प्रथम शक्ति जो चराचर जगत का निर्माण, पोषण, ओर संहार करने वाली हैं

कौन है ,आद्या शक्ति महा-माया, योग-निद्रा, प्रथम शक्ति जो चराचर जगत का निर्माण, पोषण, ओर संहार करने वाली हैं ।

सर्वप्रथम एवं आदि शक्ति 'आद्या शक्ति काली'
ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति से पूर्व घोर अंधकार से उत्पन्न होने वाली महा शक्ति या कहे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करने वाली शक्ति, 'आद्या या आदि शक्ति' के नाम से जानी जाती हैं। अंधकार से जन्मा होने के कारण वह 'काली' नाम से विख्यात हैं। विभिन्न कार्य के अनुरूप इन्हीं देवी ने नाना गुणात्मक रूप धारण किये हैं, सर्वप्रथम शक्ति होने के परिणामस्वरूप इन्हें आद्या शक्ति के नाम से जाना जाता हैं।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ओम कार सर्वोपरि एवं सर्वप्रथम हैं, समस्त अलौकिक शक्तियों का एक स्वरूप हैं ओम कार! संपूर्ण ब्रह्माण्ड इस ओम कार में समाया हुआ हैं। आद्या शक्ति ही वास्तविक रूप से ओम कर रूप में विद्यमान हैं। सर्वप्रथम, अंधकार से अवतीर्ण होने पर इन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड के निर्माण हेतु, जो निर्णय लिया वही श्री गणेश कहलाया, इस कारण किसी भी कार्य को प्रारंभ करना, श्री गणेश  कहलाता हैं। स्वस्तिक चिन्ह जो की मांगलिक कार्य हेतु प्रेरणा का अत्यंत शुभ स्तोत्र हैं, वास्तविक रूप से इन्हीं आद्या शक्ति की वह प्रेरणा हैं, जिसके द्वारा इन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण करवाया या निर्माण कारक बनी।

ब्रह्माण्ड का सञ्चालन सुचारु रूप से चलाने हेतु उन्होंने तीन प्राकृतिक गुणों की रचना की जो 'सत्व, राजस तथा तामस' नाम से जानी जाती हैं। साथ ही इन त्रिगुण परिचालन हेतु, 'त्रि-देव' तथा इनकी शक्ति रूपी 'त्रि-देवियों' की संरचना की। स्वयं देवी, भगवान विष्णु के अन्तः करण की शक्ति होकर, ब्रह्माण्ड के पालन तथा संरक्षण कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध सत्व गुण से हैं, इनकी शक्ति महालक्ष्मी हैं। भगवान विष्णु के नाभि से इन्होंने ही ब्रह्मा जी को प्रकट दिया तथा इस स्वरूप में देवी ब्रह्माण्ड रचना-कार या निर्माण कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध राजस गुण से हैं, इनकी शक्ति महासरस्वती हैं।

 भगवान विष्णु के चरणों से इन्होंने शिव जी को प्रकट दिया तथा इस स्वरूप में वे ब्रह्माण्ड के संहार कार्य में निवृत्त हुई, जिनका सम्बन्ध तामस गुण से हैं, इनकी शक्ति देवी स्वयं साक्षात रूप से सती तथा पार्वती हैं, वैसे इनके नाना अवतार हैं। साथ ही ऊर्जा के प्राप्ति हेतु आदि काल में सूर्य देव की भी रचना हुई, जिसके कारण इन्हें आदित्य भी कहा जाता हैं।

भगवान शिव द्वारा देवी आद्या शक्ति का परिचय करवाना

सत्यवती पुत्र ‘वेद-व्यास’ द्वारा आदि शक्ति भगवती देवी के सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा तथा साधना कर ब्रह्म लोक में जाने की कथा विस्तार से पढ़े,,,

एक बार भगवान विष्णु के अवतार सत्यवती पुत्र ‘वेद-व्यास’ जी जिन्होंने सम्पूर्ण पुराणों तथा उप-पुराणों की रचना की, सोचने लगे भगवान शिव जिन भगवती देवी की वास्तविकता को पूर्ण रूप से नहीं ज्ञात कर पायें, मैं उन्हें कैसे जान सकता हूँ? यह सोच उन्होंने दुर्गा देवी (आदि परा शक्ति, ‘आद्या देवी’) की एकांत हिमालय पर्वत पर, श्रद्धा युक्त हो तप-साधना प्रारंभ की। उनकी कठोर तपस्या से संतुष्ट हो भगवती देवी ने आकाश-वाणी की!

