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क्या देरी (विलम्ब) से कार्य होने के कारण ग्रह होते है?: ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

क्या देरी (विलम्ब) से कार्य होने के कारण ग्रह होते है??
आइए जाने और समझें देरी के ज्योतिषीय कारण...

प्रिय मित्रों/पाठकों, मनुष्य जीवन मे विलम्ब से होने वाले एवं उचित समय के उपरान्त होने वाले कार्य अक्सर अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं जिससे मन में विषाद और निराशा व्याप्त होती है। 

मनुष्य के जीवनकाल में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत यदि प्रत्येक कार्य उचित समय पर हों तो ऐसे व्यक्ति का जीवन सफ़ल व सानन्द माना जाता है किन्तु कई बार व्यक्ति की जन्मपत्रिका में कुछ ऐसी ग्रहस्थितियों का निर्माण हो जाता है जिनसे उसका प्रत्येक कार्य विलम्ब एवं उचित समय व्यतीत हो जाने के उपरान्त होता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष एक सत्य है जो पहले से निर्धारित है और सत्य कभी बदल नहीं सकता। अगर आप उसे स्वीकार नहीं करते, तो उसे नकारा भी नहीं जा सकता..वैसे ही इसके माध्यम से जो जानकारियां हम प्राप्त करते हैं वे भी सत्य है जिसे बदला नहीं जा सकता और न ही नकारा जा सकता है। लेकिन उनके प्रभाव को कम या ज्यादा करके काफी हद तक बचा अवश्य जा सकता है। उदाहरण के लिए बारिश को रोका नहीं जा सकता परन्तु छाता लगाकर या अन्य उपाय करके उससे बचा ज़रूर जा सकता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष मनुष्य की सहनशक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ाता है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने का साहस जगाता है।
ज्योतिष में विश्वास करना या न करना आपकी उसके प्रति धारणा पर आधारित है,परन्तु हमारी धारणाओं से ऊपर भी एक सत्य है जो हमारी जन्मकुंडली के अनुसार जीवन में प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित होता है। ज्योतिष के माध्यम से जीवन में होने वाली उन सकारात्मक और नकारात्मक घटनाओं को जाना जा सकता है जो पहले से तय है।



पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते है कि कई दफ़ा लोगों को लगता है कि ज्योतिष के माध्यम से हर समस्या का समाधान पाया जा सकता है, तो कुछ लोग यह भी समझते हैं कि यह पूर्ण रूप से अन्धविश्वास है। लेकिन ये दोनों ही सही नहीं है।

दरअसल ज्योतिष पूर्ण रूप से विज्ञान है...
और यदि सही तरीके से इसका पालन किया जाए तो बिलकुल सटीक जानकारी का माध्यम भी ...
फिर चाहे वो जानकारी आपके जीवन की विभिन्न घटनाओं की हो या फिर भौगोलिक परिवर्तनों की....
यही कारण है कि ब्रह्माण्ड में होने वाली भौगोलिक घटनाओं का महत्त्व और सटीक वर्णन ज्योतिष में मिलता है।

अक्सर मेरे पास कई जातको की समस्याएं आती रहती है जिनमे अक्सर धन समस्या भी होती है, जब उनकी जन्म पत्रिका का अवलोकन किया जाता है, तब जितनी समस्या उस जातक को जीवन मे आ रही होती उतनी उस कुंडली मे दिखाई नही पढ़ती । फिर क्या कारण होता है जो वो परेशान हो रहा है ? उसके हर कार्य मे विघ्न और धन प्राप्ति मे रुकावट आ रही है। आप या हम जिस घर मे रहते है वँहा वास्तु अनुसार कुछ नकारात्मक वायु रहती है, जो सकारात्मक वायु के प्रवेश को रोक देती है।

चूंकि जीवन, मृत्यु और जीवन की घटनाएं विधाता द्वारा पहले से निर्धारित हैं, अतः ज्योतिष विधा के माध्यम से उसे पढ़ा अवश्य जा सकता है और उनके प्रभाव को कम या ज्यादा कर जीवन में होने वाली हानि या नुकसान को कम किया जा सकता है या उससे बचा जा सकता है।

