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सारे दरख़्त कट गये फिर भी मंज़र-ए-आम कुछ भी नहीं- डॉ.ममता एक्का

मैं सच बोलती रही,मगर फासलों में रही- डॉ.ममता एक्का
होटल अशोका लेक व्यू में ग़ज़ल संग्रह एहसास की एक मंजिल का विमोचन

शुभम चौहान :भोपाल :शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर व उड़ीया,हिंदी,उर्दू एवं अंग्रेजी भाषा की जानकार डॉ.ममता एक्का के ग़ज़ल संग्रह 'एहसास की मंज़िल' का विमोचन होटल लेक व्यू अशोका में मुख्य अतिथि श्री रमाकांत दास (पूर्व ज्वाइंट सेक्रेट्री पार्लियामेंट) तथा अध्यक्षता श्री विल्फ्रेड लकड़ा (सेवानिवृत्त आईएएस) के द्वारा किया गया।इस अवसर पर पुस्तक समीक्षा डॉ.नोमान खान तथा साज़िद रिज्वी ने की।

डॉ.एक्का उड़ीया भाषी होने के वावजूद भी अपने अहसास को उर्दू भाषा के शब्दों को माध्यम बनाकर नज़्मों के रुप में पेश किया।उन्होंने कहा कि उर्दू ग़ज़लें, नज़्में मेरे दिल के तारों का झनझना देती थी। मुझे यह विश्वास होने लगा कि उर्दू के शब्दों में एक नग्मगी है,मौसिकी है।उन्होंने अपनी चुनिंदा शायरी एवं नज़्मों का पाठ करते हुए सुनाया कि मैं सच बोलती रही, मगर फासलों में रही,वो छूट बोलते रहे, और तेरे करीब रहे‌।खुशबू हर फूल में,एक सी नहीं होती,तेरे वजूद की मिट्टी में, खुशबू पराई नहीं होती।

मुख्य अतिथि श्री रमाकांत दास जो खुद एक कवि भी है उन्होंने कहा कि ममता ने अपनी अनुभूतियों के प्रस्तुत करने के लिए जिस भाषा,जिन शब्दों को चुना है वह प्रभावशाली है।बहुत बारीक एहससात, उन्होंने बड़ी खूबसूरती से पेश किया है।अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए विल्फ्रेड लकड़ा ने कहा कि ममता की हर नज़्म असरदार है।

उनका यह नजरिया उन्हें अच्छे लेखन के लिए सदैव प्रेरित करेगा।समीक्षा करते हुए साजिद रिज़वी ने कहा कि मुझे यकीं है कि डॉ. ममता एक्का की शायरी अंदर की छटपटाहट की गवाह है उनके दुख में गुथा हुआ ऐसा चंदन है जिसकी भीनी-भीनी महक हम सब को महसूस होगी। जज़्बात का झरना जब भी फूटता है,अल्फाज की लहरें उसे ऐसी रवानी अता कर देती हैं,कि देखते ही देखते नग़मात का दरिया कब वजूद में आ जाये पता ही नहीं चलता।

इस अवसर पर जे.टी एक्का, नंदनी मोहंती,आईएएस एमएम उपाध्याय,आरके शर्मा, पूर्व प्राचार्य डॉ.सुधा सिंह,डॉ. सुरेंद्र शुक्ला,डॉ. सुधीर कुमार शर्मा,डॉ.अजय कुमार घोष,डॉ.अपराजिता शर्मा, डॉ.उषा शर्मा सहित राजधानी के साहित्यकार उपस्थित रहे। संचालन एवं आभार डॉ.मोहम्मद आज़म खान ने किया।



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