समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से ‘‘तुलसी’’ की उत्पत्ति हुई:रविशराय गौड़

‘तुलसी’’ उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से ‘‘तुलसी’’ की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मदेव ने उसे भगवान विष्णु को सौंपा।


लंका में विभीषण के घर तुलसी का पौधा देखकर हनुमान अति हर्षित हुये थे। इसकी महिमा के वर्णन में कहा गयाहै, (रामायुध अंकित गृह शोभा वरिन न जाई। नव तुलसी के वृन्द तहंदेखि हरषि कपिराई)पद्म पुराण में लिखा है कि जहाँ तुलसी का एक भी पौधा होता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी निवास करते हैं।

तुलसी की सेवा करने से महापातक भी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य केउदय होने से अंधकार नष्ट हो जाता है। जिस प्रसाद में तुलसी पत्र नहीं होता उसे भगवान स्वीकार नहीं करते। भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण और पांडुरंग (श्री बालाजी) के पूजन के समय तुलसी पत्रों का हार उनकी प्रतिमाओं को अर्पण किया जाता है।

तुलसी को दैवी गुणों से अभिपूरित मानते हुए इसके विषय में अध्यात्म ग्रंथों में काफ़ी कुछ लिखागया है। तुलसी औषधियों का खान हैं। इस कारण तुलसी को अथर्ववेद में 'महाऔषधि' की संज्ञा दी गई हैं। इसे संस्कृत में 'हरिप्रिया' कहते हैं। इस औषधि की उत्पत्ति से भगवान् विष्णु का मनः संताप दूर हुआ इसी कारण यह नाम इसे दिया गया है। ऐसा विश्वास है कि तुलसी की जड़ में सभी तीर्थ, मध्य में सभी देवि-देवियाँ और ऊपरी शाखाओं में सभी वेद स्थित हैं।

तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक समझा जाता है तथा पूजन करना मोक्षदायक। देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है। तुलसी पत्र से पूजा करने से व्रत, यज्ञ, जप, होम, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है, जिनके मृत शरीर का दहन तुलसी की लकड़ी की अग्नि से क्रिया जाता है, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

प्राणी के अंत समय में मृत शैया पर पड़ेरोगी को तुलसी दलयुक्त जल सेवन कराये जाने के विधान में तुलसी की शुद्धता ही मानी जाती है और उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो, ऐसा माना जाता है।प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार देव और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से ‘‘तुलसी’’ की उत्पत्ति हुई।

 ब्रह्मदेव ने उसे भगवान विष्णु को सौंपा। लंका मेंविभीषण के घर तुलसी का पौधा देखकर हनुमान अति हर्षित हुये थे। इसकी महिमा के वर्णन में कहा गयाहै, (नामायुध अंकित गृह शोभा वरिन न जाई। नव तुलसी के वृन्द तहंदेखि हरषि कपिराई)पद्म पुराण में लिखा है कि जहाँ तुलसी का एक भी पौधा होता है।

वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी निवास करते हैं। तुलसी की सेवा करने से महापातक भी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य केउदय होने से अंधकार नष्ट हो जाता है। जिस प्रसाद में तुलसी पत्र नहीं होता उसे भगवान स्वीकार नहीं करते। भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण और पांडुरंग (श्री बालाजी) के पूजन के समय तुलसी पत्रों का हार उनकी प्रतिमाओं को अर्पण किया जाता है।

 तुलसी - वृन्दा श्रीकृष्ण भगवान की प्रिया मानी जाती है और इसका भोग लगाकर भगवत प्रेमी जन इसका प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। स्वर्ण, रत्न, मोती से बने पुष्प यदि श्रीकृष्ण को चढ़ाए जाएँ तो भी तुलसी पत्र के बिना वे अधूरे हैं। श्रीकृष्ण अथवा विष्णुजी तुलसी पत्र से प्रोक्षण किए बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते।

इस पौधे की पूजा विशेष कर स्त्रियाँ करती हैं। सद गृहस्थ महिलाएं सौभाग्य, वंश समृद्धि हेतु तुलसी- पौधे को जल सिंचन, रोली अक्षत से पूजकर दीप जलाती हुई अर्चना-प्रार्थना में कहती है।सौभाग्य सन्तति देहि, धन धान्यं व सदा। वैसे वर्ष भर तुलसी के थाँवले का पूजन होता है, परन्तु विशेष रूप से कार्तिक मास में इसे पूजते हैं।

कार्तिक मास में विष्णु भगवान का तुलसीदल से पूजनकरने का माहात्म्य अवर्णनीय है।तुलसी कथाधर्मध्वज की पत्नी का नाम माधवी तथा पुत्री का नाम तुलसी था। वह अतीव सुन्दरी थी। जन्म लेते हीवह नारीवत होकर बदरीनाथ में तपस्या करने लगी। ब्रह्मा ने दर्शन देकर उसे वर मांगने के लिए कहा।

