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जया एकादशी: पापों का नाश करती है और भूत-प्रेत योनि से मिलती है मुक्ति


जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष को आती है।  इस एकादशी का व्रत रखने से उपासक भूत, प्रेत, पिशाच योनि से मुक्त हो जाता है। जो श्रद्धालु इस एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें सात्विक आहार करना चाहिए। भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है। यह व्रत उपासक को मोक्ष प्रदान करता है। इस बार यह 16 फरवरी यानी आज है।
जानें यह कथा 
जया एकादशी को लेकर यह कथा प्रचलित है। एक बार नंदन वन में उत्सव चल रहा था। सभी देवता, संत यहां विराजमान थे। गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं। सभा में माल्यवान नामक गंधर्व और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या नृत्य कर रहे थे। पुष्यवती, माल्यवान पर मोहित होकर सभा की मर्यादा भूलकर ऐसा नृत्य करती है कि माल्यवान उसकी भंगिमा को देखकर सुध बुध खो बैठता है। इससे सुर ताल उसका साथ छोड़ देते हैं।
यह देखकर देवराज इंद्र को पुष्पवती और माल्यवान पर क्रोध आ गया और उन्होंने दोनों को श्राप दिया कि दोनों को मृत्युलोक में पिशाच योनि प्राप्त हो। श्राप के कारण दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर एक वृक्ष पर रहने लगे। एक बार माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दुखी थे। उस दिन वे फलाहार पर ही रहे। रात्रि के समय दोनों को बहुत ठंड लग रही थी। दोनों ने जागते हुए रात बिताई। अत्यधिक ठंड के कारण दोनों की मृत्यु हो गई और अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई।
अब माल्यवान और पुष्पवती को स्वर्ग लोक में स्थान मिला। देवराज ने जब दोनों को देखा तो उन्होंने पूछा कि पिशाच योनि से मुक्ति कैसी मिली तो माल्यवान ने कहा यह भगवान विष्णु की जया एकादशी का प्रभाव है। इस प्रकार जया एकादशी का व्रत रखने से दोनों को फिर से स्वर्ग में स्थान प्राप्त हुआ। 
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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