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मेरे जीवन के ढेरों खुशी और गम के पल कादर खान साहब की बदौलत आज भी दिल के किसी कोने में जिंदा है:पण्डित दयानन्द शास्त्री

कादर खान साहब का यूं चले जाना..
बेहद अफसोसनाक खबर मेरे लिए..
बहुत मुश्किल है आपको भूल पाना, कादर खान साहब।



मेरे जीवन के ढेरों खुशी और गम के पल कादर खान साहब की बदौलत आज भी दिल के किसी कोने में जिंदा है।
वैसे तो में बहुत साधारण इंसान हूं किन्तु जीवन मे जो ओर जितना भी में लिख पाया, उसके प्रेरणा स्त्रोत स्वर्गीय कादर खान जी रहे है।

मेने जब से होंश संभाला (वर्ष 1986 के आसपास) तभी से उन्हें देखा, सुना और समझा।
उनकी लेखनी का कायल में तब भी था और उम्र भर रहूँगा।
फिल्मी डायलॉग हो, स्क्रिप्ट हो,पटकथा हो, स्क्रीन प्ले हो या इस विधा की कोई दूसरी श्रेणी, उनका कोई सानी मिलना मुश्किल है।
आपको याद हो ना हो उन्होंने जितनी बेहतरीन अदाकारी के नमूने पेश किए उनको मेरे लिए भूलना नामुमकिन होगा। किसी भी तरह का किरदार हो उन्होंने उनको दिए हर काम और किरदार में जान फूंक दी थी।
फ़िल्म--हम, स्वर्ग यहाँ नर्क यहां, बाप नम्बरी बेटा दस नम्बरी जैसी ढेरों फ़िल्म मेरी आँखों के सामने घूम रही हें।
उनके कारण आज गोविंदा, शक्तिकपुर, मिथुन चक्रवर्ती, अनुपम खैर ओर अमित जी भूमिका अविस्मरणीय हो चुकी है।उनकी टाइमिंग जबरजस्त थी जो कॉमेडी की जान होती है।

उस समय की सभी प्रसिद्ध फिल्मी मैगज़ीन में मेंरे लेख छपे थे--फिल्मसिटी, मायापुरी, चित्रलेखा आदि, वो सब कुछ आपकी प्रेरणा से सम्भव हुआ था।
ओर में मानता हूं कि आज में इतने लेख जो भी लिख ओर जितना भी लिख पाया, वो सब आपकी बदौलत ही हुआ।
आप ही मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे।

1980-90 के दशक में अधिकार फिल्मों के पोस्टर पर एक नाम ज़रूर हुआ करता था - कादर खान। उनके बिना जैसे कॉमर्शियल सिनेमा बनता ही नहीं था।  आज कादर खान के देहांत की खबरों ने यादों की स्मृतियों में गोते लगाने को मजबूर कर दिया। 

एक साक्षात्कार में अपने बारे में बताते हुए कादर खान कहते हैं – “मैं काबुल के पठान खानदान से हूं। मुझसे पहले मां के तीन बेटे हुए, लेकिन तीनों की मौत तकरीबन 8 साल की उम्र तक आते आते हो गई। उसके बाद चौथे नंबर पर मेरी पैदाइश हुई। मेरे जन्म के बाद मेरी मां ने मेरे वालिद से कहा कि ये सरजमीं मेरे बच्चों को रास नहीं आ रही है। मां ने मेरे वालिद को फोर्स किया और हमारा परिवार हिन्दुतान, मुंबई आ गया।

यहां आने के बाद परिवार के पास ज्यादा पैसे तो थे नहीं। इस वजह से मुंबई के स्लम कमाटीपुरा में परिवार को रहना पड़ा। ज़िंदगी काफी तंगहाली से गुजरी। इस तंगहाली का असर मेरे मां-बाप पर हुआ। उन दोनों के बीच तलाक हो गया।

