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जानिए ज्येष्ठ (जेठ ) माह में शादी-विवाह के सम्बंध में क्या कहता हैं ज्योतिष



सुखी वैवाहिक जीवन में मधुरता, स्थिरता और सफलता के लिए विवाह लग्न अति महत्वपूर्ण और सर्वथा ग्राह्य कारक है। बहुधा अन्य कारकों का आकलन किए बिना पंचांग में विवाह मुहूर्त सारणी देखकर विवाह की तारीख निश्चित कर दी जाती है, जो सर्वथा गलत है।

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार पहले गर्भ में उत्पन्न लड़के या लड़की का विवाह उसके जन्म मास, जन्म नक्षत्र या जन्म तिथि में नही करना चाहिए। यदि माता का पहला गर्भ नष्ट हो गया हो तब यह विचार करने की आवश्यकता नहीं है। जन्म मास के सन्दर्भ में मुहूर्तशास्त्रियों के दो मत हैं, कुछ तो जन्म के चान्द्रमास को जन्म मास मानते हैं और कुछ जन्म दिन से लेकर तीस दिन के अवधि को जन्म मास माना जाए।

ज्येष्ठ लड़के और ज्येष्ठ लड़की का परस्पर विवाह ज्येष्ठ मास में नहीं करना चाहिए। पुत्र के विवाह के 6 माह के भीतर पुत्री का विवाह नहीं करना चाहिए। पुत्री का विवाह करने के बाद पुत्र का विवाह कभी भी किया जा सकता है।

ज्येष्ठ मास, ज्येष्ठ पुत्र और ज्येष्ठ कन्या ये तीन ज्येष्ठ तीन विवाह संस्कार मे वॢजत माने जाते हैं। परन्तु यदि दो ज्येष्ठ वर्तमान हों अर्थात लड़का-लड़की दोनों ज्येष्ठ यानि बड़े हों, परन्तु महीना ज्येष्ठ के अतिरिक्त हो अथवा लड़का-लड़की में में से एक ज्येष्ठ हो और दूसरा अनुज हो, तो ज्येष्ठ मास में विवाह करने से सामान्य मध्यम फल  प्राप्त होता है।

-वराहमीर के अनुसार--
तथापि आवश्यक परिस्थितिवश ज्येष्ठ मास में  कृतिका नक्षत्र से सूर्य निकल जाने पर सूर्य दानादि करके विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं।

भारद्वाज मुनि के अनुसार ज्येष्ठ के महीने की भांति मार्गशीर्ष मास में भी अग्रज लड़का-लड़की एवं मार्ग मास- तीनों का त्याग करें।

 सगे भाई-बहन के विवाह छह मास के भीतर नहीं करने चाहिएं। यदि इस बीच संवत परिवर्तन हो जाए तो कोई दोष नहीं है।

-मुनि मार्तंड
पुत्र के विवाह के बाद अपनी कन्या का विवाह 6 महीने तक न करें। इसी तरह विवाह के 6 महीन तक मुंडन, यज्ञोपवीत आदि शुभ कार्य न करें

-नारद जी।

कन्या के विवाह के 6 महीने के भीतर पुत्र का विवाह करना शुभ है। दो सगी बहनों का विवाह 2 सगे भाइयों से न करें अथवा वर के साथ 2 सगी बहनों की शादी न करें-नारद जी।


2 सगे भाईयों या 2 सगी बहनों का एक संस्कार 6 महीने के भीतर करना सम्भव है। दो सहोदर भाई-बहन के संस्कार आवश्यक स्थिति पैदा होने पर नदी, पर्वत स्थान एवं पुरोहित भेद से एक ही दिन अथवा 6 महीने के भीतर शुभ होंगे। जुड़वे भाई-बहन के मांगलीक कार्य एक ही मंडप में शुभ हैं।

विवाह आदि मंगल कार्य से 6 मास तक लघु मंगल कार्य न करें। यह 6 महीने तक निषेध केवल 3 पीढ़ी तक के मुनष्य के लिए कहा गया है।