“मुनिवर आप ब्रह्म-लोक जायें, आप का जो भी ज्ञातव्य हैं; आप पूर्ण रूप से जान लेंगे; वहां वेदों द्वारा मेरा गुणगान करने पर में आप को प्रत्यक्ष दर्शन दूंगी तथा आप की मनोकामना भी पूर्ण करूँगी।”

इस आदेश पर मुनि-राज ब्रह्म-लोक पहुँचें, वहां उन्होंने सर्वप्रथम वेदों को प्रणाम किया तथा अपनी जिज्ञासा प्रकट की। वेद-व्यास जी के निवेदन को सुन, वेदों ने जिस प्रकार का उत्तर दिया या भगवती देवी का महात्म्य-गान किया, वह इस प्रकार हैं :-

ऋग्वेद : महर्षि! यह समस्त प्राणी जिनमें अंतर्भुक्त हैं और यह चराचर समग्र जगत जिनसे प्रवृत्त हैं तथा विद्वान जन जिन्हें परम-तत्त्व कहते हैं, वह देवी साक्षात् भगवती आद्या शक्ति दुर्गा ही हैं।

यजुर्वेद : ईश्वर द्वारा समस्त यज्ञों में जिस तत्त्व को पूर्णतः पूजा जाता हैं, वह तत्त्व एकमात्र स्वयं भगवती आदि शक्ति हैं, हम चारों वेद उन्हें प्रणाम करते हैं।

सामवेद : समस्त विश्व, जिस तत्त्व से पालित हैं, जिनका योगी एकांत में ध्यान करते हैं तथा जिनसे यह समस्त चराचर जगत अवभासित होता हैं, वह तत्त्व साक्षात् भगवती आदि शक्ति दुर्गा ही हैं।

अथर्ववेद : वह परम तत्त्व एकमात्र भगवती देवी का स्वरूप हैं, जिनका भक्तजन एकांत में साधना करने में जिनका साक्षात्कार पाते हैं।

इस प्रकार चारों वेदों के इस प्रकार कहने पर, वेद-व्यास जी ने उन भगवती देवी को एकांततः परब्रह्म तत्त्व रूप में स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात चारों वेदों ने उन भगवती देवी की स्तुति-वंदना भी की।

विश्व के सृष्टि, पालन तथा संहार, तीनों विशिष्ट कार्यों में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, अपने-अपने स्वभाव अनुसार, आप की इच्छा से ही व्याप्त हैं तथा इस के विपरीत आप पर नियंत्रण रखने वाला कोई नहीं हैं। इस संसार में आप के गुणों का वर्णन करने की क्षमता किसी में नहीं हैं।

भगवान विष्णु, आप के साधना के बल से ही परिपूर्ण हो युद्ध भूमि में नाना राक्षसों का वध करते हैं तथा त्रिलोक की रक्षा करने में समर्थ हैं। आप के आराधना के कारण ही भगवान शंकर नृत्यमुद्रा में अपनी छाती पर आप के चरण रखकर त्रिलोक का संहार करते हुए कालकूट विष का पान करने में समर्थ हुए हैं। प्रत्येक प्राणी के शरीर में जो परम पुरुष की शक्ति हैं, उसी के फलस्वरूप कोई आप को “देहात्मिका शक्ति” मानता हैं तो कोई दूसरा “चिदात्मिका शक्ति”, कुछ उसे “स्पन्दनात्मिका शक्ति” मानता हैं। आप ही के माया के वशीभूत हो नाना विद्वान आप के सम्बन्ध में भेद-ज्ञान की बातें करते हैं।

सर्वप्रथम आप के हृदय में जगत की सृष्टि की इच्छा जाग्रत हुई, वास्तविक स्थिति तो यह है की सर्वप्रथम यह परब्रह्म स्त्री-पुरुष आदि उपाधि समूह से रहित था। आप की ही इच्छा शक्ति से दो शरीर ‘स्त्री-पुरुष’ प्रकट हुए, हम तो यह मानते हैं कि परब्रह्म भी आप की मायामय शक्ति का दिव्य स्वरूप हैं। समस्त जगत ब्रह्म से उद्भूत हैं और वह ब्रह्म भी शक्ति-स्वरूप हैं, सभी पर-ब्रह्म से भी ऊपर आप की शक्ति हो मानते हैं।

