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जानिए हस्ताक्षर द्वारा कैसे करें रोग निवारण --


हस्ताक्षर विज्ञान यानी हस्ताक्षर करने की कला। यह एक ऐसा ज्ञान है जो आपको बताता है कि एक व्यक्ति द्वारा किए गए उसके नाम के हस्ताक्षर का उसकी ज़िंदगी पर क्या प्रभाव होता है। जरूरी नहीं कि यह प्रभाव नुकसानदेह ही हो। कुछ लोगों के हस्ताक्षर तो उनकी ज़िंदगी निखार देते हैं। किसी विशेष व्यक्ति को अपने व्यवसाय में मिलने वाले बेहतरीन मुनाफे का कारण भी उसका हस्ताक्षर ही है।

हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में नौं ग्रहों एंव बारह भावों को सर्वसम्मति से मान्यता प्राप्त है। ये नौं ग्रह व्यक्ति का सार्वभौमिक विशलेषण करने में सक्षम होते है। अतीत, वर्तमान और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारें पूर्व आकलन करने में मद्द करते है। ग्रहों का सम्बन्ध भी व्यक्ति की लिखावट, लेखन शैली और हस्ताक्षर से जरूर होता है। ग्रहों को मजबूत करने के लिए वैसे तो अनेक प्रकार के उपाय है लेकिन आप-अपने हस्ताक्षर में थोड़ा सा संशोधन करके भी ग्रहों को अपने अनुकूल बना सकते है। अपने हस्ताक्षर में आने वाले अक्षरों को कैसे बनाते हैं, इसका भी आपके जीवन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। ऐसा इसलिये क्योंकि हर हक्षर किसी न किसी ग्रह से अपना संबंध रखता है।

उदाहरण के तौर पर अगर आपके हस्ताक्षर में A आता है और आप ए अक्षर में काट-पीट करते हैं या फिर उसे घुमा कर लिखते हैं, तो उसका प्रभाव आपकी पर्सनालिटी व भविष्य पर पड़ता है, क्योंकि ए का सीधा ताल्लुक सूर्य से होता है।

हस्ताक्षर और ग्रहों में संबंध --

एक-एक कर स्लाइडर में आगे बढ़ते जाइये आपको हस्ताक्षर कैसे करने चाहिये, यह पता चलता जायेगा।

हस्ताक्षर और 
सूर्य ग्रह का सम्बंध --
सूर्य का सम्बन्ध राज्य, पद, प्रतिष्ठा, सरकारी नौकरी, सम्मान व प्रसिद्ध आदि से होता है। यदि किसी व्यक्ति का सूर्य कमजोर है तो उसको अपने जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है, उसके बावजूद भी सफलता के लिए तरसता रहता है। सूर्य को मजबूत करने के लिए आपको अपने हस्ताक्षर में कुछ बदलाव करना होगा। हस्ताक्षर को सीधे व स्पष्ट अक्षरों में करें एंव पहले व अन्तिम अक्षर को घुमाने की कोशिश न करके उन्हे सीधा लिखें।

हस्ताक्षर में आते हैं A, D, H, M, T
सूर्य का अंक 1 होता है, इसलिए ए, डी, एच, एम, टी, इन अक्षरों का सीधा व स्पष्ट लिखने से आपका सूर्य बलवान होकर शुभ फल देने लगेगा।

चन्द्र ग्रह का हस्ताक्षर पर प्रभााव--
चन्द्रमा मन का कारक होता है और जब मन अपने हिसाब से दिल व दिमाग को चलाने की कोशिश करने लगता है तो मनुष्य समस्याओं के दलदल में फॅसता चला जाता है। ऐसे स्थिति तभी आती है जब व्यक्ति का चन्द्र ग्रह पीडि़त होकर अशुभ फल देने लगे। चन्द्रमा को बलवान करने के लिए आपको अपने हस्ताक्ष को सजावटी रूप देते हुये सभी अक्षरों को गोल व सुन्दर बनानें होंगे और हस्ताक्षर के अन्त में एक बिन्दु रखने की आदत डालनी होगी।

चंद्र और हस्ताक्षर---

हस्ताक्षर में आते हैं B, D, O, X
चन्द्रमा अंक 2 का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए अंक 2 से सम्बन्धित अक्षर जैसे- बी, डी, ओ, एक्स इन अक्षरों को बड़ा व गोल बनाते हुये इनके नीचे एक बिन्दु लगाना न भूलें। इस प्रकार का उपाय करने से आपको शीघ्र ही चन्द्रमा का शुभ फल मिलना शुरू हो जायेगा।


