वार्ड-34 में डूबी भाजपा रमा राठी को भी ले डूबी ?

 वार्ड-34 में डूबी भाजपा रमा राठी को भी ले डूबी ?



गुरुग्राम नगर निगम वार्ड-34 के उपचुनाव की घोषणा होते ही भाजपा ने मान लिया था कि उनके पास  जिताऊ उम्मीदवार तो हैं नहीं इसलिए उथल-पुथल शुरू हो गई  और आनन-फानन में नीतियां बनाई गई  तथा अपने मंसूबों को लेकर जा पहुंची आम आदमी पार्टी नेता  स्व.आरएस राठी जी के घर  और उनकी विधवा को भाजपा में शामिल करने में सफल रही , अब ऐसा करके भाजपा ने ही स्पस्ट किया है कि उनके पास प्रत्याशी तो था ही नहीं  इसलिए भाजपा ने अपने दल के क्षेत्र में सक्रिय नेताओं को खारिज कर श्रीमती रमा रानी राठी को प्रत्याशी बना लिया ।

अपने हितों को सर्वोपरि रखने वाली भाजपा ने सोचा तो था कुछ अच्छा मगर स्तिथियाँ विपरीत होती नजर आ रही हैं  कारण स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं की अवहेलना हुई है , उनका अंतर्विरोध इस बात को लेकर भी है कि जो व्यक्ति भाजपा सरकार को कोसने ,उसकी कमियां गिनाते नहीं थकते थे उन्हीं की धर्मपत्नी को पार्टी द्वारा प्रत्याशी बना दिया गया  और पार्टी का यह सोचना कि आम आदमी पार्टी का वोट भी रमा राठी को मिल जाएगा तो वह गफलत में है क्योंकि आरएस राठी जी की विचारधारा भाजपा की नीतियों के खिलाफ थी और आप कार्यकर्ता उनका समर्थन करते थे और उनके संघर्षों के सहयोगी रहते थे  अब उनका रमा राठी के भाजपा प्रत्याशी बन जाने से उनके विचारों में यकायक परिवर्तन आ जाएगा  यह भूल साबित होगी , रखते होंगें सहानुभूति राठी साहब के परिवार के प्रति मगर जब उनकी धर्मपत्नी ने ही अपने पति के दिखाए मार्ग पर चलने की बजाय विपरीत दिशा में जाना तय कर लिया है तो फिर आम आदमी पार्टी भी स्वतंत्र है  , यही कारण है कि ना ही प्रत्याशी दिखाई दे रहा है और ना ही स्थानीय भाजपाई और ना ही आम आदमी पार्टी कार्यकर्ता । खैर ...

चंद भाजपा नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि जो राव इंद्रजीत सिंह कोंग्रेस को छोड़ भाजपा में शामिल हुए वही पार्टी के प्रति पूर्णत्या समर्पित नहीं हो पाए हैं - किसान आंदोलन के कारण हरियाणा सरकार की विषम परिस्थितियों में भी पार्टी के ऊपर अपना स्वामित्व स्थापित करने की मंशा से आघात किए जा रहे हैं , पार्टी के साथ अपने समर्थकों तक को नहीं जोड़ पाए हैं  तथा जिस पार्टी ने उन्हें हरसंभव सम्मान दिया उसी के सांसदों, मंत्रियों और विधायकों को मंच पर बुलाते हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री को उपेक्षित रख  तथा उनकी नीतियों के विरुद्ध जाकर किसानों के आंदोलन का पक्ष रखते हैं और वो भी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष की मौजूदगी में  अर्थात पार्टी के मुखिया को बुलाते हैं और सूबे के मुख्यमंत्री को नहीं बुलाकर पार्टी को दो-फाड़ करने का प्रयास करते हैं ,अपमानित करना नहीं भूलते हैं तो आप समझ सकते हैं कि वास्तविकता में कितना गले उतर पाते हैं अन्य दलों से लाए गए व्यक्ति  और वह भी तब जब उन्हें प्रत्याशी बनाया जाता है पार्टी कार्यकर्ताओं को साइडलाइन करके ।

तरविंदर सैनी (माईकल ) आम आदमी पार्टी नेता का कहना हैं कि एक क्षेत्र के निकाय चुनाव में जिसकी अवधि मात्र एक वर्ष की है  एक उपचुनाव है उसमें भी भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता कम  समूची प्रदेश कार्यकारिणी नेता अधिक दिखाई दे रहे हैं , क्या भाजपा को स्थानीय नेताओं और अपने जनाधार पर विश्वास कम हो गया है या वह एक अदद उपचुनाव हार जाने से भयभीत हो गई है और रणनीतियाँ बनाने में असफल रहेगी  क्या इसलिए प्रदेश कार्यकारिणी और बड़े नेताओं को बुलाना पड़ रहा है ? 

यदि ऐसे हालात समझती है भाजपा अपने तो उसे डूबती नैया ही कहा जा सकता है और जो उसकी सवारी है उसके डूबने में भी कोई संदेह नहीं ।।

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