देहधारियों के शरीर में व्याप्त छह चक्रों में शिव जी का वास हैं, देहधारियों के देह त्याग के पश्चात सभी प्रेतावस्था में रहते हैं, आप ही के आश्रय से छहों चक्र शिव या परमेश्वर तत्त्व को प्राप्त कर पाते हैं। वास्तविक ईश्वरत्व शिव में नहीं, अपितु आप में ही स्थित हैं। अतएव समस्त देवता आप के श्री चरणों में नतमस्तक रहते हैं।

देवी का नाना दिव्य रूप में अपने आप को प्रकट कर, व्यास मुनि को संशय मुक्त करना।

तत्पश्चात, देवी भगवती आद्या शक्ति व्यास मुनि के संदेह के निवारण हेतु नाना रूपों के उनके सनमुख प्रकट हुई। सर्वप्रथम उन्होंने समस्त प्राणियों में स्थित स्वकीय ज्योतिर्मय स्वरूप में अपने आप को प्रकट किया।

 तदनंतर, उन्होंने सहस्रों देदीप्यमान सूर्य की आभा से युक्त अपना दिव्य रूप प्रकट किया, जिसमें करोड़ों चंद्रमाओं की शीतल कांति छटक रहीं थीं। सहस्रों अस्त्र-शास्त्रों से युक्त उनके अनेक हाथ थे, नाना प्रकार के दिव्य अलंकारों से वह भगवती देवी  सुशोभित थीं, शरीर से नाना गंध द्रव्यों का लेपन कर रखा था, वे भगवती देवी सिंह पीठासीन और कही-कही मृत शरीर या शव पर नृत्य करती हुई दिखाई दे रही थीं।

कहीं-कहीं उनकी चार भुजाएँ थीं, श्याम वर्ण मेघ तुल्य उनके शरीर की आभा थीं। कभी-कभी वे दस भुजाओं, अठारह भुजाओं वाली तथा क्षण भर में दो भुजाओं वाली हो जाती थीं, कभी सौ भुजाओं से युक्त तथा अगणित भुजाओं वाली हो जाती थीं। कभी वे विष्णु रूप में परिणत हो जाती थीं तथा कभी वह श्याम रूप वाले कृष्ण के रूप में दिखाई देने लगी थीं। कभी ब्रह्मा जी जी के रूप में तो कभी शिव के रूप में दिखाई देती थीं। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को व्यास मुनि के सनमुख अनेक रूप दिखाएँ, वास्तव में वे भगवती देवी ब्रह्म स्वरूप निराकार ही हैं। इस पर व्यास मुनि संशय-मुक्त हो गए।

नारद जी द्वारा विनय करने पर, भगवान शिव द्वारा अपने आराध्य का परिचय देना तथा देवी महिमा वर्णन।
एक बार भगवान शिव से नारद जी ने उनके इष्ट के सम्बन्ध में प्रश्न किया, प्रथम तो उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर देना उचित नहीं समझा। परन्तु नारद जी  द्वारा भगवान विष्णु तथा शिव की संयुक्त हो स्तुति करने पर, भगवान विष्णु ने भी शिव जी से नारद के संशय के निदान हेतु प्रार्थना की।

भगवान शिव ने उत्तर दिया! "जिसे हम लोक व्यवहार में भगवती जगदम्बा कहते हैं वही इस जगत की ‘मूल प्रकृति’ हैं। व्यवहार में ब्रह्मा जी इस जगत के सृष्टि-कर्ता, भगवान विष्णु इसके पालन-कर्ता तथा मैं शिव संहार-कर्ता हूँ !

 परन्तु वास्तव में तीनों लोकों के समस्त जीवों की सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाली एकमात्र भगवती ही हैं। वे भगवती देवी वस्तुतः रुप रहित हैं, परन्तु नाना प्रकार के लीला करने हेतु वे नाना देह धारण करती हैं। पूर्वकाल में, वे भगवती जगत को अपनी लीला से अवगत करने हेतु, अपनी सम्पूर्ण कलाओं युक्त हो दक्ष कन्या “सती” के रूप में प्रकट हुई थीं। तदनंतर, अपने कुछ अंशों के संग हिमालय पुत्री “पार्वती”, लक्ष्मी के रूप में भगवान विष्णु की पत्नी, सावित्री-सरस्वती के रूप में ब्रह्मा जी जी की पत्नी के रूप में विख्यात हैं।

