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आज बना " भोम प्रदोष" का सुखद संयोग,पुत्र फल की होती है प्राप्ति:ज्‍योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री


प्रिय मित्रों/पाठकों, आज 04 दिसम्बर 2018 (मंगलवार) को भौम प्रदोष का शुभ और सुखद संयोग बना हें। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि आज मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि और मंगलवार का दिन है, लेकिन द्वादशी तिथि आज दोपहर 12 बजकर 20 मिनट तक रहेगी, उसके बाद त्रयोदशी तिथि लग जायेगी और हर माह के कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत किया जाता है। अतः आज प्रदोष व्रत किया जायेगा। 04 दिसम्बर मंगलवार को भौम प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्षीय) का समय 17:19 से 20:04 तक रहेगा।



भौम त्रयोदशी का व्रत भगवान शंकर को समर्पित है। त्रयोदशी का व्रत शाम के समय रखा जाता है इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार को यदि त्रयोदशी हो तो उसे सोम प्रदोष कहा जाता है और यदि मंगलवार को हो तो उसे भौम प्रदोष कहा जाता है। यह कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों में किया जाता है। चूंकि यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है इसलिए इस दिन उन्हीं की पूजा और अर्चना की जाती है।

ग्रहों के सेनापति मंगल ग्रह का ही एक अन्य नाम भौम है। यह व्रत हर तरह के कर्ज से छुटकारा  दिलाता है।

हमें अपने दैनिक और व्यावहारिक जीवन में कई बार अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए  धन रुपयों-पैसों का कर्ज लेना आवश्यक हो जाता है। तब आदमी कर्ज/ऋण तो ले लेता है,  लेकिन उसे चुकाने में उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में कर्ज  संबंधी परेशानी दूर करने के लिए भौम प्रदोष व्रत लाभदायी सिद्ध होता है। आज का दिन ऋण मुक्ति के लिये श्रेष्ठ है। ऋण मुक्ति के अलावा आज के दिन कुछ विशेष उपाय करके आप मंगल से जुड़ी अन्य परेशानियों से भी छुटकारा पा सकते हैं।

पुत्र फल की होती है प्राप्ति--
शिव भक्तों में भौम प्रदोष व्रत का काफी महत्व है। मान्यता है कि इस व्रत के करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसकी दरिद्रता का नाश होता है। इस व्रत को करने से हजारों यज्ञों के फलों के बराबर इस व्रत का फल मिलता है। वह सांसारिक जीवन में निरोगी व स्वस्थ बना रहता है। इस व्रत को करने से आपकी सभी मनोकामना पूरी होती है। शिवजी की कृपा प्राप्त करने और पुत्र प्राप्ति की कामना से इस व्रत को किया जाता है।

करें इस मंत्र का जप--
इस दिन ब्रह्मवेला में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर सबसे पहले ‘अहमद्य महादेवस्य कृपाप्राप्त्यै सोमप्रदोषव्रतं करिष्ये’ यह कहकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और फिर शिवजी की पूजा अर्चना करके सारा दिन उपवास रखना चाहिए। फिर शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव को बेल पत्र, पुष्प, धूप-दीप, भोग चढ़ाने के बाद शिव मंत्र का जप करना चाहिए।

करें हनुमान चालिसा का पाठ--
मान्यता है कि शाम के समय एक बार फिर से स्नान करके उत्तर की ओर मुख करके महादेव की अर्चना और हनुमान चालिसा का पाठ करना भी लाभप्रद रहता है। इस व्रत को करने से मंगल का अशुभ प्रभाव दूर रहता है। इसके बाद गरीब और ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देने से लाभ होता है। इसके बाद अन्न ग्रहण करना चाहिए।

जानिए भौम प्रदोष के व्रत की विधि ---
ज्‍योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं क‍ि इस दिन सुबह उठकर स्नान इत्यादि से निवित्र होकर शिव पूजा प्रारंभ कर देना चाहिए। पूजा स्थल को गंगा जल से धुलकर पहले पवित्र कर लें। पूजा स्थल पर ही एक मंडप बना लें और पांच रंगों से रंगोली बनाकर एक दीपक जला दें। कुश का आसन हो तो सबसे अच्छा है। पूर्व या उत्तर पूर्व दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाना चाहिए। भगवान शिव का पार्थिव बनाकर रुद्राभिषेक या जलाभिषेक करें। व्रत के दौरान फलाहार रहना है।



इस व्रत का सबसे बड़ा लाभ संतान की प्राप्ति और संतान की उन्नति है। इस व्रत से दैहिक,दैविक और भौतिक तापों का नाश होता है। वहीं भौम प्रदोष व्रत को सेहत भी जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस द‍िन श‍िव जी की सच्‍चे मन से पूजा करने से स्‍वास्‍थ्‍य ठीक रहता है और बड़ी बीमार‍ियां दूर रहती हैं।
पूरा दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करें।
भौम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है।
जातक संध्या काल को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें।

