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अध्यात्म-ज्ञानगंगा ऋषियों के चिंतन में वैज्ञानिकता ओतप्रोत


योग में "यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे" रूप अध्यात्म- विज्ञान को इन शब्दों में पूर्णतया शिवत्व के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया है।

यस्मिन्दर्पणबिम्बजम्भितपुरी।
भातं यत्परसंविदो यत् इदं रूपयादिवल्लीयते।।
यस्याज्ञानविजृम्भिता परभिदावारीन्दु भेदादिवत।
तं भूमानमुपास्महे हृदि सदा वाघारघानिम् शिवम्।।

अर्थात्--भगवान् ने मनुष्य के साढ़े तीन हाथ के शरीर में भूर्भुवः स्व: आदि सप्त लोकों तथा सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, पर्वत, सागर, वृक्ष आदि सभी वस्तुओं को बिम्बवत् प्रतिफलित कर दिया है। शिव संहिता के द्वितीय पटल में योगी की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की संज्ञा वाली देह में जिस प्रकार अनेक देशों की व्यवस्था है, उसे पूर्णतया जान लेने वाला ही योगी है।

जानाति यः सर्वमिदं योगी नात्र संशयः।
ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथा देशं व्यवस्थितः।।

योग में मानव शरीर का विभाजन षट्चक्रों के रूप में किया गया है जैसे--मूलाधार चक्र (चतुर्दल पद्य), स्वाधिष्ठान चक्र (षड्दल पद्य), मणिपूरक चक्र (दश दल पद्य), अनाहत चक्र (द्वादश दल पद्य), विशुद्ध चक्र (षोडश दल पद्य) और आज्ञाचक्र (द्विदल पद्य)। इनके स्थान पर आधुनिक शरीर-शास्त्र की दृष्टि से क्रमशः -कटि अस्थि (पेल्विक प्लेक्सस), नाभि-उदर प्रदेश (हाइपोगेस्ट्रिक प्लेक्सस), फेफड़े (ऐपेगेस्टिव प्लेक्सस, ह्रदय और यकृत (कार्डियक प्लेक्सस), गल प्रदेश (कैरोटिड प्लेक्सस) और भृकुटि मध्य (मेडुला) है। इनके ऊपर सहस्त्रदल अर्थात् मस्तिष्क प्रदेश है। चतुर्दल में पृथ्वी तत्व, षड्दल में जलतत्व, दशदल में अग्नितत्व, द्वादशदल में वायुतत्व और षोडशदल में आकाश तत्व की प्रधानता है। इसका तात्पर्य यह है कि शरीररथ के सञ्चालन के लिए उक्त तत्वों का उक्त स्थानों  पर विशेष रूप से निर्माण हो रहा है।

दल से तात्पर्य उन उन स्थानों पर नाड़ियों के गुच्छरूप से है। इन तत्वों के बीजाक्षर तंत्र -शास्त्रोक्त लं (पृथ्वी), वं (जल), रं (अग्नि), यं (वायु) और टम (आकाश) है। ये बीजाक्षर उन ध्वनियों के अनुकरण पर है जो उन तत्वों के निर्माण के समय शरीर में उन उन स्थानों पर गूंजती रहती हैं। इन ध्वनियों को सूक्ष्म ध्वनिग्राही यंत्रों से सुना जा सकता है। शरीर जो अन्न ग्रहण करता है, उससे निःसृत होने वाले पंचतत्व निर्दिष्ट स्थानों में संग्रहीत होते हैं। तंत्रशास्त्र में बीजों के वाहन इस प्रकार निर्दिष्ट हैं--लं (ऐरावत हाथी), वं (मकर), टम (मेष), यं (मृग)। वायु भिन्न-भिन्न तत्वों से मिलकर जिस प्रकार की गति उत्पन्न करता है, यहाँ उसी का निर्देशन किया गया है। दलों के वर्ण (रंग) इस प्रकार हैं--चतुर्दल (रक्तवर्ण), षड्दल (गुलाबी), दशदल (नीलवर्ण), द्वादश दल (लाल वर्ण) और षोडश दल (धूम्र वर्ण) रुधिर के अरुण वर्ण पर भिन्न- भिन्न तत्वों का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसका जो रंग होता है, उसे ही यहाँ निर्दिष्ट किया है। शरीर में भिन्न-भिन्न नाड़ियां वायु की मदद से जिस आकार में चक्कर काटतीं हैं, वे ही इन दलों के विशिष्ट यंत्र हैं। जैसे--चतुरस्त (चतुर्दल) अर्धचंद्राकार, (षड् दल), त्रिकोणाकार, (दशदल) और लिंगाकार (द्विदल)।  द्विदल (भ्रूमध्य) में ॐ प्रणव बीज है। सहस्त्रदल में शून्यतत्व है। विसर्ग (:) ह्रीं उसका बीज है। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने कहा था कि ब्रह्माण्ड को देखने से लगता है जैसे उसके पीछे किसी का विराट मस्तिष्क हो। यही ब्रह्माण्ड का सहस्त्रार है जो मानव मस्तिष्क में निहित है। शून्य अर्थात् बिन्दुतत्व से ही विसर्ग (:) अर्थात् सृष्टि हुई--तंत्रशास्त्र की यही अन्तिम निष्पत्ति है।