यही मेरी ज़िंदगी का पहला झटका था। इसके बाद मैं अपनी मां के साथ उस स्लम एरिया में रहने लगा। ये देखकर मेरी मां के परिवार वालों ने उनकी दूसरी शादी करा दी। उन्हें लगा कि शादी के बाद मेरा और मां दोनों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं।
जब मैं बड़ा हुआ तो घर के हालात देखकर लगता कोई नौकरी कर लूं। अपने घर के पास लोगों को फैक्टरी में 3 रुपये दिन के हिसाब से काम करता देखता तो लगता यहीं कर लेता हूं। एक दिन नौकरी करने निकला, लेकिन पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और रोका। मैं पीछे मुड़ा तो देखा मेरी मां खड़ी थीं। उन्होंने मुझे कहा, आज अगर तुम फैक्टरी में काम करने गए तो हमेशा ये 3 रुपया वहीं का वहीं रहेगा। तुम घर की गरीबी हटाना चाहते हो तो बस एक रास्ता है कलम। मां की कही वो बात मेरे अंदर इस तरह घर कर गई कि मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। यहां तक कि सिविल इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन तक किया। कॉलेज में प्रोफेसर हो गया तो ड्रामा भी लिखने लगा। ड्रामा इस तरह मशहूर हुए कि दूसरे कॉलेज से लोग मेरे ऑटोग्राफ लेने आते।

मुझे शोहरत कम उम्र में ही मिल गई थी। सबसे पहला मेरा ड्रामा था लोकल ट्रेन। जो ऑल इंडिया ड्रामा कॉम्पटीशन में शामिल हुआ। उसे सारे अवॉर्ड, बेस्ट डायरेक्ट, एक्टर, राइटर मिले। इस ड्रामा के लिए मुझे 1500 रुपये ईनाम राशि मिली। सच कहूं तो जिंदगी में पहली बार 1500 रुपये एक साथ तब देखे थे। इसी प्ले को देखने बॉलीवुड के कई दिग्गज पहुंचे और मुझे फिल्म में काम मिल गया।" 

माँ ने कलम ताकत बटाई और बेटे ने एक से एक अनगिनत हिट फ़िल्में रच डालीं। ऐसे अभिनेता बहुत कम होते हैं जिन्हें किसी भी भूमिका में रख दो वो खरे ही उतरते हैं।

कादर खान भी वैसे ही चंद गिने चुने अभिनेताओं में से एक थे। भूमिका चाहे गंभीर हो या हास्य, मुख्य हो या छोटी, हीरो हो या विलेन हो, भोला हो या धूर्त हो, ईमानदार हो या बेईमान, डाकू हो या संत हो, हास्यास्पद हो या क्रूर हो, ग्रामीण हो या शहरी हो – कादर खान सबमें खरे थे।

 यह उनकी अभिनय, अनुभव और अनुभूति की ताकत थी वरना उस खुरदुरे चहरे वाले बेडौल इंसान को कोई अपनी फिल्म में क्यों रखता। अभिनय के सभी रंग में प्रवीण अभिनेता, पटकथा व संवाद लेखक कादर खान को वैसे तो सोशल मीडिया कई दफ़ा मार चुकी है अन्तः अब उनके देहावसान की सच्ची ख़बर आ ही गई।

मुफ़लिसी से प्रसिद्धि तक का सफर किसी के लिए आसान नहीं होता। निश्चित रूप से कादर खान के लिए भी नहीं था।

 बम्बई की एक बेहद ग़रीब बस्ती से रंगमंच और फिर सिनेमाई पर्दे तक के सफ़र को जानना समझना अपनेआप में एक संघर्ष की गाथा से परिचित होना है। माँ भेजती थी पढ़ने और बेटा कादर खान पहुंच जाता था क़ब्रिस्तान और दो कब्रों के बीच कुछ नाटकीय रचता।

 यह किस्सा कुछ यूं है - एक रात कादर खान रियाज कर रहे थे तभी वहां पर से गुजर रहे किसी ने पूछा कब्रिस्तान में क्या कर रहे हो? कादर बोले- “मैं दिन में जो भी अच्छा पढ़ता हूं रात में यहां आकर बोलता हूं। ऐसे मैं रियाज करता हूं।” वह शख्स अशरफ खान थे जो फिल्मों में काम करते थे। उन्होंने पूछा नाटक में काम करोगे?