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार जिस तरह कन्या के विवाह के लिए गुरु बल आवश्यक है, उसी तरह वर के विवाह के लिए शुक्र बल आवश्यक है। कुछ लोग कहते हैं कि सब समय ईश्वर का बनाया हुआ है, अतः सब ठीक है। लेकिन विचारणीय है कि संपूर्ण सृष्टि ईश्वर की ही बनाई हुई है, फिर भी इसमें सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष हैं, अच्छे और बुरे लोग, दैवी और दानवी तत्व हैं। कुल मिलाकर, यदि शुभ जीवन की अभिलाषा हो तो विवाह शुभ लग्न युक्त समय में करें।

समाज में दो प्रकार के विवाह प्रचलन में हैं- पहला परंपरागत विवाह [प्राचीन ब्रह्मधा विवाह] और दूसरा अपरंपरागत विवाह [प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह]।
परंपरागत विवाह माता-पिता की इच्छा अनुसार संपन्न होता है, जबकि प्रेम विवाह में लड़के और लड़की की इच्छा और रूचि महत्वपूर्ण होती है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य, स्वतंत्र विचारों, पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण अधिकतर अभिभावक चिंतित रहते हैं कि कहीं उनका लड़का या लड़की प्रेम विवाह तो नहीं कर लेगाक् विवाह पश्चात उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा या नहींक् ऎसे कई प्रश्न माता-पिता के लिए तनाव का कारण बन सकते हैं। क्योंकि परंपरागत विवाह में जन्म कुंडली मिलने के बाद ही विवाह किया जाता है, जबकि प्रेम विवाह में जरूरी नहीं कि कुंडली मिलान किया जाए। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अधिकतर के पास जन्म कुंडली होती नहीं है। कई बार छिपकर भी प्रेम विवाह हो जाता है। विवाह होने के पश्चात जब माता-पिता को पता चलता है तो वह चिंतित हो उठते हैं क्या इनका दाम्पत्य जीवन सुखी और स्थायी रहेगा।

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार हमारे समाज में लडके व लडकी की शादी के लिए उन दोनो की जन्म कुण्डलियो का मिलान करने का रिवाज है. इसमें मंगलीक दोष، जन्म राशी، तथा नक्षत्र के आधार पर 36 गुणो का मिलान किया जाता है. 18 से अधिक गुणमिलने पर दोनो की कुण्डली विवाह के लिए उपयुक्त मान ली जाती है. तार्किक दृष्टिकोण से यहाँ पर यहप्रश्न उठता है कि प्राचीन समय से चली आ रही कुण्डली मिलान की यह विधि क्या आज भी प्रासांगिकहै. यह एक महत्वपूर्ण एंव विचारणीय प्रश्न है, क्योंकि लेखक ने अपने जीवन में ऎसी बहुत सीकुण्डलियो की विवेचना की है जिसमें 18 से कम गुण मिलने पर भी लडके एवं लड्की दोनो कोसुखपूर्ण जीवन व्यतीत करते देखा है जबकि 25 से अधिक गुणो का मिलान होने पर भी दोनो केसम्बन्धो में तनाव देखा गया है. इस दृष्टि से प्राचीन ज्योतिष का यह सिद्धान्त/ नियम अप्रसांगिक होजाता है. कमी कहाँ है, हमें इसकी संजीदगी से खोज करनी चाहिये.