एक समय चारों ओर केवल अन्धकार था, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, ग्रह इत्यादि विहीन थे। ना तो दिन और रात का विभाजन था, न ही अग्नि का कोई रूप था, न ही कोई दिशाएं थीं, उस समय यह समस्त जगत शब्द, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषयों से रहित था। उस समय केवल उस ब्रह्म की सत्ता थी, जिसे वेद शास्त्र ‘सत् एवं एकमात्र’ रूप में प्रतिपादित करते हैं। उस समय केवल सत् चित् आनंद विग्रह वाली, शुद्ध ज्ञान रूप, नित्य भगवती “प्रकृति” ही विद्यमान थीं, जिसका कोई विभाजन नहीं था।

वह प्रकृति सर्वत्र व्याप्त थीं तथा विघ्न-बाधा आदि उपद्रवों से रहित तथा नित्यानंद स्वरूप एवं सूक्ष्म थीं। उन प्रकृति रूपी भगवती को अनायास जगत निर्माण की इच्छा हुई तथा रूप रहित होने पर भी उन्होंने अपनी इच्छा से एक रूप (आकार) धारण किया। वह रूप कृष्ण वर्ण युक्त पर्वत के अंश समान था तथा मुख खिले हुए कमल के समान प्रतीत हो रहा था। वह चार भुजाओं से युक्त थीं तथा उनके नेत्र लाल थे, केश खुले बिखरे हुए थे, वह निर्वस्त्र यानी दिगंबर थी, उनके स्थान स्थूल एवं अत्यधिक उभरे हुए थे।

उस समय उन्होंने स्वेच्छा से सत्त्व, राजस एवं तामस तीनों प्राकृतिक गुणों से युक्त एक पुरुष का सृजन किया, जो चैतन्य से रहित था। तदनंतर अपने अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा भगवती देवी ने उस पुरुष में संचारित की, उन भगवती की इच्छा जान कर पुरुष ने तीनों गुणों में से एक-एक गुण से युक्त विशेषता रखने वाले तीन पुत्रों को उत्पन्न किया। उन तीनों पुरुष का नाम ब्रह्मा, विष्णु तथा भगवान शिव  हुए।

परन्तु इस स्थिति में जगत की सृष्टि को आगे न बढ़ता देख, भगवाती ने उस पुरुष जो वह स्वयं ही थीं, द्विधा विभक्त कर दिया। उनमें से एक ‘जीव’  तथा दुसरा ‘परब्रह्म’ कहलाया।

इन भगवती प्रकृति भगवती देवी स्वयं ही माया, विद्या और पारा नाम से त्रिधा में विभक्त हो गई। उनमें से ‘माया’ जगत के प्राणियों को विमुग्ध कर इस संसार के सञ्चालन का कारण बनी। समस्त देहधारियों के देह में प्राण रूप से संचालित (परिस्पंदन) करने वाली ‘परा’ शक्ति कहलाई, तथा तत्त्व ज्ञान वाहिनी शक्ति ‘विद्या’ कहलाई।

एक काल ऐसा आया की माया के वशीभूत हो प्राणियों ने उस आद्या शक्ति को भुला दिया और उस माया के वशीभूत हो वे जीव धीरे-धीरे प्रमत्त हो गए। इस पर तीसरी शक्ति ‘परा’ ने स्वयं को पाँच भागों में विभक्त कर दिया; ये हैं १. गंगा, २. दुर्गा, ३. सावित्री ४. लक्ष्मी एवं ५. सरस्वती। तदनंतर उन पूर्ण प्रकृति आद्या शक्ति ने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव तीनों से जगत की सृष्टि में उन तीनों का पृथक-पृथक उपयोग कर यह कहा !

'पूर्व काल में, मैंने (आद्या शक्ति) स्वेच्छा से तुम तीनों का सृष्टि रचना के निमित्त निर्माण किया, अतः आप लोग वही कीजिये जो मेरी इच्छा हैं। स्थावर तथा चर, जीवित तथा निर्जीव सभी की सृष्टि, रजो गुण संपन्न ब्रह्मा जी करें, यह सृष्टि समूह विविध भी होगा और विचित्र भी, अगणित भी होगा और असंयत भी। सत्व गुणी, महाबली विष्णु जगत के उपद्रव कारक प्राणियों का संहार कर इस सृष्टि का पालन करेंगे तथा तमोगुण से युक्त शिव अभी सुख पूर्वक विश्राम करें, जब सर्वथा प्रलय करने की मेरी इच्छा होगी, तब वे इस जगत का प्रलय करेंगे।