मंगल ग्रह ओर हस्ताक्षर ---
मंगल पराक्रम, भाई, उत्साह, प्रशासन, प्रापर्टी व प्रशासन आदि का कारक माना जाता है। मंगल की अशुभता को दूर करने के लिए अपने हस्ताक्षर के नीचे पूरी लाईन खीचनें की आदत डालनी होगी और प्रथम अक्षर को बड़ा बनाना होगा।

हस्ताक्षर में C, E, G, L, S, U
सी, ई, जी, एल, एस, यू, इन अक्षरों में किसी भी प्रकार की काट-पीट न करें और इन्हे बड़े सलीके से गोल आकार में बनाने की कोशिश करें। अपनी लिखावट में इस प्राकर का सुधार करने से आप कुछ ही दिनों में आश्चर्य चकित परिणाम पायेंगे।


बुध ग्रह ओर हस्ताक्षर --/
गणित, लेखन, तर्कक्षमता, ज्ञान आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह यदि पापी होकर अशुभ फल देने लगे तो परेशान होने की जरूरत नहीं है बल्कि अपने लेखन व हस्ताक्षर में कुछ बदलाव करना होगा। अतः जब आप हस्ताक्षर करें तो स्पष्ट व गोलाकार बिन्दु रूप में करें और अन्त में गोला बनाकर उससे सटा हुआ प्लस का चिन्ह बना दें।

अगर हस्ताक्षर में हैं C, G, B
सी, जी, बी इन अक्षरों को गोल आकार में बनायें एंव इनके नीचे एक छोटा सा बिन्दु जरूर लगायें। ऐसा करने से आपका बुध ग्रह बलवान होकर अच्छा फल देने लगेगा।

बृहस्पति ग्रह---
बुद्धिमत्ता, विवेक, ज्ञान, दार्शनिकता व महत्कांक्षा का कारक ग्रह गुरू अच्छा होने पर अनके प्रकार के सुखों का भोग कराता है और सामाज में प्रतिष्ठा का पात्र बनाता है। लेकनि जब पीडि़त होकर अशुभ फल देने लगता है तो बहुत कुछ छीन भी लेता है। यदि आपको गुरू को मजबूत करना है तो इसके लिए अपने हस्ताक्षर में कुछ सुधार करना होगा।


अगर हस्ताक्षर में है N, E (देवगुरू वृहस्पति)--
हस्ताक्षर करते वक्त पहला अक्षर काफी बड़ा बनायें तथा हस्ताक्षर को उपर से नीचे की ओर करने की आदत डालें। बृहस्पति से सम्बन्धित अक्षरों को जैसे एन एंव ई, अक्षर को काफी बड़ा व सीधा बनाना होगा। ऐसा करने पर आपका भाग्य पक्ष मजबूत होकर अच्छा फल देने लगेगा और उॅचाईयों की उड़ान भरने में कामयाब होंगे।

शुक्र ग्रह ओर हस्ताक्षर ---

संसार की सभी भौतिक वस्तुओं एंव सौन्दर्यता का प्रतीक शुक्र ग्रह को शक्तिशली बनाने के लिए आप-अपने हस्ताक्षर को सुन्दर, कलात्मक एंव नीचे एक लहराते हुए की एक रेखा खीचें। हस्ताक्षर के अन्तिम अक्षर का उपरी भाग छोटा हो और नीचे का भाग लम्बाई लिये हुये होना चाहिए।

हस्ताक्षर में है U, L, V(शुक्र के प्रतीक)--
शुक्र ग्रह अंक 06 का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए शुक्र से सम्बन्धति अक्षरों को जैसे- यू, एल और वी को स्पष्ट एंव सुन्दर बनाने की कोशिश करें। ऐसा करने पर आप देंखेगें कि कुछ ही दिनों में आपको शुक्र ग्रह अच्छा फल देने लगेगा।

शनि ग्रह ओर हस्ताक्षर --

शनि ग्रह के पीडि़त होने पर व्यक्ति के सारे काम बड़ी धीमी गति से होते है और सफल होने के लिए काफी प्रत्यन करने के बावजूद भी ‘‘उॅट के मुंह में जीरा'' के सामान परिणाम मिलते है। शनि ग्रह को ताकतवर बनाने के लिए हस्ताक्षर के लगभग सभी अक्षरों को बड़ा बनाना होगा एंव हस्ताक्षर के नीचे दो सीधी रेखायें खीचनी होगी। हस्ताक्षर के अन्तिम अक्षर के उपर डबल रेखा बनानी होगी।

