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जानिए मानसिक रोग और ज्योतिष का सम्बंध


प्रिय मित्रों/पाठकों, मानसिक बीमारी होने के बहुत से कारण होते हैं, इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है, इसकी जानकारी के लिये कुंडली के उन योगों का अध्ययन करेंगे जिनके आधार पर मानसिक बिमारियों का पता चलता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होने वाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है। रोग तथा शरीर के अंगों के लिये लग्न कुण्डली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से तथा मनःस्थिति का विचार चन्द्रमा से किया जाता है। इस के अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाये रखने में विशेष योगदान है।


पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि हम ज्योतिष की दृिष्टि से विचार करें तो मस्तिष्क (अवचेतन मस्तिष्क) Subconscious Mind का कारक ग्रह सूर्य है। जन्मकुण्डली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो, उस जातक में किसी हद तक गहरी सोच का आभाव होता है, अथवा वह गम्भीर प्रकृति का होता है, तथा मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक ग्रह चन्द्रमा है। ऐसा जातक मनमुखी होता है, जो भी मन में आता है वैसा ही करने लगता है। मन में आता है तो, नाचने लगता है, मन करता है तो गाने लगता है, परंतु उस समय की जरूरत क्या है? इसकी उसे फिक्र नहीं होती। विचित्र बाते करना, किसी एक ओर ध्यान जाने पर उसी प्रकार के कार्य करने लगता है। यह सब मनमुखी जातक के लक्षण हैं, ऐसे जातक की कुंडली में चन्द्रमा तथा कुण्डली के चतुर्थ व पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है। इस के अलावा बुध विद्या देने वाला, गुरू ज्ञान देने वाला, तथा शनि वैराग्य देने वाले ग्रह हैं। किसी भी जातक की कुंडली में नवम् भाग्य का, तृतीय बल और पराक्रम का, एकादश लाभ का तथा सप्तम भाव वैवाहिक सुख के विचारणीय भाव होते हैं। यह सब ग्रहस्थितियाँ मन व मस्तिष्क पर किसी न किसी प्रकार से अपना प्रभाव ड़ालती हैं।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि मानसिक बीमारी में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है. चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है।

जन्मकुण्डली में छठा भाव बीमारी और अष्टम भाव मृत्यु और उसके कारणों पर प्रकाश डालते हैं। बीमारी पर उपचारार्थ व्यय भी करना होता है, उसका विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है। इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। अनुभव पर आधारित जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोगों का उल्लेख कर रहा हूँ। इन बीमारियों का कुण्डली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से बचा जा सकता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वैदिक ज्योतिष में मन का कारक ग्रह चंद्रमा माना गया है। उपरोक्त सभी शक्तियां मस्तिष्क (मन) के इसी भाग से मिलती हैं, उन्माद, आवेश आदि विकारों से ग्रसित भी यही होता है, डाक्टर इसी को निद्रित करके आप्रेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सूई लगाकर भी मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं को संज्ञाशून्य कर देते हैं, फलस्वरूप पीड़ा का अनुभव नहीं होता, और आप्रेशन कर लिया जाता है। पागलखानों में इसी चेतन मस्तिष्क का ही ईलाज होता है। अवचेतन की तो एक छोटी सी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ मे आई है, वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा-बहुत सफल हुये हैं, किन्तु इसका अधिकांश भाग अभी भी डाक्टरों की समझ से परे है।

 जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है. सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है. शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है. मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है।

ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मानव मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक वह जिसमें बुद्धि कार्य करती है, सोचने-विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है, इसी को अवचेतन मस्तिष्क कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इसका कारक ग्रह सूर्य है। विचारशील (अवचेतन) मस्तिष्क रात्रि में सो जाता है, विश्राम ले लेता है, अथवा कभी-कभी नशा या बेहोशी की दवा लेने से मूर्छाग्रस्त हो जाता है। अवचेतन मस्तिष्क के इसी भाग के विकार ग्रस्त होने से जातक मूर्ख, मंद बुद्धि और अनपढ़ अविकसित मस्तिष्क वाला व्यक्ति या तो सुख के साधन प्राप्त नहीं कर पाता, और यदि कमाता भी है तो, उसका समुचित उपयोग करके सुखी नहीं रह पाता। सभी वस्तुयें उसके लिये जान का जंजाल बन जाती हैं। एेसे जातक मंदबुद्धि तो कहलाते हैं, परंतु इनमें शरीर के लिये भूख, मल-त्याग, श्वास-प्रश्वास, रक्तसंचार, तथा पलकों का झपकना आदि क्रियायें सामान्य ढंग से होती हैं। मस्तिष्क की इस विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत ही कम असर पड़ता है। मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है, जिसमें आदतें संग्रहित रहती हैं, और शरीर के क्रियाकलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है।

इन ज्योतिषीय योग से पहचाने मानसिक रोग को

जातक पारिजात के अनुसार सूर्य और चंद्रमा एक साथ होकर लग्‍न में हो अथवा किसी एक त्रिकोण में हो और गुरू तीसरे स्‍थान में हो या केंद्र में हो तो जातक मंदबुद्ध‍ि होता है।
जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है और चंद्रमा मन है. मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं. व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है.

यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं तब व्यक्ति में अत्यधिक जिदपन हो सकती है और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है.

जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है.

जब जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

सूर्य और चंद्रमा एक साथ होकर लग्‍न में या फिर किसी त्रिकोण में एक साथ हों तथा गुरू तीसरे स्‍थान में हो या फिर वह भी केंद्र में हो तो जातक को मानस‍िक रोग होने की संभावना होती है।

 कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है. शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है.

जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो.

 राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है.

मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

 जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो.

 जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है.

जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

इन योग से बनता हैं सन्देह करने वाला
यदि जन्म कुंडली मे  चंद्रमा और बुध केंद्र में हो या शुभ नवांश में न हों तो जातक अत्‍यंत भ्रम वाला होता है अर्थात सभी बातों में संदेह करने वाला होता है।

यदि चंद्रमा पाप ग्रह के साथ हो और राहु लग्‍न से पांचवें, आठवें और बारहवें घर में हो तो जातक को मत भ्रष्‍ट होने का संदेह हमेशा रहता है।

इन कारणों से होता हें मिरगी रोग (जानिए जन्म कुंडली में मिरगी रोग के लक्षण)

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है. साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है.

1- शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है.

2- कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो और यह दोनो मंगल से दृष्ट हो.

3- जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों.

4-- चंद्रमा और बुध केंद्र में हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्‍टि हो साथ ही पांचवें भाव या आठवें भाव में पाप ग्रह हो तो ऐसे जातक को मिर्गी की शिकायत होती है।
5- जब चंद्रमा शनि के साथ हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक कभी-कभी जन्‍म से पागल होता है।

क्यों होते हैं मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे

जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो. यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है.

1- शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

2- जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

3- पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

4- जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

5- पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है.

कैसे करें मानसिक रोग की (भूलने की बीमारी) रत्न चिकित्सा :- 

पण्डित दयानन्द शास्त्री के विचार से  मानसिक बीमारियों  के निवारण हेतु  बुध को  बल प्रदान करना सर्वथा उपयुक्त होगा I ऐसे व्यक्ति को पन्ना रत्न की अंगूठी चाँदी  में बनवाकर दाहिने हाथ की कनिष्ठा अंगुली में  धारण करना चाहिए I  कुछ विशेष परिस्थितिओं  में गले में भी धारण किया जा सकता है I पन्ना का भष्म  आदि भी खिलाना लाभप्रद होगा I प्रज्ञा मन्त्र का अनुष्ठान एवं अपामार्ग की लता से हवन भी  कराना चाहिए I

