24 मार्च तय हुई थी, पर 11 घंटे पहले दे दी गई थी शहीद-ए-आजम भगत सिंह को फांसी, जानें क्यों?


भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी, लेकिन एक दिन पहले 23 मार्च को दी उन्हें फांसी दे दी गई थी क्योंकि तीनों वीर सपूतों को फांसी देने का एलान किया जा चुका था। यह खबर आग की तरह देश भर में फैल गई थी।

लोग भड़के हुए थे और वे तीनों वीर सपूतों को देखना चाहते थे। तीनों को फांसी को लेकर जिस तरह से लोग प्रदर्शन और विरोध कर रहे थे, अंग्रेज सरकार डर गई थी। माहौल बिगड़ता देखकर ही फांसी का दिन और समय बदला गया और एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।

गौरतलब है कि 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंके। घटना के बाद भगत सिंह भागने के बजाय डटे रहे और खुद को अंग्रेजों के हवाले कर दिया। करीब दो साल जेल में रहने के बाद भगत सिंह को राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार होने से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की प्रत्येक गतिविधि में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1920 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, उस समय भगत सिंह मात्र 13 वर्ष के थे और 1929 में जब गिरफ्तार हुए तो 22 वर्ष के।

इन 9 वर्षों में उनकी एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गतिविधियां किसी भी देशभक्त से कम नहीं। 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह पर गहरा असर डाला था और उसके बाद से ही वे भारत की आजादी के सपने देखने लगे।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह को जेल से भागने का मौका मिला था, लेकिन वे भागे नहीं। जानिए उनके निजी जीवन से जुड़ी 8 अनकही बातें और वो जवाब जो उन्होंने चिट्ठी पढ़ने के बाद दिया।

भागने का मौका मिला, पर भागे नहीं
लाहौर जेल में कैद भगत सिंह को एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था कि हमने अपने भागने के लिए एक रास्ता बनाया है, लेकिन हम चाहते हैं कि हमारी जगह आप उससे निकल जाएं। चिट्ठी का जवाब देते हुए भगत सिंह ने कहा कि- धन्यवाद.....मैं आपका आभारी हूं, लेकिन ये आग्रह स्वीकार नहीं कर सकता। अगर ऐसा किया तो मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा। मैं चाहता हूं कि मेरी शहादत देश के काम आए और युवाओं में प्रेरणा व जोश भरने का काम करे, जिससे देश को जल्द से जल्द आजादी मिल सके।

महात्मा गांधी का सम्मान, पर अहिंसावादी नीति पसंद नहीं थी
आठ वर्ष की उम्र में जब बच्चों को खिलौनों का शौक होता है, भगत सिंह अपने पिता से पूछते थे कि अंग्रेजों को भगाने के लिए क्यों न खेतों में पिस्तौलें उगाएं। पिस्तौलों की जो फसल उगेगी, उससे अंग्रेजों को आसानी से भारत से भगाया जा सकेगा। उस दौर में पंजाब में अराजकता का माहौल था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग की घटना हुई तो भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे। 10 मिनट की गोलीबारी में 379 लोगों की मौत हुई और 2000 के करीब घायल हुए। हालांकि मृतकों की संख्या 1000 से अधिक बताई जाती है। वे महात्मा गांधी का सम्मान तो बहुत करते थे, लेकिन उनकी अहिंसा वाली पद्धति से बहुत निराश थे।

लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया
1928 में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने के लिए हो रहे प्रदर्शन पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज किया। इसमें लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। इसका बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, एएसपी सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सिर में मारी। इसके बाद भगत सिंह ने 3-4 गोली दाग दीं। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आजाद ने उसे सावधान किया - आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा। नहीं मानने पर आजाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।

भगत सिंह को आती थीं कई भाषाएं
भगत सिंह का पैतृक गांव खटकड़कलां है। इनकी पढ़ाई लाहौर के डीएवी हाई स्कूल में हुई। वे कई भाषाओं के धनी थे। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू के अलावा पंजाबी पर भी उनकी खास पकड़ थी। कॉलेज में भगत सिंह ने इंडियन नेशनल यूथ आर्गनाइजेशन का गठन किया। अच्छे थियेटर आर्टिस्ट होने के साथ-साथ उनका शैक्षणिक रिकार्ड भी बढ़िया रहा। स्टेज पर उनका प्रदर्शन राणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्त और भारत की दुर्दशा दिखाता था। बाद में भगत सिंह ने अपने इस हुनर का इस्तेमाल भारतीयों के बीच देशभक्ति की भावनाएं जगाने में किया। भगत सिंह ने एक क्रांतिकारी लेखक का रोल भी अदा किया।