आप तीनों परस्पर सहमत होते हुए, इन सृष्टि कार्यों में निरंतर लगे रहें, मेरा सहयोग करें। दूसरी ओर में भी सावित्री आदि नारियों के रूप में पाँच भागों में विभक्त हो, आपकी नारी के रूप में स्वेच्छा से विहार करूँगी। मैं स्वयं शिव के संग मिल कर विविध प्राणियों की स्त्रियों में स्वेच्छा से गर्भ धारण करने की कामना जाग्रत करूँगी।

 ब्रह्म देव आप मेरी आज्ञा से मानव सृष्टि के अभिवर्धन पर पूर्ण ध्यान रखें, इस सृष्टि के विस्तार का अन्य कोई उपाय अविशिष्ट नहीं हैं।' तदनंतर वह परा विद्या रूपी भगवती देवी  वहाँ से अंतर्ध्यान हो गई, उन्हीं का आदेश पा कर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का कार्य प्रारंभ किया।"

भगवती आदि शक्ति को पत्नी स्वरूप में प्राप्त करने हेतु ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश द्वारा तपश्चर्या करना तथा भयानक डरावने रूप में देवी का तीनों देवों के सनमुख प्रकट होना।

शिव जी ने उन आदि शक्ति भगवती को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु, भक्ति भाव से तपश्चर्या प्रारंभ की। इस बात को स्वकीय दिव्य चक्षु से जानकार विष्णु जी भी उन भगवती देवी को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु, तपश्चर्या प्रारंभ की, इसी प्रकार ब्रह्मा जी ने भी एक स्थान पर बैठ कर उन भगवती देवी को पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु तप कार्य प्रारंभ किया। इस पर वह प्रकृति भगवती देवी तीनों की परीक्षा लेने हेतु उन तीनों के सनमुख प्रकट हुई।

 भगवती देवी ने अपना स्वरूप भीषण घोर डरावना बना रखा था, सर्वप्रथम भगवती देवी, ब्रह्मा जी के सनमुख प्रकट हुई, उनके विकराल रूप को देख ब्रह्मा जी भयभीत हो अपने मुख को दूसरी ओर कर लिया। तदनंतर, भगवती देवी उस ओर गई जिस ओर ब्रह्मा जी का मुख था, उस पर ब्रह्मा जी ने पुनः अपना मुख घुमा दिया। इस प्रकार भगवती देवी  विकराल रूप धारण कर जिसे देख समग्र ब्रह्माण्ड डर जाये, बार-बार ब्रह्मा जी के सामने आई। इस पर ब्रह्म जी बहुत भयभीत हो तपस्या छोड़ कर भाग गए।

 तदनंतर वह विकराल रूप वाली आदि शक्ति, विष्णु जी ने सनमुख प्रकट हुई, देवी का वह रूप देख कर वे बहुत डर गए। भय वश विष्णु जी अपनी आँखों को मूंद कर, तपस्या बीच में ही छोड़कर, समुद्र में जाकर छिप गए। इसके पश्चात वह भयंकर स्वरूप वाली देवी, भगवान शिव के पास गई, नाना प्रकार के भयंकर से भी भयंकर डरावना स्वरूप दिखा कर वे उन्हें तपस्या से च्युत नहीं कर पाई।

 उन्हें जैसे ही ज्ञात हुआ की आदि शक्ति प्रकृति देवी  उनकी परीक्षा लेने उपस्थित हुई हैं, वे और अधिक गाढ़ समाधि में निमग्न हो गए। इस पर वे महादेव शिव जी से प्रसन्न हो, अपनी पूर्ण कला से युक्त हो शिव के सानिध्य में गई तथा स्वर्ग में गंगा के रूप में निवास करने लगी। स्वकीय अंशभूत सावित्री के रूप में वे भगवती देवी ने ब्रह्मा जी को अपना पति वरन कर लिया तथा लक्ष्मी जी ने विष्णु को अपना पति स्वीकार कर लिया।

सर्वप्रथम, आदि काल में भगवती प्रकृति पूर्ण थीं, तदनंतर उन्हीं के अंश से पाँच श्रेष्ठ स्त्रियों की सृष्टि हुई, १. गंगा, २. दुर्गा, ३. सावित्री ४. लक्ष्मी एवं ५. सरस्वती। सावित्री, ब्रह्मा जी को प्राप्त हुई, लक्ष्मी, विष्णु जी को प्राप्त हुई, परन्तु पूर्ण प्रकृति भगवती आद्या शक्ति ने देह धारण कर, दक्ष प्रजापति के घर कन्या रूप में जन्म धारण किया, जिनका शिव जी  के संग विवाह हुआ।

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
अध्यात्मचिन्तक
9926910965

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