मानसिक रोग में बीती हुई बहुत सी घटनाएं अथवा बातें याद नहीं रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुण्डली में जब लग्न और लग्नेश पाप पीड़ित होते हैं तो इस प्रकार की स्थिति होती है.सूर्य और बुध जब मेष राशि में होता है और शुक्र अथवा शनि उसे पीड़ित करते हैं तो स्मृति दोष की संभावना बनती है.साढे साती के समय जब शनि की महादशा चलती है उस समय भी भूलने की बीमारी की संभावना प्रबल रहती ह.रत्न चिकित्सा पद्धति के अनुसार मोती और माणिक्य धारण करना इस रोग मे लाभप्रद होता है I

उपरोक्त रोग पूर्व जन्म में किये गए पापों से उत्पन्न होते हैं इन्हें दूर करने के लिए दवाइयां, दान, मंत्र, जप, पूजा, अनुष्ठान करने चाहिए. तथा गलत काम करने से भी बचना चाहिए. तभी पापों के दुष्प्रभाव से मुक्त मिलेगी।

मानसिक बीमारी का इलाज

मानसिक रोग का उपचार आपकी मानसिक बीमारी के प्रकार और इसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। कई चिरकारी बीमारियों की तरह मानसिक बीमारी को चलते इलाज की आवश्यकता होती है।
एलोपैथी तुरंत नतीजों के साथ विशिष्ट लक्षणों का उपचार करती है, जबकि आयुर्वेद इस मान्यता पर काम करता है कि तमाम विकार (भौतिक और मानसिक) ऊपर उल्लिखित एक या उससे ज़्यादा कारणों में असंतुलन से पैदा होते हैं. प्रभावी उपचार, डॉक्टरों के मुताबिक, एक समग्र नज़रिए से ही संभव है. इसी नज़रिए की वजह से मनोचिकित्सक ये मानते हैं कि आयुर्वेद में वैकल्पिक उपचार की संभावना भले न हो लेकिन एक पूरक उपचार के रूप में वो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दो के लिए उपयोगी हो सकती है।
 कई मानसिक स्थितियों का इलाज एक या अधिक निम्नलिखित उपचारों के साथ किया जा सकता है:
1. मनोवैज्ञानिक चिकित्सा: डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या अन्य स्वास्थ्य पेशेवर व्यक्तियों से उनके लक्षणों और चिंताओं के बारे में बात करते हैं और उनके बारे में सोचने और प्रबंधित करने के नए तरीकों की चर्चा करते हैं।
2. औषधि-प्रयोग: कुछ लोगों को कुछ समय तक दवा लेने से मदद मिलती है; और दूसरों को निरंतर आधार पर आवश्यकता हो सकती है।
3. सामुदायिक सहायता कार्यक्रम: सहायता कार्यक्रम विशेष रूप से आवर्ती लक्षण वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं या जिनकी मानसिक विकलांगता है। इस समर्थन में जानकारी, आवास, उपयुक्त कार्य, प्रशिक्षण और शिक्षा, मनोवैज्ञानिक पुनर्वास और आपसी सहायता समूहों को खोजने में सहायता शामिल हो सकती है।
