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राजनीति में किसी भी व्यक्ति की सेवा भाव से शिरकत को मैं अच्छा मानता हूं:रमन मलिक


राजनीतिक परिपेक्ष में एक कार्यकर्ता की यात्रा उसके कर्मों के अनुसार शुरू होती है और जिस प्रकार वह अपने कर्म  करता या करती है उसी प्रकार वह अपने दायित्व में पदोन्नति का लाभ प्राप्त करता है।

मैं कुछ मूलभूत विषयों को आपके समक्ष रखना चाहता हूं सबसे पहले यह बोलना उचित नहीं होगा की प्रियंका गांधी राजनीतिक क्षेत्र में कूद गई है जिस प्रकार इस परिवार ने पूधारी के नाम पर अपना जीवन का आता है उसी तरह आज भी यह उधारी के नाम को ही चलाना चाहते हैं वह प्रियंका गांधी नहीं अपितु प्रियंका वाड्रा और वाड्रा वह नाम है जिसको इस्तेमाल करना गांधी परिवार के लिए भारी पड़ेगा।

मुझको यह स्मरण होता है कि आज से कुछ ढाई 3 साल पहले एक टेलिविजन चैनल को दिए गए साक्षात्कार में कांग्रेस के युवराज और वर्तमान में अध्यक्ष राहुल गांधी ने महिला सशक्तिकरण का विषय कम से कम डेढ़ सौ बारी उठाया था लेकिन ऐसा क्यों है कि अपने घर में अपनी बहन को सशक्त करने के लिए उन्हें इतना लंबा समय लग गया?

अगर उनका तर्क मान भी लें की प्रियंका गांधी वाड्रा जी की अपनी मर्जी कि वह कब राजनीति क्षेत्र में आए लेकिन यह सवाल तो यक्ष प्रश्न है की मात्र गांधी परिवार से नाते के कारण उन्हें एक कार्यकर्ता के भक्ति श्रम की सीढ़ियां चढ़ते हुए सीधे महामंत्री बनाया गया और एक क्षेत्र का प्रभार भी दिया गया यह तो इस तरह की तुलना है की एक परिवारिक व्यवसाय में सभी बच्चों का अधिकार है और जो बच्चा उस व्यवसाय को चला रहा है उसने अपने भाई या बहन को उस कंपनी के एक हिस्से को संभालने के लिए बिठा दिया।

2014 के लोकसभा चुनावों में जब प्रियंका जी अमेठी और रायबरेली की सीटों को संभाल रही थी तो हमने उनकी कार्यकुशलता देखी और कार्यकुशलता का कितना फर्क पड़ा यह भी देखने को मिला की बहुत मुश्किल से रेंगते रेंगते राहुल गांधी की अमेठी सीट कांग्रेस के पारले में गिरी इस बार का चुनाव शायद राहुल गांधी स्मृति ईरानी जी से हार भी जाए क्योंकि जिस सीट को कथित तौर पर प्रियंका गांधी पिछले 15 साल से संभाल रही हैं उसमें विकास का क्या हाल है यह दिखता है और वही क्षेत्र की सेवा करने में वचनबद्ध स्मृति ईरानी ने कितना परिवर्तन लाया यह भी दिखता है।

विचार करते हुए एक प्रश्न और सामने आता है और वह है कि क्या 2019 में मिलने वाली बड़ी हार से राहुल को बचाने के लिए प्रियंका की बलि दी जा रही है क्योंकि यूपी में मिलने वाली करारी हार को प्रियंका और ज्योतिरादित्य के सर मर दिया जाएगा और राहुल को बचा लिया जाए!  और या फिर नेशनल हेराल्ड के केस में अगर राहुल गांधी को सजा हो जाती है तो उस परिस्थिति में गांधी परिवार का कोई ना कोई व्यक्ति सिस्टम में होना चाहिए जिसको उस समय अध्यक्ष बनाया जाए और परिवारवाद का दाग ना लगे और बोला जा सके कि यह तो पहले से ही पार्टी की सेवा में थे।

अंत में एक छोटा सा विचार और आता है की उन सभी कार्यकर्ता जिनका कुछ समय पहले निलंबन हुआ था कि उन्होंने प्रियंका जी के पोस्टर लगवाए थे आज उनको कांग्रेस के युवराज क्या कहेंगे?
लेकिन इन सारे विषयों से बड़ा यह विषय है कि बसपा और सपा या ममता बनर्जी राहुल गांधी जी जो कि कांग्रेस के अध्यक्ष हैं उन्हें अप्रासंगिक श्रेणी में रखती हैं,   क्या यह नियुक्ति अपने को उत्तर प्रदेश बिहार पश्चिमी बंगाल वह अन्य राज्यों में इन क्षेत्रीय दलों में प्रासंगिक हिस्सेदार बनने की कवायद है।

रमन मलिक ,प्रवक्ता हरियाणा भाजपा

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