सभी उस अनदेखी ताक़त को हराने में लगे हैं

कैसी अज़ीब है ये जंग, जिसमे एक तरफ़ ज़िन्दगी है।
दूसरी तरफ़ एक अनदेखी हक़ीक़त, सिर्फ और सिर्फ मौत।।

आज हम सभी उस अनदेखी ताक़त को हराने में लगे हैं, जिसे कभी कोई देख नही पाया और ना ही इसे कोई देख सकता पर फिर भी इसका दंश इसकी मार समग्र विश्व झेल रहा है।
विश्वपटल पर एक भयानक बीमारी COVID-19, ने तांडव मचा रखा है, जिसके चलते हज़ारों लोग अपनी जान गवा चुके हैं। कहीं किसी का भाई, कही किसी का पति, कहीं किसी का बेटा, कहीं किसी का बाप संक्षेप में अगर किसी घर मे कोई एक जिसने अपनी जान गवाई है वो सर्फ एक ही नही वो किसी के लिए भाई किसी के लिए बेटा किसी के लिए पति किसी के लिए पिता था, तात्पर्य एक शरीर मे न जाने कितने रिश्ते कितनी उम्मीदें वो अकेला लेकर चला गया।
दोस्तों ये आसान नहीं परंतु फिर भी जितना आसान दिख सकने वाले शत्रु को पराजित करना होता है शायद उतना आसान ना दिख सकने वाले दुश्मन को पराजित करना नहीं। तो किस प्रकार ये उम्मीद लगाई जाए कि हम इस अदृश्य ताक़त का सामना करने के लिए तैयार हैं, ये जानते हुए भी की अभी तक इतना उन्नत विज्ञान भी इसका इलाज ढूंढ पाने में सक्षम नहीं हो पाया है???

ये जानते हुए भी कि छू लेने मात्र से ही ज़िन्दगी को खतरा हो रहा है उस पर भी कुछ समझदार लोग अपने आप को बहुत सक्षम और आरोग्य समझने की गलतफहमी लिए अपनी सुरक्षा को भूल कर, अपने आत्मविश्वास के अभिमान के अंधकार में कुछ इस तरह चूर हैं कि उन्हें कोई सुरक्षा चक्र कोई नियम नहीं दिखायी दे पा रहा है। मेरा उन सभी लोगों को करबद्ध निवेदन है कि कृपया इस अभिमान के असीमित दरिया में डूब चुके ज़िंदा शरीरों, जब तक साँस है और अपनों के साथ जीवित हो, तब तक उनका हँसता हुआ चेहरा देखिए एवं उनकी मुस्कान (आपका खिलखिलाता चेहरा) बनाये रखिये। कृपया सभी अपने घरों में रहें, देखिये जब तक आप सुरक्षित हैं आपका परिवार भी सुरक्षित है, अथवा ना आप सुरक्षित ना ही आपका परिवार।

आप अपने आप मे सिर्फ एक नही, आप किसी की आंखों के तारे हैं, किसी की राखी की कलाई, किसी की मांग के सिंदूर, किसी के सर पर वात्सल्य की छांव लिए एक अड़िग उम्मीद हैं। फिर क्यों अपने अंदर की इतनी सारी शख्सियतों को एक बार मे ज़रा सी लापरवाही के चलते मिटाने पर लगे हुए हैं??
ज़रा सोचिए

कोरोना वायरस एक वो बीमारी है जिसका अभी तक आधुनिक विज्ञान भी कोई हल नही निकाल पाया है, और जब इस मर्ज का इलाज ही नही पता तो कैसे इससे बचने की उम्मीद कर सकते हैं, जबकि दुनिया भर में इसके द्वारा संक्रमित लोग और जिन्होंने अपनी जान गवा दी है उनके आंकड़े अचंभित कर देने वाले हैं। दिन ब दिन इसके मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और इसके कारण मरने वालों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती जा रही है, कुछ देशों के लोग जिनके अंतिम संस्कार तक के लिये कोई व्यवस्था नहीं हो पा रही है तो किस प्रकार हम इसे उपहास में लें???

ये अज्ञानता ही तो है कि हम में से कुछ वीरता से ओतप्रोत लोग इस से टक्कर लेने के लिये सरकार द्वारा दिये हुए एहतियातन निर्देशों को भी अनदेखा करके अपनी वीरता का परिचय देने हेतु बाहर निकल रहे हैं, प्यारे भाइयों अगर वीरता ही दिखानी है तो अपने घर में रहकर ही वीरता का परिचय दीजिये। सुरक्षित रहना वीरता है या बीमारी से ग्रस्त होकर अलग हो जाना वीरता है???

ये अज्ञानता ही तो है कि अभी भी कुछ राजनीतिज्ञ इतने गंभीर मुद्दे पर प्रशासनिक व्यवस्था का साथ देने की जगह अपनी अपनी रोटियाँ सेकने में लगे हैं, तथाकथित राजनीति के ठेकेदारों एवं उन वीर से निवेदन है कि कृपया अपने घरों में रहें एवं सरकार के नियमों का पालन करते हुए अपनी देश भक्ति का परिचय देवें। कितनी बड़ी विडंबना है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को महज़ 120 घंटे में 2 बार आम जनता से रूबरू होना पड़ा साथ ही इससे भी बड़ी विडंबना ये है कि 69 वर्ष की उम्र में एक व्यक्ति आकर हाथ जोड़ जोड़ कर निवेदन करता है और हम में से कुछ लोग ज़रा भी नहीं समझते हैं और सिर्फ अपनी मर्ज़ी चलाते हैं। दोस्तों जब हम अपने परिवार में रह रहे 5-6 लोगों का दर्द नहीं देख पाते या उनका पेट ना भरे तो हम बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं, तो सोचिए जिसके परिवार में 130 करोड़ लोग हैं, जिनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उस 69 साल के वृद्ध हो रहे शख़्स पर हो और इस उम्र में भी जिसे दिन के 24 घंटों में 18 घंटे काम करना पड़ रहा हो, उस पर क्या गुज़रती होगी?
मेरी सभी वीरों और ठेकेदारों से विनती है कि केवल एक बार आदरणीय मोदी जी की बात पर गौर कीजिए और उनके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश कीजिये। वे सभी का सोच कर सभी का भला करने और सभी की ज़िंदगियाँ बचाने में लगे हैं और कुछ वीर हैं कि उनके आदेशों का उल्लंघन करने से बाज़ नही आरहे। सभी से निवेदन है कि बेतुकी समझदारी छोड़ कर अपनों के साथ अपने घर में रहिए, अपनों की मुस्कान बनिये।।।

आदि काल में युद्ध जीतने के लिए घरों से बाहर निकलना पड़ता था, ये एक ऐसा युद्ध है जिसे जीतने के लिए अपने घर मे बैठना होगा, अरे जब घर में बैठकर ही युद्ध जीता जा सकता है तो बाहर क्यों निकलना??
स्वयं विचार कीजिये।।।
लेखक:- अरमान राज़ आर्य (डॉक्टर ए)

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