मानव के बढ़ते दुष्कृत्य, प्रकृति विनाश का एक कारण : मेघा गौतम

 "मानव के बढ़ते दुष्कृत्य, प्रकृति विनाश का एक कारण "



ईश्वर ने प्रकृति की गोद में उज्जवल प्रकाश, निर्मल जल और स्वच्छ वायु का वरदान दिया है. मानव ने प्रकृति पर अपना आधीपत्य ज़माने की धुन मे वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर प्रकृति को स्वामिनी के महत्वपूर्ण पद से हटाकर सेविका का स्थान देकर प्रतिष्ठित किया है. 

प्रकृति का उन्मुक्त वातावरण अतीत के गर्भ में विलीन हो गया. मानव मन की जिज्ञासा और नई नई खोजो की अभिलाषा ने प्रकृति को विकृत कर दिया है. दिनों दिन बढ़ने वाले प्रदुषण की आपदा से बचाव का मार्ग खोजना आज की महती आवश्यकता है. 

पर्यावरण की सुरक्षा व संतुलन  के लिए हमारा जागरूक और सचेत होना अति आवश्यक है. वायु जल, ध्वनि तथा प्रकृति के प्रकार के प्रदुषण को नियंत्रित कर धीरे धीरे उसे समाप्त करना आज के युग की मांग है. 

किन्तु यदि मानव ने अपनी अत्यधिक  भौतिक इक्छाओ के अधीन रहकर प्रकृति का दोहन अनियमित ढंग से किया तो प्रकृति की आपदा जैसे भूकंप, बाढ़ इत्यादि का प्रकोप मानव सभ्यता को निश्चित ही झेलना पड़ेगा. 

आदि ग्रन्थ गीता मे भी रचित है... 

"प्रकृतिं स्वामवशतभय विश्रजमी पुनः पुनः"

अर्थात  ईश्वर द्वारा सृजन की हुई प्रकृति का विनाश निश्चित है यदि दुष्कर्म बढ़ते है तो. वर्तमान में कोरोना जैसी महामारी का फैलना, मानव द्वारा प्रकृति के साथ दोहन का ही परिणाम है. अंततः मानव की गौरवशाली संस्कृति व सभ्यता के समक्ष पुनः एक प्रश्न चिन्ह खड़ा हुआ है, जो प्रकृति के साथ अत्यधिक दोहन का ही परिणाम है.

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