भारत की महान शाश्वत परम्परा श्रावणी उपाकर्म- गौवत्स आचार्य मनीष हरि

 भारत की महान शाश्वत परम्परा श्रावणी उपाकर्म- गौवत्स आचार्य मनीष हरि


गुरुग्राम। श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है । इस पर्व पर की जाने वाली सभी क्रियाओं का यह मूल भाव है कि बीते समय में मनुष्य से हुए ज्ञात-अज्ञात बुरे कर्म का प्रायश्चित करना और भविष्य में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देना। वर्षाऋतु के चार मास के अन्तर्गत विशेषरूप से पारायण यज्ञों का आयोजन किया जाता है। श्रावणी धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का पर्व है। सद्ज्ञान, बुद्धि, विवेक और धर्म की वृद्धि के लिए इसे निर्मित किया गया, इसलिए इसे ब्रह्मपर्व भी कहते हैं। श्रावणी पर रक्षाबंधन बड़ा ही हृदयग्राही है। श्रावणी वैदिक पर्व है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि इसी दिन से वेद पारायण आरंभ करते थे। इसे ‘उपाकर्म’ कहा जाता था।श्रावणी पर्व पर द्विजत्व के संकल्प का नवीनीकरण किया जाता है। उसके लिए परंपरागत ढंग से तीर्थ अवगाहन, दशस्नान, हेमाद्रि संकल्प एवं तर्पण आदि कर्म किए जाते हैं।ज्ञान से ही विकास का आरंभ होता है। ऋषि पूजन के पीछे उच्चतम आदर्श की परिकल्पना निहित है। 

ऋषि जीवन ने ही महानतम जीवनश्चर्या का विकास और अभ्यास करने में सफलता पाई थी। ऋषि जीवन आंतरिक समृद्धि एवं ऐश्वर्य का प्रतीक है। यह सौम्य जीवन के सुख और मधुरता का पर्याय है। आज के समाज की भटकन का कारण ऋषित्व का घनघोर अभाव है। इस पूजन से इन्हीं तत्त्वों की वृद्धि की कामना की जाती है,श्रावणी और रक्षाबन्धन की स्मृति को प्रगाढ़ करने के लिए पौधरोपण का भी प्रावधान है। वृक्ष परोपकार के प्रतीक हैं, जो बिना कुछ माँगे हमको शीतल छाया, फल और हरियाली प्रदान करते हैं। मानव जीवन के ये करीब के सहयोगी हैं और सदैव हमारी सेवा में तत्पर रहते हैं। अतः हमें भी इनकी सेवा तथा देखभाल करनी चाहिए।शास्त्रोक्त मान्यता है कि अनुकूल मौसम में पौधरोपण करने पर अनंत गुणा पुण्य लाभ होता है। अतः श्रावणी पर्व से अपने जीवन को सत्पथ पर बढ़ाने, रक्षासूत्र द्वारा नारी के प्रति पवित्रता का भाव रखने तथा पौधरोपण द्वारा इन भावनाओं को क्रियाओं में परिणत करने का संकल्प लिया जाता है जो कि इस पर्व का प्राण है।इस पर्व का नाम श्रावणी होने के कारण यह शब्द, श्रुति व श्रवण शब्दों से जुड़ा हुआ है। श्रुति से श्रवण, श्रवण शब्द श्रावणी बनकर आज का श्रावणी पर्व अस्तित्व में आए हैं,श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है – प्रायश्चित्त संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय,

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