारों उपाय भी किये जाए हैं। लेखक ने भी ऐसी ग्रह दशा से पीड़ित लोगों को रक्तचाप से ग्रसित होना बताया है। रक्तचाप की भांति मुधमेह भी आम रोग हो गया है। मानसिक तनाव और अनियमित खान-पान को इसका कारण बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बताया गया है कि सूर्य-चन्द्र द्वादश भाव में स्थित हों, राहु और सूर्य सप्तम स्थान में हों, शनि और मंगल के साथ चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें स्थान में स्थित हों तो व्यक्ति नेत्रहीन होगा।

किसी भी जन्म पत्रिका का षष्ठ भाव रोग का स्थान होता है। शरीर में कब, कहां, कौन सा रोग होगा वह इसी से निर्धारित होता है। यहां पर स्थित क्रूर ग्रह पीड़ा उतपन्न करता है। उस पर यदि शुभ ग्रहो की दृष्टि न हो तो यह अधिक कष्टकारी हो जाता है।

चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी) के संबंध में कुछ नियम वेद-पुराणों में भी दिये गये हैं---

विष्णु पुराण तृतीय खंड अध्याय-11 के श्लोक 78 में आदेश है कि भोजन करते समय अपना मुख पूर्व दिशा, उत्तर दिशा में रखें । उससे पाचन क्रिया उत्तम रहती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

इसी प्रकार विष्णु पुराण तृतीय अंश अध्याय-11 के श्लोक 111 में उल्लेख है कि शयन करते समय अपना सिर पूर्व दिशा में, या दक्षिण दिशा में रख कर सोवें। इससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

उत्तर दिशा में सिर रख कर कभी नहीं सोवें, क्योंकि उत्तर दिशा में पृथ्वी का चुंबक नार्थ उत्तरी ध्रुव है और मानव शरीर का चुंबक सिर है। अतः 2 चुंबक एक दिशा में होने से असंतुलन होगा और नींद ठीक से नहीं आएगी तथा स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा। उच्च रक्तचाप हो जाएगा। शायद इसी कारण भारतवर्ष में मृत शरीर का सिर उत्तर में रखते हैं।

कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका निभा सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका नहीं निभाते, परंतु जन्मपत्रिका, या हस्तरेखा के आधार पर ज्योतिषी यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि उक्त व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी होने की संभावना है, जैसे जन्मपत्रिका में तुला लग्न, या राशि पीड़ित हो, तो व्यक्ति को कमर के निचले वाले भाग में समस्या होने की संभावना रहती है। जन्मपत्रिका में बीमारी का घर छठवां स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है।

तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार की ओर इंगित करता है, जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो, तो टी.बी. की बीमारी की संभावना रहती है और तृतीय स्थान में शुक्र पीड़ित हो, तो शर्करा की बीमारी 'मधुमेह' की संभावना रहती है। शनि, या राहु तृतीय स्थान में पीड़ित होने पर जहर खाना, पानी में डूबना, ऊंचाई से गिरना और जलने से घाव होना आदि की संभावना बनती है।

बात केवल मनुष्य की नहीं है, उस क्षण में जन्मने वाले मिट्टी, पत्थर, मकान- दुकान, कुत्ता, बिल्ली, वृक्ष- वनस्पति सभी का सच एक ही है। यही कारण है कि ज्योतिष के मर्मज्ञ व विशेषज्ञ प्रत्येक जड़ या चेतन का ऊर्जा चक्र या कुण्डली तैयार करते हैं। यह चक्र प्रायः ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की नव मूल धाराओं या नवग्रह एवं बारह विशिष्ट शक्तिधाराओं या राशियों को लेकर होता है। यदि गणना सही ढंग से की गई है तो इन ऊर्जा धाराओं के सांयोगिक प्रभाव इन पर देखने को मिलते हैं।

जानिए आपकी राशि(लग्न) अनुसार संभावित रोग और उनके उपचार----
1. मेष : सिर दर्द, मानसिक तनाव, मतिभ्रम, पागलपन, उन्माद, अनिद्रा, मुख रोग, मेरूदंड के रोग, अग्नि जनित रोग।

उपाय : मेष राशि वाले जातक को प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।