कादर खान की ये बात किसी ने रोटी फेम एक्टर अशरफ खान को बताया कि एक लड़का कब्रिस्तान में बैठकर चिल्लाता है। अशरफ खान को एक नाटक की लिए ऐसे ही लड़के की तलाश थी। उन्होंने कादर खान को रोल दे दिया खान इसके बाद नाटकों में हिस्सा लेने लगे।

 एक नाटक में दिलीप कुमार की नजर कादर खान पर पड़ी थी। दिलीप कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म सगीना के लिए साइन कर लिया खन्ना ने कादर खान को फिल्म रोटी में बतौर डायलॉग राइटर ब्रेक दिया था। इसके बाद तो पता नहीं कितनी सुपरहिट फिल्मों के संवाद व पटकथा का लेखन किया। उनके लिखे कई संवाद आज भी फ़िल्म प्रेमियों की ज़ुबान पर हैं।

जीवन के अंतिम पहर में कदर खान को यह एहसास हो गया था कि फिल्मों के संवाद लिखने के क्रम में उन्होंने अपनी कुछ फिल्मों के माध्यम से हिंदी फिल्म उद्योग की ज़ुबान ख़राब की है। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा भी कि मुझे अगर मौक़ा मिले तो मैं बॉलीवुड की ज़बान ठीक करना चाहूंगा।

 कादर खान ने बॉम्बे यूनिवर्सिटी की इस्माइल युसूफ कॉलेज से पढ़ाई की। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा इन इंजीनियरिंग की थी और उर्दू और हिंदी ज़ुबान पर शानदार पकड़ भी थी। कादर खान की गिनती हिंदी फिल्म उद्योग के बहुत पढ़े लिखे अभिनेताओं में होती है, लेकिन जिस तरह चाँद में भी दाग होता है वैसे ही कादर खान साहब ने भी कुछ वाहियात फिल्में और एक से एक द्विअर्थी संवादों का लेखन भी किया। अब ऐसा करने के पीछे उनके मन में क्या मंशा थी, वो तो वही जाने। हां, हिट होने का दवाब तो फिल्म उद्योग पर रहता ही है।

पूँजी और पद-प्रतिष्ठा को पूजता समाज इंसान को तभी तक याद करता है जबतक वो क्रियाशील है। इंसान थोड़ा शिथिल हुआ नहीं कि एरिना से ग़ायब! विभिन्न कला माध्यमों से जुड़े ऐसे लोगों की लम्बी फेहरिस्त है जिनको बुढ़ापे में भुला दिया गया और जिनकी मौत पर "श्रद्धांजलियों" की बाढ़ आ गईं।

 एकाएक सबकी संवेदना उमड़ पड़ती है और दूसरे ही पल वो संवेदना पानी का बुलबुल साबित हो जाता है। जीवन के आखिरी मुकाम पर कादर खान का हालचाल लेनेवाला शायद कोई नहीं था। जिस व्यक्ति ने दुनियां को आनंदित किया, हिंदी फिल्म उद्योग को एक से एक बेहतरीन हिट फ़िल्में दी वो शायद अपने अंतिम दिनों में तन्हा था। सरकारों को भी पद्मश्री के लिए अनुपम खेर की याद आती है कादर खान की नहीं।

 दुखी और उदास कादर खान कहते हैं – उसने मोदी की चमचई करने के सिवा और किया क्या है? कादर खान ने सही लिखा था कि “सुख तो बेवफ़ा है, आता है जाता है, दुःख अपना साथी है, अपने साथ रहता है। दुःख को अपना ले तब तक़दीर तेरे क़दमों में होगी और तु मुकद्दर का बादशाह होगा।”

बहुत याद आओगे तुम "कादर खान" ...

