आजादी आंदोलन में अहीरवाल के अग्र वीरों का भी रहा बड़ा योगदान


-किसी ने लड़कर वीरता दिखाई, किसी ने सबका मनोबल बढ़ाया तो किसी ने जीवनभर की जमा पूंजी आजादी के लिए लगाई

-गुरुग्राम में एक अक्टूबर को अग्र समागम में अग्र वीरों की दिखेगी जीवन गाथा



गुरुग्राम। अग्रकुल जनक महाराजा अग्रसेन जी की जयंती के अवसर पर 1857 की क्रांति व स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान देने वाले अग्रवीरों की जीवन गाथा आज की पीढ़ी को दिखाकर, बताकर उन्हें अपने पूर्वजों के बलिदानों से रूबरू कराया जाएगा। आगामी एक अक्टूबर को गुरुग्राम के ताऊ देवीलाल स्टेडियम में होने जा रहे इस अग्रसमागम-2022 की गूंज देशभर में पहुंच चुकी है। समारोह को भव्य बनाने के लिए आयोजन समिति जुटी है। हरियाणा के जिन अग्रवीरों ने आजादी आंदोलन में अपना सहयोग दिया, उन अग्रवीरों की जीवनगाथा से आपको रूबरू कराते हैं। 


मनोहर लाल ने कलम से हिलाई अंग्रेजों की जड़ें 

हरियाणा के बहादुरगढ़ में जन्में व गुडग़ांव को कर्मभूमि बनाने वाले लाल मनोहर लाल मनोहर का जीवन शुरु से ही संघर्षों से भरा था। शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ वे स्वतंत्रता संग्राम में भी आगे बढ़े। शेरो-शायरी के शौकीन मनोहर लाल ने देशभक्ति पर अनेक नज्में लिखीं। उनके माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत की जमकर खिलाफत की। वर्ष 1990 में हरियाणा उर्दू अकादमी ने उन्हें प्रथम पुरस्कार से नवाजा। वे बहादुरगढ़ से गुडग़ांव आ गए थे। यहां रोशनपुरा में उन्होंने घर बनाया और महात्मा गांधी को भी यहां वे लेकर आए। इस चौक को आज गांधी चौक के नाम से जाना जाता है। 


लाला मुरलीधर ने अंग्रेजों को लौटाई सारी उपाधियां

पलवल में जन्में लाला मुरलीधर गुप्त भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के अग्रणी नेताओं में थे। उनका जन्म 30 मई 1848 को भीकम सेन-रमा देवी के आंगन में हुआ। आपने 1870 बीए तथा 1872 में एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। वकालत करते हुए उन्होंने बार काउंसिल अंबाला की स्थापना की। इस बार के वे 10 साल तक अध्यक्ष भी रहे। वे 1884 में अंबाला के म्युनिसिपल कमिश्नर और बाद में नगर पिता बनें। उन्हें अंग्रेज सरकार ने राय साहब की उपाधि से सम्मानित किया। आजादी के संघषज़् में भाग लेने के कारण वे अंगे्रज सरकार की नजर में एक खतरनाक स्वतंत्रता सेनानी बन चुके थे। 16 अगस्त 1920 को लाला मुरलीधर गुप्त ने अपनी राय साहब की उपाधि समेत सभी प्रमाण पत्र, सम्मान अंग्रेज सरकार को वापस लौटा दिए। उन्होंने गांधीजी की आवाज पर अंग्रेजों से सीधी लड़ाई का सामान किया। 


कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे रामशरण मित्तल

रामशरण चंद मित्तल का जन्म नारनौल में 18 मई 1905 को हुआ था। उनके पिता श्री अयोध्या प्रसाद मित्तल पटियाला (पंजाब) यूनियन में विधानसभा स्पीकर तथा कैबिनेट मंत्री रहे। उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत यात्रा का विरोध किया। इस आंदोलन में सक्रिय सहयोगी रहे। वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ  उन्होंने काले झंडे उठाकर प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया था। अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया। आजादी के बाद वर्ष 1952 में पेप्सू राज्य की विधानसभा के वे सदस्य चुने गए। वहां के वे अध्यक्ष भी रहे। हरियाणा सरकार में उन्हें वित्त विभाग समेत अनेक विभागों का मंत्री भी बनाया गया। 


स्वतंत्रता संग्राम के महानायक शंकरलाल

नारनौल के ही रहने वाले थे लाल शंकर लाल संघी, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महानायक के रूप में काम किया। बंसल गोत्र के लाला शंकर लाल संघी का जन्म 6 मार्च 1885 को हुआ था। देशभक्ति का जज्बा उन्हें पूर्वजों से विरासत में मिला था। लाला शंकर लाल के दादाजी हरदेव सहाय नवाब झज्जर के दीवान थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नवाब झज्जर के साथ हरदेव सहाय को भी फांसी दे दी गई थी। कैप्टन हॉकिंस जब पंजाब को जीतता हुआ नारनौल की तरफ  बढ़ रहा था तो नसीबपुर में उसका मुकाबला क्रांतिवीर राव तुलाराम के साथ हुआ। नवाब झज्जर ने राव तुलाराम का साथ दिया। साथ में लाला हरदेव सहाय ने भी मोर्चा संभाला था। इस लड़ाई में हार जाने के बाद नवाब झज्जर व लाल हरदेव सहाय को फांसी दे दी गई।

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