4. औषधि-प्रयोग हालांकि मनोरोग दवाएं मानसिक बीमारी का इलाज नहीं करती हैं, वे अक्सर लक्षणों में काफी सुधार कर सकते हैं। मनश्चिकित्सा दवाएं अन्य उपचारों जैसे मनोचिकित्सा को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती हैं।
सबसे सामान्यतः इस्तेमाल की जाने वाली कक्षाओं में से कुछ में शामिल हैं:
5. एंटी-डिप्रेसन्ट दवाएं: अवसाद, चिंता और कभी-कभी अन्य परिस्थितियों का इलाज करने के लिए एंटीडिप्रेसन्ट का उपयोग किया जाता है। वे उदासी, निराशा, ऊर्जा की कमी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और गतिविधियों में रुचि की कमी जैसे लक्षणों को सुधारने में सहायता कर सकते हैं। एंटीडिप्रेसन्ट की लत नहीं हैं और निर्भरता नहीं पैदा करते हैं।
6. एंटी-व्यग्रता दवाएं: इन दवाओं का उपयोग चिंता विकारों के इलाज के लिए किया जाता है, जैसे कि सामान्यकृत चिंता विकार या आतंक विकार। वे व्याकुलता और अनिद्रा को कम करने में भी मदद कर सकते हैं दीर्घकालिक एंटी-डेंटिटी ड्रग्स आमतौर पर एंटीडिप्रेसन्ट होते हैं जो चिंता के लिए भी काम करती हैं। दीर्घकालिक एंटी-व्यग्रता ड्रग्स आमतौर पर एंटी-डिप्रेसन्ट होते हैं जो चिंता के लिए भी काम करती हैं।
7. मूड स्थिर करने वाली दवाएं: मनोदशा स्टेबलाइजर्स का उपयोग आमतौर पर द्विध्रुवी विकारों के इलाज के लिए किया जाता है, जिसमें उन्माद और अवसाद के वैकल्पिक एपिसोड शामिल होते हैं। अवसाद का इलाज करने के लिए कभी-कभी मूड स्टेबलाइजर्स का इस्तेमाल एंटीडिप्रेसन्ट के साथ किया जाता है।
8. मनोविकार की दवाएं: मनोवैज्ञानिक दवाओं का प्रयोग आमतौर पर मनोवैज्ञानिक विकारों, जैसे कि सिज़ोफ्रेनिया के इलाज के लिए किया जाता है। मनोवैज्ञानिक दवाओं का उपयोग द्विध्रुवी विकारों के इलाज के लिए भी किया जा सकता है या अवसाद का इलाज करने के लिए एंटीडिप्रेसन्ट के साथ प्रयोग किया जा सकता है।
9. मनोचिकित्सा: मनोचिकित्सा, जिसे टॉक-थेरेपी भी कहा जाता है, में आपकी स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य प्रदाता के साथ संबंधित मुद्दों के बारे में बात करना शामिल है। मनोचिकित्सा के दौरान, आप अपनी स्थिति और आपके मूड, भावनाओं, विचारों और व्यवहार के बारे में जानें। अंतर्दृष्टि और ज्ञान आपको लाभ के साथ, आप मुकाबला और तनाव प्रबंधन कौशल सीख सकते हैं। अंतर्दृष्टि और ज्ञान से, आप तनाव से निपटने और उसका प्रबंधन करना सीख सकते हैं।
मनोचिकित्सा अक्सर कुछ महीनों में सफलतापूर्वक पूरा हो सकता है, लेकिन कुछ मामलों में, दीर्घकालिक उपचार की आवश्यकता हो सकती है।

