150 रुपए का सामान आपतक 600 रुपए में पहुंचता है, ऑनलाइन शॉपिंग का शिकार होने से ऐसे बचें



दुनिया की दिग्गज ई-कॉमर्स प्लेटरफॉर्म अमेजन पर आरोप लगा है कि कोरोना महामारी के दौरान उसने आवश्यक वस्तुएं जैसे कि साबून, हैंड सैनेटाइजर, साबून समेत 42 प्रोडक्ट्स को 48 फीसदी से 1000 फीसदी तक बढ़ाकर बेचा है. अमेरिका की कंज्युमर वॉचडॉग की एक संस्था ने यह रिपोर्ट जारी की है. केवल अमेजन ही नहीं बल्कि कई ऐशे प्लेटफॉर्म्स हैं जहां चीजों के दाम बढ़ाकर लिए जाते हैं. लेकिन सवाल है कि ये कंपनियां मोटा डिस्काउट दिखाने के बावजूद चीजों को इतना महंगा कैसे बेचती है. इसके लिए आपको ऑनलाइन शॉपिंग की पूरी प्रक्रिया को समझना होगा कि कैसे कोई वस्तु फैक्ट्री से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होती है और कैसे 150 रुपए के समान का दाम 600 रुपए से ज्यादा हो जाता है.

कंपनियां नहीं बेचती खुद का समान

अमेजन, फ्लिफकॉर्ट, स्नैपडील, मिंत्रा समेत तमाम ऐसे कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स है जो सूई से लेकर जहाज के समान बेचती है. लेकिन क्या आपको पता है कि ये समान खुद नहीं बनाती. ये सारे सामान ये अपने सेलर्स से लेती है. ऑनलाइन कंपनियां अपने प्लेटफार्म के लिए सेलर या मर्चेनडाइजर बनाती है. सेलर्स पहले अपने आपको इन प्लेटफॉर्म्स पर रजिस्टर्ड करता है. तभी जाकर वो अपना प्रोडक्ट दिग्गज कंपनियों के प्लेटफॉर्म्स बेचता हैं.

ऐसे तय होती है कीमत

मान लिजिए कि किसी सेलर ने अपने आपको अमेजन, फ्लिफकॉर्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर रजिस्टर्ड कर लिया. इसके बाद अगला चरण होता है प्रोडक्ट की कैटलांगिंग. प्रोडक्ट कंपनी की ओर से अप्रूव होने के बाद ही उस वेबसाइट पर दिखाई देगी. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं, मान लिजिए किसी सेलर ने किसी फैक्ट्री से एक खिलौना लिया जिसकी कीमत उस समय 150 रुपए है. 150 रुपए के बाद उसे प्रोडक्ट की शूट करानी होती है जिसमें उसका कुछ खर्च आता है.

150 का समान ऐसे 600 रुपए में बिकता है

प्रोडक्ट शूट होने के बाद प्रोडक्ट की डिलिवरी से पैकिंग तक का खर्चा सेलर को ही उठाना होता है. इसके अलावा जिस प्लेटफ़ॉर्म पर सेलर अपना सामान बेच रहा उसे उसको कमीशन देना होता है. जो 5 फीसदी से 35 फीसदी तक होती है. तो 150 रुपए के खिलौने पर मान लिजिए प्रोडक्ट की शूट, कमीशन, पैकिंग, ट्रांसपोर्टेशन, कूरियर जैसे खर्च के बाद उसी खिलौने का दाम 300 से उपर हो जाता है. 300 रुपए के बाद सेलर इस पर अपना मुनाफा जोड़ता हैं. सेलर के मुनाफे के बाद ऑनलाइन कंपनी अपना मुनाफा जोड़ती है. इन सबके बाद एक 150 रुपए का खिलौना ग्राहक के पास 600 रुपए का पहुंचता हैं.

ऑनलाइन कंपनी का खर्च

  • कंपनियां समय समय पर अपने प्लेटफॉर्म पर सेल कैपेंन चलाती है. जिसका खर्च कंपनियां उठाती हैं.
  • सेलर्स के मोटिवेट करने के लिए लिए क्यूज, कॉन्सेट चलाए जाते हैं जिसमें खर्च होता है.
  • प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने का खर्च
  • सर्च इंजन पर प्रोडक्ट दिखाने का जिम्मेदारी ऑनलाइन कंपनी की होती है.
  • प्रोडक्ट डेवलपर से लेकर प्रोडक्ट की डिस्पले का खर्च

सेलर या मर्चेनडाइजर का खर्च

  • प्रोडक्ट की डिजाइनिंग, पैकिंग का खर्च
  • प्रोडक्ट डिलवरी के तहत होने वाले ट्रांसपोर्टेशन का खर्च
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का कमीशन
  • बल्क डील के लिए ऑनलाइन कंपनियां अलग से चार्ज करती है.
  • प्रोडक्ट की कैटलागिंग कराना
  • प्रोडक्ट शूट कराकर उसे प्लेटफॉर्म तक लाने का खर्च

ऑनलाइन शॉपिंग के शिकार होने से ऐसे बचे

  • कोई भी प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसकी ऑनलाइन रेकी जरुर करें
  • अगर किसी चीज का दाम बहुत ज्यादा लगे तो मार्केट से उसका रेट कंपेयर करें
  • ऑनलाइन कंपनियों के डिस्काउंट, ऑफर्स, सेल के झांसे में न आएं
  • भीड़ का हिस्सा बनने से बचें, अपनी समझदारी से ही खरीदारी करें
  • सीओडी (कैश ऑन डिलिवरी) कराने से बचें, इसका अलग चार्ज देना होता है
Source tv9bharatvarsh 

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