संस्कृति और धर्म के सौंदर्य के बीच शुरु होगी भगवान गणपति की आराधना

संस्कृति और धर्म के सौंदर्य के बीच शुरु होगी भगवान गणपति की आराधना



भगवान गणेश की उपासना का १० दिवसीय पर्व 10 सितंबर से (शुक्रवार)से शुरु होगा। 

इस दिन भगवान गणेश विराजेंगे और 19 सितंबर यानी अनंत चतुर्दशी के दिन उन्हें विदा किया जाएगा।


स्कंद पुराण, नारद पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में भी भगवान गणेश की महिमा की गई है. उन्हें ज्ञान और बाधा निवारण के देवता के रूप में पूजा जाता है



 *गणेश चतुर्थी  पर बन रहा है ग्रहों का दुर्लभ योग, ब्रह्म योग में होगी गणेश स्थापना* 

इस दिन चंद्र तुला राशि में शुक्र के साथ रहेगा। सूर्य अपनी राशि सिंह में, बुध अपनी राशि कन्या में, शनि अपनी राशि मकर में और शुक्र अपनी राशि तुला में रहेगे ! ये चार ग्रह अपनी-अपनी राशि में रहेंगे। गुरु कुंभ राशि में रहेगे ।


ब्रह्म योग में होगी गणेश स्थापना

- भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी 9 सितंबर रात्रि 12:17 से प्रारंभ होकर 10 सितंबर रात्रि 10:00 बजे तक रहेगी। 

- इस बार गणपति स्थापना चित्रा नक्षत्र के ब्रह्म योग में होगी। 

- चित्रा नक्षत्र दोपहर 12:58 तक रहेगा। उसके बाद स्वाती नक्षत्र प्रारंभ होगा। 

- साथ ही इस दिन रवि योग भी सुबह 6:01 से लेकर दोपहर 12:58 तक रहेगा। 

- रवि योग के योग में गणेश जी की पूजा -अर्चना भक्तों को सुख समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करेंगी। 



 *गणेश चतुर्थी 2021 पूजन का शुभ मुहूर्त* 

गणेश चतुर्थी पूजन का शुभ मुहर्त दोपहर 12:17 बजे शुरू होकर और रात 10 बजे तक रहेगा। 


गणेश चतुर्थी 2021 : तिथि और समय

गणेश चतुर्थी – 10 सितंबर, 2021

मध्याह्न गणेश पूजा मुहूर्त – सुबह 11:03 से दोपहर 01:32 बजे तक

चतुर्थी तिथि शुरू – 10 सितंबर को दोपहर 12:18 बजे

चतुर्थी तिथि समाप्त – 10 सितंबर को रात 09:57 बजे

गणेश महोत्सव शुरू – 10 सितंबर, 2021

गणेश महोत्सव समाप्त – 19 सितंबर, 2021

गणेश विसर्जन रविवार, सितंबर 19, 2021



 *भगवान विघ्नविनाशक के पूजन हेतू कुछ आवश्यक नियम* : 



१-शास्त्रों के अनुसार गणेश प्रतिमा को 1,2,3,5,7 या 10 दिन तक स्थापित कर पूजन करना चाहिए, इसके बाद विधि पूर्वक उनका विसर्जन करें।

२-भगवान गणेश की बैठी हुई मुद्रा की प्रतिमा स्थापित करना शुभ होता है तथा प्रतिमा स्थापित करने से पहले घर में रोली या कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं।

३-भगवान गणेश की पीठ में दरिद्रता का वास माना जाता है, इसलिए प्रतिमा इस तरह स्थापित करें की उनकी पीठ का दर्शन न हो।

४-भगवान गणेश के पूजन में नीले और काले रंग के कपड़े नहीं पहनना चाहिए, उन्हें लाल और पील रंग प्रिय है। इस रंग के कपड़े पहन कर पूजन करने से गणपति बप्पा शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

५-गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन का निषेध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा देखने से व्यक्ति कलंक का भागी बनता है।

गणेश भगवान को पूजन में तुलसी पत्र नहीं अर्पित करना चाहिए, लाल और पीले रंग के फूल उन्हें बेहद प्रिय हैं।

५-गणेश उत्सव के दिनों में सात्विक आहार ही करना चाहिए। इस काल में मांस, मदिरा आदि तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से गणेश पूजन सफल नहीं माना जाता है।


 *अंकिचन को मान दिया, इसलिए दुर्वा का चढ़ता है नैवेघ* 

गणपति ने अंकिचन को भी मान दिया है। इसलिए उन्हें नैवेघ में दुर्वा चढ़ाई जाती है। गणेशोत्सव जन-जन को एक सूत्र में पिरोता है। अपनी संस्कृति और धर्म का यह अप्रतिम सौंदर्य भी है। जो सबको साथ लेकर चलता है। श्रावण की पूर्णता, जब धरती पर हरियाली का सौंदर्य बिखेर रही होती है। तब मूर्तिकार के घर आंगन में गणेश प्रतिमाएं आकार लेने लगती हैं। प्रकृति के मंगल उद़्घोष के बाद मंगलमूर्ति की स्थापना का समय आता है। गणेशजी विघ्नों का समूल नाश करते हैं। कहा जाता है कि गणपति की आराधना से जीवन में सदामंगल होता है। विघ्नों के नाश एवं शुचिता व शुभता की प्राप्ति के लिए लंबोदर की उपासना विधि-विधान से करें। गणेश जी को ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है।



 *इसलिए है गणेश चतुर्थी का महत्व* 

भादो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इसकी मान्यता है कि भगवान गणेश का इसी दिन जन्म हुआ था। भाद्रपद के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को सोमवार के दिन मध्याह्न काल में, स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था। इसलिए मध्याह्न काल में ही भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसे बेहद शुभ समय माना जाता है। हर माह के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत किया जाता है और यह व्रत इन सभी में सबसे उत्तम होता है।


 *गणपति की पूजन की यह है विधि* 

गणेश जी की पूजन में वेद मंत्र का उच्चारण किया जाता है। पूजन के लिए आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर पूजा करें। इसके साथ समस्त पूजन सामग्री के साथ दुर्वा, सिंदूर से लेकर मोदक विशेष रुप से चढ़ाए और आराधना करें। शुभ मुर्हुत में स्थापना के बाद गणपति की आराधना चतुदर्शी तक करें।


एकदंताय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदंती प्रचोद्यात।।


राघवेंद्ररविशराय गौड़

9926910965

Post a Comment

0 Comments