हस्ताक्षर में J, K, F का उपयोग --(शनि प्रधान)--
अक्षरों को घुमाकर व तोड़ मरोड़कर व दूर-दूर व अस्पष्ट लिखने से बचना होगा। शनि अंक 8 का प्रतिनिधित्व करता है। अंक 08 से सम्बन्धित अक्षरों को जे, के और एफ में उपर की लाईन को बड़ा बनाना चाहिए एंव जे अक्षर की उपरी लाईन को मोटी करने से धीरे-2 शनि ग्रह बलवान होकर शुभ फल देने लगता है जिससे आपके जीवन की प्रगति में चार-चांद लग जायेंगे।

राहु एंव केतु--
इन ग्रहों के अशुभ हो जाने पर जीवन में अन्धकार का आधिपत्य कायम हो जाता है। मानसिक तनावग्रस्त होकर व्यक्ति उलूल-जलूल काम करने लगता है। जिससे उसके जीवन पर संकट के बादल मडराने लगते है। केतु के अशुभ होने पर व्यक्ति अक्षरों को छोटा बनाता है। राहु व केतु को बलवान बनाने हेतु आप-अपने हस्ताक्षर को लयबद्ध तरीके से करें एंव ज्यादा छोटे अक्षर न बनायें।

हस्ताक्षर में G ---
लिखवाट में बार-बार कांट-छांट से बचना होगा। हस्ताक्षर का पहला अक्षर ज्यादा घुमावदार न बनायें। गोला बनाकर हस्ताक्षर को घेरने से बचना होगा। अक्षर ‘जी' के नीचे का भाग ज्यादा बड़ा न हो एंव अक्षर एस को सुडौल बनायें। हस्ताक्षर में इस प्रकार का संशोधन करने से धारे-2 राहु व केतु शुभ फल देने लगते है और आपके जीवन में प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते है।

सही हस्ताक्षर करना जरूरी
तभी तो कहा जाता है कि सुंदर एवं सही रूप से ही हस्ताक्षर करना बेहद महत्वपूर्ण है। हस्ताक्षर का हमारी ज़िंदगी से कितना गहरा संबंध है यह हम पहले भी एक ब्लॉग ‘ग्रहों के अच्छे-बुरे प्रभाव बताते हैं आपके सिग्नेचर’ में बता चुके हैं। लेकिन इस लेख में हस्ताक्षर किस प्रकार से आपको निरोगी रखने का कार्य करता है यह जानकारी दी जा रही है।

हस्ताक्षर एवं सेहत में संबंध---

हस्ताक्षर विज्ञान के अनुसार व्यक्ति का हस्ताक्षर उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर किस प्रकार से प्रभाव करता है इसे जानने के लिए हस्ताक्षर को तीन विशेष भागों में विभाजित किया जाता है। इस विभाजन के बल पर ही किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर के द्वारा उसे किस प्रकार का रोग जकड़ सकता है या फिर वह हस्ताक्षर में कुछ बदलाव करने से किस तरह के रोगों से बच सकता है, यह सभी जानकारी देता है हस्ताक्षर विज्ञान।

हस्ताक्षर विज्ञान की तीन श्रेणियां
हस्ताक्षर विज्ञान ने हस्ताक्षरित अक्षरों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है

हस्ताक्षर का प्रथम भाग, मध्य भाग एवं अंतिम भाग। 

यह तीनों भाग व्यक्ति को होने वाले रोगों का संकेत देते हैं।

प्रथम भाग---
हस्ताक्षरित अक्षरों का प्रथम यानी आगे का हिस्सा जिसमें हस्ताक्षर का प्रथम अक्षर होता है। यह अमूमन व्यक्ति के असली नाम से ही शुरू होता है। लेकिन कुछ लोगों को अपने हस्ताक्षर के शुरुआत में अपने टाइटल नेम का इस्तेमाल करना भी पसंद होता है। यह प्रथम भाग आमतौर पर बड़े अक्षरों से भरपूर होता है।

मध्य भाग--
इसके बिलकुल विपरीत है हस्ताक्षर का मध्य भाग। यह हिस्सा प्रथम एवं अंतिम भाग के बिलकुल बीच का होता है। यह व्यक्ति के नाम वाले हस्ताक्षर को पूरा करने का कार्य करता है। परन्तु हस्ताक्षर का अंतिम भाग शायद ही अक्षरों से पूरित होता है।