शिव तत्व

 ऋषि प्रज्ञा यज्ञ और कर्म सेअध्यात्म की ओर अर्थात् योग और ज्ञान की ओर उन्मुख हुई है। लेकिन इनके मूल में जो तत्व है, वह है-- उपासना। उपासना जो हृदय में स्थित होती है, उसका आधार है--तंत्र। प्रत्येक पिण्ड के तीन रूप बनते हैं--1- यंत्र अर्थात् मेकेनिज्म, 2- तंत्र अर्थात् गवर्नमेंट और 3- मन्त्र अर्थात् मेनास या माइंड।
यंत्र उसका बाहरी रूप है जैसे घडी का बाहरी रूप। तंत्र उसकी अंदरुनी व्यवस्था है जैसे घडी के अंदर के पहिये और लिवर आदि। घडी चलती है, उसके पीछे एक गणित है जिसके आधार पर उसके भीतरी अवयवों (तंत्र) का निर्माण हुआ है। वह मानवीय प्रज्ञा का रहस्य बताती है--यही मन्त्र है। इसी व्यवस्था को अध्यात्म-शास्त्र में आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक व्यवस्था कहते हैं।

मनुष्य मात्र यंत्र नहीं है। वह 'भगवती मन्त्र' से परिचालित तंत्र है। तंत्र ने जीवन और जगत के जिस पराविज्ञान को त्रिकोण, षट्कोण, श्रीचक्र आदि के रूप में व्यक्त किया है--उसी को यज्ञधारा ने 'अग्निवेदियों' के रूप में स्पष्ट किया है। योग ने उसी को 'पद्यदलों' के रूप में समझाया है।  प्रस्थान भेद से अलग रहते हुए भी योग और तंत्र एक ही विज्ञान का रूप प्रस्तुत करते हैं और वह विज्ञान है--'उपासना विज्ञान'। ""नर देह में नारायण का साक्षात्कार करा देना ही भारतीय संस्कृति का चरम लक्ष्य है""। जो मनुष्य मानव जीवन पाकर भी इस लक्ष्य (परम पुरुषार्थ) को प्राप्त न कर सका, उसका जीवन सारे भौतिक ऐश्वर्य के बावजूद व्यर्थ ही चला गया। इसी पुरुषार्थ की सिद्धि का उपयुक्त माध्यम होने के कारण व्यास ने कहा है।

"न हि मानवात श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्।"

