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बलात्कार की पीड़िता “नारी” और “सनातन धर्म”



यदि किसी महिला के साथ बलात्कार अथवा शीलभंग जैसी कुत्सित घटना (कभी भगवान् न करे) घटित हो जाए तो उसकी स्थिति को समाज में बड़ी दयनीय समझा जाता हैं । टेलीविज़न और सिनेमा ऐसी परिस्थितियों से भरे पड़े हैं जहां नायिका स्वयं कहती हैं की –“मैं तुम्हारे लायक नहीं रही” अथवा नायक या उसके परिवार वाले या स्वयं नायिका के परिवारवाले ऐसी पीड़ित महिला का परित्याग कर देते हैं (फिर एक सीरियस गाना चलाया जाता हैं) ।

मीडिया पर भी जब ऐसा समाचार दिखाया जाता हैं तो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से “नारी” को बड़ी अबला बताया जाता हैं । कुल मिलाकर सारे समाज में ऐसा जताया जाता हैं की जैसे पीड़ित महिला दूषित हो गई हो और उसके दोष-निवारण का कोई उपाय नहीं ।

मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं की “नारी” को दूषित , कलंकित अथवा अबला समझा जाता होगा विधर्मी संस्कृति में , हमारी “सनातन संस्कृति” में नहीं । हमारी “संस्कृति” में “नारी” (कैसी भी परिस्थिति में) पूज्या और पवित्र हैं । आइये पहले बता दूं की बलात्कार की शिकार “नारी” के विषय में “सनातन धर्म” के क्या प्रावधान हैं :-

सनातन धर्म के अनुसार – “ यदि किसी स्त्री का बलात्कार हो गया हो अथवा वह शत्रुओं के हाथों में पड़ गई हो तो उसे अपवित्र नहीं समझना चाहिए और अपमानित नहीं करना चाहिए । ऋतुकाल आनेपर ऐसी पीड़ित स्त्री स्वयं पूर्णतः शुद्ध एवं पूर्ववत हो जाती हैं ।

ऐसी स्त्री का परित्याग बिलकुल नहीं करना चाहिए । उनके त्याग का विधान नहीं हैं । उनका पूर्ववत आदर-सम्मान करना चाहिए ।“ देखिये :–

1) बलात्कारोपभुक्ता वा चौरहस्तगतापि वा ।

न त्याज्या दयिता नारी नास्यास्त्यागो विधीयते ॥(स्कन्दपुराण काशि० पू० 40|47)

2) स्वयं —————————— शुध्यते ॥ (वसिष्ठस्मृति 28|2-3)

3) स्वयं —————————— शुद्धयति ॥ (अत्रि संहिता 195-197)

मैने एक-दो नहीं तीन-तीन प्रमाण प्रस्तुत किये धर्मशास्त्रों से । इसके अतिरिक्त अनेकों व्यावहारिक उदाहरण भी लिए जा सकते हैं धर्मशास्त्रों से जो की विस्तारभय से आज यहाँ दे नहीं रहे हैं ।

मैं पूछता हूँ की क्या टेलीविज़न , सिनेमा और मीडिया ने “नारी” की दयनीय स्थिति प्रदर्शित करने से पहले यह जानने का प्रयत्न किया की इस विषय में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का क्या दृष्टिकोण हैं ? क्या इनको इस बात का ज्ञान हैं की सनातन संस्कृति कितनी उन्नत , कितनी महान हैं ?

उत्तर मिलेगा – नहीं !

टेलीविज़न , सिनेमा और मीडिया पूरी तरह से विधर्मी मानसिकता पर आधारित हैं । वस्तुतः वोह विधर्मी मानसिकता हैं जहां “नारी” को भोग्या(उपभोग की वस्तु) समझा जाता हैं । उपभोग हो जाने पर अथवा ऐसा कोई काण्ड (बलात्कार ) हो जाने पर वहाँ “नारी” को त्याग दिया जाता हैं ।

टेलीविज़न , सिनेमा और मीडिया ; इनका भारतीय मानसिकता से कोई लेना-देना नहीं । परिणाम यह हुआ की इन्होने विधर्मी संस्कृति दिखा-दिखाकर 90% भारतीय मानसिकता को भी विधर्मी मानसिकता का रंग दे दिया हैं । यह लोग टीआरपी के चक्कर में पीडिता को “निर्भया” , “दामिनी” आदि अनेकों काल्पनिक नाम दे डालते हैं जिससे “पीडिता” को स्वयं के “पीडिता” होने का अहसास कई गुना बढ़ जाता हैं । “पीडिता” पर दूषित होने का , कलंकित होने का धब्बा लगा दिया जाता हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा होता नहीं । “पीडिता” सर्वथा निर्दोष , निष्कलंक और पूर्णतः शुद्ध ही हैं ।

होना यह चाहिए की यह लोग ऐसी कठिन परिस्थिति में “पीडिता” और उसके परिवार का साथ दे और उसे सामान्य होने में पूरी मदद करे । जहां एक तरफ सरकार अपराध होने के कुछ ही घंटों के भीतर अपराधियों (चाहे बालिग़ हो या नाबालिग) को कठोर मृत्युदंड दे वहीँ मीडिया इत्यादि जिम्मेदारी से “पीडिता” और उसके परिवार को “सनातन धर्म” के सिद्धांतों का स्मरण कराते हुए सामान्य अवस्था में ले आयें । समाज को भी चाहिए की सनातन धर्म के अनुसार चलते हुए “#पीडिता” का #सम्मान_पूर्ववत_करे ।

from FB wall of पं. अभिषेक जोशी 

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