पारस हेल्थ गुरुग्राम में 8 हफ्ते के इलाज के बाद घर लौटी 900 ग्राम की बच्ची, वजन बढ़कर हुआ 2.64 किलो
-ऑक्टोपस थेरेपी का इनोवेटिव तरीका बच्चे को शांत करके और हार्ट रेट, सांस लेने के तरीके, ऑक्सीजन सैचुरेशन और नींद के साइकिल को स्थिर करके बेहतर न्यूरोप्रोटेक्टिव सपोर्ट देता है।
गुरुग्राम के पारस हेल्थ में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि बेबी निक्की को सांस लेने में मदद के लिए मैकेनिकल वेंटिलेशन, फेफड़ों को विकसित करने के लिए सर्फैक्टेंट थेरेपी और ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ी। उसे लंबे समय तक NICU में इंटेंसिव केयर (गहन देखभाल) में रखा गया। बाद में उसकी हालत स्थिर होने पर उसे हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई। इस दौरान उसके विकास और दिमाग की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
*10th अक्टूबर 2026, गुरुग्राम:* सिर्फ़ 27 हफ़्ते की गर्भावस्था में दुनिया में आई बच्ची जिसका वज़न 900 ग्राम था, वह कई जानलेवा दिक्कतों को पार करके लगभग दो महीने इंटेंसिव नियोनेटल केयर में रहने के बाद घर लौट आई है। गुरुग्राम के पारस हेल्थ हॉस्पिटल में पैदा हुई बेबी निक्की को NICU में मुश्किल सफ़र के बाद स्थिर हालत में डिस्चार्ज कर दिया गया। इस इलाज के दौरान उसकी सांस, खून और पूरी सेहत की देखभाल की गयी।
जन्म के तुरंत बाद निक्की को फेफड़ों की कमी और सर्फेक्टेंट की कमी की वजह से गंभीर रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (RDS) हो गया। छाती के एक्स-रे में फेफड़ों में बहुत ज़्यादा परेशानी दिखी। इसके बाद बाद उसे तुरंत मैकेनिकल वेंटिलेशन पर रखा गया और सर्फेक्टेंट रिप्लेसमेंट थेरेपी दी गई। जैसे ही उसकी सांस की हालत स्थिर हो रही थी, उसे अर्ली-ऑनसेट सेप्सिस हो गया। यह गंभीर शॉक और डिसेमिनेटेड इंट्रावैस्कुलर कोएगुलेशन (DIC) में बदल गया। इसके बाद उसे अपने ब्लड प्रेशर को सपोर्ट करने के लिए इनोट्रोप्स, ब्लड कल्चर और सेंसिटिविटी रिपोर्ट के आधार पर एंटीबायोटिक्स, और फ्रेश फ्रोजन प्लाज़्मा, पैक्ड रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स चढ़ाने की ज़रूरत पड़ी। DIC फेज़ के दौरान पल्मोनरी हैमरेज के एपिसोड से उसकी हालत और भी मुश्किल हो गई।
इस केस पर टिप्पणी करते हुए पारस हेल्थ, गुरुग्राम के नियोनेटोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. अमिताव सेनगुप्ता ने कहा, “समय से बहुत पहले जन्मे बच्चों के कई ऑर्गन सिस्टम में जटिलताएं हो सकती हैं क्योंकि उनके अंग अभी भी पूरी तरह से विकसित नही हुए होते हैं। बेबी निक्की के केस में हमें उसकी ग्रोथ और डेवलपमेंट में सहयोग करते हुए सांस लेने में गंभीर समस्या, इन्फेक्शन, सर्कुलेटरी इनस्टेबिलिटी, कोएगुलेशन एब्नॉर्मलिटीज़ और पल्मोनरी हैमरेज का उपचार करना पड़ा। हमारा फोकस न सिर्फ उसे इस क्रिटिकल फेज़ से बचने में मदद करना था, बल्कि उसके डेवलप हो रहे ब्रेन को सुरक्षित करना और एक अच्छे लॉन्ग-टर्म न्यूरोलॉजिकल और फंक्शनल आउटकम की ओर काम करना भी था।”
जैसे-जैसे इन एक्यूट समस्याओं पर काबू पाया गया निक्की के प्लेटलेट काउंट और कोएगुलेशन पैरामीटर धीरे-धीरे नॉर्मल हो गए और ब्लीडिंग बंद हो गई। इसके बाद उसके रेस्पिरेटरी सपोर्ट को मैकेनिकल वेंटिलेशन से घटाकर नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन और फिर नेज़ल कैनुला के ज़रिए ऑक्सीजन पर कर दिया गया।
उसकी क्रिटिकल केयर के साथ-साथ पोषण का भी ध्यान रखा गया। निक्की को शुरू में अमीनो एसिड, इंट्रालिपिड्स और मल्टीविटामिन के साथ टोटल पैरेंटेरियल पोषण दिया गया। जब उसकी हालत में सुधार हुआ, तो उसे फोर्टिफायर और विटामिन के साथ खास ह्यूमन मिल्क-बेस्ड डाइट दी जाने लगी।