क़ादर ख़ान का जन्म 22 अक्तूबर 1937 को हुआ था। कादर खान साहब एक हिन्दी फ़िल्म हास्य अभिनेता होने के साथ साथ एक फ़िल्म निर्देशक, लेखक (डायलॉग ओर स्क्रीन प्ले) भी हैं। उन्होंने अब तक 300 से अधिक फ़िल्मो में काम किया है। उनकी पहली फ़िल्म दाग (1973) थी जिसमे उन्होंने अभियोगपक्ष के वकील की भूमिका निभाई थी। उन्होंने स्नातक की पढ़ाई मुम्बई के इस्माइल यूसुफ कॉलेज से पूरी की। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में भी कार्य किया।
नाम - क़ादर ख़ान
जन्म--
22 अक्टूबर 1937 (आयु 81)
बलूचिस्तान, ब्रिटिश इंडिया
जातीयता
पश्तून
नागरिकता--कैनेडियन
शिक्षा प्राप्त की--
इस्माइल युसूफ कॉलेज
व्यवसाय--अभिनेता
धार्मिक मान्यता---इस्लाम
जीवनसाथी--अज़रा खान
बच्चे--
सरफ़राज़ खान

कादर खान साल 1973 में पहली फिल्म 'दाग' में नजर आए थे। इस फिल्म में कादर खान वकील की भूमिका में थे। कहा जाता है कि कादर खान के कॉलेज ड्रामा में किए गए काम से दिलीप कुमार इतने इंप्रेस हुए थे कि उन्होंने कादर खान को दो फिल्मों 'सगीना' और 'बैराग' के लिए साइन कर लिया था। कादर खान ने करीब 300 फिल्मों में काम किया है। इसके साथ ही करीब हिंदी और उर्दू में 250 फिल्मों के डायलॉग भी लिखे हैं।

कादर खान बॉम्बे युनिवर्सिटी के इस्माइल युसुफ कॉलेज से इंजीनियरिंग ग्रेज्यूएट हैं।  👉🏻👉🏻 फिल्मों में करियर बनाने के पहले, कादर खान एमएच सैबू सिद्दिक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे।

उनके पिता अब्दुल रेहमान खान कंधार के थे तो माता इकबाल बेगर पिशिन (अंग्रेजों के समय भारत का हिस्सा) से थीं।

 कादर खान द्वारा कॉलेज में किए गए ड्रामा काम करने के बाद, दिलीप कुमार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कादर खान को अपनी दो फिल्मों सगीना और बैराग के लिए साइन कर लिया।

कादर खान के तीन बेटे हैं। उनके एक बेटा कनाडा में रहता है और ऐसा कहा जाता है कि कादर खान के पास कनाडा की भी नागरिकता है।

कादर खान ने लगभग 250 से ज्यादा फिल्मों के संवाद लिखे हैं।

फिल्म 'रोटी' के लिए मनमोहन देसाई ने कादर खान को संवाद लिखने के लिए 1,20,000 रुपये जैसी बड़ी रकम अदा की थी।

 कादर खान टेलीविजन पर एक कॉमेडी शो 'हंसना मत' प्रसारित कर चुके हैं। जिसे उन्होंने खुद बनाया था।

अमिताभ बच्चन के अलावा, कादर खान ऐसे कलाकार थे जिन्होंने प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई के आपस में प्रतिस्पर्धी कैंपों में काम किया। 

 अमिताभ की कई सफल फिल्मों के अलावा, कादर खान ने हिम्मतवाला, कुली नं वन, मैं खिलाडी तू अनाड़ी, खून भरी मांग, कर्मा, सरफरोश और धर्मवीर जैसी सुपर हिट फिल्मों के संवाद लिखे हैं।

