मुंबई लोकल ट्रेन में महिलाओं के लिए विशेष डिब्बे किसलिए हैं ?

करन निम्बार्क, मुंबई:


सुबह को विरार से चर्चगेट जानेवाली ट्रेन में कितनी भीड़ हो सकती है इसका अनुमान भारतीय रेलवे या भारत सरकार को शायद ही हो । पुरूषों के डिब्बों में यात्रा करना किसी युद्ध से कम नहीं है, लेकिन पुरूष किसी तरह हर दिन अपने गंतव्य तक पहुँच ही जाते हैं । जहाँ हाथ हिलाने तक की जगह ना हो वहाँ सहयात्री से कई बार कहासुनी होना स्वाभाविक ही है । ऐसे में कोई इसे दुश्मनी में बदल ले और बात आगे बढाना चाहे, बदला लेना चाहे तो यह कहाँ तक उचित है ? अब आते हैं मुद्दे पर,

हमारे देश में, मुंबई में, सभी के लिए महिला सुरक्षा व उनका सम्मान सर्वोपरि है, परंतु क्या महिला सम्मान के नाम पर किसी भी पुरुष के साथ झगड़ना, अकारण मारना, मारने की धमकी देना अथवा फँसाना कहाँ तक उचित है अक्सर ट्रेन में हर दिन यात्रा करनेवाले समूह पर, कभी-कभार यात्रा करनेवाले यात्रियों द्वारा आरोप लगाए जाते हैं लेकिन क्या यह भारत सरकार को, रेल मंत्रालय को और रेलवे विभाग को पता है कि यही समूह एकदूजे की और अन्य यात्रियों की सहायता भी करता है । 

यही समूह ट्रेन के द्वार पर लटकने वालों का सामान अंदर रखता है बल्कि कभी-कभी बैठने की जगह के नीचे भी रखता है ताकि द्वार पर लटकने वाले सुरक्षित खड़े रह सकें । यह समूह है क्या ? यह कोई राजनैतिक संगठन नहीं है, ना ही ऐसी किसी विचारधारा अथवा प्रयोजन से बना है, बल्कि आजतक कोई समूह बनाया भी नहीं गया है । वास्तव में प्रतिदिन एक ही ट्रेन, एक ही डिब्बा, एक ही समय पर एक ही मार्ग पर जानेवाले यात्रियों में एक मित्रता हो ही जाती है । वे एक परिवार की तरह हो ही जाते हैं और इसलिए वे एकदूजे का ध्यान भी रखते हैं । अब ऐसे में भी यदि सरकार को अथवा किसी को भी आपत्ति है तब तो इस देश को भगवान ही बचाए । 

जहाँ हमारे देश के नेता हर दिन लोगों में धर्म-जाति के नाम पर एकदूजे के मन में भेदभाव पैदा करते आए हैं, लड़वाते भी आए हैं किन्तु एकमात्र यह यात्रा, यह ट्रेन ही है जिसके कारण विभिन्न जाति-धर्म के लोग निस्वार्थ भाव से मिलजुलकर रहते हैं और प्रतिदिन यात्रा करते हैं ।   


अब ऐसे भीड़ से खचाखच भरे डिब्बे में जहाँ साँस लेना भी दूभर हो वही कोई महिला अपने प्रेमी या मित्र के साथ आती है ताकि घर पहुँचने तक उसके साथ बात हो सके । प्रश्न यह है कि अन्य यात्री चाहकर भी कितना सहयोग करेंगे ? आज सुबह भी विरार से एक प्रेमी युगल चढ़ा और वसई स्थानक आने तक ट्रेन का डिब्बा खचाखच भर ही गया । यदि वह लड़की चाहती और समझदारी से काम लेती तो विरार से ही उसी समय लगनेवाली महिला विशेष ट्रेन में चढ़ सकती थी या उसी ट्रेन के महिला डिब्बे में जा सकती थी क्योंकि तब महिला डिब्बे में इतनी भीड़ भी नहीं थी । 

अब आगे आनेवाले हर रेलवे स्थानक पर डिब्बे में भीड़ बढ़ना स्वाभाविक ही था । ऐसे में किसी अन्य पुरुष यात्री का धक्का लगना या छूँ जाना स्वाभाविक घटना है । लेकिन इस बात पर झगड़ना और मारना या मारने की धमकी देना कहाँ तक उचित है ? आजकल के तनाव भरे वातावरण में जहाँ आम आदमी कई मानसिक बोझ के साथ चलता है । आजकल तो युवाओं में धैर्य की कमी और गुस्सा  बहुत है, तो ट्रेन में कभी ना कभी, किसी ना किसी के साथ ऐसी घटनाएँ हिंसक रूप भी ले सकती है या किसी न किसी के साथ ऐसा होगा ही । अब यह महिलाओं को ही समझना होगा और कम से कम सुबह और शाम को मुंबई लोकल ट्रेन में महिलाओं के डिब्बे में ही यात्रा करनी चाहिए ऐसी पहल करनी ही होगी । 

एक निवेदन पुरुषों से भी है कि सुबह और शाम के समय अपनी प्रेमिका को अथवा मित्र को जहाँ तक संभव हो सके महिला डिब्बे में ही चढने दे । बातें करने के लिए उद्यान है, कैफ़े हैं और कुछ नहीं तो व्हाट्सअप है जिस पर आप बिना किसी का धक्का लगे जी भर कर बातें कर सकते हों । अन्यथा किसी दिन अकारण झगड़े या ऐसी किसी अनहोनी को नहीं टाल पाएँगे ।

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