हमारे हिंदू धर्मशाास्त्रों में बहुत सारे ऐसे नियम बताए गए हैं जिनका रोजमर्रा के जीवन में बहुत महत्व है। रात के लिए हमारे शास्त्रों में कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं जिनका पालन स्त्री हो या पुरुष सभी को करना चाहिए। इन नियमों का पालन न करने वालों के घर में आर्थिक एवं मानसिक परेशानी बनी रहती है। यह उपाय अगर अपने ईष्ट का स्मरण कर भक्ति भाव से पूजन और नियमितता से किए जाएं तो अवश्य ही धन संकट का समाधान होता है और हां हमारे वेदों और पुराणों में भी कर्म की आवश्यकता के बारे में बताया गया है तो धर्म के साथ कर्म अवश्य करें। सफलता जरूर मिलेगी। ज्योतिष शास्त्र में सभी राशियों में ग्रह-नक्षत्र की अलग-अलग स्थिति होती है। ज्योतिष शास्त्र में हर राशि के लिए समस्याओं से बचने के लिए कुछ खास उपाय बताए गए हैं।

आइए समझने का प्रयास करते हैं कि किसी जातक की जन्म पत्रिका में वे कौन सी ऐसी ग्रहस्थितियां व ग्रह होते हैं जो कार्यों में देरी (विलम्ब) के लिए उत्तरदायी होते हैं।

जातक के कार्यों में विलम्ब के लिए केवल एक ही ग्रह सर्वाधिक उत्तरदायी होता है, वह है- शनि। शनि को "शनैश्चर" भी कहा जाता है। "शनैश्चर" अर्थात् शनै: शनै: चलने वाला, धीमे चलने वाला।

जब शनि की दृष्टि या प्रभाव किसी भाव पर पड़ता है तो उस भाव से सम्बन्धित कार्यों में विलम्ब होता है। उदाहरणार्थ यदि शनि की दृष्टि सप्तम भाव या सप्तमेश पर हो तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है।

इसी प्रकार यदि शनि की दृष्टि या प्रभाव दशम भाव पर पड़ता है तो जातक को आजीविका अत्यन्त विलम्ब से प्राप्त होती है।

शनि जब पंचम भाव, पंचमेश व शुक्र पर अपना दृष्टि प्रभाव डालते हैं तो जातक को सन्तान सुख देर से प्राप्त होता है। ऐसे ही जब शनि का दुष्प्रभाव आय व धन भाव पड़ता है तब जातक को अपने परिश्रम का लाभ विलम्ब से प्राप्त होता है व धन संचय करने में सफ़ल नहीं हो पाता।
चतुर्थ भाव, चतुर्थेश व मंगल पर जब शनि की दृष्टि या प्रभाव होता है तब जातक को स्वयं का मकान एवं वाहन प्राप्त होने में विलम्ब होता है।

यदि जन्मपत्रिका में इन भावों व भावाधिपतियों पर शनि का दुष्प्रभाव हो तो शीघ्र शनि की वैदिक शान्ति कर कार्यों में होने वाले विलम्ब को समाप्त कर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

जानिए विवाह में देरी के ज्योतिषीय कारण---

जब जन्म कुंडली के सप्तम भाव में बुध और शुक्र दोनों हो तो विवाह की बातें होती रहती हैं, लेकिन विवाह काफी समय के बाद होता है।

जब कुण्डली के चौथा भाव या लग्न भाव में मंगल हो और सप्तम भाव में शनि हो तो व्यक्ति की रुचि शादी में नहीं होती है।

यदि जातक के सप्तम भाव में शनि और गुरु हो तो शादी देर होती है।

यदि चंद्र से सप्तम में गुरु हो तो शादी देर से होती है।

चंद्र की राशि कर्क से गुरु सप्तम हो तो विवाह में बाधाएं आती हैं।

जब कुण्डली के सप्तम भाव में त्रिक भाव का स्वामी हो, कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो तो विवाह में देरी होती है।

जब जन्म कुण्डली में सूर्य, मंगल या बुध लग्न या लग्न के स्वामी पर दृष्टि डालते हों और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो व्यक्ति में आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।