उसने ब्रह्मा को बताया कि वह पूर्वजन्म में श्री कृष्ण की सखी थी। राधा ने उसे कृष्ण के साथ रतिकर्म में मग्न देखकर मृत्यृलोक जाने का शाप दिया था। कृष्ण की प्रेरणा से ही उसने ब्रह्मा की तपस्या की थी, अत: ब्रह्मा से उसने पुन: श्री कृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने का वर मांगा। ब्रह्मा ने कहा -- तुम भी जातिस्मरा हो तथा सुदामा भी अभी जातिस्मर हुआ है, उसको पति के रूप में ग्रहण करो।

नारायण के शाप अंश से तुम वृक्ष रूप ग्रहण करके वृंदावन में तुलसी अथवा वृंदावनी के नाम से विख्यात होगी। तुम्हारे बिना श्री कृष्ण की कोई भी पूजा नहीं हो पायेगी। राधा को भी तुम प्रिय हो जाओगी। ब्रह्मा ने उसे षोडशाक्षर राधा मंत्र दिया दूसरी कथा महायोगी शंखचूड़ नामक राक्षस ने महर्षि जैवीषव्य से कृष्णमंत्र पाकर बदरीनाथ में प्रवेश किया।

अनुपम सौंदर्यवती तुलसी से मिलने पर उसने बताया कि वह ब्रह्मा की आज्ञा से उससे विवाह करने के निमित्त वहाँ पहुँचा था। तुलसी ने उससे विवाह कर लिया। वे लोग दानवों के अधिपति के रूप में निवास करने लगे। जब शंखचूर्ण का उपद्रव बहुत बढ़ गया तो एक दिन हरि ने अपना शूल देकर शिव से कहा कि वे शंखचूड़ को मार डालें। शिव ने उस पर आक्रमण किया।

सबने विचारा कि जब तक उसकी पत्नी पतिव्रता है तथा उसके पास नारायण का दिया हुआ कवच है, उसे मारना असम्भव है। अत: नारायण ने बूढ़े ब्राह्मण के रूप में जाकर उससे कवच की भिक्षा मांगी। शंखचूड़ का कवच पहनकर स्वयं उसका सारूप बनाकर वे उसके घर के सम्मुख दुंदुभी बजाकर अपनी देवताओं पर विजय की घोषणा किया।

प्रसन्नता के आवेग में तुलसी ने उनके साथ समागम किया। तदनन्तर विष्णु को पहचानकर पतिव्रत धर्म नष्ट करने के कारण उसने शाप दिया- "तुम पत्थर हो जाओ। तुमने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने भक्त के हनन के निमित्त उसकी पत्नी से छल किया है।"

 शिव ने प्रकट होकर उसके क्रोध का शमन किया और कहा- "तुम्हारा यह शरीर गंडक नामक नदी तथा केश तुलसी नामक पवित्र वृक्ष होकर विष्णु के अंश से बने समुद्र के साथ बिहार करेगा। तुम्हारे शाप से विष्णु गंडकी नदी के किनारे पत्थर के होंगेऔर तुम तुलसी के रूप में उन पर चढ़ाई जाओगी।

शंखचूड़ पूर्वजन्म में सुदामा था, तुम उसे भूलकर तथा इस शरीर को त्यागकर अब तुम लक्ष्मीवत विष्णु के साथ विहार करो। शंखचूड़ की पत्नी होने के कारण नदी के रूप में तुम्हें सदैव शंख का साथ मिलेगा। तुलसी समस्त लोकों में पवित्रतम वृक्ष केरूप में रहोगी।" शिव अंतर्धान हो गये और वह शरीर का परित्याग करके बैकुंठ चली गई। कहते हैं, तभी से विष्णु के शालिग्राम रूप की तुलसी की पत्तियों से पूजा होने लगी।

श्रीकृष्ण ने कार्तिक की पूर्णिमा को तुलसी का पूजन करके गोलोक में रमा के साथ विहार किया, अत:वही तुलसी का जन्मदिन माना जाता है। प्रारम्भ में लक्ष्मी तथा गंगा ने तो उसे स्वीकार कर लिया था, किन्तु सरस्वती बहुत क्रुद्ध हुई।

तुलसी वहाँ से अंतर्धान होकर वृंदावन में चली गई। इसलिए उन्हें वृन्दा भी कहा गया है। जहां तुलसी बहुतायत से उगती है वह स्थान वृन्दावन कहा जाता है। इसी वृन्दा के नाम पर श्री कृष्ण की लीला भूमि का नाम वृन्दावन पड़ा। नारायण पुन: उसे ढूँढ कर लाये तथा सरस्वती से उसकी मित्रता करवा दी। सबके लिए आनंदायिनी होने के कारण वह नंदिनी भी कहलाती है।

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
अध्यात्मचिन्तक

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