जानिए कैसे करें पूजा --

प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत का काफी महत्व बढ़ जाता है. साथ ही मोक्ष प्राप्ति और दरिद्रता के नाश के लिए भी ये व्रत रखा जाता है. इस व्रत के दिन सुबह जल्दी उठ कर स्नान आदि कर लेना चाहिए. साथ ही इस दिन 'अहमद्य महादेवस्य कृपाप्राप्त्यै सोमप्रदोषव्रतं करिष्ये’ कह कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद शिव भगवान की पूजा करें. इस दिन उपवास रखना चाहिए. वहीं शिव मंदिर में भगवान शिव को बेल पत्र, पुष्प, भोग आदि भी चढ़ाने चाहिए और शिव मंत्र का जप करना चाहिए।

कैसे करें व्रत का पारण -
इसका पारण अगले दिन करिए। शिव मंदिर जाइए। आरती करना बहुत आवश्यक है। इस दिन अन्न और वस्त्र का दान आवश्यक है।
11 या 26 प्रदोष के बाद किसी त्रयोदशी को ही पारण करना चाहिए। पारण के दिन कुश के आसन पे बैठकर भगवान शिव का रुद्राभिषेक कराएं। हवन करें। अन्न और वस्त्र का दान करें। इस रात्रि को जागरण करना भी फलदायी रहता है। भगवान शिव की भव्य आरती करें और जहां तक हो सके सत्य बोलने का प्रयास करें।

कैसे उठाएं लाभ भौम प्रदोष का --

 इस व्रत-पूजन से मंगल ग्रह की शांति भी हो जाती है।

मंगल ग्रह की शांति के लिए इस दिन व्रत रखकर शाम के समय हनुमान और भोलेनाथ  की पूजा की जाती है।

इस दिन हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ करके बजरंग बली को बूंदी के लड्डू  अर्पित करके उसके बाद व्रतधारी को भोजन करना चाहिए।

भौम प्रदोष का व्रत बहुत प्रभावकारी माना गया है। जहां एक ओर भगवान शिव व्रतधारी  के सभी दुःखों का अंत करते हैं, वहीं मंगल देवता अपने भक्त की हर तरह से मदद करके  उसे उस बुरी स्थिति से बाहर निकालने में उसकी मदद करते हैं।

हर व्यक्ति ऋण/ कर्ज से मुक्ति के लिए हर तरह की कोशिश करता है किंतु कर्ज की यह  स्थिति व्यक्ति को तनाव से बाहर नहीं आने देती। इस स्थिति से निपटने के लिए मंगलवार  का भौम प्रदोष व्रत बहुत सहायक सिद्ध होता है।
इस दिन मंगल देव के 21 या 108 नामों का पाठ करने से ऋण से जातक को जल्दी  छुटकारा मिल जाता है।

यह हें भौम प्रदोष की कथा--

एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। उसका एक ही पुत्र था। वृद्धा की हनुमानजी पर गहरी आस्था थी। वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखकर हनुमानजी की आराधना करती  थी। एक बार हनुमानजी ने उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने की सोची।

हनुमानजी साधु का वेश धारण कर वृद्धा के घर गए और पुकारने लगे- है कोई हनुमान भक्त, जो हमारी इच्छा पूर्ण करे?
पुकार सुन वृद्धा बाहर आई और बोली- आज्ञा महाराज।

हनुमान (वेशधारी साधु)  बोले- मैं भूखा हूं, भोजन करूंगा, तू थोड़ी जमीन लीप दे।

वृद्धा दुविधा में पड़ गई। अंतत: हाथ जोड़कर बोली- महाराज। लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप कोई दूसरी आज्ञा दें, मैं अवश्य पूर्ण करूंगी।

साधु ने तीन बार प्रतिज्ञा कराने के बाद कहा- तू अपने बेटे को बुला। मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा।

यह सुनकर वृद्धा घबरा गई, परंतु वह प्रतिज्ञाबद्ध थी। उसने अपने पुत्र को बुलाकर साधु के सुपुर्द कर दिया।

वेशधारी साधु हनुमानजी ने वृद्धा के हाथों से ही उसके पुत्र को पेट के बल लिटवाया और उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर दु:खी मन से वृद्धा अपने घर में चली गई।

इधर भोजन बनाकर साधु ने वृद्धा को बुलाकर कहा- तुम अपने पुत्र को पुकारो ताकि वह भी आकर भोग लगा ले।

इस पर वृद्धा बोली- उसका नाम लेकर मुझे और कष्ट न पहुंचाओ।

लेकिन जब साधु महाराज नहीं माने तो वृद्धा ने अपने पुत्र को आवाज लगाई। अपने पुत्र को जीवित देख वृद्धा को बहुत आश्चर्य हुआ और वह साधु के चरणों में गिर पड़ी।

हनुमानजी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और वृद्धा को भक्ति का आशीर्वाद दिया

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