अंतिम भाग--
ज्यादातर लोग अपने हस्ताक्षर के अंतिम भाग में कोई चिन्ह या फिर रेखा लगा कर छोड़ देते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे सहज तरीके से अपने नाम को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। आप प्रत्येक हिस्से में अक्षरों का उपयोग करें या फिर विशेष चिन्हों का, इसका आपके स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं होता।

प्रत्येक भाग का प्रभाव---

यदि कोई बात असरदार है तो वह है कि आप कितने स्पष्ट तरीके से हस्ताक्षर का पूरा करते हैं। हस्ताक्षर विज्ञान के अनुसार हमारे हस्ताक्षर का प्रत्येक भाग हमारे किसी ना किसी शारीरिक अंग को नियंत्रित करता है।

 परिणामस्वरूप प्रथम भाग का केन्द्र होता है व्यक्ति के सिर से कंधों तक का शारीरिक अंग।

शारीरिक अंगों पर नियंत्रण----
इसके अलावा हस्ताक्षर का मध्य भाग छाती से नाभि तक के अंगों का प्रतिनिधित्व करता है। और अंत में आने वाला अंतिम भाग नाभि के नीचे से तलुवों तक के अंगों का प्रतिनिधित्व करता है। इसी आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि हस्ताक्षर का कौन सा भाग किस शारीरिक अंग पर हावी हो रहा है।

मस्तिष्क एवं मन पर काबू---
हस्ताक्षर विज्ञान का मानना है कि व्यक्ति के हस्ताक्षर के तीन भागों में से प्रथम भाग का अन्य दो भागों से अधिक महत्व है। क्योंकि यह व्यक्ति के मस्तिष्क एवं मन दोनों को सहेज कर रखता है। यह व्यक्ति के मानसिक संतुलन को परिभाषित करने में सहायक साबित होता है।

अस्पष्ट अक्षरों का प्रयोग ना करें---
हस्ताक्षर के प्रथम भाग में कुछ खास अंग मौजूद होते हैं, जैसे कि दिमाग, चेहरे के सभी अंग, गर्दन, छाती, दिल, इत्यादि। यदि हस्ताक्षर करते समय व्यक्ति अपने हस्ताक्षर के प्रथम भाग के अक्षरों को अस्पष्ट ढंग से लिखे या फिर टूटे-फूटे अक्षरों में करे तो इसका सीधा प्रभाव उसकी सोच पर होता है।

ब्रेन ट्यूमर, कैंसर जैसी बीमारी---
प्रथम भाग का अस्पष्ट होना उसे निराश बनाता है। हस्ताक्षर विज्ञान का मानना है कि हस्ताक्षर के इस हिस्से से ब्रेन ट्यूमर और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता भी लगाया जा सकता है। इन रोगों से बचाव हेतु व्यक्ति को हस्ताक्षर का प्रथम अक्षर साफ, स्पष्ट और स्वच्छ लिखना चाहिए तथा उसके नीचे ऊपर की ओर किसी भी प्रकार के बिंदु इत्यादि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

हिंदी भाषा में हस्ताक्षर---
लेकिन यदि हस्ताक्षर हिंदी भाषा में लिखा गया हो तो उसके आगे रेखा खींचना सही माना जाता है। प्रथम भाग की तरह ही मध्य भाग में वर्णित अक्षरों को भी यदि हस्ताक्षरकर्ता द्वारा टेढ़ा-मेढ़ा या फिर अटपटा सा आकार दिया गया हो तो उसे हृदय से पेट के बीच के किसी अंग में दिक्कत महसूस हो सकती है।

मध्य भाग का वासना पर कंट्रोल---
कहा जाता है हस्ताक्षर का यह मध्य हिस्सा व्यक्ति की वासना शक्ति को भी दर्शाता है। इसके लिए हस्ताक्षर विज्ञान पुरुष को हस्ताक्षर के मध्य भाग को दक्षिण की ओर बढ़ाने के लिए कहता है और स्त्री के लिए उत्तर की ओर हस्ताक्षर के मध्य भाग को खींचने की सलाह दी जाती है।

गठिया, पैरों में दर्द---
अंतिम में बारी है हस्ताक्षर के अंतिम हिस्से की। यह हिस्सा यदि ठीक ढंग से ना लिखा गया हो तो इसके भीतर मौजूद सभी अंगों को रोगों से जकड़ लेता है। उदाहरण के तौर पर यदि हस्ताक्षर के अंतिम अक्षर अधिक लंबे या फिर सिकुड़े हुए हों तो व्यक्ति को गठिया, पैरों में दर्द या पैरों के किसी किसी रोग से पीड़ित होने की संभावना बनी रहती है।

