अविघ्न थिएटर ग्रुप', गुड़गांव द्वारा प्रायोगिक नाटक "सरे राह चलते-कुढ़ते" का सफल मंचन

 'अविघ्न थिएटर ग्रुप', गुड़गांव द्वारा प्रायोगिक नाटक "सरे राह चलते-कुढ़ते" का सफल मंचन



'अविघ्न थिएटर ग्रुप' द्वारा प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सूर्यबाला द्वारा लिखित नाटक 'सरे राह चलते-कुढ़ते' का शनिवार शाम, 26 सितम्बर 2026 को 'गुरुग्राम कल्चरल फोरम' के कार्यक्रम के अंतर्गत मंचन किया गया।


इस नाटक में डॉ. सूर्यबाला ने लेखकों और साहित्यकारों पर करारा व्यंग्य करते हुए लिखा है कि किस प्रकार साहित्यकार भी 'कुढ़ने' की प्रक्रिया से गुजरते हैं। उन्होंने अत्यंत व्यंग्यपूर्ण ढंग से उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे 'कुढ़ने' की प्रक्रिया में पारंगतता हासिल की जाती है और भविष्य में साहित्य जगत में इसका किस प्रकार उपयोग हो सकता है।


नाटक को एक साक्षात्कार के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहाँ एक इंटरव्यूअर डॉ. सूर्यबाला से उनकी कुढ़ने की कला में पारंगतता और उसमें स्थापित कीर्तिमान के बारे में ज्ञान प्राप्त करती है और दर्शकों को भी कुढ़ने की इस प्रक्रिया से अवगत कराते हुए इसमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।


प्रस्तुति को रोचक बनाने के लिए इसमें विभिन्न गानों की पैरोडी और कविताओं को भी सम्मिलित किया गया। साक्षात्कार के दौरान कलाकारों ने सीधे दर्शकों से संवाद स्थापित किया, जिसमें कई दर्शक मंच पर आकर सवाल पूछते हैं, जिनका डॉ. सूर्यबाला बनी अभिनेत्री ने बहुत ही सहजता और हास्य के साथ जवाब दिया।


नाटक देखकर दर्शक हँसी से लोटपोट हो गए और सभी ने इस प्रयोगात्मक नाटक व इसमे भाग लेने वाले कलाकारों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।


इस नाटक में भाग लेने वाले कलाकार थे - डॉ. आयुषी पांडे, सुश्री सीमा गर्ग, श्री अनिल कौशिक, कर्नल सुमेश सेठ, श्री संदीप जोशी, श्री गोपाल शर्मा, श्री सुधीर कोहली, श्री विहान आचार्य और नाटक की निर्देशिका स्वयं *सुहासिनी दिघे* थीं, जिन्होंने मंच पर स्वयं डॉ. सूर्यबाला का किरदार भी निभाया।


अंत में नाटक की निर्देशिका सुश्री सुहासिनी दिघे जी ने दर्शकों का धन्यवाद अदा करते हुए कहा,*" 'अविघ्न थिएटर ग्रुप' का हमेशा से यह प्रयास रहता है कि वह अच्छे और प्रतिष्ठित लेखकों के साहित्य के माध्यम से जनमानस में साहित्य के प्रति रुचि जगाए। इसी दिशा में अग्रसर होते हुए हमारे द्वारा इस नाटक की प्रस्तुति की गई है और आगे भी 'अविघ्न थिएटर ग्रुप', गुड़गांव के सभी नाटक इसी दिशा में प्रस्तुत किए जाते रहेंगे।"*

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