हिन्दू संस्कृति में विवाह को सर्वश्रेष्ठ संस्कार बताया गया है। क्योंकि इस संस्कार के द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की सिद्धि प्राप्त करता है। विवाहोपरांत ही मनुष्य देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण से मुक्त होता है।

अन्य कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि विवाह मुहूर्त सारणी, इसलिए उनका भी आकलन अवश्य किया जाना चाहिए। 24 घंटे में बारह लग्न होते हैं और प्रत्येक लग्न लगभग दो घंटे का होता है। वस्तुतः ‘लग्न’ मुहूर्त का परमावश्यक अंग है। जन्म समय की ग्रह स्थिति को हम बदल नहीं सकते, लेकिन शुभ समय में किसी कार्य को आरंभ करके सफलता पाना संभव है। मुहूर्त के आठ अंगों में सर्वाधिक फल ‘लग्न’ को प्राप्त है। इन आठ अंगों में तिथि फल को एक गुणा, नक्षत्र फल को चार, वार को आठ, करण को सोलह, योग को بس , तारा को साठ, चंद्र को सौ और लग्न को एक हजार गुणा महत्व प्राप्त है। इसीलिए विवाह के लिए मुहूर्त प्रकरण में लग्न का निर्धारण और उसका अनुपालन आवश्यक है।

पंडित  दयानंद शास्त्री के अनुसार वे सभी महत्वपूर्ण कार्य, जिनका प्रभाव हमारे संपूर्ण जीवन काल, घर-परिवार और समाज पर पड़ता है, शुभ समय में करने चाहिए। समाज और रिश्तेदारों को भी दो आत्माओं को दाम्पत्य सूत्र में शुभ लग्न में बंधने में सहयोग करना चाहिए। पाया गया है कि जन्मपत्री में दाम्पत्य सुख बाधा हो या नहीं, यदि विवाह लग्न दोषपूर्ण हो, तो दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है। इसलिए शुभ समय में विवाह करना श्रेष्यकर है। विवाह लग्न निर्धारण संबंधी निम्नांकित मुख्य तथ्य विचारणीय है। लग्न- दीर्घ और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुभ स्थिर लग्न में वैवाहिक अनुष्ठान सम्पादित करना चाहिए। वर-कन्या की जन्म राशि या जन्म लग्न से लग्न 3, 6, 10 या11 शुभ माना जाता है। जन्म-लग्न या जन्म राशि से चतुर्थ, अष्टम या द्वादश लग्न अशुभ माना जाता है।

कुण्डली के 1,4,7,8,12 भाव में मंगल होने से वह मंगलीक दोष से युक्त होजाती है. मंगल को साहस, शक्ति, उर्जा, जमीन-जायदाद, छोटे भाई इत्यादि का कारक माना जाता है,उपरोक्त पाँच भावों में से तीन केन्द्र स्थान कहलाते हैं तथा फलित ज्योतिष के अनुसार सौम्य / शुभग्रह(चन्द्र, बुद्य, गुरु व शुक्र) केन्द्र स्थान में होने से दोषकारक होते है जबकि क्रुर ग्रह (सुर्य, मंगल, शनि वराहू) केन्द्र स्थान में होने से शुभफलदायी होते है. इस तरह दो प्रकार की विरोधात्मक बाते सामने आतीहै, मंगल ग्रह के कमजोर होने से क्या कुण्डली मिलान उत्तम रहता है. जबकि शनि ग्रह की सप्तम भावपर दृष्टि विवाह में देरी या दो विवाह का योग बनाती है, परन्तु कुण्डली मिलान में इसका कही भीउल्लेख नही है. अतः हम सभी ज्योतिर्वेदो का कर्तव्य बनता है कि इस सब पर विचार करके एकतथ्यपूर्ण फलादेश बनाना चाहिये ताकि मानव जाति परमात्मा के इस अनुपम उपहार का सही अर्थो मेंअधिक से अधिक लाभ उठा सके.