 2013 में, कादर खान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।

कादर खान 1982 और 1993 में बेस्ट डायलॉग के लिए फिल्म फेयर जीत चुके हैं।

 कादर खान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।

कादर खान 9 बार बेस्ट कॉमेडियन के तौर पर फिल्म फेयर में नामांकित किए जा चुके हैं।

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ मुस्लिम फ्रॉम इंडिया (AFMI) कादर खान को उनकी सफलताओं और भारतीय मुस्लिम कम्युनिटी की भलाई में उनके कामों के लिए सराह चुकी है।

फिल्म 'रोटी' के अशरफ खान, अपने एक नाटक के लिए एक युवा लड़के की तलाश में थे तब उन्हें लोगों ने बताया कि एक लड़का रात में कब्रों के बीच बैठकर डायलॉग चिल्लाता है। यह कादर खान थे।

कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर फैलाई गई उनकी मौत की खबर से, कादर खान बहुत आहत हुए थे और उन्होंने कहा इससे उनके परिवार को खासा दुख पहुंचा है।

अपने बचपन के दिनों में कादर खान बहुत गरीब थे। गंदी बस्ती की झोपड़ी में रहने वाले कादर की मां उन्हें मस्जिद प्रार्थना के लिए भेजती थीं जहां से वे कब्रिस्तान चले जाते थे।


कादर खान के पास बचपन में चप्पल तक नहीं हुआ करते थे। उनकी मां उनके गंदे पैर देखकर समझ जाती थीं कि वह मस्जिद नहीं गए।

कादर खान की उनके पहले ही ड्रामे में एक्टिंग देखकर एक बुजुर्ग ने उन्हें सौ रूपए का नोट दिया था। कुछ साल अपने पास रखने के बाद, गरीबी के कारण कादर खान ने इस नोट को खर्च कर दिया जिसे वह एक ट्राफी समझते थे।

कादर खान के जन्म के पहले काबुल में रहने वाले उनके परिवार में उनके तीन बड़े भाई थे जो आठ वर्ष के होते-होते मर गए। इससे घबराकर कादर खान के जन्म के बाद, उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई आ गईं।

कादर खान मानते हैं कि अच्छा लेखक बनने के लिए जिंदगी में बहुत दुख से गुजरना जरूरी है।

कादर खान कभी भी फिल्मों का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उसके समय फिल्मों को निचले दर्जे की चीज समझी जाती थी।

कादर खान एक लेखक के तौर पर बहुत ही जल्दी सफल हुए क्योंकि वह बोलचाल की भाषा में संवाद लिखते थे वहीं दूसरी ओर पहले से जमे हुए लेखक कठिन मुहावरों से भरी भाषा लिखने के आदी थे।

कादर खान गालिब की गजलों को समझाती किताबें लिख चुके हैं। जिनमें 100 से भी अधिक गजलों के मतलब लिखे हुए हैं।

एक दौर ऐसा भी था जब कादर खान कई हीरो से ज्यादा लोकप्रिय थे और दर्शक पोस्टर पर उनका चेहरा देख टिकट खरीदते थे।

अश्लील और द्विअर्थी संवाद लिखने के कारण कादर खान कई बार आलोचकों के निशाने पर रहे।

बीमार होने के बाद कादर खान इस बात से हताश हो गए कि लोगों ने उनसे दूरी बना ली और काम देना बंद कर दिया।

कादर खान, साहब, आप बहुत अच्छे एक्टर थे।.हम आपसे प्यार करते थे और आपको भुला पाना मेरे लिए असम्भव होगा।
आपने मेरे बचपन को खुशनुमा बनाया है...
सर...।
- अल्लाह आपको जन्नत बख्शे।
मेरी तरफ से आपको सादर विनम्र श्रद्धांजलि
श्रद्धानवत...
पण्डित दयानन्द शास्त्री।।


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