जब लग्न (प्रथम) भाव में, सप्तम भाव में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक न हो और चंद्रमा कमजोर हो तो विवाह में बाधाएं आती हैं।

यदि महिला की कुंडली में सप्तमेश या सप्तम भाव शनि से पीड़ित हो तो विवाह देर से होता है।

राहु की दशा में शादी हो या राहु सप्तम भाव को पीड़ित कर रहा हो तो शादी होकर टूट जाती है।

लक्ष्मी का एक स्वरूप अन्न भी है। इस रूपसे देवी लक्ष्मी शरीर का पोषण करती है। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा होती है। इसलिए जब भोजन सामने आए तब उसे आदर पूर्वक प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। भोजन करते समय पूरा भोजन करने के बाद उठना चाहिए। एक बार उठ जाने के बाद फिर से वही भोजन करना जूठन खाना कहलाता है जिससे लक्ष्मी नाराज होती हैं। भोजन करते समय पैर भोजन की ओर नहीं हो इसका ध्यान रखें। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कुछ लोग क्रोध आने पर भोजन की थाली फेंक देते हैं, इस तरह की आदत धन वैभव एवं पारिवारिक सुख के लिए नुकसान दायक होता है।

जानिए सोने से पहले बिस्तर को अच्छी तरह से क्यों साफ कर लेना चाहिए

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शयन/निद्रा/सोना सिर्फ आपके आराम के लिए और शरीर की थकान मिटाने के लिए नहीं है। शास्त्रों में शयन को योग क्रिया कहा गया है जो व्यक्ति के मस्तिष्क और बौद्धिक क्षमता को प्रभावित करता है। इससे आपकी आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। जो व्यक्ति धन और देवी लक्ष्मी की कृपा चाहते हैं उन्हें सोने से पहले बिस्तर को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। बेहतर तरीका यह है कि सोने से पहले बिछावन पर साफ चादर बिछा लें। गंदे और अपवित्र स्थान पर शयन करने से नकारात्मक उर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। रात को जिस बिस्तर पर आप सोते हैं उस पर नई बैडशीट बिछा कर सोएं सारे दिन की बिछी बैडशीट पर न सोएं क्योंकि उस पर नकारात्मक ऊर्जा अपना वास बना लेती है और दिन भर की धूल और मिट्टी से नींद में भी विध्न पड़ता है। इससे मन में नकारात्मक विचार आते हैं, शरीर में उर्जा की कमी महसूस होती है।
घर का ईशान कोण साफ और स्वच्छ रखें। यहां भगवान लक्ष्मी-नारायण का चित्र अथवा स्वरूप स्थापित कर सकते हैं। इससे आर्थिक उन्नति होती है।

आर्थिक परेशानी निवारण हेतु यह उपाय शनिवार या मंगलवार के दिन करना चाहिए। इनमें किसी भी दिन सुबह स्नान के बाद किसी शनि या हनुमान मंदिर से पीपल के 11 पत्ते तोड़कर घर लाएं। पत्ता कहीं से भी टूटा या खराब नहीं होना चाहिए। अब इन पत्तों को गंगाजल से अच्छी प्रकार साफ करें। सभी पत्तों पर अनामिका अंगुली से लाल चंदन का प्रयोग करते हुए 'राम' नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बना लें। घर के पूजाघर में हनुमान जी के सामने इस माला को रखकर हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद 108 बार 'राम' नाम का जाप करें। पूजा समाप्त होने के बाद किसी हनुमान मंदिर में जाकर उन्हें सिंदूर तथा चमेली का फूल अर्पित करते हुए इस माला को उन्हें पहनाएं। ऐसा लगातार 7 मंगलवार करने से विशेष रूप से आपकी धन संबंधी समस्या बहुत जल्दी दूर होगी और आर्थिक संपन्नता आएगी है।

रात को कमरे में अंधेरा करके न सोएं हल्की रोशनी अवश्य रखें

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अपने रसोईघर (किचन) में कोई भी दवा न रखें इससे रोग समाप्त नहीं होता अथवा आए दिन स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं। रात को जल्दी सोना चाहिए और सवेरे जल्दी उठना चाहिए। सुबह देर तक सोने से शरीर में रोग और शोक अपना बसेरा बना लेते हैं। जहां रोग और शोक होगा । वहां लक्ष्मी का बसेरा नहीं हो सकता। रात को कमरे में अंधेरा करके न सोएं हल्की रोशनी अवश्य रखें। इससे सकारात्मकता बनी रहती है। वॉशरुम और शौचालय के दरवाजों को बंद रखें।