इस संदर्भ में पुरूष के लिए शुक्र और स्त्री के लिए मंगल का विश्लेषण आवश्यक है। शुक्र प्रणय और आकर्षण का प्रेरक है। इससे सौंदर्य, भावनाएं, विलासिता का भी ज्ञान होता है। पंचम भाव स्थित शुक्र जातक को प्रणय की उद्दाम अनुभूतियों से ओत-प्रोत करता है। मंगल साहस का कारक है। मंगल जितना प्रभुत्वशाली होगा, जातक उसी अनुपात में साहसी और धैर्यशील होगा। यदि व्यक्ति मंगल कमजोर हो तो जातक प्रेमानुभूति को अभिव्यक्त नहीं कर पाता। वह दुविधा, संशय और हिचकिचाहट में रहता है।

चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। चंद्रमा का मानसिक स्थिति, स्वभाव, इच्छा, भावना आदि पर प्रभुत्व है। प्रेम मन से किया जाता है। इसलिए चंद्र की स्थिति भी प्रेम विवाह में अनुकूलता प्रदान करती है।
शुक्र आकर्षण का कारक है। यदि शुक्र जातक के प्रबल होता है तो प्रेम विवाह हो जाता है और यदि शुक्र कमजोर होता है तो विवाह नहीं हो पाता है।

कम्प्यूटर में लड़के और लड़की का जन्म दिनांक, जन्म समय, जन्म स्थान फीड किया और झट से गुण संख्या देखी। यदि गुण अच्छे हैं और दोनों मंगली नहीं हैं तो हो गया कुण्डली मिलान।
यह सम्पूर्ण कुण्डली मिलान नहीं है। मात्र गुण मिलान से ही कुण्डली नहीं मिल जाती है। यदि आप गुण मिलान ही कुण्डली मिलान मानते हैं तो आप बहुत बड़ी भूल करते हैं और बाद में जब समस्याएं आती हैं तो कुण्डली को दोष देते हैं।

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार कुण्डली मिलान में गुण मिलान तो एक सोपान्‌ हैं। इसमें कई सोपान चढ़ने के बाद कुण्डली मिलती है।
गुण मिलान करें और मंगली मिलान करें।
आजकल गुण मिलान के पीछे का रहस्य यह है कि आठ प्रकार के गुण होते हैं जिनके कुल 36अंक होते हैं। ये इस प्रकार हैं-

१.. वर्ण-इसका एक अंक होता है। दोनों का वर्ण समान होना चाहिए। वर्ण न मिले तो पारस्परिक वैचारिक मतभेद रहने के कारण परस्पर दूरी रहती है, सन्तान होने में बाधाएं या परेशानियां आती हैं एवं कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
2. वश्य-इसके दो अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो जिद्द, क्रोध एवं आक्रामकता रहती है और ये तीनों पारिवारिक जीवन के लिए अच्छे नहीं हैं। इससे परस्पर सांमजस्य नहीं हो पाता है और गृहक्लेश रहता है। दोनों अपने अहं को ऊपर रखना चाहते हैं क्योंकि एक दूसरे पर अपना प्रभाव चाहता है जिससे शासन कर सके। अहं की लड़ाई गृहक्लेश ही लाती है।
3. तारा-इसके तीन अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो दोनों को धन, सन्तान एवं परस्पर तालमेल नहीं रहता है। दुर्भाग्य पीछा करता है।
4. योनि-इसके चार अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो मानसिक स्तर अनुकूल न होकर प्रतिकूल रहता है जिससे परेशानियां अधिक और चाहकर भी सुख पास नहीं आता है।
5. ग्रहमैत्री-इसके पांच अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो परस्पर तालमेल रहता ही नहीं है।
6. गण-इसके छह अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो भी गृहस्थ जीवन में बाधाओं एवं प्रतिकूलता का सामना करना पड़ता है।
7. भकुट-इसके सात अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो परस्पर प्रेमभाव नहीं रहता है, इसलिए दोनों एकदूजे की आवश्यक देखभाल नहीं करते हैं।
8. नाड़ी-इसके आठ अंक होते हैं। यदि ये न मिले तो स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है। सन्तान होने में विलम्ब होता है या अनेक बाधाएं आती हैं।
गुण 36 में से 18 औसत माने गए हैं। ऐसा हो तो सुख, सन्तान, धन और स्थिरता सामान्य रहती है। जितने गुण अधिक होते जाते हैं, मिलान उतना अच्छा होता जाता है।