रोगों के उपाय---
हस्ताक्षर के विभिन्न हिस्से केवल तमाम रोगों को परिभाषित करते हैं, अपितु हस्ताक्षर विज्ञान उन्हें ठीक करने की राय भी देता है। यदि किसी को अक्सर सिर दर्द की दिक्कत रहती है तो उपचार के लिए वह अपने हस्ताक्षर में पीछे की ओर नीचे केवल एक बिंदु का प्रयोग करे और फिर अपने हस्ताक्षर को फाड़कर फेंक दें। लेकिन ध्यान रहे, यह प्रयोग सिर दर्द के समय ही करें।

मानसिक चिंता करे कम---
यदि व्यक्ति मानसिक रूप से चिंतित है तो वह एक कोरे कागज पर बड़ा सा ‘¬’ लिखे और उस ¬ पर हस्ताक्षर कर उसे अपनी आंखों और माथे से छुआकर फिर फाड़कर फेंक दें, इससे चिंता कम होगी। इसके अलावा यदि आंखों का दर्द सता रहा हो तो व्यक्ति हस्ताक्षर के अक्षरों को नीचे की ओर दुहरा करके लिखे और आंखों से छुआकर फाड़कर फेंक दे।

नेत्र एवं कर्ण पीड़ा---
इसके अलावा यदि कर्ण पीड़ा हो तो हस्ताक्षर के केवल आगे और पीछे के अक्षरों को दोहरा कर लिखें और फिर उसे फाड़ कर फेंक दें। दंत पीड़ा से निजात चाहते हैं तो हस्ताक्षर पर एक दांत का चिन्ह बनाकर उसमें तीन बार काटा लगाएं और फिर उसे फाड़कर फेंक दें।

गर्दन तथा कंधों में दर्द---
यदि गर्दन की पीड़ा हो तो हस्ताक्षर करके उसके मध्य बगुले की गर्दन का एक चिह्न बनाएं और उसे फाड़कर फेंक दें। इसी प्रकार से कंधों में दर्द होने पर रात्रि के समय हस्ताक्षर करके उन्हें तकिये के बीच में रखें। सुबह उठकर उसे घूरकर देखें और फाड़कर फेंक दें, कंधों का दर्द दूर होगा।

छाती की पीड़ा---
छाती की पीड़ा होने पर अनार की कलम और अनार के ही रस से हस्ताक्षर करें और फिर उसे अनार के रस में डुबोकर कहीं कच्चे स्थान में गड्ढा खोदकर दबा दें। इससे छाती में जमे बलगम, सांस की तकलीफ अथवा किसी अन्य कारणवश हुई छाती की तकलीफ से मुक्ति मिलेगी। हाथों की पीड़ा होने पर अमरूद के पत्ते पर हस्ताक्षर करें और फिर फूंक मारकर उसे हवा मे उड़ा दें।

उदर पीड़ा का इलाज---
यदि किसी को उदर पीड़ा सता रही है तो वह व्यक्ति अमरूद के पत्तों को जलाकर उसकी चुटकी भर राख चाट ले। फिर अमरूद के पेड़ की लकड़ी की कलम से उसी राख से किसी कोरे कागज पर अपने हस्ताक्षर करें और उस कागज को जला दे। इससे उदर पीड़ा कम होगी।

नितंबों की पीड़ा होने पर---
इसके अलावा नितंबों की पीड़ा होने पर गुड़ का घोल बनाएं और कोरे कागज पर सरकंडे की कलम से अपने हस्ताक्षर करें। फिर उसे सुखाकर उसके बीच में बाजरे के दाने जितनी छोटी-छोटी गुड़ की डली रखकर उसे किसी छायादार वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर उसमें दबा दें, नितंबों की पीड़ा कम होगी।

बुखार दूर करें--
यदि किसी को बुखार हुआ हो तो एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर कर उस पर एक चम्मच चीनी रखकर अपने ऊपर से 7 बार उतारें, इसके बाद उसे किसी गंदी नाली में फेंक दें। यदि किसी कारणवश गंदी नाली मिले तो फ्लश में डालकर फ्लश चला दें।

यदि आप उपरोक्त दिए सभी सुझावों को सहजापूर्वक प्रयोग करते हैं तो ऐसे रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।




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