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि आप 7 शनिवार तक लगातार शाम में किसी मंदिर स्थल पर या किसी भी पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल से मिट्टी का दीया जलाते हैं तो आर्थिक समस्या से छुटकारा मिल सकता है।

जिस स्थान पर घर का कीमती सामान रखें वहां प्रतिदिन सफाई करें। उस स्थान पर गंदगी जमा रहेगी तो धन की हानि होगी।

ज्योतिष की दृष्टि से ह्रदय रोग को प्रभावित करने वाले कारण-- 

कुंडली में चतुर्थ स्थान ह्रदय का स्थान है ।
पंचम भाव /पंचमेश  मनोस्थति को दर्शाता है ।
छठा भाव रोग का कारक है ।
सूर्य ऊर्जा का प्रतीक है ।
बुद्ध स्नायु - मंडल  पर प्रभाव रखता है ।
चन्द्रमा रक्त और मन का प्रतीक है ।
मंगल रक्ताणु और रक्त-परिभ्रमण पर प्रभाव रखता है ।

ह्रदय रोग सम्बन्धी योग के कारण--

कुंडली में पंचम भाव में पाप ग्रह बैठा हो और पंचम भाव पाप ग्रहों से घिरा हुआ हो ।
पंचम भाव का स्वामी पाप ग्रह के साथ बैठा हो अथवा पाप गृह से देखा जाता है ।
पंचम भाव का स्वामी नीच राशि अथवा शत्रु राशि में स्थित हो या  अष्ठम  भाव में बैठा हो ।
यदि पंचमेश बारहवे घर में हो या बारहवे भाव के स्वामी के साथ 6 /8 /12  स्थान पर हो तो ह्रदय रोग होता है । 
सूर्य छठे भाव का स्वामी हो कर चतुर्थ भाव में पाप ग्रहों के साथ बैठा हो ।
चतुर्थ भाव में मंगल के साथ शनि  या गुरु स्थित हो और पाप ग्रहों द्वारा दृष्ट हो ।
सूर्य और शनि चतुर्थ भाव में साथ बैठे हों ।
सूर्य कुम्भ राशि में बैठा हो ।
सूर्य वृश्चिक राशि में बैठा हो और पाप ग्रहों से प्रभावित हो ।
सूर्य, मंगल ,गुरु चतुर्थ स्थान पर स्थित हो ।
चतुर्थ स्थान  में शनि हो तथा सूर्य एवं छठे भाव के स्वामी पाप ग्रहों के साथ हो ।
चतुर्थ भाव में केतु और मंगल स्थित हों ।
यदि शनि , मंगल और  वृहस्पति चतुर्थ भाव में हो तो जातक ह्रदय रोगी होता है ।
यदि तृतीयेश , राहु या केतु के साथ हो जातक ह्रदय रोग के कारण  मूर्च्छा में जाता रहता है ।


ह्रदय-शूल होने के कारण--

चतुर्थ भाव,चतुर्थ भाव के स्वामी और सूर्य की स्थिति से ह्रदय शूल का ज्ञान होता है ।
चतुर्थ भाव में राहु स्थित हो और लग्नेश निर्बल और पाप ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो ।
द्वादश भाव में राहु हो तो गैस वायु से ह्रदय प्रदेश में दर्द होता है ।
पाप ग्रहों के साथ सूर्य वृश्चिक राशि में हों ।
यदि पंचमेश और सप्तमेश छठे स्थान पर हो तथा पंचम अथवा सप्तम स्थान पर पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो जातक ह्रदय-शूल से पीड़ित होता है ।

ह्रदय कम्पन

घबराहट और बेचैनी से ह्रदय कम्पन होता है ।  जब गुरु या शनि षष्ठेश होकर चतुर्थ स्थान पर बैठें  हों  और पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो यह रोग होता  है ।

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