गुरुग्राम: रेखा वैष्णव।
भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और फिजियोथेरेपी के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हुई है। केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में फिजियोथेरेपिस्टों को अपने नाम के साथ ‘डॉ.’ (डॉक्टर) उपसर्ग लगाने और स्वतंत्र रूप से अभ्यास (Independent Practice) करने के अधिकार पर मुहर लगा दी है। न्यायालय का यह निर्णय न केवल इस पेशे को कानूनी मजबूती प्रदान करता है, बल्कि देशभर के लाखों फिजियोथेरेपिस्टों के दशकों पुराने संघर्ष और उनकी पेशेवर गरिमा को एक नई पहचान देता है।
IAPMR की याचिका खारिज, IAP के पक्ष में फैसला
यह मामला 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन' (IAPMR) द्वारा दायर रिट याचिका (संख्या 41064/2025) से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने फिजियोथेरेपिस्टों द्वारा ‘डॉ.’ शब्द के उपयोग और उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, माननीय न्यायालय ने 'इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट्स' (IAP) के तर्कों से सहमति जताते हुए IAPMR की सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि योग्य फिजियोथेरेपिस्ट साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पद्धति का पालन करते हैं और वे बिना किसी अनावश्यक पेशेवर प्रतिबंध के अभ्यास करने के लिए अधिकृत हैं।
पेशेवर स्वायत्तता और गरिमा की जीत
इस निर्णय का स्वागत करते हुए इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट्स के अध्यक्ष प्रो. डॉ. संजीव के. झा और IAP महिला सेल हेड डॉ. रूचि वार्ष्णेय ने कहा कि यह फैसला फिजियोथेरेपी को एक वैज्ञानिक और स्वायत्त स्वास्थ्य पेशे के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने इसे फिजियोथेरेपिस्टों की स्वतंत्र पेशेवर पहचान और सम्मान की औपचारिक मान्यता बताया।
हरियाणा के फिजियोथेरेपिस्टों में खुशी की लहर
हरियाणा IAP के पूर्व अध्यक्ष एवं PhysioConnect India के चेयरमैन डॉ. सर्वोतम चौहान ने इस निर्णय पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा, "यह केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह देशभर के फिजियोथेरेपिस्टों की वर्षों की निष्ठा और वकालत का परिणाम है। यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए पेशेवर सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और फिजियोथेरेपिस्टों को नैतिक एवं साक्ष्य-आधारित अभ्यास के लिए सशक्त बनाएगा।"
मरीजों को मिलेगा सीधा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से रोगियों की फिजियोथेरेपी सेवाओं तक पहुंच और आसान होगी। अब फिजियोथेरेपिस्ट प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के रूप में अधिक प्रभावी ढंग से रोगों की रोकथाम, उपचार और रिहैबिलिटेशन में अपना योगदान दे सकेंगे।
यह निर्णय भारत में फिजियोथेरेपी के इतिहास का एक मील का पत्थर साबित होगा, जिससे न केवल शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुलेंगी, बल्कि इस पेशे से जुड़े लाखों विद्यार्थियों का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। आईएपी ने इस संघर्ष में एकजुट रहने के लिए नेशनल कमीशन फॉर अलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन्स (NCAHP) और देश भर के शिक्षाविदों का आभार व्यक्त किया है।
क्या बदला इस फैसले से?
केरल उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद फिजियोथेरेपी पेशे में आए प्रमुख बदलाव:
नाम की गरिमा: अब योग्य फिजियोथेरेपिस्ट कानूनी रूप से अपने नाम के आगे 'डॉ.' (Dr.) लगा सकेंगे।
स्वतंत्र प्रैक्टिस: क्लीनिक चलाने के लिए अब किसी अन्य मेडिकल रेफरल की कानूनी बाध्यता नहीं, फिजियोथेरेपिस्ट स्वतंत्र अभ्यास के लिए अधिकृत हैं।
प्राइमरी केयर प्रोवाइडर: इन्हें अब 'secondary ' के बजाय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के रूप में पहचान मिली है।
साक्ष्य-आधारित उपचार: कोर्ट ने माना कि फिजियोथेरेपी एक साक्ष्य-आधारित वैज्ञानिक पद्धति है, न कि केवल एक सहयोगी सेवा।
पेशेवर सुरक्षा: यह फैसला देशभर के फिजियोथेरेपिस्टों को अन्य चिकित्सा विधाओं के हस्तक्षेप से कानूनी संरक्षण प्रदान करेगा।
