गलती होने पर कान ही क्यों पकड़ते हैं सभी? क्या रहस्य छुपा है इसमें

 गलती होने पर कान ही क्यों पकड़ते हैं सभी? क्या रहस्य छुपा है इसमें



गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ग्रंथों में रहन-सहन के नियम और तरीकों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए ग्रंथों में दाहिने कान को अधिक पवित्र माना जाता है।


1. मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।


2. गोभिल गृह्यसूत्र के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु, चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है।

गोभिल गृह्यसूत्र का श्लोक...

मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।

एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।


3. पराशर स्मृति के बारहवें अध्याय के 19 वें श्लोक में बताया गया है कि के छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।


पराशर स्मृति का श्लोक...

क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।

पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।


एक नए दृष्टिकोण से समझें 


कान पकड़ना का अर्थ है – बुरे काम को न करने की प्रतिज्ञा करना।


ऐसा भी कहा जाता है कि कान के मूल में जो नाड़ियाँ हैं उनका मूत्राशय और गुदा से संबंध है। दाहिने कान की नाड़ी मूत्राशय के लिए गई है और बाएँ कान की नाड़ी गुदा से संबंध है। मूत्र त्याग करते समय दाहिने कान को लपेटने से उन नाड़ियों पर दबाव पड़ता है फल स्वरूप मूत्राशय की नाड़ियाँ भी कड़ी रहती हैं। तदनुसार, बहुमूत्र, मधुमेह, प्रमेह आदि रोग नहीं होते। इसी प्रकार दाहिने कान की नाड़ियाँ दबने से काँच, भगन्दर, बवासीर आदि गुदा के रोग नहीं होते। कई सज्जन शौच जाते समय दोनों कानों पर यज्ञोपवीत चढ़ाते हैं उनका तर्क यह है कि मल त्याग के समय मूत्र विसर्जन भी होता है इसलिए दोनों कानों पर उपवीत को बढ़ाना चाहिए। मैथुन के समय कान पर भले ही चढ़ाया जाय पर अशुद्ध अंगों से ऊंचा अवश्य कर लेना चाहिये।


क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तेच्छिप्टे तथान्नृते।

पतितानाँ चसम्भायें दक्षिणं श्रवण स्पृष्येत।

पाराशर स्मृति 7। 38


अर्थात्- छींकने पर, थूकने पर, दाँतों से किसी अंग के उच्छिष्ट हो जाने पर झूठ बोलने और पाठकों के साथ संभाषण करने पर अपने दाहिने कान का स्पर्श करें।


छोटी-मोटी अशुद्धताएं कान का स्पर्श करने मात्र से दूर हो जाती हैं। कान को छूने पकड़ने या दबाने से भूल सुधारने का प्रायश्चित होने का सम्बन्ध है। बालक के कान पकड़ने का अध्यापकों का यही प्रयोजन होता है कि उसे देवत्व का और मनोबल का विकास हो। कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाने से भी सूक्ष्म रूप से वही प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए भी मलमूत्र के समय उसके कान पर चढ़ाने का विधान है।


आदित्यावसवो रुद्रा वायुरग्निश्व धर्मराट्।

विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं निष्ठन्ति देवताः॥

शंख्यायन-

अग्निरापश्च वेदाश्च सोमः सूर्योऽनिलस्तथा।

सर्वे देवास्तु विप्रस्य कर्णे तिष्ठन्ति दक्षिणें॥

आचार मयूख-

प्रभासादीनि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा।

विप्रस्य दक्षिणे कर्णे वसन्ति मुनिरब्रवीत॥


परराशरः


उपरोक्त तीन श्लोकों में दाहिने कान का पवित्रता का वर्णन है। शांख्यायन का मत है कि आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता विप्र-के दाहिने कान में सदा रहते हैं। आचार्य मयूखकार का कथन है अग्नि, जल, वेद, सोम, सूर्य, अनिल तथा सब देवता ब्राह्मण के दाहिने कान में निवास करते हैं। पराशर का मत है कि गंगा आदि सरिताएं तीर्थ गण दाहिने कान में निवास करते हैं। इसलिए ऐसे पवित्र अंग पर मलमूत्र त्यागते समय यज्ञोपवीत को चढ़ा लेते हैं जिससे वह अपवित्र न होने पावे।


कान और ऊपरी अंगों को निरोगी और सर्वदा पवित्र रखें के लिए विशेष श्री विष्णु मन्त्र पढ़ें l


ॐ हुम् विष्णवे नम:


रविशराय गौड़

ज्योतिर्विद

अध्यात्मचिन्तक

9926910968


Post a Comment

0 Comments