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नारी देह के अलावा आज उसे कुछ सूझता नहीं:सुलक्षणा

ए साहिब! मेरे देश की विडंबना तो देखिए जरा,
सन्नी लियोन की अदा पर नौजवान जा रहा मरा।

सोचने समझने की ताकत अब उसमें बची नहीं,
हमारी सभ्यता, संस्कृति की बातें उसे जची नहीं,
भूल गया है संस्कारों से ही बनता है जीवन खरा।

नारी देह के अलावा आज उसे कुछ सूझता नहीं,
कामाग्नि का शोला उसका किसी पल बुझता नहीं,
बस इस कामसूत्र पर ही उसका दिमाग जा ठहरा।

अबोध बालिकाएं, अधेड़ महिलाएं बन रही शिकार,
किसी को नहीं पता है, कब, किस पर हो जाये वार,
ऊपर से खुश है हर कोई, पर अंदर से रहता है डरा।

दोषी ये नौजवान नहीं, माँ बाप और समाज भी है,
लगाम कसते नहीं शुरू में, बाद में आती लाज भी है,
नग्न होती औरतों ने दिमाग में हवस का जहर भरा।

"सुलक्षणा" का कर्म है चेताना, वो हर पल चेता रही,
औरत खुद त्यागें नग्नता, बेटों को मिले संस्कार सही,
तभी बेटियों से सुसज्जित रहेगी हमारी पावन धरा।

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