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पौराणिक, वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व का पर्व है छठ पर्व , छठ पर्व में की जाती है सूर्य उपासना, चार दिन तक मनाया जाता है पर्व

नेहा वालिया, लोहारू:

छठ हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह पूजा उत्तर भारत एवं नेपाल में बड़े पैमाने पर की जाती है। छठ की पूजा बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अत्यंत लोकप्रिय छठ पूजा दीपावली पर्व के छठे एवं सातवे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी एवं सप्तमी को की जाती है। छठ षष्टी का अपभ्रंश है जिसका अर्थ हिंदू पंचांग की छठवीं तारीख है। कार्तिक शुक्ल षष्टी को सूर्य षष्टी नाम से जाना जाता है।

लोक आस्था का पर्व सूर्य षष्ठी यानी छठ पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से षष्ठी तिथि के बीच मनाया जाता है। हमारे देश में सूर्य उपासना के कई प्रसिद्ध लोकपर्व हैं जो अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते हैं। सूर्य षष्ठी के महत्व को देखते हुए इस पर्व को सूर्यछठ या डाला छठ के नाम से संबोधित किया जाता है। छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व भी छिपा हुआ है व इसके साथ ही घर-परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता से भी छठ पूजा का व्रत जुड़ा हुआ है। इस व्रत का मुय उदेश्य पति, पत्नी, पुत्र व पौत्र सहित सभी परिजनों के लिए मंगल कामना से भी जुड़ा हुआ है। सुहागिन स्त्रियां अपने लोक गीतों में छठ मैया से अपने ललना और लल्ला की खैरियत की वाहिश जाहिर करती हैं।


छठ पर्व की सांस्कृतिक परंपरा में चार दिन का व्रत रखा जाता है। यह व्रत भैया दूज के तीसरे दिन यानि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ हो जाते है। छठ का पौराणिक महत्व अनादिकाल से बना हुआ है। रामायण काल में सीता ने गंगा तट पर छठ पूजा की थी। महाभारत काल में कुंती ने भी सरस्वती नदी के तट पर सूर्य पूजा की थी। इसके परिणाम स्वरूप उन्हें पांडवों जैसे वियात पुत्रों का सुख मिला था। इसके उपरांत द्रौपदी ने भी हस्तिनापुर से निकलकर गडगंगा में छठ पूजा की थी। छठ पूजा का संबंध हठयोग से भी है। जिसमें बिना भोजन ग्रहण किए हुए लगातार पानी में खड़ा रहना पड़ता है, जिससे शरीर के अशुद्व जीवाणु परास्त हो जाते हैं।

वैसे तो चलते हुए पानी में ही छठ मनाने की परंपरा है लेकिन लोगों की भीड़ को देखते हुए शहरों में छोटी बावड़ी और तालाबों में लोग उतर जाते हैं। पर्व के दौरान स्वच्छता एवं शुद्धता पर विशेष ध्यान रखा जाता है तथा मान्यता है कि किसी ने यदि भूल से या अनजाने में भी कोई त्रुटि की तो उसका कठिन दंड भुगतना होगा। इसलिए पूरी सतर्कता बरती जाती है कि पूजा के निमित्त लाए गए फल फूल किसी भी कारण अशुद्व न होने पाएं। इस पर्व के नियम बड़े कठोर हैं।

सबसे कठोर अनुशासन बिहार के दरभंगा में देखने को मिलता है। संभवत इसीलिए इसे छठ व्रतियों का सिद्धपीठ भी कहा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इस पूजा के दौरान अध्र्यदान के लिए साधक जल पूरित अंजलि ले कर सूर्याभिमुख होकर जब जल को भूमि पर गिराता है तब सूर्य की किरणें उस जल धारा को पार करते समय प्रिज्म प्रभाव से अनेक प्रकार की किरणों में विखंडित हो जाती हैं। साधक के शरीर पर ये किरणें पैराबैंगनी किरणों जैसा प्रभाव डालती हैं, जिसका उपचारी प्रभाव होता है।

इस दौरान पुत्र प्राप्ति, सुख शांति और वैभव प्राप्ति किसी भी इच्छा पूर्ति हेतु जो कोई छठ मां से मन्नत मांगता है वह मन्नत पूरी होने पर कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दीये होते हैं जो देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है। नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है।


छठ पूजा की प्रचलित कथा:-
छठ सूर्य की उपासना का पर्व है। वैसे भारत में सूर्य पूजा की परंपरा वैदिक काल से ही रही है। लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की और सप्तमी को सूर्योदय के समय अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया। इसी के उपलक्ष्य में छठ पूजा की जाती है। ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इस कारण हिंदू शास्त्रों में सूर्य को भगवान मानते हैं, इसी परिकल्पना के साथ पूर्वोत्तर भारत के लोग छठ महोत्सव के रूप में इनकी आराधना करते हैं।

माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती रही है। छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अध्र्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। महाभारत में सूर्य पूजा का एक और वर्णन मिलता है। यह भी कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। इसका सबसे प्रमुख गीत केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेडऱाय कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए है।

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