फिरोजपुर में था इनका ठिकाना
शहीद भगत सिंह का पंजाब से फिरोजपुर से गहरा रिश्ता था। यहां क्रांतिकारी डॉ. गया प्रसाद ने एक मकान किराए पर ले रखा था। इसके नीचे केमिस्ट की दुकान थी और ऊपर क्रांतिकारियों का ठिकाना। यहां भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद के अलावा अन्य क्रांतिकारियों का भी आना जाना था। यह ठिकाना पार्टी की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। क्रांतिकारी पंजाब से दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और आगरा आने जाने के लिए इस ठिकाने पर आकर ही अपनी पहचान बदलते थे, फिर ट्रेनों में यात्रा करते थे। बम बनाने का सामान जुटाने के लिए क्रांतिकारी डॉ. निगम को यहां पर केमिस्ट की दुकान खुलवाई गई थी। क्रांतिकारियों का गुप्त ठिकाना 10 अगस्त 1928 से लेकर 4 फरवरी 1929 तक रहा।

ईश्वर के अस्तित्व को लेकर लंबा लेख लिखा
शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने धर्म और ईश्वर के अस्तित्व को लेकर लंबा लेख लिखा। ईश्वर, नास्तिकता और धर्म को लेकर लिखा गया भगत सिंह का यह लेख 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार द पीपल में 'मैं नास्तिक क्यों हूं?' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। यह लेख भगत सिंह के संपूर्ण लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में से एक रहा है। लेख लिखने की वजह भगत सिंह के साथ सेंट्रल जेल में ही बंद बाबा रणधीर सिंह थे, जो 1930 से लेकर 1931 तक भगत सिंह के साथ रहे। वे धार्मिक प्रवृति के थे। धर्म और ईश्वर को लेकर वे भगत सिंह से लंबी चर्चा करते रहे। उन्होंने भगत सिंह को ईश्वर में विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे।

शादी की बात पर घर छोड़कर चले गए थे
इस बात का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता कि भगत सिंह की कोई प्रेमिका थी। कुछ इतिहासकार ये जरूर मानते हैं कि भगत सिंह के परिवार वालों ने 16 साल की उम्र में ही उनकी शादी तय करने की कोशिश की थी। इस बात से नाराज होकर भगत सिंह अपने घर से भागकर कानपुर चले गए थे। घर से जाते समय उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर कहा कि मेरी ज़िन्दगी बड़े मकसद यानी आज़ादी-ए-हिन्द के लिए समर्पित हो चुकी है। इसलिए मेरी ज़िन्दगी में आराम और दुनियावी ख्वाहिशों व सांसारिक आकर्षण की जगह ही नहीं हैं। भगत सिंह ने अपने पत्र में घर छोड़ने के लिए पिता से माफी मांगते हुए लिखा है कि उम्मीद है कि आप मुझे माफी फरमाएंगे।

12 साल की उम्र में जिंदगी में निर्णायक मोड़ आया
भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब प्रान्त के लायलपुर जिला, जो अब पाकिस्तान में हैं, के बंगा गाँव में हुआ था। यह बात चौंकाने वाली है, लेकिन सौ फीसदी सत्य हैं कि महज 12 साल की उम्र में बगैर किसी को बताए भगत सिंह जलियांवाला बाग चले गए थे। वहां हत्याकांड के निशां देखे और फूट-फूट कर रोए। फिर वे वहां की मिट्टी लेकर घर लौटे थे। भगत सिंह के पिता किशन सिंह, चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके पिता और चाचा, करतार सिंह सराभा और हरदयाल की गदर पार्टी के मेंबर थे। खुद भगत सिंह भी करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे। जानकारों के मुताबिक, भगत सिंह के जीवन में पहला निर्णायक मोड़ 1919 में आया, जब उनकी उम्र करीब 12 साल थी।

सरकार उन्हें दस्तावेजों में शहीद नहीं मानती
महान क्रांतिकारी भगत सिंह को अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को लाहौर में फांसी दे दी थी। वह देश की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार से लड़ रहे थे, लेकिन भारत सरकार उन्हें दस्तावेजों में शहीद नहीं मानती। अलबत्ता जनता उन्हें शहीद-ए-आजम मानती है। अप्रैल 2013 में केंद्रीय गृह मंत्रालय में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लेकर एक आरटीआई डाली गई, जिसमें पूछा कि भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को शहीद का दर्जा कब दिया गया। यदि नहीं तो उस पर क्या काम चल रहा है? इस पर नौ मई को गृह मंत्रालय का हैरान करने वाला जवाब आया। इसमें कहा गया कि इस संबंध में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।


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