आयुर्वेद और मानसिक स्वास्थ्य--

“आयुर्वेद, अवसाद, चिंता और ओसीडी जैसे विकारों में एलोपैथी के एक पूरक उपचार के रूप में काफी महत्त्वपूर्ण नतीजे देता है. इस तरह के अध्ययन हुए हैं जिनमें पता चला है कि आयुर्वेद की दवा की खुराक को बढ़ाने के साथ मरीज में एलोपैथी की दवा की खुराक की निर्भरता कम होती गई है,” ये कहना है डॉ डी सुधाकर का जो निमहान्स में एडवान्स्ड सेंटर फ़ॉर आयुर्वेद में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं. वो कहते हैं कि ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें एलोपैथी दवाओँ पर निर्भरता पूरी तरह खत्म कर गई है.

आयुर्वेदिक दवाएं मरीज़ में एक समग्र बदलाव लाती हैं जबकि एलोपैथी विकार के विशिष्ट लक्षणों पर ही काम करती है. आयुर्वेद पारम्परिक खानपान और जीवनशैली पर ज़ोर देता है और इसके अलावा योग, व्यायाम और हर्बल उपचार भी उसमें शामिल हैं. ये एक वैकल्पिक उपचार के रूप में प्रमाणित हैं जिसमें न सिर्फ शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार शआमिल है बल्कि ये आगामी बीमारियों से भी निजाते दिलाने के लिए व्यक्ति की जीवनशैली में बदलाव लाता है.

स्वास्थ्य को लेकर आयुर्वेद की अपनी परिभाषा है, जिसमें एक स्वस्थ दिलोदिमाग का एक महत्त्वपूर्ण रोल है. एक समग्र विज्ञान के रूप में, आयुर्वेद मन, शरीर और आत्मा और इन्द्रियों और उनकी कार्यप्रणाली के बीच एक पारस्परिक संबंध की पड़ताल करता है. ये मानसिक सेहत में निम्न तरीकों से सुधार की दिशा में काम करता हैः

मनुष्य मन यानी मानस, आत्मा, शरीर और इन्द्रियों का एक संगठन है. इसमें शामिल हैं मनोवैज्ञानिक इन्द्रियां जिन्हें ज्ञानेन्द्रियां कहते हैं, और शारीरिक अंग जिन्हें कर्मेन्द्रियां कहते हैं. इन प्राथमिक घटकों की पारस्पारिकता ही व्यक्ति के स्वास्थ्य का संचालन करती है.

मानस तीन क्रियात्मक गुणो से बनता हैः सत्व, रज और तम. इन गुणों स व्यक्ति का तत्व यानी चरित्र परिभाषित होता है. सत्व गुण तमाम अच्छी चीज़ों का समुच्चय है- आत्म नियंत्रण, ज्ञान, जीवन में सही और गलत की समझ. रज गुण गतिशील होते हैं, हिंसा, ईर्ष्या, प्राधिकार, इच्छा और दुविधा इसमें आते हैं. तम गुण की विशेषताएं हैं सुस्ती, निष्क्रियता, नींद और बेसुधी. इन गुणों में रज और तम को मनोदशा के रूप में रेखांकित किया जाता है. सत्व, रज और तम मानसिक बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं जिन्हें मनोविकार कहा जाता है।

इन ज्योतिषीय उपायों से रखें खुद को और अपने परिवार को बीमारियों से दूर--

1. पीपल के पेड़ पर रविवार को छोड़कर हर दिन जल चढ़ाएं। साथ ही इस वृक्ष की परिक्रमा करें। पुरुष सात बार परिक्रमा करें किन्तु महिलाएं परिक्रमा न करें।

2. हर पूर्णिमा पर भोलेनाथ को जल चढ़ाएं।

3. अमावस्या को प्रात: मेहंदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। चौमुंहा दीपक बनाकर उसमें 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें।

4. महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्रोत का पाठ करने रोग-शोक दूर होते हैं।

5. पीड़ित को पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा करनी चाहिए। इससे बीमारी के आलावा, भूत बाधा भी दूर होते हैं साथ ही मानसिक शान्ति का भी अनुभव होता है।

6. पीने के पानी में थोड़ा गंगा जल मिलाकर पीने से भी रोगी को शीघ्र लाभ मिलता है।

7. प्रत्येक मंगलवार को बजरंबली को सिन्दूर चढ़ाएं और बजरंबली से जल्द ही स्वस्थ होने की प्रार्थना करें। साथ ही वह सिन्दूर रोगी भी लगाए।

8. शुक्ल पक्ष को सोमवार के दिन सात जटा वाले नारियल लेकर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए नदी में प्रवाहित करें। इससे रोग अौर दरिद्रता दोनों ही दूर हो जाएंगे।

9. तकिए के नीचे सहदेई अैर पीपल की जड़ रखें, इससे लम्बे समय से चली आ रही बीमारी से छुटकारा मिल जाएगा।

10. दान पुण्य करने से भी बहुत लाभ होता है।

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