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कैसी खुशी में जी रहे हैं, कैसे ग़म में मर रहे हैं हम:युवाकवि अरमान राज़

अज़ीब सी उलझनें रहती हैं ज़हन में,
  गर रात है तो इंतज़ार सवेरे का।।
है अगर रौशनी हर तरफ़ मेरे,
  तो डर फिर से आते अंधेरे का।।।

सुबह के उजाले में एक स्फूर्ति मिले,
  तो ढलती शाम के साथ एक डर।।
हर पल लगे आखिरी सा,
  क्यूँ ना जी लूँ मैं जी भर।।।

हर सांस में दम सा निकलता,
  तो हर सांस के साथ ही आता दम।।
क्यूँ हर सांस में खुद से पिछड़ रहे,
  ज़िन्दगी से नहीं मिल रहे हम।।।

मंज़िल यूँ तो हर रास्ते की एक ही है,
  रंग भी अंतिम सबका एक ही है।।
चाहे कितने भी ऊँचे मुकाम मिल जाये,
  पर आखिरी हासिल सबका एक ही है।।।

कैसी खुशी में जी रहे हैं,
  कैसे ग़म में मर रहे हैं हम।।
जब किसी को मारने में नही डरते,
  तो खुद जीने से क्यों डर रहे हैं हम।।।
युवाकवि अरमान राज़

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4 Comments

kavish said…
Jiyo hjaro saal bna...wah
Unknown said…
EK dam tunch,Kada zahar,kanchaa
Hai yeh Poem to 🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
Unknown said…
Kya baat hai.... Nice one...