2. वृष : कान, नाक और दांत के रोग, खांसी, टॉन्सिल्स, थायराइड, सायनस।

उपाय : वृषभ राशि वाले जातक भी त्रिफला चूर्ण रात को भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें। सफेद रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।


3. मिथुन : श्वास व गले के रोग, हाथ व कंधे में फ्रैक्चर, लकवा, तंत्रिका तंत्र रोग, पक्षाघात, मिर्गी, टीबी, फेफड़ों में संक्रमण, मज्जा के रोग, अस्थमा।

उपाय : मिथुन राशि के जातक प्रतिदिन भोजन करने के बाद आंवला चूर्ण में कुछ मात्रा में काली मिर्च चूर्ण मिलाकार सेवन करें हरे रंग की बोतल पानी भरकर धूप में 3-4 घंटे रखें और रात्रि में सेवन करें। 


4. कर्क : हृदय रोग, रक्त विकार, स्तन कैंसर (गांठ), फेफड़ों व पसलियों के रोग, खांसी, जुकाम, छाती में दर्द, ज्वर, मानसिक रोग व तनाव।

उपाय : कर्क राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात के भोजन के बाद सेवन करें और सफेद बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें। 


5. सिंह : रक्त, उदर, वायु विकार, मेद वृद्धि, ल्यूकेमिया, एनीमिया, रक्तचाप (बी. पी.), अस्थि रोग (पीठ, कमर, जोड़ों व घुटनों के दर्द आदि), पेट दर्द, तिल्ली रोग, बुखार, हृदय रोग।

उपाय : सिंह राशि वाले मेष राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।


6. कन्या : किडनी रोग, कमर दर्द, अपच, मंदाग्नि, जिगर रोग, आंतों के रोग, अमाशय के रोग, उदर रोग, अनिद्रा, रक्तचाप।

उपाय : कन्या राशि वाले प्रतिदिन रात्री के भोजन के एक घंटे बाद आंवले का चूर्ण का गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। हरे रंग की बोतल में पानी भरकर धूप में 3-4 घंटे रखें और रात्रि में सेवन करें। 


7. तुला : मूत्राशय रोग, मधुमेह, मूत्रकृच्छ, बहुमूत्र, प्रदर, मूत्रवाहिनी एवं मूत्र उत्सर्जन संबंधी रोग।

उपाय : तुला राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें और प्रतिदिन रात्री के भोजन के बाद सेवन करें। सफेद बोतल में पानी भरकर धूप में दिनभर रखें और रात को सेवन करें। 


8. वृश्चिक : मलाशय व गुदा रोग, गुप्त रोग, जननेन्द्रिय रोग, अंडकोश व संसर्ग रोग, गर्भाशय रोग।

उपाय : वृश्चिक राशि वाले सिंह राशि और मेष राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।


9. धनु : कूल्हे, जांघ के रोग, हड्डियां टूटना, मांसपेशियां खिंचना, चर्मरोग, जुकाम, यकृत दोष, ऋतु विकार।

उपाय : धनु राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात्री के भोजन के बाद सेवन करें और पीली कांच की बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें।


10. मकर : घुटनों के रोग, पिंडली रोग, चर्मरोग, वात व शीत रोग, रक्तचाप रोग।

उपाय : मकर राशि वाले अन्य राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगो रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें। नीले रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।


11. कुंभ : मानसिक व जलोदर रोग, ऐंठन, गर्मी रोग, टखना हड्डी रोग, संक्रामक रोग।

उपाय : कुंभ राशि वाले सुबह-सुबह 2-3 लोंग का सेवन अवश्य करें। नीले रंग की कांच की बोतल को पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रातभर पियें।


12. मीन : मूत्र उत्सर्जन, पेशाब में जलन, रुक-रुक कर आना, साफ न आना या बहुमूत्रता, किडनी रोग, पैर, पंजे, तलवे व एड़ी के रोग जैसे-एड़ी में पानी भर जाना, मानसिक तनाव, अनिद्रा, एलर्जी, चर्म रोग, रक्तविकार, आमवात, ग्रंथि रोग, गठिया रोग।

उपाय : मीन राशि वाले मेथी दाना,अजवाइन, जीरा और सूखा आंवला 1-1 ग्राम कांच के बर्तन में गलाकर रात भर रखें और सुबह छानकर उसका पानी निराहार पियें। पीली कांच की बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें।

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