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ना हार में, ना जीत में, देशवासियों अब साथ देना देशहित में


करन निम्बार्क: मुंबई

यदि मोदी हार जाते तो कांग्रेसी और कन्हैया वाले कहते अंततः सच्चाई की जीत हुई और झुमलेबाजी की हार परंतु अब उनके मुख से, मन में जो है वह नहीं निकल रहा । जो अच्छा लिखना और मंच पर बोलना जानते हैं उन्हें लगता हैं कि देशहित का एकमात्र ठेका उन्होंने ही ले रखा हैं ।

यदि 8 नवंबर 2016 की बात करूँ तो वास्तव में कितने आम आदमियों को उससे समस्या हुई ? उस अवधि में, स्वंय मैं भी स्थायी काम नहीं कर रहा था, तब भी कोई बहुत अधिक शिकायत नहीं थी, इसलिए नहीं कि मैं मोदी भक्त हूँ या मुझे अर्थशास्त्र की गहरी समझ है, अपितु मुझे कोई बड़ी समस्या हुई ही नहीं । मैंने माह के अंत में एटीएम से पैसे भी निकाले ।

कहते हैं ढूँढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं तो श्रम करने वाले को एक नौकरी मिलना क्यों कठिन है ? विमुद्रीकरण के ठीक दो माह बाद मुझे और भी अच्छा एवं स्थायी काम मिला । तिथि भी बता दूँ, 14 दिसंबर 2016 को । जब प्याज के भाव बढ़ते हैं तो प्याज सभी की पसंद और भोजन व पोषण का प्रमुख भाग हो जाता है । मंडियों में भीड़ बढ जाती है प्याज के लिए ।

यदि मोदी सरकार से भारत के नागरिक सच में दुखी होते तो आज पूरे भारत से बहुमत नहीं मिलता । अँधभक्त मुट्ठीभर हो सकते हैं संपूर्ण राष्ट्र नहीं । मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा कि सभी मोदी का समर्थन करना प्रारंभ कर दें, तब तो कार्य का निरीक्षण कैसे होगा ? परंतु, केवल विरोध करने से आप कहाँ पहुँचेंगे और देश को कहाँ ले जायेंगे ? सरकार से, मंच पर बैठकर या सोशल मीडिया पर प्रश्न पूछने वाला जानकार तो हो सकता है किन्तु बुद्धिमान और योग्य भी हो यह आवश्यक नहीं है ।

मोदी ने या भाजपा के प्रवक्ता ने भाषण में यह कह दिया, वह कह दिया ! परंतु अच्छा बोलने वाला रावण भी तो हो सकता है ! देश में आरक्षण और धर्म व जाति के नाम पर विरोधियों ने,  मीडिया ने जो उत्पात मचाया था उस पर तो क्या लिखूँ ! ऊपर से रोहिंग्याओं के लिए प्रेम, पत्थर मारने वालों के लिए प्रेम, असहिष्णुता, भारत में डर लगना इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि

अब दो बातें मोदी समर्थक, भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए ; सत्ता का अहंकार बहुत भयानक होता है । हिन्दू धर्म कोई रेत पर खींची रेखा नहीं है जिसे कोई भी मिटा देगा इसलिए हर बात को धर्म से जोड़ने के बदले राष्ट्रहित की बात करें । गोहत्या के नाम पर किसी पर अन्याय करना कहाँ तक उचित है ? सबकुछ मोदी जी ही करेंगे तो आप सरकार में, सत्ता में क्यों हों ? आप के क्या कर्तव्य हैं ? आपको अगला चुनाव और आनेवाले चुनाव भी क्या मोदी के नाम पर ही लड़ने हैं ?

अंतिम बात, बहस करने के लिए और अर्थव्यवस्था को समझने के लिए आंकडे आवश्यक हैं किन्तु देश केवल आंकड़ों और तथ्यों से नहीं अपितु आपसी सामंजस्य से, विश्वास से और एकता से चलता है । देशहित में जब कभी कड़े निर्णय लिये जाए तो स्वार्थ से ऊपर उठकर उन्हें स्वीकारना चाहिए, अन्यथा हम बिल्लियों की भाँति मीडिया और आज के बुद्धिजीवियों के हाथों की बंदरबाँट में खाली हाथ लिये बैठे रह जायेंगे । अपने नेताओं की स्तुति करना और विरोधी नेताओं की खिल्ली उड़ाना, भ्रामक चित्र और विडियो साझा करना, सस्ती लोकप्रियता और प्रचार-प्रसार के पीछे भागना अब बंद करना होगा और देशहित में हम सभी को एक होकर एकसाथ चलना होगा । 


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