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शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने बाद भी कोसली इलाके की तस्वीर नहीं बदली

धनेश विद्यार्थी, रेवाड़ी। प्रदेश में स्कूली बच्चो की पढ़ाई के लिए शिक्षा का अधिकार कानून वर्षो पूर्व लागू होने बाद भी कोसली क्षेत्र के गा्रमीण इलाके की तस्वीर अभी नहीं बदली है। आलम यह है कि 90 प्रतिशत बच्चे सकूल में दाखिल तो हो गए, लेकिन भाषा व गणीत की पढ़ाई में उनकी स्थिति पहले से भी खराब हुई है। इतना ही नहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के गिरते स्तर के  कारण सरकारी स्कूलों से तौबा करके निजी स्कूलों व टयूशन  सैटरों की ओर रूख करना शुरू कर दिया है। हालाकिं ग्रामीण क्षेत्र में 90 से 98 प्रतिशत बच्चों ने स्कूलों में नाम लिखवा लिया है। 

उनमें से 80 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे है। जबकि पाचं वर्ष पूर्व मात्र 45 प्रतिशत बच्चे ही निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे थे। इसके अलावा प्रदेश में शिक्षा का अधिकार एक दशक पूर्व  लागू होने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्र के बच्चो की एक बड़ी जमात निजी स्कूलों की ओर ही आकर्षित हो रही है। और इसका ग्राफ दर साल दर बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि देखा जाए तो प्राइमरी स्तर के बच्चो में सरकारी स्कूल की बनीस्बत निजी स्कूलों में ज्यादा मेहनत करवाने से बच्चे काफी आगे है, वहीं सरकारी स्कूलों के बच्चे मात्र जमा गुणा भाग तक ही सिमित होकर रह गए है। इस विषय में खण्ड मौलिक शिक्षा अधिकारी जवान सिहं का कहना है कि इसके लिए स्कूल का मुखिया जिम्मेदार है, जो बच्चों को पढाने में नाकाम साबित हो रहे है।

उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक निजी स्कूलों से अच्छे व शिक्षित होने के बावजूद अपनी जिम्मदारी नहीं निभाते जिसके कारण सरकारी स्कूलों से निजी स्कूल आगे निकल रहे है। वे मेहनत करवाते है उनका कहना है की किसी भी स्कूल का शिक्षक अपने विषय को हर रोज 2-3 घन्टा भी बच्चों को इमानदारी से पढाए तो वे निजी स्कूलो से काफी आगे जा सकते है। 

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