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चिकित्सा क्षेत्र में सुधार की मांग को लेकर डॉ ओमशंकर का आमरण अनशन जारी

वाराणसी
बीएचयू के प्रसिद्द कार्डियोलॉजिस्ट डॉ ओम शंकर का आमरण अनशन दूसरे दिन भी जारी रहा।वे चिकिसा सुविधाओं में सुधार और काशी में बीएचयू से अलग ऐम्स की मांग कर रहे हैं।उनके समर्थन में वकील,महिलाएं तथा समाज के अलग अलग तबके के लोग आ खड़े हुए हैं। आज आमरण अनशन स्थल पर समाज के विभिन्न तबके के लोगों ने पहुंचकर समर्थन व्यक्त किया। विशेष बात यह है कि डॉक्टर ओम शंकर ने अनशन स्थल पर ही मरीजों को भी देखा। सोमवार को डॉक्टर ओम शंकर की ओपीडी रहती है ,लेकिन अनशन पर रहने की वजह से वे बीएचयू ओपीडी में नहीं गये। इसकी सूचना जब मरीजों को लगी तो वे अनशन स्थल पर ही पहुंच गए और डॉक्टर ने उन्हें निराश नहीं किया। अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बगैर मरीजों को दवाई लिखी ।

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी उनके आंदोलन को समर्थन दिया है। वाराणसी में केंद्र सरकार तथा प्रदेश सरकार के तमाम मंत्रियों, अधिकारियों की उपस्थिति प्रवासी भारतीय दिवस के मद्देनजर है।मुख्यमंत्री स्वयं शहर में मौजूद हैं। ऐसे में डॉक्टर ओम शंकर के आमरण अनशन तथा उनकी मांग की खबर उन तक अवश्य पहुंच गई है ।बावजूद इसके अभी तक किसी ने आमरण अनशन को समाप्त करने की ठोस पहल नहीं की है। यह बात अलग है कि पुलिस के व प्रशासन के छोटे अधिकारी जरूर मान मनोबल में जुटे हैं।अब मंगलवार को प्रधानमंत्री शहर में होंगे तथा बुधवार को राष्ट्रपति । डॉक्टर ओम शंकर के आमरण अनशन ने स्थानीय प्रशासन के माथे पर पसीना ला दिया है।डॉ ओम शंकर इससे पहले भी कई बार इस मुद्दे पर आंदोलन कर चुके है।

डॉ ओम शंकर की मांग है काशी में BHU से बाहर अलग एम्स की स्थापना, पूरे उत्तर प्रदेश में 6 नए एम्स की स्थापना तथा देश के हर नागरिक के लिए केंद्र तथा राज्यों के सालाना बजट को 10% करना। डॉ ओम श

एम्स क्या होता है?
डॉ ओम शंकर ने कहा कि एम्स भारतवर्ष में "कम खर्च पर बेहतर स्वास्थ सेवाएं" प्रदान करनेवाला अस्पतालों का समूह है जिसकी स्थापना सबसे पहले नई दिल्ली में 1956 में की गयी थी। इस पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर स्थापित सबसे पहले एम्स की अपार सफलता के बाद इसे पूरे देश में स्थापित करने की शुरुआत हुई जिसके तहत अबतक 22 एम्स घोषित किये जा चुके हैं जिनके निर्माण की प्रक्रिया अभी चल रही है। ऐसे अस्पतालों में कैंसर, किडनी,लिवर,तथा हृदय ट्रांसप्लांट जैसी विशिष्ट सुविधाएं निजी अस्पतालों की तुलना में बहुत कम दामों में उपलब्ध होती हैं।यहां मिलनेवाले गुणात्मक सुविधाओं की हीं वजह से उसमें इलाज करवाने देश के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति से लेकर अन्य गणमान्य जन भी अक्सर इलाज करवाने जाते रहते हैं!