ऐसा नहीं है कि गुण मिल गए तो सबकुछ अच्छा ही होगा। यह जान लें कि गुणमिलान के अलावा दोनों की कुण्डली का विश्लेषण तो करना ही होगा। कुण्डली का विश्लेषण करके यह देखना चाहिए कि-
1. आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, इसके कारण पारिवारिक जीवन में परेशानी तो नहीं आएगी।
2. शरीर पर भी दृष्टि डालकर देखें कि कोई बड़ा अरिष्ट, दुर्घटना या रोग तो नहीं होगा।
3. तलाक एवं वैधव्य या विधुर योग का विश्लेषण करें।
4. चरित्र दोष के कारण पर पुरुष या पर स्त्री के प्रति आकर्षण तो नहीं होगा जिससे गृहक्लेश या अलगाव की नौबत आए।
5. विवाह के बाद सन्तान होनी चाहिए, सन्तान संबंधी विचार करके देखें कि सन्तान सुख है या नहीं।
6. ईगो या अहम्‌ के कारण परस्पर वैचारिक मतभेद या क्लेश तो नहीं होगा।
ध्यान रखें कि गुण अधिक मिल जाने के बाद भी यदि उक्त पांचों बातों में से कोई भी बात नकारात्मक है तो पारिवारिक क्लेश अवश्य होगा। कुण्डली मिलान करते समय उक्त विचार कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष मिलान छानबीन या देखकर भी यह सब विचारना चाहिए कि –
1. दोनों के कुल, संस्कार, सदाचार व सामाजिक प्रतिष्ठा का ध्यान देना चाहिए।
2. वर कन्या के स्वभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए कि उनके स्वभाव में सामंजस्य हो सकता है या नहीं।
3. आर्थिक स्थिति, रोजगार आदि।
4. शैक्षिक योग्यता।
5. शारीरिक सुन्दरता, व्यक्तित्व, सबलता आदि।
6. आयु का सामंजस्य भी ध्यान में रखें। दोनों के आयु में बहुत अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए।
लोग आयु बढ़ जाने पर कम करके नकली या डुप्लीकेट कुण्डली बनवा लेते हैं, इससे मिलान करना तो निरर्थक ही है।
कुछ लोग जन्मपत्रियां होते हुए भी नाम राशि से ही कुण्डली मिलान के रूप में मात्र गुण मिला लेते हैं जोकि ठीक नहीं है। क्योंकि गुणमिलान सुखद् गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक नहीं है।
कुण्डली मिलान के अलावा विवाह के लिए परिणय बंधन(फेरों का समय) भी अवश्य निकालना चाहिए। फेरों का समय भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यदि इस समय की लग्न कुण्डली मजबूत है तो पारिवारिक जीवन को सुखमय बनाने में अधिक सहयोग मिलता है। वैसे भी कुण्डली मिलान के अलावा भी सुखद् गृहस्थ जीवन के लिए आपसी समझ, एक दूजे के लिए त्याग भावना, बुर्जुगों का मार्गदर्शन और मधुरभाषी सहित व्यवहारकुशल होना अति आवश्यक है।
मूलतः एक दृष्टि में श्रेष्ठ पारिवारिक जीवन के लिए कुल, स्वास्थ्य, आयु, आर्थिक स्थिति के अलावा कुण्डली का समम्यक विश्लेषण भी आवश्यक है।

