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रैगिंग जैसी कुप्रथा को किसी भी सभ्‍य समाज में जायज नहीं ठहराया जा सकता

महेन्द्रगढ़: प्रमोद बेवल 

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण नारनौल के सचिव लोकेश गुप्ता के निर्देशानुसार व उपमंडल विधिक सेवा समिति महेन्दरगढ़ के चेयरमैन हिमांशु सिंह के नेतृत्व में शरबती कालेज महेन्द्रगढ़ में  "एन्टी रैगिंग ड्राइव कम्प" के तहत का आयोजन किया गया । लीगल एडवाइजर एडवोकेट रेखा यादव एवं राजकुमार पीएलवी ने कार्यक्रम में पहुंचकर विद्यार्थियों को रैगिंग के प्रति जागरूक के किया ।

एडवोकेट रेखा यादव ने बताया कि रैगिंग जैसी कुप्रथा को किसी भी सभ्‍य समाज में जायज नहीं ठहराया जा सकता। शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता को बनाए रखना है तो इसे सख्ती से रोकना होगा। रैगिंग का एक सालाना रिवाज जैसा बन जाना बड़े दुर्भाग्य की बात है। वैसे तो कालेज खुलने के समय नए विद्यार्थियों को प्रवेश मिलने की खुशियां मनानी चाहिए। लेकिन उन्हें कालेज के सीनियर छात्रों के कठोर व्यवहार को सहना पड़ता है। ऐसे बहुत कम छात्र होते हैं, जो रैंगिंग के खिलाफ लड़ते हैं। अनगिनत छात्र ऐसे हैं, जो चुपचाप इसे सहते हैं, और पूरे जीवन पीड़ा का अनुभव करते हैं। रैगिंग से मौत होने पर ही इसके खिलाफ आवाज़ उठाई जाती है। लेकिन कुछ दिनों बाद फिर सब कुछ शांत हो जाता है ।

एक और दुःख की बात यह है कि ऐसा मैडिकल छात्र भी कर रहें हैं। रैगिंग के नाम पर वे नए छात्रों के जीवन से खेल रहे हैं। जबकि हम मेडिकल छात्रों से आगे चलकर लोगों का जीवन बचाने की अपेक्षा करते हैं । नए छात्रों को अपमानित करने की परंपरा हमारे संस्कृति के लोकाचार के भी खिलाफ है क्योंकि हमारी संस्कृति तो "अतिथि देवो भव" की वकालत करती है । नए छात्रों का विश्वास पाने की जगह सीनियर सहपाठी नए आने वाले छात्रों के दुश्मन बन जाते हैं । यह हमारे मूल्यों में एक घिनौनी गिरावट है। हर सभ्य संस्कृति की तरह ही हमारी संस्कृति में भी अपने से उम्र में छोटों को पहली प्राथमिकता दी जाती है। 

लेकिन जो छात्र कहीं एक दिन पहले आ जाता है, वह खुद को "सीनियर" समझने लगता है। उसे लगता है कि उसे अपने से "जूनियर" को उसकी हैसियत बताकर रखनी है । यह आधुनिक मानवता के लिए एक शाप की तरह है । कुछ लोग यह सोचते हैं कि रैगिंग को नियंत्रित करने के लिए हमें नए कानूनों की आवश्यकता है। एक देश के तौर पर हम अव्यवस्थित तरीके से चल रहे हैं, पर जब कोई गुंडागर्दी होती है तो नए कानून बनाने की बात करते हैं। रैगिंग रोकने के लिए नए कानून बनाने की बात अपने आप में एक दुखद मजाक की तरह ही लगती है। नए कानूनों से ऐसे छात्रों को दंड दिलाना ज़रूर आसान हो जाएगा। लेकिन ऐसी क्रूरता से निपटने के लिए मौजूदा कानून ही अपने आप में काफी हैं। इन कानूनों को हर स्तर पर कड़ाई से लागू करने की ज़रूरत है। अगर कानूनों को लागू करने में ढिलाई होगी, तो नए कानून बनानें से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 

हिंसा की ऐसी वारदातों को रोकने के लिए शिक्षण संस्थानों को अपने यहां कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। ऐसा करने के लिए सरकार और समाज को संस्थानों पर दबाव बनाना पड़ेगा । हमें यह सुनिश्चित करना होगा, कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में देश में कहीं भी रैगिंग की एक भी घटना न हो। इसके लिए हमारे पास क्षमता और साधन मौजूद हैं। ऐसा करने के लिए हमें अपने अंदर रैगिंग के प्रति संवेदना लाने की ज़रूरत है। अगर हम संवेदनाशून्य बने रहे तो कभी रैगिंग रोकने के लिए कदम नहीं उठा पाएंगे।

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