काशी में एम्स क्यों?
डॉ ओम शंकर ने कहा कि काशी वो नगरी है जहां आज से हज़ारों वर्ष पूर्व भगवान धन्वंतरि जी द्वारा भगवान शंकर जी का इलाज कर चिकित्सा जगत की उत्पत्ति हुई थी। भगवान धन्वंतरि जी के हीं वंशज महर्षि देवदास ने इसी काशी में शल्य चिकित्सा की शुरुआत की तथा शल्य चिकित्सा का विश्व का पहला विश्वविद्यालय स्थापित की जहां आकर विदेशियों ने भी इस विधा में दक्षता हासिल की। जब पूरी दुनियां में चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी तब काशी में दुनियाभर से लोग अपने इलाज को आया करते थे।परंतु पिछले 5 सालों से यहां के सांसद-प्रधानमंत्री होने के बावजूद लोगों को अपने विशिष्ट इलाज के लिए अन्य शहरों में जाकर भटकना पड़ रहा है, जबकि 2014 चुनाव के पहले यहां एम्स बनवाने का वादा किया था और एम्स प्रधानमंत्री जी के अधीन आनेवाली प्रधानमंत्री स्वस्थ सुरक्षा योजना के हीं तहत बनवाये जाते हैं। 

पूरे देश के कुछ महानगरों को अगर छोड़ दिये जाए तो काशी में आनेवाले मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है जो न सिर्फ यहां रोज लगने वाले भीषण जाम बल्कि उससे जनित प्रदूषण की भी मुख्य वजह है।कई मरीज तो रोज यहां अस्पताल पहुंचने से पहले इसी जाम में फंसकर दम तोड़ देते हैं! जब गोरखपुर जैसे छोटे शहरों में मेडिकल कॉलेज, जापानी बुखार इलाज के लिए अलग से केंद्र होने के बाद एम्स बनवाये जा सकते, पटना में 3 सरकारी अस्पतालों के पहले से होने के बावजूद एम्स बनवाए जा सकते, जब सोनिया जी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में एम्स बनवाये जा सकते हैं तो फिर वर्तमान प्रधानमंत्री जी के संसदीय क्षेत्र तथा चिकित्सा जगत की जननी काशी को "जाम तथा प्रदूषण" से मुक्ति तथा करोड़ों लोगों की स्वास्थ सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए "भगवान धन्वंतरि जी का मंदिर वाला एम्स" क्यों नहीं बनवाना चाहिए? यह एम्स जब प्रधानमंत्री जी के सांसद रहते नहीं बनाया जा सकता तो कब बनाया जा सकेगा?

एम्स और एम्स जैसा में क्या अंतर है?
वे बताते हैं एम्स और एम्स जैसे अस्पतालों में वही फर्क होता है जो पीतल और सोने में होता है। "एम्स" स्वास्थ विघाग के अधीन होता है जिनके पास कम अस्पताल तथा जय बजट होता है जबकि "एम्स जैसा अस्पताल" UGC अथवा HRD मंत्रालयों के अधीन होता है जिनके पास सीमित संसाधन होते हैं जिसकी वजह से ऐसे अस्पतालों को मिलनेवाले सहयोग राशियों में आसमान-जमीन का अंतर होता है। वैसे भी BHU के अंदर न तो जगह है नए निर्माणों की, न हीं एम्स जैसे योग्य चिकित्सकों की टीम। आज भी बांझपन जैसे साधारण इलाज जब यहां संभव नहीं हो पाता है तो फिर अतिविशिष्ट इलाज की सुविधाओं की क्या बात की जाए? जिस एम्स जैसी सुविधाओं की आज बात की जा रही है उस कमिटी के अध्यक्ष हीं जब फिजी से फरार एक सजायाफ्ता मुजरिम हो, जहां उमंग फार्मेसी जैसे लूट का केंद्र स्थापित हो, जहां CT स्कैन/MRI जैसे 10 करोड़ रुपयों की लागत से सस्ते दामों में गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं के बदले निजी संस्थाओं द्वारा लूट का खेल चल रहा हो, जहां कई सारी जांचे बाहर से भी ज्यादा दामों पर हो रही हो क्या वहां कोई एम्स जैसा केंद्र संभव है?

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