लगभग 8 हफ़्ते की इंटेंसिव नियोनेटल केयर के बाद निक्की ने डिस्चार्ज के लिए ज़रूरी क्लीनिकल माइलस्टोन पूरे कर लिए। वह ओरल फीड ले रही थी, बिना किसी बाहरी सपोर्ट के अपना टेम्परेचर बनाए रख रही थी और उसका वज़न भी सही तरीके से बढ़ रहा था।
इंटेंसिव मेडिकल मैनेजमेंट के साथ NICU टीम ने डेवलपमेंटली सपोर्टिव केयर (DSC) और न्यूरोप्रोटेक्शन की रणनीतियों को भी इलाज का हिस्सा बनाया। यूनिट 2014 से DSC फाउंडेशन की गाइडलाइंस और प्रोटोकॉल के अनुसार इस तरीके को अपना रही है। इसमें बहुत ज्यादा प्रीटर्म बच्चों पर पड़ने वाले एनवायरनमेंटल स्ट्रेस को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। इसके लिए रोशनी और आवाज के स्तर को नियंत्रित और मॉनिटर करना, बच्चे को सही पोजीशन में रखना, सावधानी से हैंडल करना और उसकी शारीरिक स्थिति को स्थिर बनाए रखना शामिल है। साथ ही बच्चे की जरूरत के अनुसार देखभाल करने वाले लोगों के व्यवहार पर भी ध्यान दिया जाता है। इस तरह की देखभाल का उद्देश्य बहुत ज्यादा प्रीटर्म बच्चों के न्यूरोडेवलपमेंट और आगे के शारीरिक व मानसिक विकास को बेहतर तरीके से सपोर्ट करना है।
इस डेवलपमेंटल केयर तरीके के तहत निक्की के NICU में रहने के दौरान ऑक्टोपस थेरेपी का भी इस्तेमाल किया गया। एक नरम, सूत से बने ऑक्टोपस को उसकी माँ के पास रखने के बाद इनक्यूबेटर में उसके पास रखा गया ताकि उसमें उसकी जानी-पहचानी खुशबू रहे। टेंटेकल्स ने निक्की को पकड़ने के लिए कुछ दिया, जिससे इंटेंसिव केयर में रहने के दौरान उसे एक जाना-पहचाना सेंसरी अनुभव और आराम का एहसास मिला। NICU टीम ने देखा कि इस इंटरवेंशन से निक्की ठीक हो गई, उसकी हार्ट रेट और रेस्पिरेटरी रेट कम हो गई और उसका ऑक्सीजन सैचुरेशन स्टेबल रहा।
डॉ. अमिताव ने कहा, "डेवलपमेंटली सपोर्टिव केयर (DSC) एंड स्ट्रेटेजीज़ फॉर न्यूरोप्रोटेक्शन इन NICU" एक दशक से भी अधिक समय से मेरे पैशन और रिसर्च का प्रमुख फोकस रहा है। साल 2014 से यह हमारी यूनिट की पहचान और देखभाल के तरीके का एक अहम हिस्सा रहा है। यह इस बात को समझने के बारे में है कि एक बहुत ज़्यादा प्रीटर्म बच्चे को सिर्फ़ मेडिकल मदद ही नहीं बल्कि उससे ज़्यादा की ज़रूरत होती है। जब दिमाग बढ़ रहा होता है, तो माहौल, पोज़िशन, सेंसरी स्टिम्युलेशन और देखभाल करने वालों के साथ बातचीत भी मायने रखती है। ऑक्टोपस थेरेपी जैसी तकनीकों का उद्देश्य माँ से अलग रहने के दौरान बच्चे को एक परिचित संवेदी अनुभव और आराम का एहसास देना है।"
निक्की के परिवार वालों ने कहा, "NICU का सफ़र अनिश्चितता से भरा था, लेकिन उसे जो देखभाल और ध्यान मिला, उससे हमें उन मुश्किल हफ़्तों में हिम्मत मिली। उसके ज़्यादा सक्रिय होने से लेकर धीरे-धीरे वज़न बढ़ने तक हर छोटा सुधार हमारे लिए एक बड़े पड़ाव जैसा लगा। लगभग दो महीने बाद उसे घर लाना हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ा पल था, और हम पूरी NICU टीम के बहुत शुक्रगुज़ार हैं क्योंकि उन्होंने देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी।"
हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद फॉलो-अप के समय निक्की का वज़न जन्म के समय 900 ग्राम से बढ़कर लगभग 2.64 kg हो गया था। NICU टीम ने बताया कि वह एक्टिव थी, अच्छे से रोती थी और उसकी मसल्स टोन थीं, और उसने अपनी उम्र के हिसाब से अब तक के सभी माइलस्टोन हासिल कर लिए थे। रेगुलर फॉलो-अप के ज़रिए उसके न्यूरोडेवलपमेंटल और फंक्शनल प्रोग्रेस पर नज़र रखी जा रही है।
यह मामला बहुत ज़्यादा प्रीटर्म बच्चों के मैनेजमेंट में एडवांस्ड नियोनेटल इंटेंसिव केयर को डेवलपमेंटल और न्यूरोप्रोटेक्टिव तरीकों के साथ मिलाने की अहमियत पर ज़ोर देता है। NICU टीम के लिए लक्ष्य सिर्फ बच्चे को बचाना नहीं, बल्कि उसे स्वस्थ और बेहतर तरीके से जीवन की शुरुआत देना है। इसके लिए बच्चे के आगे के विकास, अच्छे न्यूरोडेवलपमेंटल और फंक्शनल नतीजों के साथ-साथ स्वस्थ ग्रोथ पर लगातार ध्यान दिया जाता है।