 अर्थात्--मनुष्य से श्रेष्ठ इस संसार में कुछ भी नहीं है।         आज की प्रमुख समस्या यह है कि मानव मस्तिष्क को अहंकार से मुक्त कर कैसे मानव के वास्तविक कल्याण में लगाया जाय ? इस प्रसंग में विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का जो खोखला सुझाव दे दिया जाता है, वह नितान्त अवैज्ञानिक है। अध्यात्म पूर्णतम विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान उसी ओर विकासोन्मुख है। आवश्यकता यह है कि आज का मानव जीवन हर क्षेत्र में अध्यात्म के प्रकाश में आगे बढ़ने का प्रयास करे। यही शान्ति और कल्याण का शाश्वत राजमार्ग है।
आधुनिक विज्ञान के सन्दर्भ में तंत्रशास्त्र द्वारा प्रतिपादित शिव-शक्तिवादी नयी समझ पैदा होगी--इसमें कोई सन्देह नहीं। सृष्टि और सृष्ट पदार्थों के मूल में तरंगायित शक्ति नवीन विज्ञान की देन है। अब ध्वनि तरंगें प्रकाश तरंगों में परिवर्तित की जा सकती हैं। नादतत्व से बिन्दुतत्व का प्रादुर्भाव तंत्रोक्त है। इसी दिशा में अब विज्ञान प्रगति कर रहा है। पदार्थों के सम्बन्ध में नवीनतम अवधारणा उर्जामूलक है। स्थितिशील ऊर्जा (स्टेटिक इनर्जी) ही पदार्थ है। मुक्त गतिशील ऊर्जा

(डायनमिक इनर्जी) अमूर्त है। तंत्र की भाषा में स्थितिशील मूलऊर्जा ही "शिव" है। गतिशील ऊर्जा ही "शक्ति" है। स्पन्दविज्ञान अब अंतरिक्ष विज्ञान के आलोक में समझा जा सकता है। आकाश, अवकाश का वह स्वरुप है जिससे प्रकाश-तरंगें चलती हैं। 'नभ्' धातु का अर्थ है--ध्वनि। अंतरिक्ष, आकाश का वह स्वरुप है जो रात्रिकाल में सूर्य की अनुपस्थिति में दिखाई देता है जिसमें ज्योति तरंगों के समान नीहारिकाओं तथा असंख्य ग्रहपिंडों का दर्शन होता है। ये समस्त ज्योतियां किसी दूरंगत एक ज्योति से ही निःसृत हुई हैं।

"दूरंगतं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु।"

वह एक परम ज्योति ही शिवसंकल्प है। उसी शिवसंकल्प से कल्पसृष्टि हुई। वही महाकाल है। 'कल' धातु से ही कला और काल शब्द निष्पन्न हुए हैं। शिवसंकल्प की स्वतंत्रता और स्वयं स्फूर्ति से ही अनेक कलाओं में चंद्रकलावत ब्रह्मांडों की सृष्टि हुई है। काल की शक्ति ही काली है। कल्प और काल एक हैं। वे एक दूसरे में परिवर्तनीय हैं। आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सन्दर्भ में तंत्र के इस पराविज्ञान को समझने की नयी दृष्टि पैदा होती है। भर्तृहरि ने दिक् (कल्प) और काल के इस अद्वैत को मूल चिततत्व के सन्दर्भ में, उसी की स्तुति में, इन शब्दों में प्रकट किया है।

"दिक्ककालनवच्छिन्नानंतचिन्तात्रामूर्तये।
स्वानुभूत्येक रूपाय नमः शान्ताय तेजसे।।

हाल ही में लाखों-करोड़ों प्रकाश वर्षों पर स्थित ब्रह्मपिण्डों से ऐसे रेडियो संकेत (स्पन्द) प्राप्त हो रहे हैं जिनके आधार पर कुछ वैज्ञानिक ऐसे ग्रहों की उपस्थिति का अनुमान लगा रहे हैं जहाँ मानवीय सभ्यता से कहीं उच्चतर सभ्यता है। इसका माध्यम ये 'स्पन्द' (रेडियों संकेत) ही हैं। जिस आकाश से ये स्पन्द निःसृत होते हैं, उसे तंत्रों में और ऋग्वेद में "व्योम" कहा गया है। व्योम को ऋषि परमपद कहते हैं। यह विशिष्ट 'ॐ' नाद के प्रथम विस्फोट का ही आदि परिणाम है।

रविशराय गौड़
अध्यात्मचिन्तक
ज्योतिर्विद
9926910965

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