जब लड़के व लड्की की कुण्डली मिलायी जाती है तो यह देखा जाता है कि कितने गुण मिले। आठ प्रकार के गुण होते हैं इनसे कुल 36 गुण मिलते हैं जिसमें से 18 से अधिक गुण मिलने पर यह आशा की जाती है कि वर-वधू का जीवन प्रसन्तामयी एवं प्रेमपूर्ण रहेगा। इन आठ गुणों में से सर्वाधिक अंक नाड़ी के 8 होते हैं। इसके बाद सर्वाधिक अंक भकूट के 7 होते हैं। मूलतः भकूट से तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है। यह 6 प्रकार का होता है-1. प्रथम-सप्तम 2. द्वितीय-द्वादश 3. तृतीय-एकादश 4. चतुर्थ-दशम 5. पंचम-नवम 6. छह-आठ।
ज्योतिष के अनुसार निम्न भकूट अशुभ हैं-द्विर्द्वादश, नवपंचम एवं षडष्टक।

तीन भकूट शुभ हैं-प्रथम-सप्तम, तृतीय-एकादश एवं चतुर्थ-दशम। इनके रहने पर भकूट दोष माना जाता है।
भकूट जानने के लिए वर की राशि से कन्या की राशि तक तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक गणना करनी चाहिए। यदि दोनों की राशि आपस में एक दूसरे से द्वितीय एवं द्वादश भाव में पड़ती हो तो द्विर्द्वादश भकूट होता है। वर-कन्या की राशि परस्पर पांचवी व नौवीं पड़ती है तो नव-पंचम भकूट होता है, इस क्रम में यदि वर-कन्या की राशियां परस्पर छठे एवं आठवें स्थान पर पड़ती हों तो षडष्टक भकूट बनता है।

नक्षत्र मेलापक में द्विर्द्वादश, नव-पंचम एवं षडष्टक ये तीनों भकूट अशुुभ माने गए हैं। द्विर्द्वादश को अशुभ इसलिए कहा गया है क्योकि द्सरा भाव धन का होता है और बारहवां भाव व्यय का होता है, इस स्थिति के होने पर यदि विवाह किया जाता है तो आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।

नवपंचम भकूट को इसलिए अशुुभ कहा गया है क्योंकि जब राशियां परस्पर पांचवे तथा नौवें भाव में होती हैं तो धार्मिक भावना, तप-त्याग, दार्शनिक दृष्टि और अहंकार की भावना जागृत होती है जो पारिवारिक जीवन में विरक्ति लाती है और इससे संतान भाव प्रभावित होता है।

षडष्टक भकूट को महादोष माना गया है क्योंकि कुण्डली में छठा एवं आठवां भाव रोग व मृत्यु का माना जाता है। इस स्थिति के होने पर यदि विवाह होता है तो पारिवारिक जीवन में मतभेद, विवाद एवं कलह ही स्थिति बनी रहती है जिसके फलस्वरूप अलगाव, हत्या एवं आत्महत्या की घटनाएं घटित होती हैं। मेलापक के अनुसार षडाष्टक दोष हो तो विवाह नहीं करना चाहिए।

शेष तीन भकूट-प्रथम-सप्तम, तृतीय-एकादश तथा चतुर्थ-दशम शुभ होते हैं। शुभ भकूट का फल अधोलिखित है-
मेलापक में राशि यदि प्रथम-सप्तम हो तो विवाहोपरान्त दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हो तो उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहने के कारण परिवार में समृद्धि रहती है।
जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ -दशम भकूट हो तो विवाहोपरान्त दोनों के मध्य परस्पर आकर्षण एवं प्रेम बना रहता है।

कुण्डली मिलान में जब अधोलिखित स्थितियां बनती हों तो भकूट दोष नहीं रहता है या भंग हो जाता है-
1. यदि वरवधू दोनों के राशि स्वामी परस्पर मित्र हों।
2. यदि दोनों के राशि स्वामी एक हों।
3. यदि दोनों के नवांश स्वामी परस्पर मित्र हों।
4. यदि दोनों के नवांश स्वामी एक हो।
कुण्डली मिलान में सुखद् गृहस्थ जीवन के लिए नाड़ी दोष के बाद भकूट विचार अवश्य विचार करना चाहिए। आठ गुणों में से ये दोनों गुण अधिक महत्वपूर्ण हैं।

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