बच्चों को दें अनुशासन, गुरु के प्रति रखें श्रद्धा: विनम्र सागर जी महाराज

 बच्चों को दें अनुशासन, गुरु के प्रति रखें श्रद्धा: विनम्र सागर जी महाराज 



महाभारत और रानी मनोवती के प्रसंग से समझाया जीवन का सार 


गुरुग्राम। आज के प्रवचन में महाराज श्री ने जीवन को दिशा देने वाले दो महत्वपूर्ण सूत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बच्चों के पालन-पोषण में अनुशासन और जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा-समर्पण ही उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।


गुरुग्राम। परम पूज्य संत शिरोमणि समाधिस्थ आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज एवं प.पू. अभिनवाचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य परम पूज्य मुनिश्री 108 विनम्र सागर जी महाराज ने 

अपने प्रवचनों में अनुशासन, चरित्र निर्माण और बच्चों के सर्वांगीण विकास का संदेश दिया।


श्री 1008 पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर के प्रधान नरेश कुमार जैन, उप-प्रधान शैलेंद्र जैन, महामंत्री अशोक कुमार जैन और सह-मंत्री जितेंद्र जैन ने बताया कि 

श्री 1008 पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर जैकबपुरा में पधारे विनम्र सागर जी महाराज श्री ने रविवार को भी ज्ञान की गंगा बहाई। महाराज जी ने कहा कि बच्चों को फ्री डिसिप्लिन यानी बिना नियम-मर्यादा के नहीं पालना चाहिए। उन्हें यथार्थ अनुशासन, नियम और मर्यादा के साथ बड़ा किया जाए।

इसे समझाने के लिए उन्होंने महाभारत के दो उदाहरण दिए। मुनिश्री ने कहा कि

धृतराष्ट्र ने दुर्योधन की हर जिद पूरी की। बिना रोक-टोक के लाड़-प्यार ने दुर्योधन को अहंकारी और स्वेच्छाचारी बना दिया। मैं जो करूं वही सही है, यही सोच उसके विनाश का कारण बनी। पांडवों को भी वही गुरु मिले, पर उन्हें बचपन से अनुशासन, संयम, मर्यादा और बड़ों का सम्मान सिखाया गया। इच्छाओं पर नियंत्रण और गुरु के मार्गदर्शन के कारण वे धैर्यवान, आदर्श और मर्यादित बने।

विनम्र सागर जी महाराज जी ने कहा कि जिन घरों में बच्चों को नियम, संयम, संस्कार मिलते हैं, वे आगे चलकर प्रगति करते हैं और समाज के अच्छे नागरिक बनते हैं। जिनको मनमानी की छूट मिलती है, वे मर्यादा से भटक जाते हैं। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि बच्चों को शुरू से ही परंपरा, संस्कार, मर्यादा और अनुशासन का अभ्यास कराएं। यही उनके श्रेष्ठ चरित्र की सबसे मजबूत नींव है।



जैन समाज के प्रवक्ता अभय जैन एडवोकेट ने बताया कि दूसरे प्रसंग में महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन में गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और विश्वास रखना चाहिए। गुरु के वचनों का पालन करने से ही जीवन की दिशा और दशा दोनों बदलती हैं। इसके लिए उन्होंने रानी मनोवती का उदाहरण दिया। रानी मनोवती की अपने गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा थी। परिस्थितियां कैसी भी रहीं, उनका विश्वास कभी नहीं डगमगाया। इसी निष्कपट श्रद्धा के कारण उन्हें भगवान की कृपा और दिव्य अनुभूति प्राप्त हुई।

विनम्र सागर जी महाराज जी ने कहा कि जब शिष्य का भाव निर्मल और समर्पित होता है, तभी श्रद्धा उसे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाती है।

उन्होंने कहा कि गुरु ही भ्रम दूर करते हैं, धर्म-सदाचार का मार्ग दिखाते हैं और जीवन को सार्थक बनाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु के बिना आध्यात्मिक यात्रा कठिन हो जाती है। महाराज श्री ने कहा कि बच्चों को अनुशासन दें और स्वयं गुरु के प्रति श्रद्धा रखें। अनुशासन से चरित्र बनता है और श्रद्धा से जीवन। भक्तों ने प्रवचन सुनकर संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में इन शिक्षाओं को अपनाएंगे।

Previous Post Next Post

نموذج الاتصال